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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
प्रातःर्जितं भगमुग्र ९४ हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्त्ता.
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह.. ( ३५ )
हम प्रातःकाल में अदिति देव का आह्वान करते हैं. वे विजेता, सौभाग्यवान, उग्र
व संसार के धारक हैं. यह कहा गया है कि धनवान, गरीब, रोगी, राजा कोई भी हो
वे अभीष्ट मनोकामना सिद्धि हेतु सूर्य की उपासना ( आराधना ) करते हैं. ( ३५ )
भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददनः.
भग प्र नो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम.. ( ३६ )
हे भग देव! आप हमारे पथ के प्रणेता हैं. हे भग देव! आप सत्य रूपी धन के
प्रदाता हैं. हे भग देव! आप उन्नतिदायी बुद्धि के प्रदाता हैं. हे भग देव! आप हमारे
लिए गाएं उत्पन्न करें. हे भग देव! आप हमारे लिए घोड़े उत्पन्न करें. हे भग देव!
आप की कृपा से हम नेतृत्व करने वाली संतान वाले हो जाएं. ( ३६ )
उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व ऽ उत मध्ये अह्नाम्.
उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवाना ९४ सुमतौ स्याम.. ( ३७ )
हम सूर्य की कृपा से सद्बुद्धि वाले व धनवान हो जाएं. हम उन की कृपा से सूर्योदय
में धन प्राप्त करें. हम उन की कृपा से मध्याह्न और सूर्यास्त में धन संपन्न हों. ( ३७ )
भग ऽ एव भगवाँ २ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम.
तं त्वा भग सर्व ऽ इज्जोहवीति स नो भग पुर ऽ एता भवेह.. ( ३८ )
हे भग देव! आप धनवान व भाग्यवान हैं. आप की कृपा से हम यजमान भी
धनवान और भाग्यवान हो जाएं. यजमान भग देव का आह्वान करते हैं. आप हमारे यहां
पधार कर हमारे यज्ञ और सभी इष्ट कार्यों को सफल बनाने की कृपा कीजिए. ( ३८ )
समध्वरायोपसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय.
अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन ऽ आ वहन्तु.. ( ३९ )
हम उषाकाल में यज्ञ व नमन करते हैं. हम उषाकाल में पवित्र गतिविधियां
संपन्न करते हैं. जैसे अश्ववान रथ गतिशील रहते हैं, वैसे ही भग देव हमें प्राचीन
और श्रेष्ठ धन वाला बनाने की कृपा करें. ( ३९ )
अश्वावतीर्गोमतीर्न ऽ उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः.
घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... ( ४० )
जैसे अश्वमयी वीरवती व कल्याणी उषा देवी घी व दूध देती हैं, वैसे ही प्रभात
वेला हमारा कल्याण करने की कृपा करें. हमारे लिए घी व दूध दुहें. अज्ञान
अंधकारमय बाधाएं सब ओर से दूर करें. आप सभी देवगण सदैव हमारा कल्याण
करने की कृपा करें. ( ४० )
३९० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
पूषन् तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन. स्तोतारस्त ऽ इह स्मसि.. (४१)
हे पूषा देव! हम स्तोता आप के व्रत में लगें. हम कभी नष्ट न हों. हम यज्ञ में
आप की स्तुति करते हैं तथा आप की चाह रखते हैं. ( ४१ )
पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानडर्कम्.
स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधिय १॑४ सीषधाति प्र पूषा.. (४२)
पूषा देव हमारे पथ दर्शक हैं. मंत्र से कामना किए जाने पर वे राक्षसों का
नाश करते हैं और शत्रुनाशक साधन प्रदान करते हैं. वे हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों
में साधने की कृपा करें. ( ४२ )
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णोर्गोपा ऽ अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (४३)
विष्णु ने अपने तीन पैरों में ही संपूर्ण विश्व को धारण कर लिया. वे उस
सामर्थ्य से लोकों को धारते हुए विराजमान हैं. ( ४३ )
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवा १॑४ सः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (४४)
जो ब्राह्मण जाग्रत हो कर यज्ञ विधान करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे
ब्राह्मण विष्णु देव के परम धाम को प्राप्त करते हैं. ( ४४ )
घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा.
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा.. (४५)
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक वरुण देव की शक्ति से सुदृढ़ हुए हैं. स्वर्गलोक
और पृथ्वीलोक श्रेष्ठ रूप वाले हैं और वृद्धावस्था रहित हैं. प्रभूत ( अत्यंत ) सामर्थ्य
का मूल स्रोत हैं. पृथ्वी घीमयी, लोकों का आश्रय स्थली, व्यापक व विशेष मधुर
रसों के दोहन की सामर्थ्य रखती है. ( ४५ )
ये नः सपत्ना ऽ अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान्.
वसवो रुद्रा ऽ आदित्या ऽ उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्.. (४६)
जो हमारे शत्रु हैं, वे हार जाएं. हम उन शत्रुओं को इंद्र देव और अग्नि की
क्षमता से बाधित करें. वसुगण हमारे चित्त को उग्र, पराक्रमी व अधिपति बनाने की
कृपा करें. रुद्रगण और आदित्यगण हमारे चित्त को उग्र व पराक्रमी और अधिपति
बनाने की कृपा करें. ( ४६ )
आ नासत्या त्रिभिरेकादशैर्रिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना.
प्रायुस्तारिष्टं नी रपा १॑४ सि मृक्षत १॑४ सेधतं द्वेषो भवत १॑४ सचाभुवा.. (४७)
अश्विनीकुमार नाशरहित ( अविनाशी ) हैं. आप दोनों ग्यारह से तिगुने
( ११ × ३ = ३३ ) देवताओं सहित पधारिए. आप दोनों ग्यारह से तिगुने देवताओं
यजुर्वेद - ३९१

