सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
वनस्पति देव देवों के देव और सुनहरे पत्तों वाले फलों के स्वामी हैं. वनस्पति
देव अश्विनीकुमारों तथा सरस्वती देवी ने इंद्र देव को अच्छे मीठे फल से पाया. इंद्र
देव में ओज तथा बल धारण कराया. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि
की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान
उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. (५६)
देवं बर्हिर्वारितीनामध्वरे स्तीर्णमश्विभ्यामूर्णम्रदाः सरस्वत्या स्योनमिन्द्र ते सदः.
ईशायै मन्यु १६ राजानं बर्हिषा दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५७)
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमार ने यज्ञसदन में इंद्र देव के लिए कुश का
आसन बिछाया. इन्होंने इंद्र देव में मन्यु (क्रोध) तथा वैभव धारण कराया. (५७)
देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवान्यक्षद्यथायथ १४ होताराविन्द्रमश्विना वाचा वाच १७
सरस्वतीमग्नि १४ सोम १४ स्विष्टकृत् स्विष्ट ऽ इन्द्रः सुत्रामा सविता वरुणो भिषगिष्टो
देवो वनस्पतिः स्विष्टा देवा ऽ आज्यपाः स्विष्टो अग्निरग्निना होता होत्रे स्विष्टकृद्यशो
न दधदिन्द्रियमूर्जमपचिति १४ स्वधां वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५८)
भलीभांति लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अग्नि, मित्र देव, वरुण देव, इंद्र देव, सविता
देव, वनस्पति देव तथा घी पीने वाले अन्य देवों ने अग्नि द्वारा ग्रहण की हुई हवि
को ग्रहण किया. देवगण यजमानों द्वारा किए गए यज्ञ से प्रसन्न हुए. देवगण ने
यजमानों के लिए यश, इंद्रिय शक्ति, बल तथा पराक्रम धारण किया. (५८)
अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन् पक्तीः पचन् पुरोडाशान् बध्नन्नश्विभ्यां
छाग १४ सरस्वत्यै मेषमिन्द्राय ऋषभ १४ सुन्वन्नश्विभ्या १४ सरस्वत्या ऽ इन्द्राय सुत्राम्णे
सुरासोमान्.. (५९)
इस यजमान ने आज होता अग्नि का वरण किया. सरस्वती देवी के लिए मेष
से पुरोडाश पकाया. अश्विनीकुमारों के लिए छाग से पुरोडाश पकाया. इंद्र देव के
लिए ऋषभ से पुरोडाश पकाया. सरस्वती देवी तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव हेतु
सुरा (ओषधियों का तीखा रस) और सोम भेंट किया. (५९)
सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदश्विभ्यां छागेन सरस्वत्यै मेषेणेन्द्राय
ऋषभेणाक्षँस्तान् मेदस्तः प्रति पचतागृभीषतावीवृधन्त पुरोडाशैरपुरश्विना सरस्वतीन्द्रः
सुत्रामा सुरासोमान्.. (६०)
आज वनस्पति देव यज्ञ में पधारें. उन्होंने छाग से अश्विनीकुमारों को प्रसन्न
किया. उन्होंने मेष से सरस्वती देवी को प्रसन्न किया. उन्होंने ऋषभ से इंद्र देव को
प्रसन्न किया. तीनों देव इस से आनंदित हुए. इन ओषधियों से पुरोडाश पकाया.
सरस्वती देवी तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव हेतु सुरा (ओषधियों का तीखा रस)
और सोम भेंट किया. (६०)
२८२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
त्वामद्य ऋष ऽ आर्षेय ऋषीणां नपादवृणीतायं यजमानो बहुभ्य ऽ आ सङ्गतेभ्य ऽ एष मे
देवेषु वसु वार्यायक्ष्यत ऽ इति ता या देवा देव दानान्यदुस्तान्यस्मा ऽ आ च शास्स्वा च
गुरस्वेषितश्च होतरसि भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय सूक्ता ब्रूहि.. (६१)
आर्ष ऋषियों के मार्ग पर चलते हुए यजमान ने यज्ञ में सभी देवों का वरण
किया. यजमान ने ऐश्वर्य की कामना से यज्ञ किया. इन देवगणों ने यजमान के लिए
दिव्य दान किए. हे होताओ! आप सभी देवताओं का आह्वान कीजिए. आप भद्र
वाणी से सभी देवताओं का आह्वान कीजिए. आप अच्छे वाणीमय सूत्रों से देवताओं
का आह्वान कीजिए. ( ६१ )
यजुर्वेद - २८३

बाईसवां अध्याय

बाईसवां अध्याय
तेजोसि शुक्रममृतमायुष्पा ऽ आयुर्मे पाहि. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्चिवनोर्बाहुभ्यां
पूष्णो हस्ताभ्यामाददे.. (१)
हे देव! आप तेजोमय, चमकीले, अमर व आयु की रक्षा करने वाले हैं. आप
हमारी आयु की रक्षा कीजिए. सविता देव और अश्विनीकुमार की बाहु तथा पूषा
देव के हाथों आप हम पर कृपा दान कीजिए. (१)
इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य पूर्व ऽ आयुषि विदथेषु कव्या.
सा नो अस्मिन्त्सुत ऽ आ बभूव ऋतस्य सामन्तसरमारपन्ती.. (२)
कवियों ने यज्ञ से ज्ञान पाया. ज्ञान से सृष्टि व आयु को जाना. वे हमारे पुत्रों के
लिए ऋत को जानें. प्रकृति के रहस्यों को जान जाएं. (२)
अभिधा असि भुवनमसि यन्तासि धर्त्ता.
