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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
आनन्दमय, चिन्मय, प्रकाशमान, निर्वात स्थान में स्थित दीपक के
समान अकृत्रिम मणि की प्रभा वाले परब्रह्म का ध्यान करने से मुक्ति
योगी के करतलगत रहती है ॥१५३-१५७॥
विश्वरूपस्य देवस्य रूपं यत्किंचिदेव हि ।
स्थवीयः सूक्ष्ममन्यद्वा पश्यन्हृदयपंकजे ॥१५८
ध्यायतो योगिनो यस्तु साक्षादेव प्रकाशते ।
अणिमादिफलं चैव सुखेनैवोपजायते ॥१५९
जीवात्मनः परस्यापि यच्चैवमुभयोरपि ।
अहमेव परं ब्रह्म ब्रह्माहमिति संस्थितिः ॥१६०
समाधिः स तु विज्ञेयः सर्ववृत्तिविवर्जितः ।
ब्रह्म संपद्यते योगी न भूयः संसृतिं व्रजेत ॥१६१
एवं विशोध्य तत्त्वानि योगी निःस्पृहचेतसा ।
यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥१६२
ग्राह्याभावे मनःप्राणौ निश्चयज्ञानसंयुक्तः ।
शुद्धसत्त्वे परे लीनो जीवः सैन्धवपिण्डवत् ॥१६३
मोहजालकसंघातं विश्वं पश्यति स्वप्नवत् ।
सुषुप्तिवच्चश्चरति स्वभावपरिनिश्चलः ॥१६४
निर्वाणपदमाश्रित्य योगी कैवल्यमश्नुते ।
इत्युपनिषत् ॥
विश्व-रूप देव का जो कुछ स्थूल, सूक्ष्म अथवा अन्य प्रकार
का रूप है, उसका अपने हृदय-कमल में जो योगी ध्यान करता है वह
साक्षात् उन्हीं के रूप का हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल
को अनायास ही पा लेता है ॥ १५८-१५९ ॥ जीवात्मा और
परमात्मा दोनों का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर "मैं ही ब्रह्म हूँ" इस