१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१६० ] [ ... अध्याय
१६० ] [ ... अध्याय
इमं संसारमखिलमाशापाशविधायकम् ।
दधदन्तः फलैर्हीनं वटधाना वटं यथा ॥१३३
हे पुत्र ! जो प्राप्त नहीं होता वह अक्षयपद कहा जाता है । माया
की उत्पत्ति किसके द्वारा हुई, तुम्हें इसका विचार नहीं करना है । तुम्हें
तो इस पर विचार करना चाहिये कि मैं इस माया को कैसे नष्ट करूँ ?
जब यह क्षीण होकर नष्ट हो जाय, तभी अक्षय पद का ज्ञान पा सकोगे ।
यह जहाँ से प्रकट होती है, इसका जैसा स्वरूप है, जैसे यह नष्ट होगी
इसका विचार करते हुये इस रोग के मूल की ही चिकित्सा करनी चाहिए,
जिससे यह तुम्हें बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में न डाले और चित् रूपी
समुद्र स्वयं में विभासित हो उठे । अपने अन्तर में यह दृढ़ भावना करे
कि यह चित् सत्ता एक अखण्ड रूप की है । वह चित्-शक्ति चिन्मय रूप
सागर में स्वल्प क्षोभ युक्त हो रही है । समुद्र में निर्मल चिन्मय तरंग ही
लहरों के समान उठ रही हैं । वायु जैसे स्वयं ही आकाश सरोवर में
लहरें मारता है, वैसे ही स्वात्मा में आत्मा तरङ्गित होता है । सर्व
शक्ति सम्पन्नता के कारण ऐसी दिव्य स्फुरण क्षण भर के लिये होती
है । जिस आत्मशक्ति को चलायमान करने में देश-काल और क्रियाशक्ति
असमर्थ रहती है, वह आत्मशक्ति उच्च अनन्त पद में अवस्थित है । वह
चित्-शक्ति जानी नहीं जाने से परिमित-सी होकर रूप-भावना वाली
होती है । उस परम शक्ति में जब रूप की भावना होती है, तब उसके
साथ नाम और संख्या आदि लग जाती है । चित् शक्ति का वह रूप देश,
काल और क्रिया का आधार भूत है तथा विकल्प के रूप का धारण करने
वाला है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । फिर वह भी वासनाओं की कल्पना
से अहंकार का धारक होता है । निश्चयात्मक एवम् दोषयुक्त हुआ
अहंभाव ही बुद्धि कहा जाता है । वही बुद्धि जब सङ्कल्प का रूप धारण
करती है तब मन रूप हो जाती है और मन जब घोर विकल्प में पड़
जाती है, तब धीरे-धीरे इन्द्रिय रूप को प्राप्त होता है । मेधावी जन
महोपनिषद् [ १६१
हाथ-पांव युक्त देह को ही इन्द्रिय बताते हैं। इस प्रकार सङ्कल्प और
वासना की रस्सी में बँध जाने पर प्राणी दुःख-पास में फँस कर अधोगति
को पाता है। जैसे रेशम बनाने वाला कीड़ा अपनी इच्छा से बन्धन में
पड़ता है, वैसे ही शक्तिमय चित् घोर अहम्भाव को प्राप्त होकर बन्धन में
पड़ जाता है। जंजीर में जकड़े हुये सिंह के समान अपने द्वारा ही
कल्पित तन्मात्र रूपी पाश में रहकर यह चित्-शक्ति नितांत विवश हो
जाती है। यह आत्मा ही कहीं अहंकार रूप से और कहीं चित् के नाम
से जाना जाता है। उसे ही कहीं मन, कहीं बुद्धि और कहीं ज्ञान कहा
गया है। वही कहीं क्रिया है, कहीं प्रकृति और मन कहा जाता है।
इसे कहीं पुर्यष्टक और कहीं बन्धन कहा गया है। यह कहीं इच्छा है
तो कहीं अविद्या। यही आशारूप पाश का निर्माता सम्पूर्ण जगत को
वैसे ही धारण करता है, जैसे बिना फल का वट बीज वट के वृक्ष को
धारण करता है ॥ ११४-१३३ ॥
चिन्तानलशिखादग्धं कोपाजगर चर्वितम् ।
कामाब्धिकल्लोलरतं विस्मृतात्मपितामहम् ॥१३४
समुद्धर मनो ब्रह्मन् मातङ्गमिव कर्दमात् ।
एवं जीवाश्चितो भावा भवभावनयाऽऽहिताः ॥१३५
ब्रह्मणा कल्पिताकारा लक्षशोऽप्यथ कोटिशः ।
संख्याऽतीताः पुरा जाता जायन्तेऽद्यापि चाभितः ॥१३६
उत्पत्स्यन्तेऽपि चैवान्ये कणौघा इव निर्झरात् ।
केचित् प्रथमजन्मानः केचिज्जन्मशताधिकाः ॥१३७
केचित् च्चासंख्यजन्मानः केचित् द्वित्रिभवान्तराः ।
केचित् किन्नरगन्धर्वविद्याधरमहोरगाः ॥१३८
केचिदर्केंदुवरुणास्यक्षाधोक्षपद्मजाः ।
केचिद्ब्राह्मणभूपालवैश्यशूद्रगणाः स्थिताः ॥१३९