Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

Page 585Permalink

में है. पृथ्वी पर जितने सांस लेने वाले हैं, वे भी तुम्हारे अधिकार में हैं. इन सब पर कृपा करने
के लिए तुम्हें नमस्कार है. (१०)
उरुः कोशो वसुधानस्तवायं यस्मिन्निमा विश्वा भुवनान्यन्तः.
स नो मृड पशुपते नमस्ते परः क्रोष्टारो अभिभाः श्वानः परो यन्त्वघरुदो
विकेश्यः.. (११)
हे पशुपति! विस्तीर्ण एवं पापपुण्य रूप कर्मों को धारण करने वाला यह कोष ब्रह्मांड
एवं कटाह तुम्हारा है. सभी इसी कोष के अंदर विद्यमान हैं. हे पशुपति! तुम हमें सुखी
बनाओ. तुम्हें नमस्कार है. तुम्हारी कृपा से हमें पराजित करने वाले सियार एवं कुत्ते हम से
दूर देश में चले जाएं. अमंगल पूर्ण रोदन करने वाली पिशाचियां भी हम से दूर चली जाएं.
(११)
धनुर्बिभर्षि हरितं हिरण्ययं सहस्रघ्नि शतवधं शिखण्डिन्.
रुद्रस्येषुश्चरति देवहेतिस्तस्यै नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (१२)
हे रुद्र! तुम विश्व के संहार के लिए धनुष धारण करते हो. जो हरे रंग का, स्वर्ण निर्मित,
एक बार में एक हजार जनों को तापित करने वाला तथा सौ प्राणियों का वध करने वाला है.
हे मोरपंख से निर्मित मुकुट वाले रुद्र! तुम्हारे उस धनुष के लिए नमस्कार है. रुद्र देव का बाण
बिना रुके सर्वत्र जाता है. यह देवों का हनन साधन है. यह बाण जिस दिशा में है, उसी दिशा
में इस बाण को नमस्कार है. (१२)
यो ३ भियातो निलयते त्वां रुद्र निचिकीर्षति.
पश्चादनुप्रयुङ्क्ते तं विद्धस्य पदनीरिव.. (१३)
हे रुद्र! जिस पुरुष पर तुम आक्रमण करते हो, वह तुम्हारे सामने नहीं ठहर पाता एवं
तुम्हारी हिंसा करने की इच्छा करता है. हे देव! इस प्रकार के अपकारी पुरुष को तुम उस के
अपराध के अनुसार उसी प्रकार दंड देते हो, जिस प्रकार घायल व्यक्ति के पद चिन्हों के
अनुसार पहुंच कर शत्रु उस पर वार करता है. (१३)
भवारुद्रौ सयुजा संविदानावुभावुग्रौ चरतो वीर्याय.
ताभ्यां नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (१४)
भव और रुद्र मित्र बने हुए, एक मत को प्राप्त एवं शत्रुओं द्वारा अपराजेय हो कर
अपना शौर्य प्रकट करने के लिए सर्वत्र घूमते हैं. इन दोनों के लिए नमस्कार है. हमारे निवास
स्थान से वे जिस दिशा में वर्तमान हों, वहीं उन को नमस्कार है. (१४)
नमस्ते S स्वायते नमो अस्तु परायते.
नमस्ते रुद्र तिष्ठत आसीनायोत ते नमः.. (१५)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 586Permalink

हे रुद्र! हमारे सम्मुख आते हुए तुम्हें नमस्कार है और हमारी ओर पीठ कर के जाते हुए
तुम्हें नमस्कार है. खड़े हुए एवं अपने स्थान पर बैठे हुए तुम्हें नमस्कार है. (१५)
नमः सायं नमः प्रातर्नमो रात्र्या नमो दिवा.
भवाय च शर्वाय चोभाभ्यामकरं नमः.. (१६)
हे रुद्र! तुम्हें सायंकाल, प्रातःकाल, रात्रि में एवं दिन में नमस्कार है. हे भव और शर्व! मैं
तुम दोनों को नमस्कार करता हूं. (१६)
सहस्राक्षमतिपश्यं पुरस्ताद् रुद्रमस्यन्तं बहुधा विपश्चितम्.
मोपाराम जिह्वयेयमानम्.. (१७)
हजार नेत्रों वाले, क्रांतदर्शी, सामने की ओर बाण चलाने वाले, मेधावी एवं भक्षण के
लिए सारे संसार को अपनी जीभ के अग्र भाग से व्याप्त करने वाले रुद्र के सामने हम न
जाएं. (१७)
श्यावाश्वं कृष्णमसितं मृणन्तं भीमं रथं केशिनः पादयन्तम्.
पूर्वे प्रतीमो नमो अस्त्वस्मै.. (१८)
काले रंग वाले, काले वस्त्रों वाले, हिंसक एवं भयंकर रुद्र ने केशी नामक असुर के रथ
को तोड़ कर धरती पर डाल दिया था. अन्य स्तोताओं के पूर्ववर्ती हम रुद्र को अपना रक्षक
जानते हैं. ऐसे रुद्र को नमस्कार है. (१८)
मा नो ऽ भि स्रा मत्यं देवहेतिं मा नः क्रुधः पशुपते नमस्ते.
अन्यत्रास्मद् दिव्यां शाखां वि धूनु.. (१९)
हे रुद्र! अपने दैवी बाण को हम मरणधर्माओं पर मत चलाओ. हे पशुपति! हमारे प्रति
क्रोध न करो. तुम्हारे लिए नमस्कार है. शाखा के समान विस्तृत अपने दिव्य बाण को हमारी
अपेक्षा अन्यत्र छोड़ो. (१९)
मा नो हिंसीरधि नो ब्रूहि परि णो वृङ्ग्धि मा क्रुधः. मा त्वया समरामहि..
(२०)
हे रुद्र! हमारी हिंसा मत करो. हमारे प्रति पक्षपात के वचन अधिक मात्रा में बोलो. हमें
तुम अपने आयुध का लक्ष्य मत बनाओ एवं हमारे प्रति क्रोध मत करो. हम कभी भी तुम से
न मिलें. (२०)
मा नो गोषु पुरुषेषु मा गृधो नो अजाविषु.
अन्यत्रोग्र वि वर्तय पियारूणां प्रजां जहि.. (२१)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 587Permalink