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
सहित मधुर पेय पीजिए. आप हमारी रक्षा कीजिए और हमारी आयु बढ़ाइए. आप
हमारे पापों व द्वेषियों का नाश कीजिए. आप हमारे सहायक ही रहिए. (४७)
एष व स्तोमो मरुत ऽ इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारो:.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (४८)
हे मरुद्गणो! ये स्तोत्र आप के लिए समर्पित हैं. ये वाणीमयी स्तुतियां आप
को आनंदित करने की कृपा करें. ये स्तुतियां माननीय व श्रेष्ठ फलदायी है. आप
पधारिए. हमें इष्ट सुख, विद्या, अन्न व आयु प्रदान कीजिए. (४८)
सहस्तोमा: सहच्छन्दस ऽ आवृत्: सहप्रमा ऽ ऋषय: सप्त दैव्या:.
पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा ऽ अन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन्.. (४९)
सात ऋषियों ने स्तुतियों के साथ, छंदों के साथ, प्रमाण के साथ दिव्य सृष्टि
का प्रादुर्भाव किया. इन ऋषियों ने पूर्व ऋषियों का अनुसरण किया. इन धीर
ऋषियों ने वैसे ही इष्ट गंतव्य तक पहुंचाया जैसे लगाम घोड़ों को अपने इष्ट गंतव्य
तक पहुंचाती हैं. (४९)
आयुष्यं वर्चस्य १४ रायस्पोषमौद्भिदम्.
इद १४ हिरण्यं वर्चस्वज्जैत्रायाविशतादु माम्.. (५०)
यह स्वर्णमय धन आयु, वर्चस्व, धन व पुष्टिवर्द्धक है. यह स्वर्णमय धन भूमि
से उत्पन्न है. यह स्वर्णमय धन वर्चस्वदायी है. यह स्वर्णमय धन तेजमय है. यह
स्वर्णमय धन हमें विजयश्री दिलाने की कृपा करें. (५०)
न तद्रक्षा १४ सि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोज: प्रथमज १४ ह्येतत्.
यो बिभर्ति दाक्षायण १४ हिरण्य १४ स देवेषु कृणुते दीर्घमायु: स मनुष्येषु कृणुते
दीर्घमायु:.. (५१)
इस स्वर्णमय धन को राक्षस हिंसित नहीं करते. इस स्वर्णमय धन को पिशाच
भी हिंसित नहीं करते. यह स्वर्णमय प्रथम उत्पन्न देवताओं का ओज है, जो
दक्षवंशीय ब्राह्मण इसे स्वर्णधन आभूषण के रूप में धारते हैं, उन्हें भी देवता मनुष्यों
में दीर्घायु प्रदान करते हैं. (५१)
यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्य १४ शतानीकाय सुमनस्यमाना:.
तन्म ऽ आ बध्नामि शतशारदायायुष्माञ्जरदष्टिर्यथासम्.. (५२)
दक्षवंशीय (दक्षवंश के ब्राह्मणों) ने अच्छे मन से जिस सोने के धागे को
सैकड़ों सेना वाले राजा को बांधा उसे ही हम सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने के लिए
अपने शरीर पर बांधते हैं. हम वृद्ध व चिरायु हों. (५२)
३१२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
उत नोहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज ऽ एकपात्पृथिवी समुद्रः.
विश्वे देवा ऽ ऋतावृधो हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता ऽ अवन्तु.. (५३)
अहिर्बुध्न्य, अज, एकपात, पृथ्वी, समुद्र व सभी देवता हमारी स्तुतियां सुनने
की कृपा करें. ये सभी देव सच की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. हम सभी देव का
आह्वान करते हैं. हम सभी देव की स्तुति करते हैं. कवि यजमान के ये सभी देवगण
रक्षक हों. ( ५३ )
इमा गिर ऽ आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि.
शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अ ᳵ शः... (५४)
हम यह वाणीमय व घीमय आहुति आदित्य गणों के लिए अर्पित करते हैं. हम
बुद्धि के जुहू ( पलाश की लकड़ी से बना हुआ एक यज्ञपात्र ) से आहुति आदित्य
गणों के लिए अर्पित करते हैं. आदित्य देव चिर प्रकाशक हैं. मित्र देव, अर्यमा देव,
भग देव, वरुण देव, दक्ष देव हमारी विशिष्ट स्तुति सुनने की कृपा करें. ( ५४ )
सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम्.
सप्तापः स्वपतो लोकमीयुरस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ.. (५५)
शरीर में विद्यमान सात प्राण सात ऋषि हैं. ये सातों ऋषि आलस्यरहित हो कर
शरीर की रक्षा करते हैं. सोते हुए भी ये सातों लोक में जाग्रत आत्मा को प्राप्त होते
हैं. इस स्थिति में भी ये निरंतर प्राणियों की रक्षा में लगे रहते हैं. ( ५५ )
उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे.
उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव ऽ इन्द्र प्राशूर्भवा सचा.. (५६)
हे ब्रह्मणस्पति! आप उठिए. हम देवत्व धारण करना व आप का आगमन
चाहते हैं. हे मरुद्गण! आप अच्छे दानकर्ता हैं. आप हमारे समीप पधारने की कृपा
कीजिए. हे इंद्र देव! आप भी शीघ्र ही इन के साथ पधारने व हमारे साथ निवास
करने की कृपा कीजिए. ( ५६ )
प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्.
यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ऽ ओका ᳵ सि चक्रिरे.. (५७)
निश्चित रूप से ब्रह्मणस्पति विधिविधान के साथ उक्थों को ( वैदिक मंत्रों
को ) उच्चारते हैं. इन मंत्रों में इंद्र देव, वरुण देव, मित्र देव, अर्यमा देव व अन्य देव
वास करते हैं. ( ५७ )
ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.
विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.
य ऽ इमा विश्वा विश्वकर्मा यो नः पितान्नपतेन्नस्य नो देहि.. (५८)
यजुर्वेद - ३९३

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
हे देवगण! आप संसार के नियंत्रक हैं. आप भलीभांति हमारी आकांक्षा को
जानते हैं. आप भलीभांति हमारी प्रार्थना को जानते हैं. आप हमें और हमारी संतानों
को पोसते हैं. आप हमें सभी प्रकार के कल्याण उपलब्ध कराइए. आप की कृपा
से हमारी संतान वीर व महिमावान हो. आप सब कार्यों के कर्ता, पालक व अन्नपति
हैं. ( ५८ )
३९४ - यजुर्वेद

