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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१६४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्

१६४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्
आसनानि तदङ्गानि स्वस्तिकादीनि वै द्विज ॥३४
वर्ण्यते स्वस्तिकं पादतलयोरुभयोरपि ।
पूर्वोत्तरे जानुनी द्वे कृत्वाऽऽसनमुदीरितम् ॥३५
चित्त को निश्चल बना लेना धारणा है और मैं चिन्मात्र रूप हूँ--
यह भावना ध्यान है ॥ ३१ ॥ ध्यान का भी पूर्णतः विस्मरण कर
देना समाधि है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव
( सरलता ), क्षमा, धैर्य, मिताहार और शुद्धता---ये दस नियम हैं ।
तप, संतोष, आस्तिकता, दान, भगवत्-आराधन, वेदान्त-श्रवण, ह्री
और जप को व्रत कहा जाता है । अब स्वस्तिक आदि आसन और
उनकी विधि को बतलाते हैं ॥३२--३४॥ दोनों पैरों के तलुओं को दोनों
घुटनों के बीच में करके बैठना स्वास्तिक आसन है ॥३५॥
सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठापार्श्वे नियोजयेत् ।
दक्षिणोऽपि तथा सव्यं गोमुगं गोमुखं यथा ॥३६
एकं चरणमन्यस्मिन्नूरावारोप्य निश्चलः ।
आस्ते यदिमेनोघ्नं वीरासनमुदीरितम् ॥३७
गुदं नियम्य गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमेण समाहितः ।
योगासनं भवेदेतदिति योगविदो विदुः ॥३८
ऊर्वोरुपरि वै धत्ते यदा पादतले उभे ।
पद्मासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविषापहम् ॥३९
पद्मासनं सुसंस्थाप्य तदंगुष्ठद्वयं पुनः ।
व्युत्क्रमेणैव हस्ताभ्यां बद्धपद्मासनं भवेत् ॥४०
पीठ के बांई ओर दाहिने गुल्फ को और दांयी और बांयें गुल्फ
को लगाने से जो गौ के मुख की तरह होता है, वही गोमुख आसन
होता है ॥ ३६ ॥ एक चरण को बांयी जांघ पर और दूसरे को
दाहिनी जांघ पर रखने से वीरासन होता है ॥ ३७ ॥ दाहिनी