हे रुद्र! हमारी गायों, पुत्र, भृत्य आदि को मारने की इच्छा मत करो. हमारी बकरियों एवं
भेड़ों की हिंसा करने की बात मत सोचो. हे शक्तिशाली रुद्र! अपना आयुध हमें छोड़ कर
अन्यत्र चलाओ तथा देव हिंसकों की संतान का वध करो. (२१)
यस्य तक्मा कासिका हेतिरेकमश्वस्येव वृषणः क्रन्द एति.
अभिपूर्वं निर्णयते नमो अस्त्वस्मै.. (२२)
ज्वर एवं खांसी जिन रुद्र के आयुध हैं, वे गर्भाधान में समर्थ घोड़े के समान शब्द करते
हुए अपकारी पुरुष के पास जाते हैं. रुद्र के वे आयुध अपराधी के अपराध का विचार कर के
क्रम से नाश करते हैं. ऐसे रुद्र को मेरा नमस्कार है. (२२)
यो ३ न्तरिक्षे तिष्ठति विष्टभितो ऽ यज्वनः प्रमृणन् देवीपीयून्.
तस्मै नमो दशभिः शक्वरीभिः.. (२३)
जो रुद्र अंतरिक्ष में स्थित हो कर यज्ञ न करने वालों एवं देव हिंसकों की हत्या करते हैं,
उन के लिए मेरा हाथ जोड़ कर नमस्कार है. (२३)
तुभ्यमारण्याः पशवो मृगा वने हिता हंसाः सुपर्णाः शकुना वयांसि.
तव यक्षं पशुपते अप्स्व १ न्तस्तुभ्यं क्षरन्ति दिव्या आपो वृधे.. (२४)
हे पशुपति! वन में जन्म लेने वाले हरिण, सिंह आदि पशु एवं हंस आदि नर पक्षी तुम्हारे
लिए बनाए गए हैं. तुम उन्हीं को स्वीकार करो और हमारे पशुओं का वध मत करो. तुम्हारा
पूज्य स्वरूप जलों के भीतर वर्तमान है, इसलिए तुम्हारे स्नान के हेतु दिव्य जल बहते हैं. तुम
हमारे उपयोग के जल को मत छुओ. (२४)
शिंशुमारा अजगराः पुरीकया जषा मत्स्या रजसा येभ्यो अस्यसि.
न ते दूरं न परिष्ठास्ति ते भव सद्यः सर्वान् परि पश्यसि भूमिं
पूर्वस्माद्धंस्युत्तरस्मिन् त्समुद्रे.. (२५)
हे रुद्र! मगर, अजगर, झष, मत्स्य आदि जलचर तुम्हारे हेतु हैं, जिन की ओर तुम अपने
तेज से आयुध चलाते हो. तुम सारी भूमि को एक क्षण में ही देख लेते हो और पूर्व दिशा में
वर्तमान सागर से उत्तर दिशा में स्थित सागर तक एक क्षण में ही पहुंच जाते हो. (२५)
मा नो रुद्र तक्मना मा विषेण मा नः सं स्रा दिव्येनाग्निना.
अन्यत्रास्मद् विद्युतं पातयैताम्.. (२६)
हे रुद्र! ज्वर के द्वारा, विष के द्वारा एवं बिजली रूपी दिव्य तेज के द्वारा हमारा स्पर्श
मत करो. तुम अपने प्रकाश युक्त आयुध को हमें छोड़ कर अन्यत्र गिराओ. (२६)
भवो दिवो भव ईशे पृथिव्या भव आ पप्र उर्व १ न्तरिक्षम्.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 588Permalink

तस्मै नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (२७)
भव द्युलोक और पृथ्वी के स्वामी हैं. ये विस्तृत अंतरिक्ष को अपने तेज से पूर्ण करते हैं.
ये भव और जिस दिशा में भी विद्यमान हैं, उन त्रिलोकव्यापी को उसी दिशा में नमस्कार है.
(२७)
भव राजन् यजमानाय मृड पशूनां हि पशुपतिर्बभूथ.
यः श्रद्दधाति सन्ति देवा इति चतुष्पदे द्विपदे ऽ स्य मृड.. (२८)
हे सब के स्वामी भव! यजमान को सुखी बनाओ. हे गाय, अश्व आदि पशुओं के
पालको! जो मनुष्य ऐसी श्रद्धा करता है कि इंद्र आदि देव मेरे रक्षक हैं, उस मनुष्य की संतान
और पशुओं की रक्षा करो. (२८)
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा नो वहन्तमुत मा नो वक्ष्यतः.
मा नो हिंसीः पितरं मातरं च स्वां तन्वं रुद्र मा रीरिषो नः.. (२९)
हे रुद्र! हमारे संबंधी वृद्ध की हिंसा मत करो. हमारे शिशु की तथा भार वहन के योग्य
युवक की हिंसा मत करो. भार ढोने वाले सेवकों की भी हिंसा मत करो. हे रुद्र! हमारे
मातापिता की तथा हमारे अपने शरीर की भी हिंसा मत करो. (२९)
रुद्रस्यैलबकारेभ्यो ऽ संसूक्तगिलेभ्यः.
इदं महास्येभ्यः श्वभ्यो अकरं नमः.. (३०)
मैं रुद्र को प्रेरणा देने वाले कर्म करने वालों को नमस्कार करता हूं. मैं अशोभन वचन
बोलने वाले रुद्र गणों को तथा शिकार के सहायक विशाल मुख वाले कुत्तों को नमस्कार
करता हूं. (३०)
नमस्ते घोषिणीभ्यो नमस्ते केशिनीभ्यः.
नमो नमस्कृताभ्यो नमः सम्भुञ्जतीभ्यः.
नमस्ते देव सेनाभ्यः स्वस्ति नो अभयं च नः.. (३१)
हे रुद्र! घोष करती हुई एवं बिखरे हुए केशों वाली तुम्हारी सेनाओं को नमस्कार है.
तुम्हारी चंडेश्वर सेनाओं को नमस्कार है, जिन्हें सब प्रणाम करते हैं. तुम्हारी एक साथ भोजन
करती हुई सेनाओं को नमस्कार है. हे देव, तुम्हारी कृपा से हमें कुशल और निर्भयता प्राप्त
हो. (३१)
सूक्त-३ देवता—बृहस्पति का भोजन
तस्यौदनस्य बृहस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 589Permalink

