अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)
बालकाण्ड - सर्ग २: भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना...
६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १
तथैव देहेन्द्रियकर्तुरात्मनः
कृतं परेऽध्यस्य जनो विमुह्यति ॥२२॥
किये हुए कर्मोंका आत्मामें आरोप करके मोहित हो जाते हैं ॥२२॥
नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत्
प्रकाशरूपान्यभिचारतः क्वचित् ।
ज्ञानं तथाऽज्ञानमिदं द्वयं हरौ
रामे कथं स्थास्यति शुद्धचिद्धने ॥२३॥
प्रकाश-रूपताका कभी व्यभिचार न होनेसे जिस प्रकार सूर्यमें रात-दिनका भेद नहीं होता—वह सर्वदा एक समान प्रकाशमान रहता है—उसी प्रकार शुद्धचेतनघन भगवान् राममें ज्ञान और अज्ञान दोनों कैसे रह सकते हैं ? ॥२३॥
तस्मात्परानन्दमये रघूत्तमे
विज्ञानरूपे हि न विद्यते तमः ।
अज्ञानसाक्षिण्यरविन्दलोचने
मायाश्रयत्वान्न हि मोहकारणम् ॥२४॥
अतएव परानन्दस्वरूप विज्ञानघन अज्ञान-साक्षी कमलनयन भगवान् राममें अज्ञानका लेश भी नहीं है क्योंकि वे मायाके अधिष्ठान हैं इसलिये वह उन्हें मोहित नहीं कर सकती ॥२४॥
अत्र ते कथयिष्यामि रहस्यमपि दुर्लभम् ।
सीताराममरुत्सूनुसंवादं मोक्षसाधनम् ॥२५॥
हे पार्वति ! इस विषयमें मैं तुम्हें सीता, राम और हनुमान्जीका मोक्षका साधन-रूप संवाद सुनाता हूँ जो अत्यन्त गोपनीय और परम दुर्लभ है ॥२५॥
पुरा रामायणे रामो रावणं देवकण्टकम् ।
हत्वा रणे रणश्लाघी सपुत्रबलवाहनम् ॥२६॥
सीतया सह सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
अयोध्यामगमद्रामो हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ॥२७॥
पूर्वकालमें रामावतारके समय जब युद्धप्रिय श्रीरामचन्द्रजी देवताओंके कण्टकरूप रावणको संतान, सेना और वाहनोंके सहित युद्धमें मारकर सीता, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित हनुमान् आदि वानरोंसे घिरे हुए अयोध्यापुरीमें आये ॥ २६-२७ ॥
अभिषिक्तः परिवृतो वसिष्ठाद्यैर्महात्मभिः ।
सिंहासने समासीनः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥२८॥
दृष्ट्वा तदा हनूमन्तं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम् ।
कृतकार्यं निराकाङ्क्षं ज्ञानापेक्षं महामतिम् ॥२९॥
रामः सीतामुवाचेदं ब्रूहि तत्त्वं हनूमते ।
निष्कल्मषोऽयं ज्ञानस्य पात्रं नौ नित्यभक्तिमान् ॥३०
और वहाँ आकर राज्याभिषेक होनेपर वसिष्ठ आदि महात्माओंसे घिर कर करोड़ों सूर्योंकी प्रभा धारणकर जब सिंहासनपर विराजमान हुए ॥२८॥ उस समय कृतकृत्य और भोगेच्छारहित महामति हनुमान्जीको ज्ञानाभिलाषासे अपने सम्मुख हाथ जोड़े खड़े देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीसे ऐसा कहा—"सीते ! यह हनुमान् हम दोनोंमें अत्यन्त भक्ति रखता है, इसलिये यह निष्पाप है और ज्ञानका सुयोग्य पात्र है। अतः तुम इसे मेरे तत्त्वका उपदेश करो" ॥ २९-३० ॥
तथेति जानकी प्राह तत्त्वं रामस्य निश्चितम् ।
हनूमते प्रपन्नाय सीता लोकविमोहिनी ॥३१॥
तब लोक-विमोहिनी जनकनन्दिनी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीसे 'बहुत अच्छा' कह शरणागत हनुमान्को भगवान् रामका निश्चित तत्त्व बताने लगीं।३ १
रामं विद्धि परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम् ॥३२॥
