अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतुम ने ओदन को खाया है अथवा ओदन ने तुम्हें खाया है. (२७)
पराञ्चं चैनं प्राशीः प्राणास्त्वा हास्यन्तीत्येनमाह.. (२८)
यदि तुम ने पराङ्मुख हो कर ब्रह्मोदन खाया है, तो प्राण तुम्हें त्याग देंगे. ऐसे ओदन
खाने वाले की महिमा को विद्वान् बताएं. (२८)
प्रत्यञ्चं चैनं प्राशीरपानास्त्वा हास्यन्तीत्येनमाह.. (२९)
यदि तुम ने आत्माभिमुख हो कर ब्रह्मोदन खाया है तो अपान वायु तुम्हें त्याग देगी.
ऐसा ओदन खाने वाले की महिमा को विद्वान् बताएं. (२९)
नैवाहमोदनं न मामोदनः.. (३०)
न मैं ने ओदन खाया है और न ओदन ने मुझे खाया है. (३०)
ओदन एवौदनं प्राशीत्.. (३१)
ओदन ने ही ओदन को खाया है. (३१)
सूक्त-४ देवता—मंत्र में बताए गए
ततश्चैनमन्येन शीर्ष्णा प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
ज्येष्ठस्ते प्रजा मरिष्यतीत्येनमाह.
तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. बृहस्पतिना शीर्ष्णा.
तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः.
सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१)
'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वालों ने जिस शीश से इस ओदन को खाया था, तुम
ने यदि उस से भिन्न शीश के द्वारा खाया है तो तुम्हारी संतान ज्येष्ठ क्रम से मरेगी अर्थात् सब
से पहले बड़ा लड़का मरेगा, उस के पश्चात उस से कम आयु वाला'—ऐसा शिष्य से गुरु कहे.
शिष्य कहे कि इस ओदन को मैं ने न पराङ्मुख हो कर खाया था और न आत्माभिमुख हो
कर खाया है. बृहस्पति से संबंधित ओदन का जो शीश है, उस ओर से मैं ने ओदन को खाया
था तथा उसी शीश से ओदन को वहां पहुंचाया है, जहां उसे पहुंचना चाहिए. यह ओदन सभी
अंगों से युक्त, सभी जोड़ों से युक्त एवं संपूर्ण शरीर वाला है. जो पुरुष ऊपर बताए हुए ढंग से
ओदन को खाना जानता है, वही संपूर्ण अंगों से युक्त, सभी जोड़ों से युक्त एवं संपूर्ण शरीर
वाला होता है. (१)
ततश्चैनमन्याभ्यां श्रोत्राभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
बधिरो भविष्यसीत्येनमाह.
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