विराट् के रूप में कल्पित ओदन अर्थात् भात का शीश बृहस्पति और मुख ब्रह्म है. (१)
द्यावापृथिवी श्रोत्रे सूर्याचन्द्रमसावक्षिणी सप्तऋषयः प्राणापानाः.. (२)
द्यावा पृथिवी उस ओदन के दोनों कान, सूर्य, चंद्रमा दोनों आंखें और सात ऋषि उस के
प्राण तथा अपान वायु हैं. (२)
चक्षुर्मुसलं काम उलूखलम्.. (३)
इस प्रकार की महिमा वाले ओदन का मूसल चक्षु और उलूखल कान हैं. (३)
दितिः शूर्पमदितिः शूर्पग्राही वातो ऽ पाविनक्.. (४)
असुरों की माता इस का सूप हैं, देव माता अदिति उस सूप को पकड़ने वाली हैं और
वायु चावलों और भूसी का विवेचन करने वाले हैं. (४)
अश्वाः कणा गावस्तण्डुला मशकास्तुषाः.. (५)
ओदन संबंधी कण अश्व, चावल गाय और भूसी मशक अर्थात् मच्छर हैं. (५)
कब्रु फलीकरणः शरो ऽ भ्रम्.. (६)
इस ओदन का फलीकरण ही कब्रु नामक प्राणी है, जिस के सिर और भौंहों में भेद नहीं
होता. आकाश में घूमता हुआ मेरु ही उस का सिर है. (६)
श्याममयो ऽ स्य मांसानि लोहितमस्य लोहितम्.. (७)
खनित्र अथवा फावड़े का काले रंग का लोहा इस विराट् रूप ओदन का मांस और लाल
रंग का तांबा इस का रक्त है. (७)
त्रपु भस्म हरितं वर्णः पुष्करमस्य गन्धः.. (८)
ओदन पकाने के पश्चात होने वाली राख जस्ता है, सोना इस ओदन का रंग है और
कमल इस की गंध है. (८)
खलः पात्रं स्फ्यावंसावीषे अनूक्ये.. (९)
खल अर्थात् खलिहान इस ओदन का पात्र तथा अनाज भरने की गाड़ी के फूले हुए
भाग इस के कंधे और गाड़ी की हरसें इस ओदन के कंधों और शरीर के बीच के जोड़ है. (९)
आन्त्राणि जत्रवो गुदा वरत्राः.. (१०)

Page 590Permalink

सभी प्राणियों से संबंधित जो आंतें हैं, वे ही बैलों को गाड़ी में जोड़ने की रस्सियां हैं.
समस्त प्राणियों के शरीर की गुदा गाड़ी और जुए को जोड़ने हेतु चमड़े की रस्सियां हैं. (१०)
इयमेव पृथिवी कुम्भी भवति राध्यमानस्यौदनस्य द्यौरपिधानम्.. (११)
यह दिखाई देती हुई पृथ्वी पकाए जाते हुए पूर्वोक्त ओदन को पकाने की बटलोई है
तथा द्युलोक उसे ढकने का पात्र है. (११)
सीता: पर्शव: सिकता ऊबध्यम्.. (१२)
खेत में हल चलाने से बनने वाली रेखाएं इस ओदन की पसली की हड्डियां हैं तथा
नदियों की बालू इस के पेट के भीतर के आधे पके हुए तृण हैं. (१२)
ऋतं हस्तावनेजनं कुल्योपसेचनम्.. (१३)
लोक में विद्यमान समस्त जल इस ओदन के हाथ धुलाने के लिए हैं तथा छोटी नदियां
इस ओदन को मिलाने का साधन हैं. (१३)
ऋचा कुम्भ्यधिहितार्त्विज्येन प्रेषिता.. (१४)
विराट् रूप ओदन को पकाने वाली बटलोई ऋग्वेद में अग्नि पर रखी है और यजुर्वेद ने
इस में आग जलाई है. (१४)
ब्रह्मणा परिगृहीता साम्ना पर्यूढा.. (१५)
इस ओदन को पकाने वाली बटलोई अथर्ववेद ने पकड़ी है और सामवेद ने इसे चारों
ओर से अंगारों से घेर दिया है. (१५)
बृहदायवनं रथन्तरं दर्वि:.. (१६)
बृहत् साम पानी में डाले गए चावलों को मिलाने का काठ है तथा रथंतर साम बटलोई
से भात निकालने की करछुलीस है. (१६)
ऋतव: पक्तार आर्तवा: समिन्धते.. (१७)
वसंत आदि ऋतुएं इस ओदन को पकाने वाली हैं और ऋतुओं संबंधी रातदिन अग्नि
को जलाते हैं. (१७)
चरुं पञ्चबिलमुखं घर्मो ३ भीन्धे.. (१८)
गाय, अश्व, पुरुष, बकरी, भेड़ की उत्पत्ति का कारण विराट् ही चरु अर्थात् ओदन
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 591Permalink

पकाने का पात्र है. सूर्य की धूप उसे गरम करती है. (१८)
ओदनेन यज्ञवचः सर्वे लोकाः समाप्याः.. (१९)
इस प्रकार महा प्रभाव से पके हुए ओदन के द्वारा यज्ञों से प्राप्त होने वाले सभी लोग
पाए जा सकते हैं. (१९)
यस्मिन्तसमुद्रो द्यौर्भूमिस्त्रयो ऽ वरपरं श्रिताः.. (२०)
इस ओदन में सागर, द्यौ और भूमि ऊपरनीचे स्थित है. (२०)
यस्य देवा अकल्पन्तोच्छिष्टे षडशीतयः.. (२१)
यज्ञ से बचे हुए इस ओदन के अंश से चार सौ अस्सी देव शक्तिशाली बनें. (२१)
तं त्वौदनस्य पृच्छामि यो अस्य महिमा महान्.. (२२)
शिष्य ने प्रश्न किया—‘हे गुरु! मैं आप के इस ओदन की उस महिमा को पूछता हूं, जो
अत्यधिक है.’ (२२)
स य ओदनस्य महिमानं विद्यात्.. (२३)
वह प्रसिद्ध गुरु है, जो इस ओदन की महिमा जाने. (२३)
नाल्प इति ब्रूयान्नानुपसेचन इति नेदं च किं चेति.. (२४)
गुरु ओदन की महिमा के उपदेश के समय महिमा की अल्पता का उपदेश न करे. वह
ओदन दूध, घी, आदि से रहित है, ऐसा भी न कहे. वह ओदन सामने रखा है अथवा वह
अनिर्दिष्ट है, ऐसा भी न कहे. (२४)
यावद् दाता ऽ भिमनस्येत तन्नाति वदेत्.. (२५)
ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला मन से जितना फल पाना चाहे, गुरु उस से
अधिक फल न बताए. (२५)
ब्रह्मवादिनो वदन्ति पराञ्चमोदनं प्राशी ३: प्रत्यञ्चा ३ मिति.. (२६)
वेद के विचारक महर्षि परस्पर कहते हैं कि हे देवदत्त! तुम ने इस ओदन को पराङ्मुख
हो कर खाया है अथवा आत्माभिमुख हो कर खाया है. (२६)
त्वमोदनं प्राशी३स्त्वामोदना ३ इति.. (२७)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 592Permalink