पैंतीसवां अध्याय

पैंतीसवां अध्याय
अपेतो यन्तु पणयोसुम्ना देवपीयवः. अस्य लोकः सुतावतः.
द्युभिरहोभिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्ववसानमस्मै.. (१)
चोर व जो अच्छे मन वाले नहीं हैं, वे इस स्थान से दूर चले जाएं. देवताओं
के पीड़क इस स्थान से दूर चले जाएं. यह लोक हम देवपुत्रों का है. यम देव दिन
और रात में अभिव्यक्त इस उत्तम स्थान को हमारे लिए प्रदान करने की कृपा
करें. ( १ )
सविता ते शरीरेभ्यः पृथिव्याँल्लोकमिच्छतु. तस्मै युज्यन्तामुस्रियाः.. (२)
सविता देव आप के शरीर के लिए पृथ्वीलोक की इच्छा करने की कृपा करें.
वे पृथ्वीलोक को पशुओं से जोड़ने की कृपा करें. ( २ )
वायुः पुनातु सविता पुनात्वग्नेर्भ्राजसा सूर्यस्य वर्चसा. वि मुच्यन्तामुस्रियाः.. (३)
वायु देव व सविता देव इस स्थान को पवित्र बनाने की कृपा करें. सूर्य देव इस
स्थान को वर्चस्वी बनाने की कृपा करें. बंधे हुए गायों और बैलों को खोल दिया
जाए. ( ३ )
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता.
गोभाज ऽ इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्.. (४)
पीपल और पलाश वृक्षों पर वास करने वाली ओषधियों से निवेदन है कि वे
यजमान को गायों को कांति से युक्त करने की कृपा करें. आप यजमान को पौरुष
युक्त करने की कृपा करें. ( ४ )
सविता ते शरीराणि मातुरुपस्थ ऽ आ वपतु. तस्मै पृथिवि शं भव.. (५)
सविता देव यजमान के शरीर को पृथ्वी माता की गोद में बैठाने की कृपा करें.
पृथ्वी माता का हम आह्वान करते हैं. वे उन सब के लिए सुखदायी तथा कल्याणकारी
हो. ( ५ )
प्रजापतौ त्वा देवतायामुपोदके लोके नि दधाम्यसौ. अप नः शोशुचदघम्.. (६)
यजुर्वेद - ३९५

उत्तरार्ध पैंतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध पैंतीसवां अध्याय
प्रजापति देव को हम जल के पास स्थापित करते हैं. वे इस जल को धारण
करने और हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. ( ६ )
परं मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्ते अन्य ऽ इतरो देवयानात्.
चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजा थ्‍ँ रीरिषो मोत वीरान्.. (७)
मृत्यु का पथ दूसरा है. उन का पथ देवताओं के पथ से भिन्न है. आप दूसरे
पथ से लौट जाने की कृपा करें. आप नेत्रवान हैं. आप श्रवण क्षमता युक्त हैं. आप
से अनुरोध है कि आप हमारी प्रजा व वीरों का नाश मत कीजिए. ( ७ )
शं वातः श थ्‍ँ हि ते घृणिः शं ते भवन्त्विष्टकाः.
शं ते भवन्त्वग्नयः पार्थिवासो मा त्वाभि शूशुचन्.. (८)
वायु हमारे लिए सुखदायी हो. सूर्य हमारे लिए सुखदायी हो. इष्टिका देव हमारे
लिए कल्याणदायी हो. अग्नि हमारे लिए कल्याणदायी हो. ये सभी पृथ्वी पर किसी
को भी सोच एवं संताप न दें. ( ८ )
कल्पन्तां ते दिशस्तुभ्यमापः शिवतमास्तुभ्यं भवन्तु सिन्धवः.
अन्तरिक्ष थ्‍ँ शिवं तुभ्यं कल्पन्तां ते दिशः सर्वाः.. (९)
दिशाएं आप के लिए फलीभूत हों. जल आप के लिए कल्याणकारी हों. समुद्र
आप के लिए कल्याणकारी हो. अंतरिक्ष आप के लिए कल्याणकारी हो. दिशाएं
आप के लिए फलीभूत हों. ( ९ )
अश्मन्वती रीयते स थ्‍ँ रभध्वमुत्तिष्ठत प्र तरता सखायः.
अत्रा जहीमोशिवा ये असञ्छिवान्वयमुत्तरेमाभि वाजान्.. (१०)
पत्थर वाली नदी बह रही है. आप मित्र उस नदी को लांघने की कोशिश कीजिए.
आप उठ कर उस के पार पहुंचिए. इस में जो अकल्याणकारी तत्त्व हैं, उन्हें दूर कीजिए.
हम सुख और कल्याणदायी पदार्थ इस नदी से पाएं. ( १० )
अपाघमप किल्बिषमप कृत्यामपो रपः.
अपामार्ग त्वमस्मदप दुःष्वप्न्य थ्‍ँ सुव.. (११)
हटाइए, पाप को दूर हटाइए. आप हमारे पाप कर्मों को दूर हटाइए.
अपयशदायी कर्मों को आप हम से दूर हटाइए. आप दुःस्वप्नों को हम से ( हमारे
जीवन से ) दूर हटाइए. ( ११ )
सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः
सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (१२)
जल हमारे अच्छे मित्र हो जाएं. ओषधियां हमारी अच्छी मित्र हो जाएं. जो
३९६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध पैंतीसवां अध्याय
हम से द्वेष करते हैं, जिन से हम द्वेष करते हैं, उन दुष्ट अमित्रों के लिए पीड़ादायी
होइए. ( १२ )
अनड्वाहमन्वारभामहे सौरभेय ৺ स्वस्तये.
स न ऽ इन्द्र ऽ इव देवेभ्यो वह्निः सन्तारणो भव.. (१३)
हम अपने कल्याण हेतु सुरभि पुत्र ( गाय के पुत्र बछड़े ) का बारबार आह्वान
करते हैं. वह इंद्र देव के समान उद्धार करने वाला हो. वह अग्नि देव के समान उद्धार
करने वाला हो. ( १३ )
उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्.
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (१४)
हम अंधकार से ऊपर प्रकाशमय स्वर्गलोक को देखते हैं. देवता भी उत्तम
ज्योतिष्वान सूर्य को देखते हुए परमात्मा को पाते हैं. ( १४ )
इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम्.
शतं जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तर्मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (१५)
हम यह मर्यादा रूपी परिधि जीवों के लिए धारण करते हैं. हम इस मर्यादा रूपी
परिधि का अनुसरण करें. हम सौ वर्ष तक उद्देश्यपूर्ण सार्थक जीवन जीएं. यदि इस
बीच में मौत आए तो मृत्यु देवगण के पथ में पर्वत जैसी बाधाएं खड़ी कर दें. ( १५ )
अग्न ऽ आयू ৺ षि पवस ऽ आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१६)
हे अग्नि! आप आयु की बढ़ोत्तरी करने वाले हैं. हे अग्नि! आप पवित्र कार्य
संपन्न करने वाले हैं. हे अग्नि! आप हमें ऊर्जादायी इष्ट पदार्थ प्रदान करने की कृपा
कीजिए. आप दुष्टों को बाधित कीजिए. ( १६ )
आयुष्मानग्ने हविषा वृधानो घृतप्रतीको घृतयोनिरेधि.
घृतं पीत्वा मधु चारु गव्यं पितेव पुत्रमभि रक्षतादिमान्त्स्वाहा.. (१७)
हे अग्नि! आप हवि से बढ़ोत्तरी पाने वाले हैं. घी आप का मूल स्थान हैं. आप
घी रूपी प्रतीक वाले हैं. आप सुंदर गायों का मधुर घी पी कर उसी प्रकार हम
यजमान रूपी पुत्रों की रक्षा कीजिए, जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है. आप के लिए
स्वाहा. ( १७ )
परीमे गामनेषत पर्यग्निममृषत. देवेष्वक्रत श्रवः क ऽ इमाँ २ आ दधर्षति.. ( १८)
जो अग्नि को इन परिपूर्ण आहुतियों से हर्षित करते हैं, इन आहुतियों को
देवताओं तक पहुंचाते हैं, देवताओं के लिए ऐसे यज्ञ करने वाले यजमान को कोई
नहीं हरा सकता. ( १८ )
यजुर्वेद – ३९७

उत्तरार्ध पैंतीसवां अध्याय
क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्यं गच्छतु रिप्रवाहः.
इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (१९)
हम क्रव्याद् अग्नि को दूर करते हैं. हम उस से दूर यमराज्य में जाने का निवेदन
करते हैं. सर्वज्ञ अग्नि हमारे घरों में होने वाले यज्ञ में बढ़ोतरी पाएं. अग्नि हमारी हवि
को वहन करने व उसे देवताओं तक पहुंचाने की कृपा करें. (१९)
वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैनान्वेत्थ निहितान् पराके.
मेदसः कुल्या ऽ उप तान्तस्रवन्तु सत्या ऽ एषामाशिषः सं नमन्ता ᳵ स्वाहा.. (२०)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप जहां पितर निवास करते हैं, आप उस स्थान को
जानते हैं. अतः आप हम से दूर पितरलोकवासी पितरों के लिए हवि वहन करने की कृपा
करें. पितरों के पास जल की धाराएं स्रवित होने की कृपा करें. पितरों के आशीर्वाद हमारे
प्रति सधे हों. हम पितरों को नमन करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. (२०)
स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी.
यच्छा नः शर्म सप्रथाः.
अप नः शोशुचदघम्.. (२१)
हे पृथ्वी देवी! आप हमारे वास योग्य होने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए
सुख प्रदान कीजिए. आप हमें कष्ट मुक्त कीजिए. आप हमारे पापों को हम से दूर
करने व हमें पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. (२१)
अस्मात्त्वमधि जातोसि त्वदयं जायतां पुनः. असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा.. (२२)
हे अग्नि! आप यजमान द्वारा उपजाए जाते हैं. फिर बारबार यजमान द्वारा उपजाए
जाते हैं. यह यजमान स्वर्ग के व लोक के लिए यज्ञ संपादित करते हैं. हे अग्नि! आप
के लिए स्वाहा. (२२)
३९८ - यजुर्वेद

छत्तीसवां अध्याय

छत्तीसवां अध्याय
ऋचं वाचं प्र पद्ये मनो यजुः प्र पद्ये साम प्राणं प्र पद्ये चक्षुः श्रोत्रं प्र पद्ये.
वागोजः सहौजो मयि प्राणापानौ.. (१)
ऋग्वेद वाणी स्वरूप है. हम उसे प्राप्त करते हैं. यजुर्वेद मन स्वरूप है. हम उसे
प्राप्त करते हैं. सामवेद प्राण स्वरूप है. हम उसे प्राप्त करते हैं. हम नेत्रों की सामर्थ्य
को प्राप्त करते हैं. हम कानों की सामर्थ्य को प्राप्त करते हैं. वाणी, प्राण व अपान
अपनी ऊर्जा सहित हम से स्थापित होने की कृपा करें. ( १ )
यन्मे छिद्रं चक्षुषो हृदयस्य मनसो वातितृण्णं बृहस्पतिर्मे तद्दधातु.
शं नो भवतु भुवनस्य यस्पतिः.. (२)
हे बृहस्पति देव! आप हमारे चक्षुओं के दोष दूर करने की कृपा कीजिए. आप
हमारे हृदय व मन के दोष दूर करने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए सुखों का विस्तार
करने की कृपा कीजिए. आप भुवन के स्वामी हैं. आप हमारे लिए कल्याणदायी होने
की कृपा कीजिए. ( २ )
भूर्भुवः स्वः. तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (३)
परमात्मा स्वयंभू, प्राणदायी व स्वयं प्रकाशवान हैं. वे सविता देव वरेण्य और
सौभाग्यदायी हैं. हम उन का ध्यान करते हैं. वे हमारी बुद्धियों को प्रेरित करने की
कृपा करें. ( ३ )
कया नश्चित्र ऽ आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (४)
परमात्मा उत्तम व शक्तिमान हैं. वे सदा हमारी बढ़ोतरी करने व हमारे सखा
होने की कृपा करें. वे हमें सुखों से आवृत करने की कृपा करें. ( ४ )
कस्त्वा सत्यो मदानां म ᳪ हिष्ठो मत्सदन्धसः. दृढा चिदरुजे वसु.. (५)
हे इंद्र देव! सचमुच कौन आप को मदयुक्त बनाता है. सचमुच आप क्या
पीकर हर्षित होते हैं. आप यजमान को दृढ़ बनाइए. आप हमें शाश्वत धन प्रदान
करने की कृपा कीजिए. ( ५ )
यजुर्वेद - ३९१

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतिभिः.. (६)
हे इंद्र देव! आप सखा की तरह हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप धन
देने की कृपा कीजिए. हम आप के सैकड़ों रक्षा साधनों से रक्षित हों. (६)
कया त्वं न ऽ ऊत्याभि प्र मन्द्र से वृषन्. कया स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (७)
हे परमात्मा! आप अपनी रक्षाओं से किस के लिए आनंद की वर्षा नहीं करते
हैं ? आप अपने स्तोताओं को जो भरपूर धन प्रदान करते हैं. वह किस को आनंदित
नहीं करता ? (७)
इन्द्रो विश्वस्य राजति. शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (८)
इंद्र देव विश्व की शोभा हैं. वे हमारे लिए सुखदायी हैं. वे दोपायों व चौपायों
के लिए सुखदायी हैं. (८)
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा.
शं न ऽ इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः.. (९)
मित्र देव, वरुण देव, अर्यमा देव हमारे लिए कल्याणदायी हों. इंद्र देव व
बृहस्पति देव व जगत्पालक विष्णु हमारे लिए कल्याणकारी हों. (९)
शं नो वातः पवता २४ शं नस्तपतु सूर्यः.
शं नः कनिक्रदद्देवः पर्जन्यो अभि वर्षतु.. (१०)
वायु हमारे लिए कल्याणदायी हों. वे हमें पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. सूर्य
देव हमारे लिए सुखदायी हो कर तपने की कृपा करें. गड़गड़ाहट करने वाले पर्जन्य
देव हमारे लिए कल्याणदायी हो कर बरसात करें. (१०)
अहानि शं भवन्तु नः श २४ रात्रीः प्रति धीयताम्.
शं न ऽ इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न ऽ इन्द्रावरुणा रातहव्या.
शं न ऽ इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः.. (११)
दिन हमारे लिए कल्याणदायी हो. हम बुद्धिपूर्वक प्रार्थना करते हैं. रात्रि हमारे
लिए कल्याणदायी हो. हम बुद्धिपूर्वक प्रार्थना करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए
कल्याणदायी हों. इंद्र देव हमारी रक्षा करने की कृपा करें. अग्नि हमारे लिए
कल्याणदायी हों. वे हमारी रक्षा करने की कृपा करें. इंद्र देव हमारे लिए कल्याणदायी
हों. वे हमारी हवि स्वीकारने की कृपा करें. वरुण देव हमारे लिए कल्याणदायी हों
व हमारी हवि स्वीकारने की कृपा करें. इंद्र देव हमारे लिए कल्याणदायी हों और रोग
दूर करें. पूषा देव हमारे लिए कल्याणदायी हों और रोग दूर करें. (११)
शं नो देवीरभिष्टय ऽ आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (१२)
४०० - यजुर्वेद 632/25

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय
दिव्य जल हमारा कल्याण करे. वह हमारे अभीष्टपूरक हो. जल हमारे पीने के
लिए हो. वह हमारे लिए सुखदायी हो व हमारे लिए प्रवाहित होने की कृपा करे. ( १२ )
स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी. यच्छा नः शर्म सप्रथा:.. (१३)
हे पृथ्वी देवी! आप वासयोग्य होने की कृपा करें. आप उत्तम वास प्रदान
करने की कृपा करें. आप हमें इच्छित सुख प्रदान कीजिए. आप बहुत अधिक
विस्तृत होने की कृपा कीजिए. ( १३ )
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऽ ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१४)
जल हमारे लिए कल्याणदायी हो. वह हमारे लिए ऊर्जा धारण करने की कृपा
करें. वह हमें ऊर्जस्वी बनाने की कृपा करें. परमात्मा हमें देखने हेतु महती दृष्टि
प्रदान करने की कृपा करें. ( १४ )
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (१५)
जैसे माताएं सर्वाधिक कल्याणदायी रस से बच्चों को पोसती हैं, वैसे ही
आप हम सब को सर्वाधिक कल्याणदायी रस ( पोषण हेतु ) सेवन कराने की
कृपा करें. ( १५ )
तस्मा ऽ अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (१६)
हे जल देव! हम ने क्षय को जीतने के लिए आप तक गमन किया है. आप हम
सब जनों का कल्याण करने की कृपा करें. ( १६ )
द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष १७् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः.
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व १७् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा
मा शान्तिरेधि.. (१७)
स्वर्गलोक हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. अंतरिक्षलोक हमारे लिए
शांतिदायी होने की कृपा करें. पृथ्वीलोक हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें.
जल देव हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. ओषधि देव हमारे लिए शांतिदायी
होने की कृपा करें. वनस्पति देव हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. सब देवगण
हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. परब्रह्म हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा
करें. शांति भी हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. ( १७ )
दृते दृ १७् ह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्.
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे.
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे.. (१८)
हे परमात्मा! आप दृढ़ हैं. आप हमें दृढ़ बनाने की कृपा कीजिए. हम मित्रभाव की
यजुर्वेद - ४०१

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय
दृष्टि से सभी प्राणियों को देख सकें. सभी प्राणी हमें मित्र भाव से देख सकें. ( १८ )
दृते दृ ꣪ह मा.
ज्योक्ते सन्दृशि जीव्यासं ज्योक्ते सन्दृशि जीव्यासम्.. (१९)
हे परमात्मा! आप सामर्थ्यवान हैं. आप हमें भी सामर्थ्यशाली बनाइए. आप की
ज्योति से हम चिरायु हों. आप की ज्योति से हम चिरकाल तक देखें. ( १९ )
नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्ते अस्त्वर्चिषे.
अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य ꣪ह शिवो भव.. (२०)
हे अग्नि! आप को नमस्कार. हम आप की अर्चना करते हैं. आप को नमस्कार
है. हम आप की अर्चना करते हैं. आप की ज्वालाएं हमें पवित्र बनाएं. हमारे दुःख
हरें. आप हमें पवित्र बनाएं व हमारे लिए कल्याणदायी होने की कृपा करें. ( २० )
नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे. नमस्ते भगवन्नस्तु यतः स्वः समीहसे.. (२१)
हे परमात्मा! आप को नमस्कार. बिजली की तरह चमकने वाले व गड़गड़ाने
वाले परमात्मा आप को नमस्कार. हे भगवन! आप को नमस्कार. हे भगवन! आप
को बारबार नमस्कार. ( २१ )
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु. शं नः कुरु प्रजाभ्योभयं नः पशुभ्यः.. (२२)
हे भगवन! जिसजिस से आप चाहते हैं, उसउस से हमें निर्भय बनाने की कृपा
करें. आप हमारी प्रजा व पशुओं का कल्याण करने की कृपा करें. ( २२ )
सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु.
योस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (२३)
जल हमारे अच्छे मित्र हो जाएं. हमारे शत्रु के लिए शत्रु हो जाएं. ओषधियां हमारी
अच्छी मित्र हो जाएं. हमारे शत्रु के लिए शत्रु हो जाए. जो हम से द्वेष करते हैं, उन के
लिए शत्रु हो जाए. जिन से हम द्वेष करते हैं, उन के लिए शत्रु हो जाए. ( २३ )
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्.
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत ꣪ह शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः
शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्.. (२४)
सूर्य जगत् के नेत्र हैं. वे हितकारक हैं. वे जगत् में सर्वत्र विचरते हैं. वे हमारे सामने
प्रकट होते हैं. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से देखें. हम सौ शरदों तक उन की कृपा
से सुनें. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से बोलें. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से
अदीन ( दीनता रहित ) हों. हम सौ से भी अधिक समय तक सुखी हों. ( २४ )
४०२ – यजुर्वेद

