अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)
DevanagariHindipublished423 pages
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सर्ग २] बालकाण्ड ११
| अतस्तवाङ्घ्रिर्मे दृष्टश्चित्तदोषापनुत्तये ।<br>सद्योऽन्तर्हृदये नित्यं मुनिभिः सात्वतैर्वृतः ॥ १७॥ | जन जिनका निरन्तर अपने हृदयमें ध्यान करते हैं ऐसे आपके चरण-कमलोंका आज मैंने अपने अन्तःकरणके दोषोंका तत्क्षण नाश करनेके लिये दर्शन किया है ॥ १७ ॥ |
| ब्रह्माद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थमस्माभिः पूर्वसेवितः ।<br>अपरोक्षानुभूत्यर्थं ज्ञानिभिर्हृदि भावितः ॥ १८॥ | आपके इन चरण-कमलोंका पहले भी हम ब्रह्मा आदि देवगणने अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये सेवन किया है और ज्ञानी मुनिजनोंने अपरोक्षानुभवके लिये अपने हृदयमें निरन्तर ध्यान किया है ॥ १८ ॥ |
| तवाङ्घ्रिपूजानिर्माल्यतुलसीमालया विभो ।<br>स्पर्धते वक्षसि पदं लब्ध्वापि श्रीः सपत्निवत् ॥ १९॥ | हे विभो ! लक्ष्मीजी आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपकी चरणपूजाके समय चढ़ी हुई तुलसीकी मालासे सौतकी तरह डाह करती हैं ॥ १९ ॥ |
| अतस्त्वत्पादभक्तेषु तव भक्तिः श्रियोऽधिका ।<br>भक्तिमेवाभिवाञ्छन्ति त्वद्भक्ताः सारवेदिनः ॥ २०॥ | आपके चरण-कमलोंमें प्रेम रखनेवाले भक्तोंमें आपका प्रेम लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है । इसलिये आपके सारग्राही भक्तजन केवल आपकी भक्तिकी ही इच्छा करते हैं ॥ २० ॥ |
| अतस्त्वत्पादकमले भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ।<br>संसारामयतप्तानां भेषजं भक्तिरेव ते ॥ २१॥ | अतएव हे देव ! आपके चरण-कमलोंमें मेरी सर्वदा भक्ति रहे क्योंकि संसार-रोगके रोगियोंके लिये आपकी भक्ति ही एकमात्र औषध है ॥ २१ ॥ |
| इति ब्रुवन्तं ब्रह्माणं बभाषे भगवान् हरिः ।<br>किं करोमीति तं वेधाः प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥ २२॥ | इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मासे भगवान् हरिने कहा, “मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ?” तब ब्रह्माने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ २२ ॥ |
| भगवन् रावणो नाम पौलस्त्यतनयो महान् ।<br>राक्षसानामधिपतिर्मद्दत्तवरदर्पितः ॥ २३॥ | “भगवन् ! पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाका पुत्र रावण राक्षसोंका राजा है। वह मेरे वरके प्रभावसे अत्यन्त अभिमानी हो गया है ॥ २३ ॥ |
| त्रिलोकीं लोकपालांश्च बाधते विश्वबाधकः ।<br>मानुषेण मृतिस्तस्य मया कल्याण कल्पिता ॥<br>अतस्त्वं मानुषो भूत्वा जहि देवरिपुं प्रभो ॥ २४॥ | वह सम्पूर्ण विश्वका बाधक तीनों लोकों और लोक-पालोंको पीड़ा पहुँचाता है। हे कल्याणरूप ! मैंने उसकी मृत्यु मनुष्यके हाथ रखी है। इसलिये हे प्रभो ! आप मनुष्य-रूप धारणकर उस देवशत्रुका वध कीजिये” ॥ २४ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>कश्यपस्य वरो दत्तस्तपसा तोषितेन मे ॥ २५॥<br>याचितः पुत्रभावाय तथेत्यङ्गीकृतं मया ।<br>स इदानीं दशरथो भूत्वा तिष्ठति भूतले ॥ २६॥ | **श्रीभगवान् बोले—**मैंने कश्यपकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर उन्हें वर दिया था। उन्होंने मुझसे पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेकी प्रार्थना की थी, तब मैंने ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार कर लिया था। इस समय वे पृथिवीपर राजा दशरथ होकर विद्यमान हैं ॥ २५-२६ ॥ |
| तस्याहं पुत्रतामेत्य कौसल्यायां शुभे दिने ।<br>चतुर्धात्मानमेवाहं सृजामीतरयोः पृथक् ॥ २७॥ | उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे पृथक्-पृथक् चार अंशोंमें प्रकट होकर मैं शुभ दिनमें कौशल्याके और अन्य दो माताओंके गर्भसे जन्म लूँगा ॥ २७ ॥ |
| योगमायापि सीतेति जनकस्य गृहे तदा ।<br>उत्पत्स्यते तया सार्धं सर्वं सम्पादयाम्यहम् ॥<br>इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे विष्णुर्ब्रह्मा देवानथाब्रवीत् ॥ २८॥ | उसी समय मेरी योगमाया भी जनकजीके घरमें सीतारूपसे उत्पन्न होगी; उसको साथ लेकर मैं तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करूँगा। ऐसा कह भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा ॥ २८ ॥ |