तुम ने ओदन को खाया है अथवा ओदन ने तुम्हें खाया है. (२७)
पराञ्चं चैनं प्राशीः प्राणास्त्वा हास्यन्तीत्येनमाह.. (२८)
यदि तुम ने पराङ्मुख हो कर ब्रह्मोदन खाया है, तो प्राण तुम्हें त्याग देंगे. ऐसे ओदन
खाने वाले की महिमा को विद्वान् बताएं. (२८)
प्रत्यञ्चं चैनं प्राशीरपानास्त्वा हास्यन्तीत्येनमाह.. (२९)
यदि तुम ने आत्माभिमुख हो कर ब्रह्मोदन खाया है तो अपान वायु तुम्हें त्याग देगी.
ऐसा ओदन खाने वाले की महिमा को विद्वान् बताएं. (२९)
नैवाहमोदनं न मामोदनः.. (३०)
न मैं ने ओदन खाया है और न ओदन ने मुझे खाया है. (३०)
ओदन एवौदनं प्राशीत्.. (३१)
ओदन ने ही ओदन को खाया है. (३१)
सूक्त-४ देवता—मंत्र में बताए गए
ततश्चैनमन्येन शीर्ष्णा प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
ज्येष्ठस्ते प्रजा मरिष्यतीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. बृहस्पतिना शीर्ष्णा.
तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१)
'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वालों ने जिस शीश से इस ओदन को खाया था, तुम
ने यदि उस से भिन्न शीश के द्वारा खाया है तो तुम्हारी संतान ज्येष्ठ क्रम से मरेगी अर्थात् सब
से पहले बड़ा लड़का मरेगा, उस के पश्चात उस से कम आयु वाला'—ऐसा शिष्य से गुरु कहे.
शिष्य कहे कि इस ओदन को मैं ने न पराङ्मुख हो कर खाया था और न आत्माभिमुख हो
कर खाया है. बृहस्पति से संबंधित ओदन का जो शीश है, उस ओर से मैं ने ओदन को खाया
था तथा उसी शीश से ओदन को वहां पहुंचाया है, जहां उसे पहुंचना चाहिए. यह ओदन सभी
अंगों से युक्त, सभी जोड़ों से युक्त एवं संपूर्ण शरीर वाला है. जो पुरुष ऊपर बताए हुए ढंग से
ओदन को खाना जानता है, वही संपूर्ण अंगों से युक्त, सभी जोड़ों से युक्त एवं संपूर्ण शरीर
वाला होता है. (१)
ततश्चैनमन्याभ्यां श्रोत्राभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
बधिरो भविष्यसीत्येनमाह.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 593Permalink

तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
द्यावापृथिवीभ्यां श्रोत्राभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (२)
‘हे देवदत्त! इन पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन कानों की ओर से इस ओदन को
खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न ओर से उस को खाया तो तुम बहरे हो जाओगे.’—गुरु
शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया, न
सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने ओदन को द्यावा, पृथ्वी रूप
कानों की ओर से खाया है. उन्हीं के द्वारा मैं ने ओदन खाया है और उसे वहां पहुंचा दिया,
जहां उसे पहुंचना था. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर के
रूप में है. जो इस ओदन को इस रूप में जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों
सहित एवं संपूर्ण शरीर युक्त होता है. (२)
ततश्चैनमन्याभ्यामक्षीभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
अन्धो भविष्यसीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. सूर्याचन्द्रमसाभ्या मक्षीभ्याम्.
ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (३)
‘हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन आंखों की ओर से इस ओदन को
खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न उस की आंखों की ओर से खाया तो तुम अंधे हो
जाओगे’—गुरु इस प्रकार अपने शिष्य से कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न
पराङ्मुख हो कर खाया और न सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया है.
मैं ने इस ओदन को सूर्य और चंद्रमा रूपी आंखों की ओर से खाया है. मैं ने इसे उन्हीं के द्वारा
खाया है और इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे पहुंचना चाहिए. यह ओदन सभी अंगों से
युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. जो इस ओदन को इस रूप में खाना
जानता है, वही समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (३)
ततश्चैनमन्येन मुखने प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
मुखतस्ते प्रजा मरिष्यतीत्येनहमा.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ब्रह्मणा मुखेन. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (४)
‘हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिस मुख से इस ओदन को खाया था,
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 594Permalink

