अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवाला है. इस विधि से जो इस ओदन को खाना जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी
जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (६)
सूक्त-५ देवता—मंत्र में बताए गए
एतद् वै ब्रध्नस्य विष्टपं यदोदनः.. (१)
यह जो पूर्वोक्त ओदन अर्थात् भात है, वह सूर्य मंडल के मध्यवर्ती ईश्वर के आकाश में
स्थित मंडल हैं. (१)
ब्रध्नलोको भवति ब्रध्नस्य विष्टपि श्रयते य एवं वेद.. (२)
जो पुरुष ओदन के सूर्य मंडल में स्थित होने के विषय में जानता है, वह सूर्य मंडल में
स्थित होता है तथा सूर्य मंडल रूप स्थान में आश्रय पाता है. (२)
एतस्माद् वा ओदनात् त्रयस्त्रिंशतं लोकान् निरमिमीत प्रजापतिः.. (३)
प्रजापति ने समस्त जगत् के उपादान के रूप में इस ओदन से तैंतीस देव लोकों को
बनाया. (३)
तेषां प्रज्ञानाय यज्ञमसृजत.. (४)
प्रजापति ने उन तैंतीस देव लोकों का साक्षात्कार करने के लिए यज्ञ की रचना की. (४)
स य एवं विदुष उपद्रष्टा भवति प्राणं रुणद्धि.. (५)
जो कोई पुरुष इस प्रकार से उपासक का साक्षात्कार करने वाला होता है एवं उस के
कार्य में बाधा डालता है, वह अपने शरीर में प्राणों की गति को रोकता है. (५)
न च प्राणं रुणद्धि सर्वज्यानिं जीयते.. (६)
वह न केवल शरीर में प्राणों की गति को रोकता है, अपितु आयु से सर्वथा हीन हो जाता
है अर्थात् अल्प आयु में मर जाता है. (६)
ततश्चैनमन्यैः प्राणापानैः प्राशीर्यैश्चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. प्राणापानास्त्वा
हास्यन्तीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. सप्तर्षिभिः प्राणापानैः.
तैरेनं प्राशिषं तैरेनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (७)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिन
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