अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयदि तुम ने उस से भिन्न उस के मुख की ओर से खाया तो तुम्हारी संतान मर जाएगी'—गुरु
इस प्रकार अपने शिष्य से कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया
और न सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने इसे ब्रह्मरूपी मुख की
ओर से खाया. मैं ने इस ओदन को इसी मुख से खाया और वहीं पहुंचाया है, जहां इसे
पहुंचना चाहिए था. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला एवं संपूर्ण शरीर से युक्त
है. जो पुरुष ऊपर बताई हुई विधि से इस ओदन को खाना जानता है, वही संपूर्ण अंगों से
युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला होता है. (४)
ततश्चैनमन्यया जिह्वया प्राशीर्यया चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
जिह्वा ते मरिष्यतीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
अग्नेर्जिह्वया. तयैनं प्राशिषं तयैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (५)
'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिस जीभ की ओर से इस ब्रह्मौदन को
खाया है, तुम ने यदि उस से भिन्न उस की जीभ की ओर से खाया तो तुम्हारी जीभ मर
जाएगी अर्थात् तुम गूंगे हो जाओगे'— गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं
ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया और न सामने से खाया और न आत्माभिमुख हो
कर खाया. मैं ने इसे अग्नि की जीभ से खाया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे
पहुंचना चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों सहित, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर
वाला है. इस विधि से जो इस ओदन को खाना जानता है, वही सब अंगों से युक्त, पूरे जोड़ों
सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला होता है. (५)
ततश्चैनमन्यैर्दन्तैः प्राशीर्यैश्चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. दन्तास्ते
शत्स्यन्तीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ऋतुभिर्दन्तैः तैरैनं प्राशिषं तैरैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (६)
'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन दांतों की ओर से इस ब्रह्मौदन को
खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न उस के दांतों की ओर से इसे खाया तो तुम्हारे दांत गिर
जाएंगे.' गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन का न पराङ्मुख
हो कर खाया, न सामने से खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने इसे वसंत आदि
ऋतुओं रूपी दांतों से खाया है. मैं ने इसे उन्हीं के द्वारा खाया है और इसे जहां जाना चाहिए
था, वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर
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