यदि तुम ने उस से भिन्न उस के मुख की ओर से खाया तो तुम्हारी संतान मर जाएगी'—गुरु
इस प्रकार अपने शिष्य से कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया
और न सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने इसे ब्रह्मरूपी मुख की
ओर से खाया. मैं ने इस ओदन को इसी मुख से खाया और वहीं पहुंचाया है, जहां इसे
पहुंचना चाहिए था. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला एवं संपूर्ण शरीर से युक्त
है. जो पुरुष ऊपर बताई हुई विधि से इस ओदन को खाना जानता है, वही संपूर्ण अंगों से
युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला होता है. (४)
ततश्चैनमन्यया जिह्वया प्राशीर्यया चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
जिह्वा ते मरिष्यतीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
अग्नेर्जिह्वया. तयैनं प्राशिषं तयैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (५)
'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिस जीभ की ओर से इस ब्रह्मौदन को
खाया है, तुम ने यदि उस से भिन्न उस की जीभ की ओर से खाया तो तुम्हारी जीभ मर
जाएगी अर्थात् तुम गूंगे हो जाओगे'— गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं
ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया और न सामने से खाया और न आत्माभिमुख हो
कर खाया. मैं ने इसे अग्नि की जीभ से खाया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे
पहुंचना चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों सहित, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर
वाला है. इस विधि से जो इस ओदन को खाना जानता है, वही सब अंगों से युक्त, पूरे जोड़ों
सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला होता है. (५)
ततश्चैनमन्यैर्दन्तैः प्राशीर्यैश्चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. दन्तास्ते
शत्स्यन्तीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ऋतुभिर्दन्तैः तैरैनं प्राशिषं तैरैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (६)
'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन दांतों की ओर से इस ब्रह्मौदन को
खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न उस के दांतों की ओर से इसे खाया तो तुम्हारे दांत गिर
जाएंगे.' गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन का न पराङ्मुख
हो कर खाया, न सामने से खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने इसे वसंत आदि
ऋतुओं रूपी दांतों से खाया है. मैं ने इसे उन्हीं के द्वारा खाया है और इसे जहां जाना चाहिए
था, वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 595Permalink

वाला है. इस विधि से जो इस ओदन को खाना जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी
जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (६)
सूक्त-५ देवता—मंत्र में बताए गए
एतद् वै ब्रध्नस्य विष्टपं यदोदनः.. (१)
यह जो पूर्वोक्त ओदन अर्थात् भात है, वह सूर्य मंडल के मध्यवर्ती ईश्वर के आकाश में
स्थित मंडल हैं. (१)
ब्रध्नलोको भवति ब्रध्नस्य विष्टपि श्रयते य एवं वेद.. (२)
जो पुरुष ओदन के सूर्य मंडल में स्थित होने के विषय में जानता है, वह सूर्य मंडल में
स्थित होता है तथा सूर्य मंडल रूप स्थान में आश्रय पाता है. (२)
एतस्माद् वा ओदनात् त्रयस्त्रिंशतं लोकान् निरमिमीत प्रजापतिः.. (३)
प्रजापति ने समस्त जगत् के उपादान के रूप में इस ओदन से तैंतीस देव लोकों को
बनाया. (३)
तेषां प्रज्ञानाय यज्ञमसृजत.. (४)
प्रजापति ने उन तैंतीस देव लोकों का साक्षात्कार करने के लिए यज्ञ की रचना की. (४)
स य एवं विदुष उपद्रष्टा भवति प्राणं रुणद्धि.. (५)
जो कोई पुरुष इस प्रकार से उपासक का साक्षात्कार करने वाला होता है एवं उस के
कार्य में बाधा डालता है, वह अपने शरीर में प्राणों की गति को रोकता है. (५)
न च प्राणं रुणद्धि सर्वज्यानिं जीयते.. (६)
वह न केवल शरीर में प्राणों की गति को रोकता है, अपितु आयु से सर्वथा हीन हो जाता
है अर्थात् अल्प आयु में मर जाता है. (६)
ततश्चैनमन्यैः प्राणापानैः प्राशीर्यैश्चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. प्राणापानास्त्वा
हास्यन्तीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. सप्तर्षिभिः प्राणापानैः.
तैरेनं प्राशिषं तैरेनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (७)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिन
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 596Permalink

प्राण और अपनों की सहायता से ओदन का सेवन किया था, तुम ने यदि उस से भिन्न अर्थात्
लौकिक प्राण और अपनों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हारे प्राण और
रूप वायु तुम्हारा त्याग कर देंगे. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैंने इस
का सेवन अभिमुख, पराङ्मुख और आत्माभिमुख हो कर किया है. मैंने इस ओदन का सेवन
सप्तर्षि रूप प्राण और अपान वायुओं की सहायता से किया है इस प्रकार सेवन किया हुआ
होदन संपूर्ण शरीर वाला होता है मैंने इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे जाना चाहिए था. इस
प्रकार सेवन किया हुआ ओदन मनचाहा फल देने वाला होता है. इस विधि से जो इस ओदन
का सेवन करता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (७)
ततश्चैनमन्येन व्यचसा प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
राजयक्ष्मस्त्वा हनिष्यतीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
अन्तरिक्षेण व्यचसा. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (८)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस
विधि से इस ओदन का सेवन किया था, उस के अतिरिक्त यदि किसी अन्य लौकिक विधि से
तुम ने इस ओदन का सेवन किया तो राजयक्ष्मा रोग तुम्हारा विनाश कर देगा.' इस के उत्तर
के रूप में शिष्य गुरु से कहे, कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न
सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैंने इस ओदन का सेवन अंतरिक्ष
विधि से किया है. इस विधि से सेवन किया हुआ ओदन सर्वांग पूर्ण हो जाता है. जो पुरुष इस
प्रकार से ओदन का सेवन करना जानता है वह सर्वांग पूर्ण फल को प्राप्त करता है. (८)
ततश्चैनमन्येन पृष्ठेन प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. विद्युत् त्वा
हनिष्यतीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
दिवा पृष्ठेन. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (९)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वाले ऋषियों ने
जिस पृष्ठ से इस ओदन का सेवन किया है, तू ने यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक पृष्ठ से इस
ओदन का सेवन किया तो विद्युत तेरा विनाश कर देगी. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने
गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख होकर किया है, न सामने से किया है
और न आत्माभिमुख होकर किया है मैं ने द्यौ रूपी पृष्ठ से इस ओदन का सेवन किया है. इसे
जहां जाना चाहिए था मैंने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी
जोड़े वाला और संपूर्ण शरीर वाला है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवन करना चाहता है.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 597Permalink

