१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१५० ] [ पंचम अध्याय
१५० ] [ पंचम अध्याय
त्रुटिते हृदयग्रन्थौ श्लथे वैराग्यरंहसा ॥६५
कातकं फलमासाद्य यथा वारि प्रसीदति ।
तथा विज्ञानवशतः स्वभावः संप्रसीदति ॥६६
नीरागं निरूपासङ्गं निर्द्वन्द्वं निरुपाश्रयम् ।
विनिर्याति मनो मोहाद्विहगः पञ्जरादिव ॥६७
शान्तसंदेहदौरात्म्यं गतकौतुकविभ्रमम् ।
परिपूर्णान्तरं चेतः पूर्णेन्दुरिव राजते ॥६८
जो चित्तत्वहीन परम पद को पा चुके हैं और जो संकल्प जाल
को व्यर्थ कर चुके हैं, वे दोषों से मुक्त हो जाते हैं और ब्रह्म को प्राप्त
करते हैं। जो मन को त्यागकर विमनस्क हो गये हैं, उनका शान्त चित्त
उनकी मेधा को प्रवृद्ध करता है। जिनके मन की वृत्तियां नष्ट हो चुकी
हैं और मानसिक संकल्पों के त्याग का अभ्यास करने से जिनका मन
परिपक्व हो चुका है तथा जो वेदान्त के विचार में मननपूर्वक लगे
रहते हैं, जो मुमुक्षुरूप से देय और उपादेय दोनों प्रकार के पदार्थों का
त्याग करते हैं, जो नित्य द्रष्टा और प्रपंच को न देखने वाले अद्रष्टा हैं,
जो जानने योग्य परम तत्व में लगे रहकर जीवित हैं, जो रसमय तथा रस-
हीन पदार्थों के प्रति अत्यन्त वैराग्य धारणपूर्वक मोहात्मक जगत के पथ
में सुषुप्त बने हुये हैं, जिन्होंने वैराग्य की प्रबलता के कारण सांसारिक
वासनाओं का सुनहरा पाश छिन्न-भिन्न कर डाला है और जिनके हृदय
की गाँठ ढीली हो गई हैं, ऐसे ज्ञानी अपने स्वभाव के द्वारा उसी प्रकार
शुद्ध हो जाते हैं, जैसे निर्मली फल से जल शुद्ध हो जाता है। जब वह मन
पिंजड़े से मुक्त हुये पक्षी के समान मोह पाश से मुक्त हो जाता है तब
अनासक्त, द्वन्द्वातीत, निरालम्ब और राग-रहित हो जाता है। जिनका
दुरात्मभाव शान्त हो चुका है और जो प्रपंचात्मक विचार से विरक्त हो
महोपनिषत् [ १५१
चुके हैं, उनका चित्त पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान सब प्रकार से शोभा
पाता है ॥ ६०-६८ ॥
नाहं न चान्यदस्तीह ब्रह्मैवास्मि निरामयम् ।
इत्यं सदसतोर्मध्यं यः पश्यति स पश्यति ॥६९
अयत्नोपनतेष्वक्षिहग्द्रव्येषु यथाः मनः ।
नीरागमेव पतित तद्वत् कायषु धीरधोः ॥७०
परिज्ञायोपमुक्तो हि भोगो भवति तुष्टये ।
विज्ञाय सेवितश्चोरो मैत्रीमेयि न चोरताम् ॥७१
अशङ्किताऽपि संप्राप्ता ग्रामयात्रा यथाऽध्वगैः ।
प्रेक्ष्यते तद्वदेव ज्ञैर्भोगश्रीरवलोक्यते ॥७२
मनसो निगृहीतस्य लीलाभोगोऽल्पकोऽपि यः ।
तमेबालब्धविस्तारं क्लिष्टत्वाद्बहुमन्यते ॥७३
बन्धमुक्तो महीपालो ग्रासमात्रेण तुष्यति ।
परैरबद्धो नाक्रान्तो न राष्ट्रं बहु मन्यते ॥७४
हस्तं हस्तेन संपीज्य दन्तैर्दन्तान् रिचूर्ण्य च ।
अङ्गान्यङ्गैरिवाक्रम्य जयेदादौ स्वकं मनः ॥७५
मनसो विजयान्नान्या गतिरस्ति भवार्णवे ।
महानरकसाम्राज्ये मत्तदुष्कृतवारणाः ।
आकाशरशलाकाढ्या दुर्जया हीन्द्रियारयः ॥७६
प्रक्षीणचित्तदर्पस्य निगृहीतेन्द्रियद्विषः ।
पद्मिन्य इव हेमन्ते क्षीयन्ते भोगवासनाः ॥७७
तावन्निशीव वेताला वल्गन्ति हृदि वासनाः ।
एकतत्त्वदृढाभ्यासाद्यावन्न विजितं मनः ॥७८
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi