१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१२० ] [ चतुर्थ अध्याय
१२० ] [ चतुर्थ अध्याय
अकर्त्ता हूँ, ऐसी भावना करने पर परम अमृता नाम वाली समता ही
शेष रहती है । जो प्राणी सत्व में विद्यमान रहकर इस लोक में उत्पन्न
हुये हैं, वही गुणवान हैं । वे आकाशस्थ चन्द्र के समान सदा हर्षित रहते
हैं और वे ही उन्नतिशील हैं ॥ १२—१७ ॥
नापदि ग्लानिमायान्ति निशि हेमाम्बुजं यथा ।
नेहन्ते प्रकृतादन्यद्रमन्ते शिष्टवर्त्मनि ॥१८
आकृत्यैव विराजन्ते मैत्र्यादिगुणवृत्तिभिः ।
समाः समरसाः सौम्याः सततं साधुवृत्तयः ॥१९॥
अब्धिवद्गतमर्यादा भवन्ति विशदाशयाः ।
नियतिं न विमुञ्चन्ति महान्तो भास्करा इव ॥२०
कोऽहं कथमिदं चेति संसारमलमाततम् ।
प्रविचार्यं प्रयत्नेन प्राज्ञेन सह साधुना ॥२१
नाकर्मसु नियोक्तव्यं नानार्येण सहावसेत् ।
द्रष्टव्यः सर्वसंहर्त्ता न मृत्युरवहेलया ॥२२
शरीरमस्थि मांसं च त्यक्त्वा रक्ताद्यशोभनम् ।
भृतमुक्तावली तन्तुं चिन्मात्रमवलोकयेत् ॥२३
उपादेयानुपतनं हेयैकान्त विसर्जनम् ।
यदेतन्मनसो रूपं तद्बाह्यं विद्धि नेतरत् ॥२४
गुरुशास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्या च चिद्घने ।
ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः ॥२५
यत्र निशितासिशतपातनमुत्पलताडनवत्सोढव्यं, अग्नि-
दाहो हिमसेचनमिव, अङ्गारार्वटनं चन्दनचर्चैव, निरवधिनाराच
विकिरपातो निदाघविनोदनधारागृहशीकरवर्ष णमिव, स्व-
शिरश्छेदः सुखनिद्रेव, मूकीकरणमाननमुद्रंक, बाधियं महानुप-
चय, इव, इदं नावहेलनया भक्षितव्यं, एवं दृडवैराग्याद्बोधो
भवति ॥ २५—१ ॥
महोपनिषत् [ १२१
गुरुवाक्यसमुद्भूतस्वानुभूत्याऽतिशुद्धया ।
यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥२६
विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्वं विभाति दिक् ।
तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्नास्तीति भावय ॥२७
न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न बान्धवाः ।
न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्थायतनाश्रयः ।
केवलं तन्मनोमात्रजये नासाद्यते पदम् ॥२८
सत्व में स्थित पुरुष स्वर्णिम कमल के समान रात्रि रूप विपत्ति
में कुण्ठित नहीं होते । जो भोग सहज उपलब्ध हो जांय उनके सिवा
अन्य वस्तु की इच्छा नहीं करते और शास्त्र के अनुकूल चलते हैं, वे
सहज ही मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित
रहते हैं । वे सदा समान भाव में स्थित रहकर लगातार साधुवृत्ति में
ही रहे आते हैं । वे लोक मर्यादा से परे रहकर समुद्र के समान
विशाल हृदय वाले होकर सूर्य के समान नियत मार्ग पर ही गमन
करते हैं । विचार करना हो तो स्वयं क्या है, विश्व प्रपंच कैसे उत्पन्न
हुआ है, इस पर बुद्धिपूर्वक विचार करे । वह कभी निरर्थक कार्य को
न करे और दुष्ट के संग से बचता रहे । मृत्यु सब को खा जाती है,
उसके प्रति उपेक्षा-भाव न रखे । यदि उपेक्षा करनी है तो देह, अस्थि,
मांस, रक्त आदि नश्वर पदार्थों के प्रति उपेक्षा करे । जैसे मोती की
लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, वैसे प्राणियों में पिरोये हुये चिदात्मा
को देखे । देय वस्तु को त्यागे और उपादेय को ग्रहण करे । यह जान लो
कि मन का स्वरूप बाहरी है, भीतरी नहीं । गुरु और शास्त्र के वचन
तथा अपने अनुभव से "मैं ब्रह्म हूँ" ऐसा जान ले और शोकादि का त्याग
करे । ऐसी अवस्था में तीक्ष्ण तलवार के सैकड़ों आघात कमल की