आनन्दं निर्मलं शान्तं निर्विकारं निरञ्जनम् ।
सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम् ॥३३॥
सीताजीने कहा—"वत्स हनुमान् ! तुम रामको साक्षात् अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म समझो; ये निःसन्देह समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्र, इन्द्रियोंके अविषय, आनन्दघन, निर्मल, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, सर्व-व्यापक, स्वयंप्रकाश और पापहीन परमात्मा ही हैं ॥३२-३३॥
मां विद्धि मूलप्रकृतिं सर्गस्थित्यन्तकारिणीम् ।
तस्य सन्निधिमात्रेण सृजामीदमतान्द्रता ॥३४॥
और मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाली मूल-प्रकृति जानो। मैं ही निरालस्य होकर इनकी सन्निधिमात्रसे इस विश्वकी रचना किया
सर्ग १ ]
बालकाण्डे
७
| तत्सान्निध्यान्मया सृष्टं तस्मिन्नारोप्यतेऽबुधैः।<br>अयोध्यानगरे जन्म रघुवंशेऽतिनिर्मले ॥३५॥<br>विश्वामित्रसहायत्वं मखसंरक्षणं ततः।<br>अहल्याशापशमनं चापभङ्गो महेशितुः ॥३६॥<br>मत्पाणिग्रहणं पश्चाद्भार्गवस्य मदक्षयः।<br>अयोध्यानगरे वासो मया द्वादशवार्षिकः॥३७॥<br>दण्डकारण्यगमनं विराधवध एव च।<br>मायामारीचमरणं मायासीताहृतिस्तथा ॥३८॥<br>जटायुषो मोक्षलाभः कबन्धस्य तथैव च।<br>शबर्याः पूजनं पश्चात्सुग्रीवेण समागमः ॥३९॥<br>वालिनश्च वधः पश्चात्सीतान्वेषणमेव च।<br>सेतुबन्धश्च जलधौ लंकायाश्च निरोधनम् ॥४०॥<br>रावणस्य वधो युद्धे सपुत्रस्य दुरात्मनः।<br>विभीषणे राज्यदानं पुष्पकेण मया सह ॥४१॥<br>अयोध्यागमनं पश्चाद्राज्ये रामाभिषेचनम्।<br>एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि।<br>आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ४२<br>रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोच-<br>त्याकाङ्क्षते त्यजति नो न करोति किञ्चित्।<br>आनन्दमूर्तिरचलः परिणामहीनो<br>मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ॥४३॥<br><br>ततो रामः स्वयं प्राह हनूमन्तमुपस्थितम्।<br>शृणु तत्त्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ४४<br>आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान्।<br>जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि।<br>प्रतिबिम्बाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ॥४५॥ | करती हूँ ॥३४॥ तो भी इनकी सन्निधिमात्रसे की हुई मेरी रचनाको बुद्धिहीन लोग इनमें आरोपित कर लेते हैं। अतएव, अयोध्यापुरीमें अत्यन्त पवित्र रघुकुलमें इनका जन्म लेना ॥ ३५ ॥ फिर विश्वामित्रजीकी सहायता करना, उनके यज्ञकी रक्षा करना, अहल्याको शाप-मुक्त करना, श्रीमहादेवजीके धनुषको तोड़ना ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् मेरा पाणिग्रहण करना, परशुरामजीका गर्व-खण्डन करना तथा बारह वर्षतक मेरे साथ अयोध्यापुरीमें रहना ॥ ३७॥ फिर दण्डकारण्यमें जाना, विराधका वध करना, माया-मृगरूप मारीचका मारा जाना, मायामयी सीताका हरा जाना ॥ ३८ ॥ तदनन्तर जटायु और कबन्धका मुक्त होना, शबरीद्वारा भगवान्का पूजित होना और सुग्रीवसे मित्रता होना ॥ ३९ ॥ फिर बालिका वध करना, सीताजीकी खोज कराना, समुद्रका पुल बँधवाना और लङ्कापुरीको घेर लेना ॥ ४० ॥ तथा पुत्रोंके सहित दुरात्मा रावणको युद्धमें मारना एवं विभीषणको लङ्काका राज्य देकर पुष्पक-विमानद्वारा मेरे साथ अयोध्या लौट आना, फिर श्रीरामजीका राज्यपदपर अभिषिक्त होना—इत्यादि समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किये हुए हैं तो भी अज्ञानी लोग उन्हें इन निर्विकार सर्वात्मा भगवान् राममें आरोपित करते हैं ॥ ४१-४२ ॥ ये राम तो (वास्तवमें) न चलते हैं, न ठहरते हैं, न शोक करते हैं, न इच्छा करते हैं, न त्यागते हैं और न कोई अन्य क्रिया ही करते हैं। ये आनन्दस्वरूप, अविचल और परिणामहीन हैं, केवल मायाके गुणोंसे व्याप्त होनेके कारण ही ये वैसे प्रतीत होते हैं॥ ४३ ॥<br><br>तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने सम्मुख खड़े हुए पवनपुत्र हनुमान्से स्वयं कहा—"मैं तुम्हें आत्मा, अनात्मा और परमात्माका तत्त्व बताता हूँ, (सावधान होकर) सुनो ॥ ४४ ॥ जलाशयमें आकाशके तीन भेद स्पष्ट दिखायी देते हैं—एक महाकाश¹, दूसरा जलावच्छिन्न आकाश² और तीसरा प्रतिबिम्बाकाश³। जैसे आकाशके ये तीन बड़े-बड़े भेद दिखायी देते हैं ॥४५॥ उसी प्रकार चेतन भी तीन प्रकारका |
¹ १, जो सर्वत्र व्याप्त है। ² २, जो केवल जलाशयमें ही परिमित है। ³ ३, जो जलमें प्रतिबिम्बित है।
| ८ | अध्यात्मरामायणं | [ सर्ग १ |
|---|
बुद्धयवच्छिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम्।
आभासस्त्वपरं विम्बभूतमेवं त्रिधा चितिः॥४६॥
साभासबुद्धेः कर्तृत्वमविच्छिन्नेऽविकारिणि।
साक्षिण्यारोप्यते भ्रान्त्या जीवत्वं च तथाऽबुधैः॥४७
आभासस्तु मृषा बुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते।
अविच्छिन्नं तु तद्ब्रह्म विच्छेदस्तु विकल्पतः ४८
अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च साभासस्याहमस्तथा॥४९॥
ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः।
तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः॥५०॥
एतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते।
मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।
न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि॥५१॥
इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो
मयैव साक्षात्कथितं तवानघ।
मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया
दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम्॥५२॥
श्रीमहादेव उवाच
एतत्तेऽभिहितं देवि श्रीरामहृदयं मया।
अतिगुह्यतमं हृद्यं पवित्रं पापशोधनम्॥५३॥
साक्षाद्रामेण कथितं सर्ववेदान्तसंग्रहम्।
यः पठेत्सततं भक्त्या स मुक्तो नात्र संशयः॥५४॥
ब्रह्महत्यादिपापानि बहुजन्मार्जितान्यपि।
नश्यन्त्येव न सन्देहो रामस्य वचनं यथा॥५५॥
है—एक तो बुद्धयवच्छिन्न चेतन (जो बुद्धिमें व्याप्त है), दूसरा जो सर्वत्र परिपूर्ण है और तीसरा जो बुद्धिमें प्रतिबिम्बित होता है—जिसको आभासचेतन कहते हैं॥४६॥ इनमेंसे केवल आभास-चेतनके सहित बुद्धिमें ही कर्तृत्व है अर्थात् चिदाभासके सहित बुद्धि ही सब कार्य करती है। किन्तु अज्ञजन भ्रान्तिवश निरवच्छिन्न, निर्विकार, साक्षी आत्मामें कर्तृत्व और जीवत्वका आरोप करते हैं अर्थात् उसे ही कर्त्ता-भोक्ता मान लेते हैं॥४७॥ (हमने जिसे जीव कहा है, उसमें) आभास-चेतन तो मिथ्या है (क्योंकि सभी आभास मिथ्या ही हुआ करते हैं)। बुद्धि अविद्याका कार्य है और परब्रह्म परमात्मा वास्तवमें विच्छेदरहित है अतः उसका विच्छेद भी विकल्पसे ही माना हुआ है॥४८॥ (इसी प्रकार उपाधियोंका बाध करते हुए) साभास अहंकरूप अवच्छिन्न चेतन (जीव) की 'तत्त्वमसि' (त. वह है) आदि महावाक्योंद्वारा पूर्ण चेतन (ब्रह्म) के साथ एकता बतलायी जाती है॥४९॥ जब महावाक्यद्वारा (इस-प्रकार) जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान उत्पन्न हो जाता है उस समय अपने कार्योंसहित अविद्या नष्ट हो ही जाती है—इसमें कोई सन्देह नहीं॥५०॥ मेरा भक्त इस उपर्युक्त तत्त्वको समझ-कर मेरे स्वरूपको प्राप्त होनेका पात्र हो जाता है; पर जो लोग मेरी भक्तिको छोड़कर शास्त्ररूप गढ़ेमें पड़े भटकते रहते हैं उन्हें सौ जन्मतक भी न तो ज्ञान होता है और न मोक्ष ही प्राप्त होता है॥५१॥ हे अनघ! यह परम रहस्य मुझ आत्मस्वरूप रामका हृदय है; और साक्षात् मैंने ही तुम्हें सुनाया है। यदि तुम्हें इन्द्रलोकके राज्यसे भी अधिक सम्पत्ति मिले तो भी तुम इसे मेरी भक्तिसे हीन किसी दुष्ट पुरुषको मत सुनाना"॥५२॥
श्रीमहादेवजी बोले—हे देवि! मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गोपनीय, हृदयहारी, परम पवित्र और पापनाशक 'श्रीरामहृदय' सुनाया है॥५३॥ यह समस्त वेदान्तका सार-संग्रह साक्षात् श्रीरामचन्द्रजीका कहा हुआ है। जो कोई इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह निस्सन्देह मुक्त हो जाता है॥५४॥ इसके पठन-मात्रसे अनेक जन्मोंके सञ्चित ब्रह्महत्यादि समस्त पाप निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि श्रीरामके वचन
सर्ग २ ] बालकाण्ड ९
| योऽतिभ्रष्टोऽतिपापी परधनपरदा-<br> रेषु नित्योद्यतो वा<br>स्तेयी ब्रह्मघ्नमातापितृवधनिरतो<br> योगिवृन्दोपकारी।<br>यः संपूज्याभिरामं पठति च हृदयं<br> रामचन्द्रस्य भक्त्या<br>योगीन्द्रैरप्यलभ्यं पदमिह लभते<br> सर्वदेवैः स पूज्यम् ॥ ५६॥ | ऐसे ही हैं ॥ ५५ ॥ जो कोई अत्यन्त भ्रष्ट, अतिशय पापी, परधन और परस्त्रियोंमें सदा प्रवृत्त रहनेवाला, चोर, ब्रह्म-हत्यारा, माता-पिताका वध करनेमें लगा हुआ और योगिजनोंका अहित करनेवाला मनुष्य भी श्रीरामचन्द्रजीका पूजनकर इस रामहृदयका भक्तिपूर्वक पाठ करता है वह समस्त देवताओंके पूज्य उस परमपदको प्राप्त होता है जो योगिराजोंको भी परम दुर्लभ है ॥५६॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे<br>श्रीरामहृदयं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवान्का उनकी प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें धैर्य बँधाना।
| पार्वत्युवाच<br>धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्प्रभो।<br>विच्छिन्नो मेऽतिसन्देहग्रन्थिर्भवदनुग्रहात् ॥ १ ॥<br>त्वन्मुखाद्गलितं रामतत्त्वामृतरसायनम्।<br>पिबन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवापहम् ॥ २ ॥<br>श्रीरामस्य कथा त्वत्तः श्रुता संक्षेपतो मया।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण स्फुटाक्षरम् ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेव उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत्।<br>अध्यात्मरामचरितं रामेणोक्तं पुरा मम ॥ ४ ॥