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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 596 of 1063

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Page 596

प्राण और अपनों की सहायता से ओदन का सेवन किया था, तुम ने यदि उस से भिन्न अर्थात्
लौकिक प्राण और अपनों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हारे प्राण और
रूप वायु तुम्हारा त्याग कर देंगे. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैंने इस
का सेवन अभिमुख, पराङ्मुख और आत्माभिमुख हो कर किया है. मैंने इस ओदन का सेवन
सप्तर्षि रूप प्राण और अपान वायुओं की सहायता से किया है इस प्रकार सेवन किया हुआ
होदन संपूर्ण शरीर वाला होता है मैंने इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे जाना चाहिए था. इस
प्रकार सेवन किया हुआ ओदन मनचाहा फल देने वाला होता है. इस विधि से जो इस ओदन
का सेवन करता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (७)
ततश्चैनमन्येन व्यचसा प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
राजयक्ष्मस्त्वा हनिष्यतीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
अन्तरिक्षेण व्यचसा. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (८)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस
विधि से इस ओदन का सेवन किया था, उस के अतिरिक्त यदि किसी अन्य लौकिक विधि से
तुम ने इस ओदन का सेवन किया तो राजयक्ष्मा रोग तुम्हारा विनाश कर देगा.' इस के उत्तर
के रूप में शिष्य गुरु से कहे, कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न
सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैंने इस ओदन का सेवन अंतरिक्ष
विधि से किया है. इस विधि से सेवन किया हुआ ओदन सर्वांग पूर्ण हो जाता है. जो पुरुष इस
प्रकार से ओदन का सेवन करना जानता है वह सर्वांग पूर्ण फल को प्राप्त करता है. (८)
ततश्चैनमन्येन पृष्ठेन प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. विद्युत् त्वा
हनिष्यतीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
दिवा पृष्ठेन. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (९)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वाले ऋषियों ने
जिस पृष्ठ से इस ओदन का सेवन किया है, तू ने यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक पृष्ठ से इस
ओदन का सेवन किया तो विद्युत तेरा विनाश कर देगी. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने
गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख होकर किया है, न सामने से किया है
और न आत्माभिमुख होकर किया है मैं ने द्यौ रूपी पृष्ठ से इस ओदन का सेवन किया है. इसे
जहां जाना चाहिए था मैंने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी
जोड़े वाला और संपूर्ण शरीर वाला है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवन करना चाहता है.
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