स त्वमग्निं वैश्वानर १४ सप्रथसं गच्छ स्वाहाकृतः.. (३)
हे अश्व! आप दोनों लोकों के धारक, भुवन, नियंत्रक व धारक हैं. आप
वैश्वानर अग्नि में आहुति दीजिए. आप आहुतिपूर्वक अपने निर्धारित स्थान तक
पहुंचने की कृपा कीजिए. (३)
स्वगा त्वा देवेभ्यः प्रजापतये ब्रह्मन्नश्वं भन्त्स्यामि देवेभ्यः प्रजापतये तेन राध्यासम्.
तं बधान देवेभ्यः प्रजापतये तेन राध्नुहि.. (४)
आप सर्वत्र गमन करने वाले हैं. आप देवों तक स्वयं जाने वाले हैं. आप प्रजापति
तक पहुंचने वाले हैं. अग्नि ब्रह्मज्ञानी हैं. हम आप से देवताओं तक पहुंचने की प्रार्थना
करते हैं. देवता और प्रजापति हमें सब प्रकार के धन प्रदान करने की कृपा करें. (४)
प्रजापतये त्वा जुष्टं प्रोक्षामीन्द्राग्निभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि वायवे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि
विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जुष्टं प्रोक्षामि सर्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जुष्टं प्रोक्षामि.
यो अर्वन्तं जिघा १४ सति तमभ्यमीति वरुणः.
परो मर्त्तः परः श्वा.. (५)
प्रजापति सब के प्रिय हैं. हम प्रजापति की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक करते
२८४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
हैं. इंद्र और अग्नि की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक करते हैं. हम वायु की संतुष्टि
हेतु आप का अभिषेक करते हैं. हम विश्वे देव की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक
करते हैं. हम सभी देवों की संतुष्टि हेतु आप का अभिषेक करते हैं. यज्ञ की जो चंचल
ऊंची उठती हुई लपटें हैं उन्हें जो भी हानि पहुंचाने वाले हों, उन्हें वरुण देव नष्ट करने
की कृपा करें. यज्ञ को नुकसान पहुंचाने वाले कुत्तों और ऐसे व्यक्तियों को दूर
पहुंचाने की कृपा करें. ( ५ )
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहापां मोदाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा वायवे स्वाहा विष्णवे
स्वाहेन्द्राय स्वाहा बृहस्पतये स्वाहा मित्राय स्वाहा वरुणाय स्वाहा.. ( ६)
अग्नि के लिए स्वाहा. सोम के लिए स्वाहा. प्रसन्नता के लिए स्वाहा. सविता
के लिए स्वाहा. वायु के लिए स्वाहा. विष्णु के लिए स्वाहा. इंद्र के लिए स्वाहा.
बृहस्पति के लिए स्वाहा. मित्र के लिए स्वाहा. वरुण के लिए स्वाहा. ( ६ )
हिङ्काराय स्वाहा हिङ्कृताय स्वाहा क्रन्दते स्वाहावक्रन्दाय स्वाहा प्रोथते स्वाहा
प्रप्रोथाय स्वाहा गन्धाय स्वाहा घ्राताय स्वाहा निविष्टाय स्वाहोपविष्टाय स्वाहा
सन्दित्वाय स्वाहा वल्गते स्वाहासीनाय स्वाहा शयानाय स्वाहा स्वपते स्वाहा जाग्रते
स्वाहा कूजते स्वाहा प्रबुद्धाय स्वाहा विजृम्भमाणाय स्वाहा विवृत्ताय स्वाहा स ष्ठ
हानाय स्वाहोपस्थिताय स्वाहायनाय स्वाहा प्रायणाय स्वाहा.. (७)
हिंकार के लिए स्वाहा. हिंकृत के लिए स्वाहा. क्रंदन के लिए स्वाहा. अवक्रंदन
के लिए स्वाहा. कार्य शुरू करने के लिए स्वाहा. कार्य समाप्त करने के लिए स्वाहा.
गंध के लिए स्वाहा. सूंघने के लिए स्वाहा. स्थित के लिए स्वाहा. बैठने के लिए
स्वाहा. स्थिर के लिए स्वाहा. गतिमान के लिए स्वाहा. आसन ग्रहण करने के लिए
स्वाहा. सोने के लिए स्वाहा. जाग्रत के लिए स्वाहा. कूजने के लिए स्वाहा. प्रबुद्ध के
लिए स्वाहा. जम्हा के लिए स्वाहा. चैतन्य होने के लिए स्वाहा. उपस्थित के लिए
स्वाहा. आगमन के लिए स्वाहा. गमन के लिए स्वाहा. ( ७ )
यते स्वाहा धावते स्वाहोद्द्रवाय स्वाहोद्द्रुताय स्वाहा शूकाराय स्वाहा शूक़्ताय स्वाहा
निषण्णाय स्वाहोत्थिताय स्वाहा जवाय स्वाहा बलाय स्वाहा विवर्त्तमानाय
स्वाहा विवृत्ताय स्वाहा विधून्वानाय स्वाहा विधूताय स्वाहा शुश्रूषमाणाय स्वाहा शृण्वते
स्वाहेक्षमाणाय स्वाहेक्षिताय स्वाहा वीक्षिताय स्वाहा निमेषाय स्वाहा यदत्ति तस्मै स्वाहा
यत् पिबति तस्मै स्वाहा यन्मूत्रं करोति तस्मै स्वाहा कुर्वते स्वाहा कृताय स्वाहा.. (८)
जाते हुए के लिए स्वाहा. दौड़ते हुए के लिए स्वाहा. उत्कर्षशील के लिए
स्वाहा. उत्कर्ष हेतु गतिमान के लिए स्वाहा. बैठे हुए के लिए स्वाहा. उठे हुए के लिए
स्वाहा. वेगवान के लिए स्वाहा. बल के लिए स्वाहा. बारबार किए जाने के लिए
स्वाहा. बारबार किए गए के लिए स्वाहा. कांपने वाले के लिए स्वाहा. कांपने के
लिए स्वाहा. सुनने की इच्छा वाले के लिए स्वाहा. सुनने के लिए स्वाहा. देखने के
यजुर्वेद - २८५

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
लिए स्वाहा. देख चुके के लिए स्वाहा. देखनेपरखने के लिए स्वाहा. पलक झपकाने
के लिए स्वाहा. जो खाता है, उस के लिए स्वाहा. जो पीता है, उस के लिए स्वाहा.
