अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतस्मै नमो यतमस्यां दिशी ३ तः.. (२७)
भव द्युलोक और पृथ्वी के स्वामी हैं. ये विस्तृत अंतरिक्ष को अपने तेज से पूर्ण करते हैं.
ये भव और जिस दिशा में भी विद्यमान हैं, उन त्रिलोकव्यापी को उसी दिशा में नमस्कार है.
(२७)
भव राजन् यजमानाय मृड पशूनां हि पशुपतिर्बभूथ.
यः श्रद्दधाति सन्ति देवा इति चतुष्पदे द्विपदे ऽ स्य मृड.. (२८)
हे सब के स्वामी भव! यजमान को सुखी बनाओ. हे गाय, अश्व आदि पशुओं के
पालको! जो मनुष्य ऐसी श्रद्धा करता है कि इंद्र आदि देव मेरे रक्षक हैं, उस मनुष्य की संतान
और पशुओं की रक्षा करो. (२८)
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा नो वहन्तमुत मा नो वक्ष्यतः.
मा नो हिंसीः पितरं मातरं च स्वां तन्वं रुद्र मा रीरिषो नः.. (२९)
हे रुद्र! हमारे संबंधी वृद्ध की हिंसा मत करो. हमारे शिशु की तथा भार वहन के योग्य
युवक की हिंसा मत करो. भार ढोने वाले सेवकों की भी हिंसा मत करो. हे रुद्र! हमारे
मातापिता की तथा हमारे अपने शरीर की भी हिंसा मत करो. (२९)
रुद्रस्यैलबकारेभ्यो ऽ संसूक्तगिलेभ्यः.
इदं महास्येभ्यः श्वभ्यो अकरं नमः.. (३०)
मैं रुद्र को प्रेरणा देने वाले कर्म करने वालों को नमस्कार करता हूं. मैं अशोभन वचन
बोलने वाले रुद्र गणों को तथा शिकार के सहायक विशाल मुख वाले कुत्तों को नमस्कार
करता हूं. (३०)
नमस्ते घोषिणीभ्यो नमस्ते केशिनीभ्यः.
नमो नमस्कृताभ्यो नमः सम्भुञ्जतीभ्यः.
नमस्ते देव सेनाभ्यः स्वस्ति नो अभयं च नः.. (३१)
हे रुद्र! घोष करती हुई एवं बिखरे हुए केशों वाली तुम्हारी सेनाओं को नमस्कार है.
तुम्हारी चंडेश्वर सेनाओं को नमस्कार है, जिन्हें सब प्रणाम करते हैं. तुम्हारी एक साथ भोजन
करती हुई सेनाओं को नमस्कार है. हे देव, तुम्हारी कृपा से हमें कुशल और निर्भयता प्राप्त
हो. (३१)
सूक्त-३ देवता—बृहस्पति का भोजन
तस्यौदनस्य बृहस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम्.. (१)
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