कोमल मार के समान सहन करने योग्य हो जाते हैं । अग्नि के द्वारा
जलाये जाने का प्रभाव शीतल जल में स्नान करने के समान सहनीय हो
जाता है। आग के अङ्गारों पर लेटना भी ऐसा लगता है जैसे चन्दन का
लेप कर लिया हो। देह पर निरन्तर होने वाली घातक वाण वर्षा भी
गर्मी को शान्त करने वाली शीतल जल के फुब्बारे के समान मन प्रसन्न
करने वाली हो जाती है। सिर का कट जाना सुखदायिनी निद्रा के
समान होता है। गूँगा हो जाना मौनावलम्बन के समान और बहिरा हों
जाना उन्नति के समान सुखप्रद होता है। परन्तु ऐसी अवस्था उपेक्षा से
नहीं मिल सकती। इसकी प्राप्ति वैराग्य से उत्पन्न हुये आत्मज्ञान द्वारा
ही सम्भव है। गुरुशास्त्र के वचनों और अपने अनुभव के आधार पर जो
मानसिक पवित्रता प्राप्त होती है, उसी के द्वारा निरन्तर आत्म साक्षात्कार
होते रहना सम्भव है। जैसे भभूड़े के नष्ट होने पर दिशा का ज्ञान पुनः
होने लगता है, वैसे ही विज्ञान द्वारा ध्वस्त हुये विश्व की स्थिति नहीं
रहती। धन, मित्र, बन्धु, पुत्र-परिजन आदि मनुष्य का उपकार नहीं
कर सकते। शारीरिक क्लेश के नष्ट होने से अथवा तीर्थस्थान में वास
कर लेने मात्र से ही मनुष्य लाभान्वित नहीं हो सकता, वह तो चिन्मात्र
में लय होकर ही परमपद पा सकता है ॥ १८—२८ ॥
यानि दुःखानि या तृष्णा दुःसहा ये दुराधय ।
शान्तचेतःसु तत् सर्वं तमोऽर्केष्विव नश्यति ॥२९
मातरीव परं यान्ति विषमाणि मृदूनि च ।
विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि शमशालिनि ॥३०
न रसायनपानेन न लक्ष्म्यालिङ्गितेन च ।
न तथा सुखमाप्नोति शमेनान्तर्यथा जनः ॥३१
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा भुक्त्वा च दृष्ट्वा ज्ञात्वा शुभाशुभम् ।
न हृष्यति ग्लायति यः स शान्त इति कथ्यते ॥३२
तुषारकरबिम्बाच्छं मनो यस्य निराकुलम् ।
मरणोत्सवयुद्धेषु स शान्त इति कथ्यते ॥३३
तपस्विषु बहुज्ञेषु याज्ञकेषु नृपेषु च ।
महोपनिषद् [ १२३ ]
बलवत्सु गुणाढ्येषु शमवानेव राजते ॥३४॥
संतोशामृतपानेन ये शान्तास्तृप्तिमागताः ।
आत्माराम महात्मानस्ते महापदमागताः ॥३५॥
अप्राप्तं हि परित्यज्य संप्राप्ते समतां गतः ।
अदृष्टखेदाखेदो यः संतुष्ट इति कथ्यते ॥३६
नाभिनन्दत्यसंप्राप्तं भुङ्क्ते यथेप्सितम् ।
यः स सौम्यसमाचारः सन्तुष्ट इति कथ्यते ॥३७
रमते धीर्ययाप्राप्ते साध्वीवान्तः पुराजिरे ।
सा जीवन्मुक्ततोदेति स्वरूपानन्दायिनी ॥३८
यथाक्षणं यथाशास्त्रं यथादेशं यथासुखम् ।
यथासंभवसत्सङ्गममं मोक्षपथक्रमम् ।
तावद्विचारयेत् प्राज्ञो यावद्विश्रान्तमात्मनि ॥३९
तुर्यविश्रान्तियुक्तस्य निवृत्तस्य भवार्णवात् ।
जीवतोऽजीवताश्चैव गृहस्थस्याथवा यतेः ॥४०
नाकृतेन कृतेनार्थो न श्रुतिस्मृतिविभ्रमैः ।
निर्मन्थर इवाम्भोधिः तिष्ठति यथास्थितः ॥४१
संसार में जितने दुःख, जितनी तृष्णायें और दुश्चिन्ताएं हैं, वे
सब शान्त मन वाले पुरुष में, सूर्य की किरणों से अन्धकार दूर होने के
समान ही नष्ट हो जाती हैं, जैसे माता का पुत्र विश्वास करते हैं, वैसे
ही शम वाले पुरुष का सभी मृदु एवं कठोर प्राणी पूर्ण विश्वास करते
हैं । जो सुख मनुष्य को शांति से प्राप्त होता है, वैसा सुख लक्ष्मी के
आलिंगन द्वारा अथवा अमृत का पान करने पर भी नहीं मिल सकता ।
शांत मनुष्य वही है जो शुभ-अशुभ को सुनकर भी हर्ष विषाद नहीं
करता और भूखा रहने पर या भोजन कर लेने पर दुःख-सुख को नहीं
मानता । जिसका मन चन्द्रमा के समान अत्यन्त निर्मल है और जो
उत्सव, युद्ध अथवा मृत्यु में भी हर्ष-शोक द्वारा अधीर नहीं होता वहीं