वही सब अंगो से युक्त सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण फलवाला हो कर स्वर्ग आदि लोकों में
स्थित होता है. (९)
ततश्चैनमन्येनोरसा प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. कृष्या न
रात्स्यसीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
पृथिव्योरसा तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१०)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने
जिस वक्षस्थल से इस ओदन का सेवन किया था, तुम ने उस से भिन्न पृष्ठ से यदि इस ओदन
का सेवन किया तो तुम्हें ऋषि कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होगी.' इस के उत्तर के रूप में
शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे कि मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न
सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने पृथ्वी रूप वक्षस्थल से इस
ओदन का सेवन किया है. इसे जहां जाना चाहिए था मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन
सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीरवाला है. इस विधि से जो उस ओदन
का सेवन करना जानता है, वह समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों वाला संपूर्ण शरीर वाला तथा
सर्वांगफल से युक्त हो कर स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१०)
ततश्चैनमन्येनोदरेण प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
उदरदारस्त्वा हनिष्यतीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न
प्रत्यञ्चम्. सत्येनोदरेण. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (११)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस
उदर से इस ओदन का सेवन किया था, तुम ने यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक उदर से इस
ओदन का सेवन किया तो उदर के लिए कष्ट देने वाला अतिसार रोग तुम्हें नष्ट कर देगा. इस
के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने उस ओदन का सेवन न पराङ्मुख होकर
किया है, न सामने से किया है, न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने सत्यरूपी उदर से इस
ओदन का सेवन किया है. इसे जहां जाना चाहिए था मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन
समस्त अंशों से युक्त सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर से युक्त है इस विधि से जो पुरुष इस
ओदन का सेवन करना जानता है, वही समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण
शरीर वाला है वह स्वर्ग आदि उत्तम लोकों में स्थित होता है. (११)
ततश्चैनमन्येन वस्तिना प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
अप्सु मरिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 598Permalink

समुद्रेण वस्तिना. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१२)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वाले ऋषियों ने
उस ओदन का सेवन जिस व्यक्ति अर्थात् मूत्राशय की सहायता से किया, तुम ने यदि उस से
भिन्न विधि से इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हारी मृत्यु जल में होगी.' उस के उत्तर रूप में
शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख होकर किया, न सामने से
किया और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इसका सेवन समुद्ररूपी बस्ती अर्थात्
मूत्राशय की सहायता से किया है. मैं ने इस ओदन को वहीं पहुंचा दिया है जहां इसे जाना
चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर रहित है. इस
स्थिति से जो इस ओदन का सेवन करना जानता है वही समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों
सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१२)
ततश्चैनमन्याभ्यामूरुभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
ऊरू ते मरिष्यत इत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
मित्रावरुणयो रूरुभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं
भवति य एवं वेद.. (१३)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे— 'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने इस
ओदन का सेवन जिन जंघाओं की सहायता से किया, यदि तुम ने उस से भिन्न अर्थात्
लौकिक जंघाओं की सहायता से इस का सेवन किया तो तुम्हारी जंघाएं नष्ट हो जाएंगी.' इसे
उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे—'मैं ने उस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो
कर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इस ओदन का
सेवन मित्र और वरुण रूपी जंघाओं की सहायता से किया है. इसे जहां जाना चाहिए था, मैं
ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण
शरीर सहित है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवन करना जानता है, वह समस्त अंगों
सहित, सभी जोड़ों से युक्त और संपूर्ण शरीर वाला होता है. वह स्वर्ग आदि पुण्यलोकों में
प्रतीक्षित होता है.' (१३)
ततश्चैनमन्याभ्यामष्ठीवद्भ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
स्रामो भविष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
त्वष्टुरष्ठीवद्भ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं
भवति य एवं वेद.. (१४)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहें—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वाले ऋषियों

Page 599Permalink

ने जिन अस्थियुक्त .... अर्थात् हड्डियों वाले घुटनों की सहायता से सेवन किया था, यदि तुम ने
उस से भिन्न अर्थात् लौकिक अस्थियुक्त जानुओं अर्थात् हड्डियों वाले घुटनों की सहायता से
ओदन का सेवन किया तो तुम्हारे घुटने सूख जाएंगे।” इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने
गुरु से कहे—“मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है न सामने से किया है
और न आत्माभिमुख होकर किया है. मैं ने इस ओदन का सेवन देव के घुटनों की सहायता से
किया है. उसे वहीं पहुंचा दिया है जहां उसे जाना चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त,
सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है, इस विधि से जो ओदन का सेवन करना जानता
है, वह समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर सहित होता है, वह स्वर्ग
आदि पुण्य लोकों में प्रतिष्ठित होता है. (१४)
ततश्चैनमन्याभ्यां पादाभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
बहुचारी भविष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
अश्विनोः पादाभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्. एष वा
ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः
सं भवति य एवं वेद.. (१५)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने
जिन पैरों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया था, उस से भिन्न अर्थात् लौकिक पैरों
की सहायता से यदि तुम ने इस ओदन का सेवन किया तो तुम बहुचरी अर्थात् निरर्थक बहुत
चलने वाले बनोगे।” इस के उत्तर में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न
तो पराङ्मुख होकर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं
ने इस का सेवन अश्विनीकुमारों रूपी चरणों की सहायता से किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा
दिया है जहां इसे जाना था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण
शरीर वाला है. इस स्थिति से जो उस ओदन का सेवन करता है, वह समस्त अंगों वाला, सभी
जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१५)
ततश्चैनमन्याभ्यां प्रपदाभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
सर्पस्त्वा हनिष्यतीत्येनमहा. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
सवितुः प्रपदाभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं
भवति य एवं वेद.. (१६)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने जिन
चरणांशों अर्थात् पंजों की सहायता से ब्रह्मौदन सेवन किया था उससे भिन्न प्रकार से यदि
तुमने इस का सेवन किया तो सर्प तुम्हारी मृत्यु कर देगा।” इस के उत्तर के रूप में शिष्य
अपने गुरु से कहे — मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 600Permalink

किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया, जहां इसे जाना
चाहिए था. मैंने सविता देव के प्रपदों अर्थात् अर्थात् पंजों की सहायता से उस का सेवन
किया है, यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. जो
इस ओदन को उस विधि से सेवन करना जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों
सहित और संपूर्ण शरीर वाला हैं. वह स्वर्ग आदि श्रेष्ठ स्थानों में स्थित होता है. (१६)
ततश्चैनमन्याभ्यां हस्ताभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
ब्राह्मणं हनिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ऋतस्य हस्ताभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं
भवति य एवं वेद.. (१७)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने इस
ओदन को जिन हाथों की सहायता से सेवन किया उस के अतिरिक्त अर्थात् लौकिक हाथों से
यदि इस ओदन का सेवन किया है. यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक हाथों की सहायता से
उस ब्रह्मौदन का सेवन किया तो ब्राह्मणों की हत्या करोगे अथवा तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप
लगेगा. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे—मैं ने इस ओदन का सेवन न
पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से खाया है और न आत्माभिमुख हो कर खाया है. मैं ने
ऋतु रूपी हाथों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया है. मैंने ओदन को वहीं पहुंचा
दिया है, जहां उसे जाना था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण
अंगों सहित है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवना करना जाता. वह समस्त अंगों वाला है.
सभी जोड़ों से युक्त और संपूर्ण शरीर वाला हो जाता है, वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में
प्रतिष्ठित होता है. (१७)
ततश्चैनमन्यया प्रतिष्ठया प्राशीर्यया चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. अप्रतिष्ठानो ऽ
नायटनो मरिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
सत्ये प्रतिष्ठाय. तयैनं प्राशिषं तयैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्गः एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद..
(१८)
गुरु अपने शिष्य से कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस प्रतिष्ठा के
माध्यम से इस ब्रह्मौदन का सेवन किया है उस के अतिरिक्त लौकिक प्रतिष्ठा के माध्यम से
तुम यदि इस ओदन का सेवन करोगे तो तुम बिना प्रतिष्ठा वाले और बिना घर के स्वामी हुए
मरोगे. इस के उत्तर में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे—मैंने इस ब्रह्मौदन का न पराङ्मुख
हो कर सेवन किया है, न सामने से सेवन किया है और न आत्माभिमुख हो कर सेवन किया
है. मैं ने सत्य में प्रतिष्ठित हो कर उस प्रतिष्ठा के माध्यम से इस ओदन का सेवन किया है. इस
ब्रह्मौदन को जहां जाना चाहिए था. मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-६ देवता—प्राण

Page 601Permalink

युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है इस विधि से जो इस ओदन का सेवन
करना जानता है वह समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर है. (१८)
सूक्त-६ देवता—प्राण
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे.
यो भूत: सर्वस्येश्वरो यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१)
इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत् है. यह प्राण
सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत् स्थित है. (१)
नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते स्तनयित्नवे.
नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्षते.. (२)
हे ध्वनि करते हुए प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार है, मेघ घटा में घुस कर वर्षा करने वाले
तुम्हारे लिए नमस्कार है. बिजली के रूप में प्रकाशित एवं वर्षा करते हुए तुम्हें नमस्कार है.
(२)
यत् प्राण स्तनयित्नुनाभिक्रन्दत्योषधी:.
प्र वीयन्ते गर्भान् दधतेऽथो बह्वीर्वि जायन्ते.. (३)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा काल में मेघ ध्वनि के द्वारा जौ, गेहूं, एवं जंगली
वृक्षों को लक्ष्य कर के गरजते हैं, तब सभी फसलें गर्भ धारण करती हैं एवं अनेक प्रकार से
उत्पन्न होती हैं. (३)
यत् प्राण ऋतावागते ऽ भिक्रन्दत्योषधी:.
सर्वं तदा प्र मोदते यत् किं च भूम्यामधि.. (४)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा ऋतु आने पर फसलों को लक्ष्य कर के गर्जन
करते हैं, तब भूमि पर जितने भी प्राणी हैं, वे सब प्रसन्न होते हैं. (४)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
पशवस्तत् प्र मोदन्ते महो वै नो भविष्यति.. (५)
जिस समय प्राण अर्थात् सूर्य देव, पृथ्वी को वर्षा के जल से सभी ओर गीला कर देते हैं,
उस समय गाय आदि पशु प्रसन्न होते हैं कि घास की अधिकता से हमारे लिए उत्सव होगा.
(५)
अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन समवादिरन्.
आयुर्वै नः प्रातीतरः सर्वा नः सुरभीरकः.. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 602Permalink

प्राण अर्थात् सूर्य देव के द्वारा वर्षा के जल से सींची गई फसलें और जड़ीबूटियां सूर्य से
संभाषण करने लगती हैं—"हे प्राण अर्थात् सूर्य देव! तुम हमारा जीवन बढ़ाओ तथा हमें
शोभन गंध वाली बनाओ.” (६)
नमस्ते अ्रस्त्वायते नमो अस्तु परायते.
नमस्ते प्राण तिष्ठत आसीनायोत ते नमः.. (७)
हे प्राण देव! तुझ आते हुए को नमस्कार है और वापस जाते हुए को नमस्कार है. हे
प्राण देव! तुझ स्थिर रहने वाले को तथा बैठे हुए को नमस्कार है. (७)
नमस्ते प्राण प्राणते नमो अस्त्वपानते.
पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः सर्वस्मै त इंद नमः.. (८)
हे प्राण देव! सांस लेने का व्यापार करने वाले तुम्हें नमस्कार है तथा अपान वायु छोड़ने
वाले तुम्हें नमस्कार है. अधिक कहने से क्या लाभ है, समस्त व्यापार अर्थात् क्रियाएं करने
वाले तुम्हें नमस्कार है. (८)
या ते प्राण प्रिया तनूर्यो ते प्राण प्रेयसी.
अथो यद् भेषजं तव तस्य नो धेहि जीवसे.. (९)
हे प्राण देव! तुम्हारा प्रिय जो शरीर है एवं प्राण, अपान अर्थात् अग्नि और सोम रूपी
तुम्हारी जो दो प्रियाएं हैं तथा जो तुम्हारी अमरता प्रदान करने वाली ओषधि है, इन सब से
हमें जीवन के अमृत का साधन ओषधि प्रदान करो. (९)
प्राणः प्रजा अनु वस्ते पिता पुत्रमिव प्रियम्.
प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच्च प्राणति यच्च न.. (१०)
हे प्राण देव! समस्त प्रजाओं के शरीर में तुम इस प्रकार निवास करते हो, जिस प्रकार
पिता अपने वस्त्र से प्रिय पुत्र को ढकता है. प्राण उन सब के स्वामी हैं, जो सांस लेते हैं
अथवा सांस नहीं लेते हैं. (१०)
प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा प्राणं देवा उपासते.
प्राणो ह सत्यवादिनमुत्तमे लोक आ दधत्.. (११)
ये प्राण देव ही मृत्यु करने वाले हैं एवं यही जीवन को कष्टमय बनाने वाले ज्वर हैं. शरीर
के मध्य में वर्तमान इन्हीं प्राण की देवगण उपासना करते हैं. (११)
प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते.
प्राणो ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राणमाहुः प्रजापतिम्.. (१२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 603Permalink