जो मूत्र विसर्जित करता है, उस के लिए स्वाहा. करने वाले के लिए स्वाहा. कर
चुके के लिए स्वाहा. ( ८ )
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. ( ९ )
सविता देव को नमस्कार है. सविता देव वरेण्य, सौभाग्यदायी व देवों को
धारण करते हैं. वे बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर उन्मुख करते हैं. वे हमारी बुद्धि को प्रेरित
करने की कृपा करें. ( ९ )
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये. स चेत्ता देवता पदम्.. ( १० )
सविता देव! आप सोने के हाथों वाले व आप सर्वज्ञ व चित्त में धारण करने
योग्य हैं. हम अपनी रक्षा के लिए आप का आह्वान करते हैं. ( १० )
देवस्य चेततो महीं प्र सवितुर्हवामहे. सुमति १७ सत्यराधसम्.. ( ११ )
हे सविता देव! आप चैतन्य करते हैं. आप सत्य रूपी धन वाले हैं. हम सुमति
( अच्छी बुद्धि ) हेतु आप का आह्वान करते हैं. ( ११ )
सुष्टुति १७ सुमतीवृधो राति १७ सवितुरीमहे. प्र देवाय मतीविदे.. ( १२ )
हे सविता देव! आप सुमति की बढ़ोतरी करते हैं. आप हम को सुष्ठु ( श्रेष्ठ )
गति प्रदान करने की कृपा कीजिए. हम बुद्धिपूर्वक सविता देव की उपासना करते
हैं. ( १२ )
राति १७ सत्यपतिं महे सवितारमुप ह्वये. आसवं देववीतये.. ( १३ )
हम सत्यति, धनशील, वैभववान सविता देव की उपासना करते हैं. हम
देवताओं को तृप्त करने के लिए सविता देव की उपासना करते हैं. ( १३ )
देवस्य सवितुर्मतिमासवं विश्वदेव्यम्. धिया भगं मनामहे.. ( १४ )
सविता देव वैभववान हैं. सभी देवताओं के हितैषी हैं. सौभाग्य बढ़ाने वाली
बुद्धि को पाने के लिए हम उन की उपासना करते हैं. ( १४ )
अग्नि १७ स्तोमेन बोधय समिधानो अमर्त्यम्. हव्या देवेषु नो दधत्.. ( १५ )
हे पुरोहित! आप अग्नि को स्तोत्रों से जाग्रत कीजिए. समिधाओं से
प्रज्वलित कीजिए. अग्नि अमर हैं. देवताओं के लिए हमारी हवि को धारण
करते हैं. ( १५ )
स हव्यवाडमर्त्य ऽ उशिग्दूतश्चनोहितः. अग्निर्धिया समृण्वति.. ( १६ )
२८६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
हे अग्नि! आप हवि वहन करते हैं. आप अमर हैं. आप स्वयं प्रज्वलित होते हैं.
आप देवताओं के दूत हैं. आप हितैषी हैं. आप हवि धारण कर के उसे पहुंचाने की
कृपा करें. ( १६ )
अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे. देवाँ २ आ सादयादिह.. (१७)
अग्नि दूत व हव्य वाहक हैं. हम सम्मुख ही उन की स्थापना करते हैं. हम
उन से अनुरोध करते हैं कि वह यहां पधारें व विराजें और हवि को देवताओं
तक पहुंचाएं. ( १७ )
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पय:.
गोजरीया र २४ हमाणः पुरन्ध्या.. (१८)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले हैं. आप ने सूर्य को प्रकटाया. आप जल
धारण करने की सामर्थ्य रखते हैं. आप गौ आदि के लिए जीवन धारण करते हैं.
गौ आदि आप की कृपा से जल ( दूध ) धारती हैं. ( १८ )
विभूर्मात्रा प्रभूः पित्राश्वो ऽ सि हयो ऽ स्यत्यो ऽ सि मयो ऽ स्यर्वा ऽ सि सप्तिरसि
वाज्यसि वृषासि नृमणा ऽ असि.
ययुर्नामासि शिशुर्मामास्यादित्यानां पत्वान्विहि देवा ऽ आशापाला ऽ एतं देवेभ्यो ऽ श्वं
मेधाय प्रोक्षित २४ रक्षतेह रन्तिरिह रमतामिह धृतिरिह स्वधृतिः स्वाहा.. (१९)
हे अग्नि! आप वैभव संपन्न हैं. आप माता हैं. आप पिता हैं. आप अश्व हैं. आप
हम हैं. आप गतिशील हैं. आप मय हैं. आप पराक्रमी हैं. आप सुखदायी हैं. आप नम्र
हैं. आप शिशु हैं. आप रक्षक हैं. आप आदित्यों की तरह अपनी राह पर चलते हैं.
आप दिशापति हैं. आप देवताओं के लिए इस संस्कार संपन्न घोड़े की रक्षा की कृपा
कीजिए. यह यहां प्रसन्नता से रमण करें, रमें. यह यज्ञ को धारें. यह स्वयं धारण
करने की शक्ति वाले हैं. इन के लिए स्वाहा. ( १९ )
काय स्वाहा कस्मै स्वाहा कतमस्मै स्वाहा स्वाहाधिमाधीताय स्वाहा मनः प्रजापतये
स्वाहा चित्तं विज्ञातायादित्यै स्वाहादित्यै मह्यै स्वाहादित्यै सुमृडीकायै स्वाहा सरस्वत्यै
स्वाहा सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा पूष्णे प्रपथ्याय
स्वाहा पूष्णे नरन्धिषाय स्वाहा त्वष्ट्रे स्वाहा त्वष्ट्रे तुरीपाय स्वाहा त्वष्ट्रे पुरुरूपाय स्वाहा
विष्णवे स्वाहा विष्णवे निभूयपाय स्वाहा विष्णवे शिपिविष्टाय स्वाहा.. (२०)
प्रजापति के लिए स्वाहा. सुख हेतु स्वाहा. सर्वश्रेष्ठ के लिए स्वाहा. विद्या
धारण करने हेतु स्वाहा. मन स्वरूप प्रजापति के लिए स्वाहा. चित्त स्वरूप
प्रजापति के लिए स्वाहा. विशिष्ट ज्ञात आदित्य के लिए स्वाहा. मध्यादित्य के
लिए स्वाहा. सुखदायी के लिए स्वाहा. पवित्र सरस्वती देवी के लिए स्वाहा.