<br>तदद्य कथयिष्यामि शृणु तापत्रयापहम्।<br>यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुरज्ञानोत्थमहाभयात्।<br>प्राप्नोति परमासृद्धिं दीर्घायुः पुत्रसन्ततिम् ॥ ५ ॥<br>भूमिर्भारेण मग्ना दशवदनमुखा-<br> शेषरक्षोगणानां<br>धृत्वा गोरूपमादौ दिविजमुनिजनैः<br> साकमब्जासनस्य। | पार्वतीजी बोलीं— हे जगत्प्रभो ! आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर मैं धन्य और कृतकृत्य हो गयी तथा मेरी कठिन सन्देहग्रन्थि टूट गयी ॥ १ ॥ हे देव ! आपके मुखसे चूते हुए भवभयहारी रामतत्त्वरूप अमृतमय रसायनका पान करते-करते मेरा मन तृप्त नहीं होता ॥ २ ॥ मैंने आपके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी कथा संक्षेपसे सुनी। अब मैं उसे स्पष्ट शब्दोंमें विस्तारपूर्वक सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेवजी बोले— हे देवि ! सुनो, मैं तुम्हें गुह्यसे भी गुह्य महान् अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ जो पहले मुझे श्रीरामचन्द्रजीने ही सुनायी थी ॥ ४ ॥ अब मैं तुम्हें वह तापत्रयहारिणी अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। इसके सुननेसे जीव अज्ञानजन्य महाभयसे छूट जाता है और परम ऐश्वर्य, दीर्घ आयु तथा पुत्र-पौत्रादि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥<br>एक बार रावण आदि राक्षसोंके भारसे व्यथित हो पृथिवी गौका रूप धारणकर देवता और मुनिजनोंके सहित श्रीब्रह्माजीके लोकको गयी। वहाँ पहुँचकर उसने रोते हुए, अपनेपर पड़ा हुआ सारा दुःख |
· १० अध्यात्मरामायण [ सर्ग २
| · गत्वा लोकं रुदन्ती व्यसनमुपगतं<br> ब्रह्मणे प्राह सर्वं<br>ब्रह्मा ध्यात्वा मुहूर्तं सकलमपि हृदा-<br> ऽवेदशेषामकत्वात् ॥ ६ ॥ | ब्रह्माजीसे कहा। तब ब्रह्माजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ हो अपने मनमें उसकी दुःख-निवृत्तिका सम्पूर्ण उपाय जान लिया क्योंकि वे सर्वान्तर्यामी हैं॥ ६ ॥ तत्पश्चात् |
| तस्मात्क्षीरसमुद्रतीरमगमद्<br> ब्रह्माथ देवैर्वृतो<br>देव्या चाखिललोकहृत्स्थमजरं<br> सर्वज्ञमीशं हरिम् ।<br>अस्तौषीच्छ्रुतिसिद्धनिर्मलपदैः<br> स्तोत्रैः पुराणोद्भवै-<br>र्भक्त्या गद्गदया गिरातिविमलै-<br> रानन्दवाष्पैर्वृतः ॥ ७ ॥ | वहाँसे समस्त देवताओंके सहित श्रीब्रह्माजी पृथिवीको साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त निर्मल आनन्दाश्रुओंसे परिप्लुत हो अखिल-लोकान्तर्यामी, अजर, सर्वज्ञ, भगवान् हरिकी अति निर्मल भक्तियुक्त गद्गद-वाणीसे श्रुतिसिद्ध विमल पदों और पुराणोक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की ॥ ७ ॥ तब सहस्रों |
| ततः स्फुरत्सहस्रांशुसहस्रसदृशप्रभः ।<br>आविरासीद्धरिः प्राच्यां दिशं व्यपनयंस्तमः ॥८॥ | देदीप्यमान सूर्योंके समान प्रभावान् भगवान् हरि (अपने तेजसे) सब दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए पूर्व-दिशामें प्रकट हुए ॥ ८ ॥ पुण्य- |
| कथंचिद्ददृशूवान्ब्रह्मा दुर्दर्शमकृतात्मनाम् ।<br>इन्द्रनीलप्रतीकाशं सितास्यं पद्मलोचनम् ॥ ९ ॥ | हीन पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुर्दर्शनीय भगवान् हरिको (उनके अमित तेजके कारण) ब्रह्माजीने भी बड़ी कठिनतासे देख पाया। इन्द्रनीलमणिके समान उनका तेजोमय श्याम वर्ण था, मुखपर मधुर मुसकान थी और कमलके समान विशाल और मनोहर नेत्र थे ॥ ९ ॥ |
| किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ।<br>विभ्राजमानं श्रीवत्सकौस्तुभप्रभयान्वितम् ॥१०॥ | वे किरीट, हार, केयूर, कुण्डल और कटक आदि आभूषणोंसे सुशोभित तथा श्रीवत्स और कौस्तुभमणिकी प्रभासे युक्त थे॥ १० ॥ |
| स्तुवद्भिः सनकाद्यैश्च पार्षदैः परिवेष्टितम् । ·<br>शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविरोजितम् ॥११॥ | उन्हें स्तुति करते हुए सनकादि पार्षद चारों ओरसे घेरे हुए थे और उनकी शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमालासे अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ११ ॥ |
| स्वर्णयज्ञोपवीतेन स्वर्णवर्णाम्बरेण च ।<br>श्रिया भूम्या च सहितं गरुडोपरि संस्थितम् ॥१२॥ | वे सुनहरे यज्ञोपवीत और पीताम्बरसे सुशोभित एवं लक्ष्मी और भूमिके सहित गरुडपर विराजमान थे। |
| हर्षगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१३॥ | (उनकी ऐसी दिव्य छविको देखकर) पितामह ब्रह्माजी हर्षसे गद्गदकण्ठ हो स्तुति करने लगे ॥ १२-१३ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नतोऽस्मि ते पदं देव प्राणबुद्धीन्द्रियात्मभिः ।<br>यच्चिन्त्यते कर्मपाशाद्दृष्टदि नित्यं मुमुक्षुभिः॥१४॥ | **ब्रह्माजी बोले—**हे देव ! कर्म-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षुजन अपने प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे जिनका नित्य चिन्तन करते हैं आपके उन चरणारविन्दों-को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥ |
| मायया गुणमय्या त्वं सृजस्यवसि लुम्पसि ।<br>जगत्वेन न ते लेप आनन्दानुभवात्मनः ॥१५॥ | आप अपनी त्रिगुणमयी मायाका आश्रय करके ही इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और लय करते हैं; किन्तु ज्ञानानन्दस्वरूप आप इससे लिप्त नहीं होते ॥ १५ ॥ |
| तथा शुद्धिर्न दुष्टानां दानाध्ययनकर्मभिः ।<br>शुद्धात्मता ते यशसि सदा भक्तिमतां यथा ॥१६॥ | हे भगवन् ! आपके विमल यशमें सदा प्रेम रखनेवाले भक्तोंका अन्तःकरण जैसा शुद्ध होता है वैसी शुद्धि मलिन अन्तःकरणवाले पुरुष दान और अध्ययन आदि शुभ कर्मोंसे नहीं प्राप्त कर सकते ॥ १६ ॥ अतः भक्त मुनि- |
सर्ग २] बालकाण्ड ११
| अतस्तवाङ्घ्रिर्मे दृष्टश्चित्तदोषापनुत्तये ।<br>सद्योऽन्तर्हृदये नित्यं मुनिभिः सात्वतैर्वृतः ॥ १७॥ | जन जिनका निरन्तर अपने हृदयमें ध्यान करते हैं ऐसे आपके चरण-कमलोंका आज मैंने अपने अन्तःकरणके दोषोंका तत्क्षण नाश करनेके लिये दर्शन किया है ॥ १७ ॥ |
| ब्रह्माद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थमस्माभिः पूर्वसेवितः ।<br>अपरोक्षानुभूत्यर्थं ज्ञानिभिर्हृदि भावितः ॥ १८॥ | आपके इन चरण-कमलोंका पहले भी हम ब्रह्मा आदि देवगणने अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये सेवन किया है और ज्ञानी मुनिजनोंने अपरोक्षानुभवके लिये अपने हृदयमें निरन्तर ध्यान किया है ॥ १८ ॥ |
| तवाङ्घ्रिपूजानिर्माल्यतुलसीमालया विभो ।<br>स्पर्धते वक्षसि पदं लब्ध्वापि श्रीः सपत्निवत् ॥ १९॥ | हे विभो ! लक्ष्मीजी आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपकी चरणपूजाके समय चढ़ी हुई तुलसीकी मालासे सौतकी तरह डाह करती हैं ॥ १९ ॥ |