प्राण अर्थात् स्थूल प्रपंच का अभिमानी देवता ईश्वर प्राण है तथा अपनेअपने व्यापारों में
सब को प्रेरित करने वाला परम देवता प्राण है. अपने मनचाहे फल को पाने के लिए सभी
प्राण की उपासना करते हैं. प्राण सूर्य और चंद्रमा है तथा प्राण को ही ज्ञानी जन सब की
रचना करने वाला प्रजापति कहते हैं. (१२)
प्राणापानौ व्रीहियवावनड्‌वान् प्राण उच्यते.
यवे ह प्राण आहितो ऽ पानो व्रीहिरुच्यते.. (१३)
प्राण और अपान प्रधान प्राण की विशेष वृत्तियां हैं. प्राण ही गेहूं, जौ तथा अपान बैल
कहे जाते हैं. प्राण वायु जौ में आश्रित है तथा अपान वायु को ही गेहूं कहा जाता है. (१३)
अपानति प्राणति पुरुषो गर्भे अन्तरा.
यदा त्वं प्राण जिन्वस्यथ स जायते पुनः.. (१४)
पुरुष स्त्री के गर्भाशय के मध्य सांस लेता और अपान वायु छोड़ता है. हे प्राण! जब तुम
गर्भस्थ भ्रूण को पुष्ट करते हो, तब वह जन्म लेता है. (१४)
प्राणमाहुर्मातरिश्वानं वातो ह प्राण उच्यते.
प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१५)
प्राण को मातरिश्वा अंतरिक्ष का स्वामी वायु कहा जाता है. उसी वायु को प्राण कहा
जाता है. उन दोनों में केवल नाम का भेद है. जगत् के आधार बने हुए उस प्राण में भूतकाल
से संबंधित और भविष्य काल में उत्पन्न होने वाला जगत् आश्रित रहता है. इस प्रकार प्राणों
में ही सब प्रतिष्ठित हैं. (१५)
आथर्वणीराङ्गिरसीर्देवीर्मनुष्यजा उत.
ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि.. (१६)
अथर्वा महर्षि द्वारा, अंगिरा महर्षि द्वारा, देवों द्वारा तथा मनुष्यों द्वारा उत्पन्न अनेक
प्रकार की जड़ीबूटियों और फसलों को हे प्राण! तुम ही वर्षा का जल प्रदान कर के प्रसन्न
करते हो. (१६)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
ओषधयः प्र जायन्तेऽथो याः काश्च वीरुधः.. (१७)
प्राण जब वर्षा के रूप में विशाल पृथ्वी पर जल गिराता है, तभी जड़ीबूटियां, फसलें
और जो भी वृक्ष हैं, वे सब उत्पन्न होते हैं. (१७)
यस्ते प्राणेदं वेद यस्मिंश्चासि प्रतिष्ठितः.
सर्वे तस्मै बलिं हरानमुष्मिंल्लोक उत्तमे.. (१८)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 604Permalink

हे प्राण! यह कहा हुआ तुम्हारा माहात्म्य जो जानता है एवं जिस विद्वान् में तुम
प्रतिष्ठित रहते हो, उस के लिए सभी देव स्वर्ग में अमृतमय भाग प्रस्तुत करते हैं. (१८)
यथा प्राण बलिहृतस्तुभ्यं सर्वाः प्रजा इमाः.
एवा तस्मै बलिं हरान् यस्त्वा शृणवत् सुश्रवः.. (१९)
हे प्राण! जिस प्रकार ये सभी प्रजाएं तुम्हारे लिए बलि प्रस्तुत करें. हे सुनने वाले प्राण!
जो तुम्हारा माहात्म्य सुनता है, उस के लिए भी सब बलि प्रस्तुत कर देते हैं. (१९)
अन्तर्गर्भश्चरति देवतास्वाभूतो भूतः स उ जायते पुन:.
स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्रं प्र विवेशा शचीभिः.. (२०)
प्राण गर्भ हो कर देवताओं में विचरण करता है, वही भलीभांति व्याप्त हो कर मनुष्य
आदि के शरीर के रूप में पुनः उत्पन्न होता है. नित्य वर्तमान वह प्राण भूतकाल की वस्तुओं
में तथा भविष्य काल की वस्तुओं के रूप में उत्पन्न होता है. वही अपनी शक्तियों से पिता
और पुत्र में प्रवेश करता है. (२०)
एकं पादं नोत्खिदति सलिलाद्धंस उच्चरन्.
यदङ्ग स तमुत्खिदेन्रैवाद्य
न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदा चन.. (२१)
हंस अर्थात् जगत् के प्राण बने हुए सूर्य जल से उदित होते हुए अपने एक चरण अर्थात्
भाग को जल से ऊपर नहीं उठाते हैं. यदि वे अपने दूसरे चरण को भी ऊपर उठा लें तो काल
विभाजन नहीं हो सकेगा. तब वे कहीं न जा सकेंगे और न दिन और रात हो सकेंगे. (२१)
अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा.
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (२२)
त्वचा, रक्त आदि आठ धातुएं शरीर का निर्माण करती हैं. उन्हीं का यहां रथ के पहियों
के रूप में निरूपण है—यह शरीर आठ पहियों वाला रथ है. प्राण ही इस की एकमात्र धुरी है.
लोक में रथ के पहिए धुरी को घेरे रहते हैं. प्राण रूपी धुरी एक पहिए से निकल कर दूसरे में
प्रवेश करती है. वह प्राण अपने एक अंश से सारे प्राणियों में प्रवेश कर के आत्मा के रूप में
उत्पन्न होता है. उस का दूसरा भाग असीमित ब्रह्म का झंडा अर्थात् ब्रह्मांड बन जाता है.
(२२)
यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः.
अन्येषु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमो ऽ स्तु ते.. (२३)
जो प्राण नाना रूपों को जन्म देने वाला है, जो इस संसार का स्वामी है तथा नाना
प्राणियों के शरीरों में व्याप्त है, उस तीव्रता से व्याप्त होने वाले हे प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार
ebook converter DEMO Watermarks*