विशालवती देवी के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. श्रेष्ठ पथवाले पूषा
यजुर्वेद - २८७

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
देव के लिए स्वाहा. मानवधारी पूजा देव के लिए स्वाहा. त्वष्टा पूजा देव के
लिए स्वाहा. तीव्र पूषा देव के लिए स्वाहा. विविध रूप पूषा देव के लिए स्वाहा.
विष्णु हेतु स्वाहा. भूपति देव हेतु स्वाहा. सब के चित्त में स्थित विष्णु देव हेतु
स्वाहा. (२०)
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत्त सख्यम्.
विश्वो राय ऽ इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा.. (२१)
सविता देव संसार के नायक हैं. हम उन की मित्रता व संसार के सारे वैभव पाना
चाहते हैं. हम पुष्टता चाहते हैं. हम स्वर्गलोक चाहते हैं. सविता देव हेतु स्वाहा. (२१)
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर ऽ इषव्योतिव्याधी महारथो
जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य
यजमानस्य वीरो जायतां निकामेनिकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधयः
पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्.. (२२)
हे ब्राह्मण! आप ब्रह्मवर्चस्वी हैं. राष्ट्र में शूरवीर बाणविद्या में निपुण महारथी
क्षत्रिय उत्पन्न हों. तीव्र वेग वाले घोड़े, भार ढोने वाले बैल, दुधारू गाएं लोगों
को मिलें. स्त्रियां चरित्रवती और गुणवती हों. वीर विजयी हों. सभी युवा हों.
अच्छे वक्ता हों. बादल अच्छे बरसें. ओषधियां फलवती हों. योगक्षेम का भी
निर्वाह हो. (२२)
प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा वाचे स्वाहा
मनसे स्वाहा.. (२३)
प्राण को स्वाहा. अपान को स्वाहा. व्यान को स्वाहा. चक्षु को स्वाहा. वाणी
को स्वाहा. मन को स्वाहा. (२३)
प्राच्यै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा दक्षिणायै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा प्रतीच्यै
दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहोदीच्यै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहोर्ध्वायै दिशे
स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहावाच्यै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा.. (२४)
पूर्व दिशा के लिए स्वाहा. पश्चिम दिशा के लिए स्वाहा. दक्षिण दिशा के लिए
स्वाहा. ईशान दिशा के लिए स्वाहा. ऊर्ध्व दिशा के लिए स्वाहा. प्रतीच्य दिशा के
लिए स्वाहा. उदीच्य दिशा के लिए स्वाहा. अर्वाच्य दिशा के लिए स्वाहा. अध्वार्य
दिशा के लिए स्वाहा. अर्वाच्य दिशा के लिए स्वाहा. उवाच्य दिशा के लिए स्वाहा.
ऊर्वाच्य दिशा के लिए स्वाहा. उवाच्य दिशा के लिए स्वाहा. (२४)
अद्भ्यः स्वाहा वार्य्यः स्वाहोदकाय स्वाहा तिष्ठन्तीभ्यः स्वाहा स्रवन्तीभ्यः स्वाहा
स्यन्दमानाभ्यः स्वाहा कूप्याभ्यः स्वाहा सूद्याभ्यः स्वाहा धार्याभ्यः स्वाहार्णवाय स्वाहा
२८८ - यजुर्वेद 632/18

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
समुद्राय स्वाहा सरिराय स्वाहा.. (२५)
जलों के लिए स्वाहा. वारि के लिए स्वाहा. उदक के लिए स्वाहा. स्थिर जलों
के लिए स्वाहा. प्रवाहितों के लिए स्वाहा. बहते जलों के लिए स्वाहा. कूप जल
के लिए स्वाहा. सागर जलों के लिए स्वाहा. धारण योग्य जल के लिए स्वाहा. समुद्र
जलों के लिए स्वाहा. सरोवर के लिए स्वाहा. ( २५ )
वाताय स्वाहा धूमाय स्वाहाभ्राय स्वाहा मेघाय स्वाहा विद्योतमानाय स्वाहा स्तनयते
स्वाहावस्फूर्जते स्वाहा वर्षते स्वाहाववर्षते स्वाहोग्रं वर्षते स्वाहा शीघ्रं वर्षते
स्वाहोद्गृह्णते स्वाहोद्गृहीताय स्वाहा पृष्णते स्वाहा शीकायते स्वाहा पृष्वाभ्यः
स्वाहा ह्रादुनीभ्यः स्वाहा नीहाराय स्वाहा.. (२६)
वायु के लिए स्वाहा. धुएं के लिए स्वाहा. विद्युत् वाले के लिए स्वाहा. गर्जने
वाले के लिए स्वाहा. वर्षक के लिए स्वाहा. कमवर्षक के लिए स्वाहा. अति वर्षक
के लिए स्वाहा. शीघ्र वर्षक के लिए स्वाहा. ऊपर उठने वाले के लिए स्वाहा. ऊपर
से जलग्राही के लिए स्वाहा. बूंदाबांदी के लिए स्वाहा. घनघोर वर्षक के लिए
स्वाहा. गड़गड़ाहट वाले के लिए स्वाहा. कोहरे वाले के लिए स्वाहा. सभी मेघों के
लिए स्वाहा. ( २६ )
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहेन्द्राय स्वाहा पृथिव्यै स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा दिवेस्वाहा
दिग्भ्यः स्वाहाशाभ्यः स्वाहोर्ध्वै दिशे स्वाहावार्वाच्यै दिशे स्वाहा.. ( २७)
अग्नि के लिए स्वाहा. सोम के लिए स्वाहा. इंद्र के लिए स्वाहा. पृथ्वी के
लिए स्वाहा. अंतरिक्ष के लिए स्वाहा. स्वर्ग के लिए स्वाहा. दिशाओं के लिए
स्वाहा. उपदिशा के लिए स्वाहा. अपर दिशाओं के लिए स्वाहा. नीच दिशा के लिए
स्वाहा. ( २७ )
नक्षत्रेभ्यः स्वाहा नक्षत्रियेभ्यः स्वाहाहोरात्रेभ्यः स्वाहार्धमासेभ्यः स्वाहा मासेभ्यः
स्वाहा ऋतुभ्यः स्वाहर्तवेभ्यः स्वाहा संवत्सराय स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ँ स्वाहा
चन्द्राय स्वाहा सूर्याय स्वाहा रश्मिभ्यः स्वाहा वसुभ्यः स्वाहा रुद्रेभ्यः स्वाहादित्येभ्यः
स्वाहा मरुद्भ्यः स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा मूलेभ्यः स्वाहा शाखाभ्यः स्वाहा
वनस्पतिभ्यः स्वाहा पुष्पेभ्यः स्वाहा फलेभ्यः स्वाहौषधीभ्यः स्वाहा.. ( २८)
नक्षत्रों के लिए स्वाहा. नक्षत्रों से संबंधित देवताओं के लिए स्वाहा. दिनरात
के लिए स्वाहा. अर्द्धमास के लिए स्वाहा. मास के लिए स्वाहा. ऋतुमास के लिए
स्वाहा. ऋतु से उत्पन्नो के लिए स्वाहा. वर्ष के लिए स्वाहा. स्वर्ग के लिए स्वाहा.
पृथ्वी के लिए स्वाहा. चंद्र के लिए स्वाहा. सूर्य के लिए स्वाहा. किरणों के लिए
स्वाहा. वसुओं के लिए स्वाहा. रुद्रों के लिए स्वाहा. आदित्यों के लिए स्वाहा.
मरुतों के लिए स्वाहा. सभी देवों के लिए स्वाहा. शाखाओं के लिए स्वाहा.
यजुर्वेद - २८१

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
वनस्पतियों के लिए स्वाहा. पुष्पों के लिए स्वाहा. फलों के लिए स्वाहा. ओषधियों
के लिए स्वाहा. ( २८ )
पृथिव्यै स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा चन्द्राय स्वाहा नक्षत्रेभ्यः
स्वाहाद्भ्यः स्वाहौषधीभ्यः स्वाहा वनस्पतिभ्यः स्वाहा परिप्लवेभ्यः स्वाहा
चराचरेभ्यः स्वाहा सरीसृपेभ्यः स्वाहा.. (२९)
पृथ्वी के लिए स्वाहा. अंतरिक्ष के लिए स्वाहा. स्वर्ग के लिए स्वाहा. सूर्य के
लिए स्वाहा. चंद्र के लिए स्वाहा. नक्षत्रों के लिए स्वाहा. जलों के लिए स्वाहा.
ओषधियों के लिए स्वाहा. वनस्पतियों के लिए स्वाहा. चराचर के लिए स्वाहा. रेंगने
और रपटने वालों के लिए स्वाहा. ( २९ )
असवे स्वाहा वसवे स्वाहा विभुवे स्वाहा विवस्वते स्वाहा गणश्रिये स्वाहा
गणपतये स्वाहाभिभुवे स्वाहाधिपतये स्वाहा शूषाय स्वाहा स ४' सर्पाय स्वाहा चन्द्राय
स्वाहा ज्योतिषे स्वाहा मलिम्लुचाय स्वाहा दिव पतयते स्वाहा.. (३०)
असव के लिए स्वाहा. वसव के लिए स्वाहा. विभु के लिए स्वाहा. विवस्वत
( सूर्य ) के लिए स्वाहा. गणश्री के लिए स्वाहा. गणपति के लिए स्वाहा. अभिभु के
लिए स्वाहा. अधिपति के लिए स्वाहा. सामर्थ्यवान के लिए स्वाहा. सर्प के लिए
स्वाहा. चंद्र के लिए स्वाहा. ज्योतिवान के लिए स्वाहा. अधिमास के देव के लिए
स्वाहा. स्वर्गलोक के पालक के लिए स्वाहा. ( ३० )
मधवे स्वाहा माधवाय स्वाहा शुक्राय स्वाहा शुचये स्वाहा नभसे स्वाहा नभस्याय
स्वाहेषाय स्वाहोर्ज्याय स्वाहा सहसे स्वाहा सहस्याय स्वाहा तपसे स्वाहा तपस्याय
स्वाहा ४' हसस्पतये स्वाहा.. (३१)
चैत मास के लिए स्वाहा. वैशाख मास के लिए स्वाहा. ज्येष्ठ मास के लिए
स्वाहा. आषाढ़ मास के लिए स्वाहा. सावन मास के लिए स्वाहा. भादों मास के लिए
स्वाहा. आश्विन मास के लिए स्वाहा. कार्तिक मास के लिए स्वाहा. अगहन मास के
लिए स्वाहा. पौष मास के लिए स्वाहा. फाल्गुन मास के लिए स्वाहा. अधिमास के
लिए संतुलन हेतु स्वाहा. ( ३१ )
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा स्वः स्वाहा मूर्ध्ने स्वाहा
व्यश्नुविने स्वाहान्त्याय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये
स्वाहा प्रजापतये स्वाहा.. (३२)
अन्न के लिए स्वाहा. उत्पादक के लिए स्वाहा. जल में उत्पन्न अन्न के लिए
स्वाहा. यज्ञ के लिए स्वाहा. मूर्धा में उत्पन्न अन्न के लिए स्वाहा. व्यापक अन्न के
लिए स्वाहा. अंतिम उत्पन्न अन्न के लिए स्वाहा. भुवन के लिए स्वाहा. भुवनपति
के लिए स्वाहा. अधिपति के लिए स्वाहा. प्रजापति के लिए स्वाहा. ( ३२ )
२९० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध बाईसवां अध्याय
आयुर्यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा प्राणो यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहापानो यज्ञेन कल्पता ४
स्वाहा व्यानो यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहोदानो यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा समानो यज्ञेन
कल्पता ४ स्वाहा चक्षुर्यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा श्रोत्रं यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा वाग्यज्ञेन
कल्पता ४ स्वाहा मनो यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहात्मा यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा ब्रह्मा
यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा ज्योतिर्यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा स्वर्यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा
पृष्ठं यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा यज्ञो यज्ञेन कल्पता ४ स्वाहा.. ( ३३)
यज्ञ से आयु वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से प्राण वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से
अपान वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से व्यान वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से उदान वृद्धि
के लिए स्वाहा. यज्ञ से समान वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से चक्षु बल वृद्धि
के लिए स्वाहा. यज्ञ से कर्ण बल वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से वाणी बल वृद्धि
के लिए स्वाहा. यज्ञ से मन बल वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से आत्म बल वृद्धि
के लिए स्वाहा. यज्ञ से ब्रह्म बल वृद्धि के लिए स्वाहा. ज्योतिर्मय यज्ञ के लिए
स्वाहा. स्वयं प्रकाशित यज्ञ के लिए स्वाहा. यज्ञ से यज्ञ वृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ
से अग्रवृद्धि के लिए स्वाहा. यज्ञ से तृण वृद्धि के लिए स्वाहा. ( ३३ )
एकस्मै स्वाहा द्वाभ्या ४ स्वाहा शताय स्वाहैकशताय स्वाहा व्युष्ट्यै स्वाहा स्वर्गाय
स्वाहा.. ( ३४)
एक के लिए स्वाहा. दो के लिए स्वाहा. सौ के लिए स्वाहा. एक सौ के लिए
स्वाहा. व्यष्टि के लिए स्वाहा. स्वर्ग के लिए स्वाहा. ( ३४ )
यजुर्वेद - २९१

तेईसवां अध्याय

तेईसवां अध्याय
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽ आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१)
परमात्मा सोने ( हिरण्य ) के गर्भ में रहे. वे सब से पहले उत्पन्न हुए. वे सब को
उत्पन्न करने वाले व सब के एकमात्र पालक हैं. उन्होंने पृथ्वी व उत्तम स्वर्ग को धारण
किया है. परमात्मा के अलावा अन्य किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १ )
उपयामगृहीतोसि प्रजापतये त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिः सूर्यस्ते महिमा.
यस्ते ऽ हन्संवत्सरे महिमा सम्बभूव यस्ते वायावन्तरिक्षे महिमा सम्बभूव यस्ते दिवि
सूर्ये महिमा सम्बभूव तस्मै ते महिम्ने प्रजापतये स्वाहा देवेभ्यः.. (२)
हवि को प्रजापति देव हेतु उपयाम में ग्रहण किया है. यह आप का इष्ट स्थान
है. हम आप को इस में ग्रहण करते हैं. यह आप का मूल स्थान है. सूर्य आप की
महिमा है. दिन आप की महिमा का सूचक है. संवत्सर आप की महिमा का
सूचक है. वायु आप की महिमा के सूचक हैं. अंतरिक्ष लोक आप की महिमा का
सूचक है. स्वर्गलोक आप की महिमा का सूचक है. महिमाशाली प्रजापति के
लिए स्वाहा. सब देवगणों के लिए स्वाहा. ( २ )
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक ऽ इद्राजा जगतो बभूव.
य ऽ ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३)
जो परमात्मा प्राण से जगत् के अधिष्ठाता हैं, जो परमात्मा जल से जगत् के
अधिष्ठाता हैं, जो परमात्मा महिमाशाली हैं, जिन परमात्मा से महिमाशाली जग
उत्पन्न हुआ, जो परमात्मा दोपायों व चौपायों के स्वामी हैं उन के अलावा हम किस
देव के लिए हवि का विधान करें. ( ३ )
उपयामगृहीतोसि प्रजापतये त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिश्चन्द्रमास्ते महिमा.
यस्ते रात्रौ संवत्सरे महिमा सम्बभूव यस्ते पृथिव्यामग्नौ महिमा सम्बभूव यस्ते नक्षत्रेषु
चन्द्रमसि महिमा सम्बभूव तस्मै ते महिम्ने प्रजापतये देवेभ्यः स्वाहा.. (४)
हवि को प्रजापति के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप प्रजापति की
२१२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
इष्ट है. इसीलिए आप को ग्रहण किया गया है. यही आप का मूल स्थान है. चंद्रमा
आप की महिमा है. रात्रि आप की महिमा है. संवत्सर आप की महिमा है. पृथ्वी आप
की महिमा है. अग्नि आप की महिमा है. नक्षत्रों में जो महिमा है, वह आप की है.
चंद्रमा में जो महिमा है, वह आप की है. आप की उस महिमा के लिए स्वाहा.
प्रजापति के लिए स्वाहा. देवगणों के लिए स्वाहा. ( ४ )
युञ्जन्ति ब्रघ्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (५)
सूर्य जैसे स्वर्गलोक को प्रकाशित करते हैं और जैसे अपने चारों ओर के ग्रह
को जोड़ते हैं, वैसे ही यजमान यज्ञ के सारे साधनों को जोड़ते हैं. ( ५ )
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (६)
मनुष्य के वाहन में घोड़े जोतने की तरह हवि ले जाने हेतु देवरथ में कामना
पूरक हरि नामक घोड़े को जोतिए तथा धृष्णु नामक घोड़े को रथ में जोतने की
कृपा कीजिए. ( ६ )
यद्वातो अपो अगनीगन्प्रियामिन्द्रस्य तन्वम्.
एत ६४ स्तोतरनेन पथा पुनरश्वमावर्तयासि नः.. (७)
जब यह अश्व, जो वायु के समान वेगवान है, इंद्र देव के प्रिय जल को प्राप्त
होता है, तब यजमानों को चाहिए कि वे अपने लिए उसी मार्ग से उस अश्व को
लौटा दें. ( ७ )
वसवस्त्वाञ्जन्तु गायत्रेण छन्दसा रुद्रास्त्वाञ्जन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसा दित्यास्त्वाञ्जन्तु
जागतेन छन्दसा.
भूर्भुवःस्वर्लाजी ३ च्छाची ३ न्यव्ये गव्य ऽ एतदन्नमत्त देवा ऽ एतदन्नमद्धि
प्रजापते.. (८)
हे यज्ञ रूपी अश्व! वसुगण गायत्री छंद से आप को आंजते हैं. हे यज्ञ रूपी
अश्व! रुद्रगण त्रिष्टुभ् छंद से आप को आंजते हैं. हे यज्ञ रूपी अश्व! आदित्यगण
जगती छंद से आप को आंजते हैं. भूलोक में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस
हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. अंतरिक्ष में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस
हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. स्वर्गलोक में स्थित देव से अनुरोध है कि वे
इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. प्रजापति में स्थित देव से अनुरोध है कि वे
इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. देवगण में स्थित देव से अनुरोध है कि वे
इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. ( ८ )
कः स्विदेकाकी चरति क ऽ उ स्विज्जायते पुनः.
कि ६४ स्विद्धिमस्य भेषजं किम्वावपनं महत्.. (९)
यजुर्वेद - २९३

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
कृपया बताइए कि कौन अकेला विचरता है ? कौन बारबार उत्पन्न होता है ?
शीत की ओषधि क्या है ? बीज बोने के लिए कौन सा क्षेत्र सब से बड़ा है ? ( ९ )
सूर्य ऽ एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः.
अग्निर्हिमस्य भेषजं भूमिरावपनं महत्.. (१०)
सूर्य अकेले विचरते हैं. चंद्रमा बारबार उत्पन्न होता है. अग्नि शीत की ओषधि
है. भूमि बीज बोने का सब से विशाल क्षेत्र है. ( १० )
का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः कि १थ् स्विदासीद् बृहद्वयः.
का स्विदासीत्पिलिप्पिला का स्विदासीत्पिशङ्गिला.. (११)
यजमान पूछते हैं कि सब से पहले किस का चिंतन करना चाहिए ? सब से
बड़ा कौन है ? सब से बड़ा रक्षक एवं शोभाधारक कौन है ? सब के रूपों को
निगल जाने वाला कौन है ? ( ११ )
द्यौरासीत्पूर्वचित्तिरश्व ऽ आसीद् बृहद्वयः.
अविरासीत्पिलिप्पिला रात्रिरासीत्पिशङ्गिला.. (१२)
स्वर्गलोक के बारे में सब से पहले चिंतन करना चाहिए. अश्व सब से विशाल
है. पृथ्वी सब से बड़ी रक्षिका है. पृथ्वी सब से ज्यादा शोभा धारने वाली है. रात्रि
अपने अंधेरे में सब को छिपा कर रखने वाली है. ( १२ )
वायुष्ट्वा पचतैरवत्वसितग्रीवश्छागैर्न्यग्रोधश्चमसैः शाल्मलिर्वृद्ध्या.
एष स्य राथ्यो वृषा पद्भिश्चतुर्भिरिदगन्ब्रह्मा ऽ कृष्णश्च नोवतु नमोग्नये.. (१३)
वायु हमें परिपक्वता प्रदान करे. वायु काली गरदन वाली अग्नि दे. वटवृक्ष
चमस प्रदान करे. शाल्मली वृक्ष ( सेमल ) बढ़ोतरी प्रदान करे. यह शक्तिमान,
सर्वव्यापक, आनंददायक है. अग्नि चारों चरणों में जीवों को पोसें व अग्नि आगमन
की कृपा करें. बिना काले यानी सफेद अश्व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. अग्नि
के लिए नमस्कार. ( १३ )
स १थ् शितो रश्मिना रथः स १थ् शितो रश्मिना हयः.
स १थ् शितो अप्स्वप्सुजा ब्रह्मा सोमपुरोगवः.. (१४)
रश्मियों से यज्ञ रूपी रथ की प्रशंसा होती है. किरण रूपी घोड़ों से यज्ञ रूपी
रथ की प्रशंसा होती है. जल में उत्पन्न जल में शोभा पाते हैं. ब्रह्मा की प्रशंसा सोम
को आगे करने के कारण होती है. ( १४ )
स्वयं वाजिंस्तन्वं कल्पयस्व स्वयं यजस्व स्वयं जुषस्व.
महिमा तेन्येन न सन्नशे.. (१५)
२९४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
हे यज्ञ ऊर्जा! आप स्वयं बलवान हैं. आप अपने शरीर को फलीभूत कीजिए.
आप स्वयं यज्ञ से विस्तृत होइए. आप पदार्थों से जुड़िए. उन्हें प्राणवान बनाने की
कृपा कीजिए. आप की महिमा कभी भी नष्ट न हो. ( १५ )
न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ २ इदेषि पथिभिः सुगेभिः.
यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु.. (१६)
परम शक्ति न मरती है, न क्षीण होती है. वह देवताओं के मार्ग से जाती है. वह
सुगम पथ से वहां पहुंचती है, जहां अच्छे कर्म करने वाले लोग रहते हैं. वहां सविता
देव स्वयं इसे धारण करते हैं. ( १६ )
अग्निः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतँल्लोकमजयद्यस्मिन्नग्निः स ते लोको भविष्यति तं
जेष्यसि पिबैता ऽ अपः.
