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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 593 of 1063

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Page 593

तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
द्यावापृथिवीभ्यां श्रोत्राभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (२)
‘हे देवदत्त! इन पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन कानों की ओर से इस ओदन को
खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न ओर से उस को खाया तो तुम बहरे हो जाओगे.’—गुरु
शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया, न
सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने ओदन को द्यावा, पृथ्वी रूप
कानों की ओर से खाया है. उन्हीं के द्वारा मैं ने ओदन खाया है और उसे वहां पहुंचा दिया,
जहां उसे पहुंचना था. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर के
रूप में है. जो इस ओदन को इस रूप में जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों
सहित एवं संपूर्ण शरीर युक्त होता है. (२)
ततश्चैनमन्याभ्यामक्षीभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
अन्धो भविष्यसीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. सूर्याचन्द्रमसाभ्या मक्षीभ्याम्.
ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (३)
‘हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन आंखों की ओर से इस ओदन को
खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न उस की आंखों की ओर से खाया तो तुम अंधे हो
जाओगे’—गुरु इस प्रकार अपने शिष्य से कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न
पराङ्मुख हो कर खाया और न सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया है.
मैं ने इस ओदन को सूर्य और चंद्रमा रूपी आंखों की ओर से खाया है. मैं ने इसे उन्हीं के द्वारा
खाया है और इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे पहुंचना चाहिए. यह ओदन सभी अंगों से
युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. जो इस ओदन को इस रूप में खाना
जानता है, वही समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (३)
ततश्चैनमन्येन मुखने प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
मुखतस्ते प्रजा मरिष्यतीत्येनहमा.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ब्रह्मणा मुखेन. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (४)
‘हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिस मुख से इस ओदन को खाया था,
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