| अतस्त्वत्पादभक्तेषु तव भक्तिः श्रियोऽधिका ।<br>भक्तिमेवाभिवाञ्छन्ति त्वद्भक्ताः सारवेदिनः ॥ २०॥ | आपके चरण-कमलोंमें प्रेम रखनेवाले भक्तोंमें आपका प्रेम लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है । इसलिये आपके सारग्राही भक्तजन केवल आपकी भक्तिकी ही इच्छा करते हैं ॥ २० ॥ |
| अतस्त्वत्पादकमले भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ।<br>संसारामयतप्तानां भेषजं भक्तिरेव ते ॥ २१॥ | अतएव हे देव ! आपके चरण-कमलोंमें मेरी सर्वदा भक्ति रहे क्योंकि संसार-रोगके रोगियोंके लिये आपकी भक्ति ही एकमात्र औषध है ॥ २१ ॥ |
| इति ब्रुवन्तं ब्रह्माणं बभाषे भगवान् हरिः ।<br>किं करोमीति तं वेधाः प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥ २२॥ | इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मासे भगवान् हरिने कहा, “मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ?” तब ब्रह्माने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ २२ ॥ |
| भगवन् रावणो नाम पौलस्त्यतनयो महान् ।<br>राक्षसानामधिपतिर्मद्दत्तवरदर्पितः ॥ २३॥ | “भगवन् ! पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाका पुत्र रावण राक्षसोंका राजा है। वह मेरे वरके प्रभावसे अत्यन्त अभिमानी हो गया है ॥ २३ ॥ |
| त्रिलोकीं लोकपालांश्च बाधते विश्वबाधकः ।<br>मानुषेण मृतिस्तस्य मया कल्याण कल्पिता ॥<br>अतस्त्वं मानुषो भूत्वा जहि देवरिपुं प्रभो ॥ २४॥ | वह सम्पूर्ण विश्वका बाधक तीनों लोकों और लोक-पालोंको पीड़ा पहुँचाता है। हे कल्याणरूप ! मैंने उसकी मृत्यु मनुष्यके हाथ रखी है। इसलिये हे प्रभो ! आप मनुष्य-रूप धारणकर उस देवशत्रुका वध कीजिये” ॥ २४ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>कश्यपस्य वरो दत्तस्तपसा तोषितेन मे ॥ २५॥<br>याचितः पुत्रभावाय तथेत्यङ्गीकृतं मया ।<br>स इदानीं दशरथो भूत्वा तिष्ठति भूतले ॥ २६॥ | **श्रीभगवान् बोले—**मैंने कश्यपकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर उन्हें वर दिया था। उन्होंने मुझसे पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेकी प्रार्थना की थी, तब मैंने ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार कर लिया था। इस समय वे पृथिवीपर राजा दशरथ होकर विद्यमान हैं ॥ २५-२६ ॥ |
| तस्याहं पुत्रतामेत्य कौसल्यायां शुभे दिने ।<br>चतुर्धात्मानमेवाहं सृजामीतरयोः पृथक् ॥ २७॥ | उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे पृथक्-पृथक् चार अंशोंमें प्रकट होकर मैं शुभ दिनमें कौशल्याके और अन्य दो माताओंके गर्भसे जन्म लूँगा ॥ २७ ॥ |
| योगमायापि सीतेति जनकस्य गृहे तदा ।<br>उत्पत्स्यते तया सार्धं सर्वं सम्पादयाम्यहम् ॥<br>इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे विष्णुर्ब्रह्मा देवानथाब्रवीत् ॥ २८॥ | उसी समय मेरी योगमाया भी जनकजीके घरमें सीतारूपसे उत्पन्न होगी; उसको साथ लेकर मैं तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करूँगा। ऐसा कह भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा ॥ २८ ॥ |