सैंतीसवां अध्याय

सैंतीसवां अध्याय
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आ ददे नारिरसि.. (१)
सविता देव सभी देवताओं को पैदा करने वाले हैं. हम अश्विनी देव व पूषा देव
को उन के हाथों से ग्रहण करते हैं. ( १ )
युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः.
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः.. (२)
हम परमात्मा से मन और बुद्धि जोड़ते हैं. ब्राह्मण विशाल सर्वव्यापक परमात्मा
से अपना मन जोड़ते हैं. परमात्मा सर्वविद हैं. होता उन्हें धारण करते हैं. सविता देव
अभिनंदनीय हैं. उन की आराधना करते हैं. ( २ )
देवी द्यावापृथिवी मखस्य वामद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (३)
हम स्वर्गलोक की दिव्य शक्तियों को यज्ञ में आमंत्रित कर के वेदी पर
प्रतिष्ठित करते हैं. हम पृथ्वी की दिव्य शक्तियों को यज्ञ में आमंत्रित कर के वेदी
पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक की दिव्य शक्तियों को पृथ्वी
के इस देवयज्ञ में आराधनापूर्वक यज्ञवेदी पर स्थापित करते हैं. हम मिट्टी देवी को
यज्ञ के शीर्षस्थ ( उच्च ) स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. ( ३ )
देव्यो वम्रयो भूतस्य प्रथमजा मखस्य वोद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (४)
अग्नि की लपटें सब से पहले उत्पन्न हुई हैं. वे प्राणियों से भी पहले उत्पन्न हुई
हैं. पृथ्वी के इस दिव्य यज्ञ में हम आप को शिरोधार्य करते हैं. हम यज्ञ के लिए आप
को यज्ञ के शीर्षस्थ स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. ( ४ )
इयत्यग्र ऽ आसीन्मखस्य तेद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (५)
यजुर्वेद – ४०३

उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय
हम पृथ्वी के दिव्य यज्ञ में आप को अग्र स्थान पर बैठाते हैं. हम यज्ञ के लिए
आप को यज्ञ के शीर्षस्थ स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. ( ५ )
इन्द्रस्यौज स्थ मखस्य वोद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.. ( ६ )
हम पृथ्वी के इस दिव्य यज्ञ में इंद्र देव को ओज की तरह यज्ञ के शीर्षस्थ स्थान
पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम यज्ञ के लिए आप को शीर्ष पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम
यज्ञ के लिए आप को शीर्ष पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम यज्ञ के लिए आप को शीर्ष
पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम यज्ञ के लिए आप को शीर्ष पर प्रतिष्ठित करते हैं. ( ६ )
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता.
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.. (७)
ब्रह्मणस्पति देव इस दिव्य यज्ञ में पधारने की कृपा करें. सरस्वती देवी इस दिव्य
यज्ञ में पधारने की कृपा करें. श्रेष्ठ वीर को प्रजानुपालक इस दिव्य यज्ञ में ले जाने
की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. ( ७ )
मखस्य शिरोसि.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखस्य शिरोसि.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखस्य शिरोसि.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्षे.. (८)
हे अग्नि! आप यज्ञ के सिर हैं. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा
करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य
यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें.
यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में
ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ
के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. ( ८ )
४०४ - यजुर्वेद 632/26

सैंतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध
सैंतीसवां अध्याय
अश्वस्य त्वा वृष्णः शक्ना धूपयामि देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
अश्वस्य त्वा वृष्णः शक्ना धूपयामि देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
अश्वस्य त्वा वृष्णः शक्ना धूपयामि देवयजने पृथिव्याः.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (९)
हे परमात्मा! आप के लिए पृथ्वि पर किए जा रहे इस दिव्य यज्ञ में हम
शक्तिशाली घोड़े को धूपायित (संस्कारमय) करते हैं. हम यज्ञ के लिए आप को
यज्ञ के शीर्षस्थ स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने
की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए
इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की
कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. (९)
ऋजवे त्वा साधवे त्वा सुक्षित्यै त्वा.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.
मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (१०)
हे सामर्थ्यशाली देव! हम सत्य और सुरक्षा हेतु आप को साधते हैं. यज्ञ के लिए
इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की
कृपा करें. यज्ञ के लिए इस दिव्य यज्ञ में ले जाने की कृपा करें. (१०)
यमाय त्वा मखाय त्वा सूर्यस्य त्वा तपसे.
देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु पृथिव्याः स ᳵ स्पृशस्पांहि.
अर्चिरसि शोचिरसि तपोसि.. (११)
हे सामर्थ्यशाली देव! हम यम देव के लिए आप को प्रतिष्ठित करते हैं. हम यज्ञ
देव व सूर्य के लिए आप को प्रतिष्ठित करते हैं. हम सविता देव के लिए आप को
मधुर बनाएं. आप पृथ्वी को स्पर्श करने की कृपा करें. आप पृथ्वी की रक्षा करने
की कृपा करें. आप पवित्र व तपोमय हैं. हम आप की अर्चना करते हैं. (११)
अनाधृष्टा पुरस्तादग्नेराधिपत्य ऽ आयुर्मे दाः.
पुत्रवती दक्षिणत ऽ इन्द्रस्याधिपत्ये प्रजां मे दाः.
सुषद्रा पश्चाद्देवस्य सवितुराधिपत्ये चक्षुर्मे दाः.
आश्रुतिरुत्तरतो धातुराधिपत्ये रायस्पोषं मे दाः.
यजुर्वेद - ४०५

उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय
विधृतिरुपरिष्टाद्बृहस्पतेराधिपत्य ऽ ओजो मे दा विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्पाहि
मनोरश्वासि.. (१२)
हे पृथ्वि! शत्रु आप को हिंसा न पहुंचाए. आप पूर्व दिशा में अग्नि का
आधिपत्य स्थापित कराने की कृपा करें. आप हमें आयु प्रदान कीजिए. आप पुत्रवती
हो कर दक्षिण दिशा में इंद्र देव के आधिपत्य में रहने की कृपा कीजिए. हमें भी
संतान प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप सुखदायिनी हैं. हे पृथ्वि! आप पश्चिम
दिशा में सविता देव के आधिपत्य में रहने की कृपा करें. आप हमें सम्यक् चक्षु
( दृष्टि ) प्रदान करने की कृपा करें. आप हमारी विनती पूरी तरह सुनने की कृपा
कीजिए. हे पृथ्वि! आप उत्तर दिशा में धातु देव के आधिपत्य में रहने की कृपा
कीजिए. हे पृथ्वि! आप हमें धन से पोषित करने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि देवी!
आप ऊपर की दिशाओं में बहुत पदार्थ धारिए. आप बृहस्पति देव के आधिपत्य में
रह कर हमारे लिए बलदायिनी होइए. आप हमारे सभी शत्रुओं को नष्ट कर दीजिए.
आप हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे मन का अश्व हैं. ( १२ )
स्वाहा मरुद्भिः परि श्रीयस्व दिवः स १७ स्पृशस्पाहि. मधु मधु मधु.. (१३)
मरुद्गणों के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक को यह हवि चारों ओर से स्पर्श करे. यह
हवि हमारी रक्षा करने की कृपा करे. मधुरता की स्थापना हो. ( १३ )
गर्भो देवानां पिता मतीनां पतिः प्रजानाम्.
सं देवो देवेन सवित्रा गत स १७ सूर्येण रोचते.. (१४)
परमात्मा देवताओं के गर्भ, बुद्धियों के पिता और प्रजाओं के पालक हैं.
परमात्मा देवों के देव सविता देव संसार को प्रेरित करते हैं. सूर्य सर्वत्र प्रकाशित
करते हैं. ( १४ )
समग्निरग्निना गत सं दैवेन सवित्रा स १७ सूर्येणारोचिष्ट.
स्वाहा समग्निस्तपसा गत सं दैव्येन सवित्रा स १७ सूर्येणारुरुचत.. (१५)
परमात्मा अग्नि के साथ सविता देव से एकमेक हो कर सूर्यरूप में प्रकाशित
होते हैं. अग्नि के साथ सूर्य के लिए स्वाहा. सविता देव सूर्यरूप में शोभित होते
हैं. ( १५ )
धर्ता दिवो वि भाति तपसस्पृथिव्यां धर्ता देवो देवानाममर्त्यस्तपोजाः.
वाचमस्मे नि यच्छ देवायुवम्.. (१६)
परमात्मा स्वर्गलोक के धारक हैं. वे अपने तेज से पृथ्वी पर विभूषित होते हैं.
वे पृथ्वी पर देवों के धारक व अपने दिव्य तप और ओज से संपन्न हैं. वे हमें दिव्य
वाणी और आयु प्रदान करने की कृपा करें. ( १६ )
४०६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्.
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान ऽ आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (१७)
हम सूर्य देव को गोपथ पर आतेजाते हुए देखते हैं. सूर्य देव सर्वरक्षक, सर्वश्रेष्ठ
व अविनाशी हैं. सूर्य देव देवताओं के पथ से आनेजाने वाले हैं. वह सूर्य देव सभी
लोकों के द्रष्टा हैं. (१७)
विश्वासां भुवां पते विश्वस्य मनसस्पते विश्वस्य वचसस्पते सर्वस्य वचसस्पते.
देवश्रुत्वं देव घर्म देवो देवान् पाह्यत्र प्रावीरनु वां देववीतये.
मधु माध्वीभ्यां मधु माधूचीभ्याम्.. (१८)
परमात्मा सभी भुवनों के पति हैं. विश्व के मन के स्वामी हैं. वे विश्व की
वाणियों के स्वामी हैं. वे सभी की वाणियों के पालक हैं और देवताओं में विश्रुत
(प्रसिद्ध) हैं. देवों के देव हैं. धर्म मार्ग पर चलने वालों के रक्षक हैं. देवत्व चाहने
वालों को संरक्षण प्रदान करते हैं. (१८)
हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा. ऊर्ध्वो अध्वरं दिवि देवेषु धेहि.. (१९)
हे परमात्मा! आप हमारे हृदय व मन में हैं. आप स्वर्गलोक में हैं. हे सूर्य!
हम आप के लिए उपासना करते हैं. आप हमारे यज्ञ को ऊंचाइयों तक ले जाइए.
आप इसे देवताओं हेतु दिव्यलोक तक पहुंचाइए. (१९)
पिता नोसि पिता नो बोधि नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः.
त्वष्टमन्तस्त्वा सपेम पुत्रान्नशून्मयि धेहि प्रजामस्मासु
धेह्यारिष्टाह ᳵ सह पत्या भूयासम्.. (२०)
हे परमात्मा! आप हमारे पिता हैं. आप पिता की तरह हमें बोधित (जाग्रत)
करते हैं. हमारा आप को नमस्कार. आप किसी भी प्रकार की हिंसा मत कीजिए.
आप किसी भी प्रकार की हिंसा मत कीजिए. आप हमारे लिए पुत्र धारिए. आप
हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे लिए संतान धारण करें. आप हमारी रक्षा कीजिए.
हम इष्ट वचनों से आप की स्तुति करते हैं. हम पालक सहित बारबार आप की
उपासना करते हैं. (२०)
अहः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा.
रात्रिः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा.. (२१)
आप कर्मयुक्त, इष्ट साधक व सुप्रकाशवान हैं. आप की ज्योति सहित आप के
लिए स्वाहा. आप रात में भी कर्मयुक्त हैं. आप इष्ट साधक हैं. आप सुप्रकाशवान हैं.
आप की ज्योति सहित आप के लिए स्वाहा. (२१)
यजुर्वेद - ४०७

