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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 421 में से

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पृष्ठ 397

उत्तरार्ध पैंतीसवां अध्याय
हम से द्वेष करते हैं, जिन से हम द्वेष करते हैं, उन दुष्ट अमित्रों के लिए पीड़ादायी
होइए. ( १२ )
अनड्वाहमन्वारभामहे सौरभेय ৺ स्वस्तये.
स न ऽ इन्द्र ऽ इव देवेभ्यो वह्निः सन्तारणो भव.. (१३)
हम अपने कल्याण हेतु सुरभि पुत्र ( गाय के पुत्र बछड़े ) का बारबार आह्वान
करते हैं. वह इंद्र देव के समान उद्धार करने वाला हो. वह अग्नि देव के समान उद्धार
करने वाला हो. ( १३ )
उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्.
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (१४)
हम अंधकार से ऊपर प्रकाशमय स्वर्गलोक को देखते हैं. देवता भी उत्तम
ज्योतिष्वान सूर्य को देखते हुए परमात्मा को पाते हैं. ( १४ )
इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम्.
शतं जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तर्मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (१५)
हम यह मर्यादा रूपी परिधि जीवों के लिए धारण करते हैं. हम इस मर्यादा रूपी
परिधि का अनुसरण करें. हम सौ वर्ष तक उद्देश्यपूर्ण सार्थक जीवन जीएं. यदि इस
बीच में मौत आए तो मृत्यु देवगण के पथ में पर्वत जैसी बाधाएं खड़ी कर दें. ( १५ )
अग्न ऽ आयू ৺ षि पवस ऽ आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१६)
हे अग्नि! आप आयु की बढ़ोत्तरी करने वाले हैं. हे अग्नि! आप पवित्र कार्य
संपन्न करने वाले हैं. हे अग्नि! आप हमें ऊर्जादायी इष्ट पदार्थ प्रदान करने की कृपा
कीजिए. आप दुष्टों को बाधित कीजिए. ( १६ )
आयुष्मानग्ने हविषा वृधानो घृतप्रतीको घृतयोनिरेधि.
घृतं पीत्वा मधु चारु गव्यं पितेव पुत्रमभि रक्षतादिमान्त्स्वाहा.. (१७)
हे अग्नि! आप हवि से बढ़ोत्तरी पाने वाले हैं. घी आप का मूल स्थान हैं. आप
घी रूपी प्रतीक वाले हैं. आप सुंदर गायों का मधुर घी पी कर उसी प्रकार हम
यजमान रूपी पुत्रों की रक्षा कीजिए, जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है. आप के लिए
स्वाहा. ( १७ )
परीमे गामनेषत पर्यग्निममृषत. देवेष्वक्रत श्रवः क ऽ इमाँ २ आ दधर्षति.. ( १८)
जो अग्नि को इन परिपूर्ण आहुतियों से हर्षित करते हैं, इन आहुतियों को
देवताओं तक पहुंचाते हैं, देवताओं के लिए ऐसे यज्ञ करने वाले यजमान को कोई
नहीं हरा सकता. ( १८ )
यजुर्वेद – ३९७