अड़तीसवां अध्याय

अड़तीसवां अध्याय
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आ ददेदित्यै रास्नासि.. ( १ )
हे यज्ञ ऊर्जा! हम सविता देव की जीवनदायी प्रेरणा से आप को ग्रहण करते
हैं. हम अश्विनी देवताओं की भुजाओं से पूषा देव के हाथों से आप को ग्रहण
करते हैं. आप देवताओं की माता अदिति को आवृत्त करने वाली हैं. ( १ )
इड ऽ एह्य दित ऽ एहि सरस्वत्येहि. असावेह्यासावेह्यासावेहि.. ( २ )
हे इड़ा देवी! आप यहां पधारिए. हे अदिति देवी! आप यहां पधारिए. हे सरस्वती
देवी! आप यहां पधारने की कृपा कीजिए. ( २ )
अदित्यै रास्नासीन्द्राण्या ऽ उष्णीषः. पूषासि घर्माय दीष्व.. ( ३ )
हे यज्ञ ऊर्जा! आप अदिति देव की ( मेखला ) आवृत्त करने वाली हैं. आप
इंद्राणी के सिर का वस्त्र ( प्रतिष्ठा सूचक ) हैं. आप पोषक हैं. आप यज्ञ जैसे
हितकारी कार्यों में अपनी शक्ति को लगाने की कृपा कीजिए. ( ३ )
अश्विभ्यां पिन्वस्व सरस्वत्यै पिन्वस्वेन्द्राय पिन्वस्व.
स्वाहेन्द्रवत् स्वाहेन्द्रवत् स्वाहेन्द्रवत्.. ( ४ )
अश्विनी देव के लिए यह आहुति प्रवाहित हो रही है. आप इसे पीजिए.
सरस्वती देवी के पीने के लिए यह आहुति झर रही है. इंद्र देव के पान ( पीने ) के
लिए यह आहुति बह रही है. इंद्र देव के लिए स्वाहा. स्वाहा. स्वाहा. ( ४ )
यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः.
येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवेकः.
उर्वन्तरिक्षमन्वेमि.. ( ५ )
हे सरस्वती देवी! आप का दिव्य ज्ञान सुखदायी, कल्याणदायी व समृद्धिदायी
है. आप का दिव्य ज्ञान वैसा ही सुखद और आनंददायी है, जैसे मां का स्तन बच्चे
के लिए सुखकारी नींद लाने वाला व आनंद देने वाला होता है. बच्चे में उत्तम बल
संचरित करता है और उन में उत्तम गुण पैदा करने वाला होता है. ( ५ )
४०८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय

उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय
गायत्रं छन्दोसि त्रैष्टुभं छन्दोसि द्यावापृथिवीभ्यां त्वा परि गृह्णाम्यन्तरिक्षेणोप
यच्छामि.
इन्द्राश्विना मधुनः सारघस्य घर्मं पात वसवो यजत वाट्.
स्वाहा सूर्यस्य रश्मये वृष्टिवनये.. (६)
हे इंद्र देव! जो यजमान गायत्री छंद में आप की स्तुति करते हैं. आप उन के
संरक्षक हैं. जो त्रिष्टुभू छंद में इंद्र देव की उपासना करते हैं. इंद्र देव उन्हें भी
संरक्षण देने वाले हैं. हे अश्विनी देव! हम स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हेतु आप
दोनों का परिग्रहण करते हैं. हम आप से आरोग्य ( स्वास्थ्य) की कामना करते
हैं. हम इंद्र देव और दोनों अश्विनीकुमारों को अंतरिक्षलोक से अपने पास लाना
चाहते हैं. आप दोनों अमृत व ऊर्जा बरसाने की कृपा करें. वसुगण उपयुक्त रीति
से यज्ञ कार्य का निर्वाह करें. वे सूर्य की किरणों से अच्छी बरसात पाने के लिए
उपयुक्त रीति से यज्ञ करने की कृपा करें. ( ६ )
समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा सरिराय त्वा वाताय स्वाहा.
अनाधृष्याय त्वा वाताय स्वाहाप्रतिधृष्याय त्वा वाताय स्वाहा.
अवस्यवे त्वा वाताय स्वाहाशिमिदाय त्वा वाताय स्वाहा.. (७)
हे वायु! समुद्र के लिए आप को आहुति प्रदान करते हैं. सभी को संरक्षण
प्रदान करने के लिए हम आप को आहुति प्रदान करते हैं. हम अपार शक्ति के लिए
आप को आहुति प्रदान करते हैं. सभी के वास ( संरक्षण ) प्रदाता के लिए हम
आहुति प्रदान करते हैं. शांतिदायी वायु के लिए आहुति प्रदान करते हैं. आप हमारी
ये सभी आहुतियां स्वीकार करने की कृपा कीजिए. ( ७ )
इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते स्वाहेन्द्राय त्वादित्यवते स्वाहेन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने स्वाहा.
सवित्रे त्व ऽ ऋभुमते विभुमते वाजवते स्वाहा बृहस्पतये त्वा विश्वदेव्यावते स्वाहा.. (८)
हे इंद्र देव! आप धनवान व शक्तिमान हैं. हम आप के लिए आहुति अर्पित
करते हैं. आप आदित्यवान ( तेजोमय ) हैं. आप के लिए आहुति समर्पित है. हे इंद्र
देव! आप अभिमान को समाप्त करने वाले हैं. आप के लिए आहुति समर्पित है.
सविता देव सत्यवान हैं. वे धनवान व बलवान हैं. उन के लिए आहुति समर्पित है.
सभी देवताओं के लिए हितकारी बृहस्पति के लिए आहुति समर्पित है. ( ८ )
यमाय त्वाङ्गिरस्वते पितृमते स्वाहा. स्वाहा घर्माय स्वाहाः घर्मः पित्रे.. (९)
यम देव पितरगणों एवं अंगिरा से युक्त हैं. यम देव के लिए आहुतियां अर्पित
हैं. यज्ञ के विस्तार के लिए आहुति समर्पित है. पितरों को तृप्ति देने के लिए आहुति
समर्पित है. ( ९ )
यजुर्वेद - ४०९