वायुः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतँल्लोकमजयद्यस्मिन्वायुः स ते लोको भविष्यति तं
जेष्यसि पिबैता ऽ अपः.
सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतँल्लोकमजयद्यस्मिन्सूर्यः स ते लोको भविष्यति तं
जेष्यसि पिबैता ऽ अपः.. (१७)
अग्नि रूपी पशु से देवताओं ने यजन ( यज्ञ ) किया. जिस में अग्नि है, वही
इस लोक में जीतता है और जीतेगा. यजमान इस ज्ञान को अपनाएं. वायु रूपी पशु
से देवताओं ने यज्ञ किया. जिस में वायु प्रबल है, वह जीतता है और जीतेगा.
यजमान इस ज्ञान को अपनाएं. सूर्य रूपी पशु से देवताओं ने यज्ञ किया. जिस में
सूर्य तत्त्व की प्रधानता होती है, वह जीतता है और जीतेगा. यजमान इस ज्ञान को
अपनाएं. ( १७ )
प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा.
अम्बे अम्बिकेम्बालिके न मा नयति कश्चन.
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्.. (१८)
प्राण के लिए स्वाहा. अपान के लिए स्वाहा. प्राण के लिए स्वाहा. हे अंबे!
हे अंबिके! आप हमें किसी अप्रिय स्थिति में न ले जाएं. हे अंबालिके! आप हमें
किसी अप्रिय स्थिति में न ले जाएं. ठंडी अग्नि कांपील पेड़ की समिधाओं पर पड़ी
है. ठंडी अग्नि श्रेष्ठ हवियों के साथ ठंडी पड़ी हुई है. ( १८ )
गणानां त्वा गणपति ᳵ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ᳵ हवामहे निधीनां त्वा
निधिपति ᳵ हवामहे वसो मम.
आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्.. (१९)
आप गणों के स्वामी हैं. हम आप गणपति का आह्वान करते हैं. आप प्रियों के
बीच प्रिय हैं. हम आप प्रियपति का आह्वान करते हैं. आप निधियों के बीच प्रिय हैं.
यजुर्वेद - २९५

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
हम निधिपति का आह्वान करते हैं. जगत् को आप ने बसाया है. आप हमारे होइए. आप
संसार के गर्भधारी हैं. हम आप की इस गर्भधारण क्षमता को जानें. ( १९ )
ता ऽ उभौ चतुरः पदः संप्रसारयाव स्वर्गे लोके प्रोर्णुवाथां वृषा वाजी रेतोधा रेतो
दधातु.. (२०)
यज्ञ शक्ति और देव शक्ति दोनों से उम्मीद है कि वे अपने चारों पैरों का प्रसार
करने की कृपा करें. दोनों शक्तियां स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक में व्याप्त करने की
कृपा करें. दोनों शक्तियां बलवान हैं. वे हमें बलशाली व वीर्यवान बनाएं. हमारे
लिए शक्ति और शौर्य धारण करें. ( २० )
उत्सक्थ्या अव गुदं धेहि समज्रिं चारया वृषन्.
य स्त्रीणां जीवभोजनः.. (२१)
हे परम शक्ति! आप दुष्टों का दमन करने वाले व शक्तिमान हैं. जो व्यक्ति
स्त्रियों से अपनी आजीविका कमाते हैं, अपना भोजन पाते हैं, आप उन को प्रताड़ना
दीजिए. ( २१ )
यकासकौ शकुन्तिकाहालयिति वञ्चति.
आहन्ति गभे पसो निगलगलीति धारका.. (२२)
यह जल पक्षी की भांति प्रसन्नतादायी निनाद ( आवाज ) करता है. यह जल
तेजोमय है. यह तेजस्वी जल कलकल निनाद करता है और शक्तिधारी है. ( २२ )
यकोसकौ शकुन्तक ऽ आहालयिति वञ्चति.
विवक्षत ऽ इव ते मुखमध्वर्यो मा नस्त्वमभि भाषथाः.. (२३)
उपर्युक्त तेज के प्रभाव से बोलने के इच्छुक मुंह पक्षी की तरह निरंतर शब्द
करते हैं. उन से निवेदन है कि वे यज्ञ के बारे में निरर्थक बात न करें. ( २३ )
माता च ते पिता च ते ऽ ग्रं वृक्षस्य रोहतः.
प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमत् ँष् सयत्.. (२४)
हे यजमान! आप के माता और पिता वृक्ष के आगे के भाग से ऊर्ध्व गति पाते
हैं. ऊर्ध्वलोक से आप के पूर्वज बादल से वर्षा कर के शोभा बढ़ाते हुए ऐसे प्रतीत
होते हैं, मानो वे कहते हैं, हम आप से प्रसन्न हैं. ( २४ )
माता च ते पिता च तेग्रे वृक्षस्य क्रीडतः.
विवक्षत ऽ इव ते मुखं ब्रह्मन्मा त्वं वदो बहु.. (२५)
आप के माता और पिता वृक्ष के आगे के भाग पर खेलते हैं. आप बोलने के
अधिक इच्छुक प्रतीत होते हैं. आप अधिक मत बोलें. ( २५ )
२९६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
ऊर्ध्वामेनामुच्छ्रापय गिरौ भार १भ् हरन्निव.
अथास्यै मध्यमेधता १भ् शीते वाते पुनन्निव.. ( २६ )
हे प्रजापति! आप इस राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाइए. हे प्रजापति! जैसे किसी
भार को पर्वत पर पहुंचा कर ( लोग ) प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार हम राष्ट्र को ऊंचाई
पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं. जैसे ठंडी हवाओं के बीच से किसान अन्न को साफ
करते हैं, उसी प्रकार प्रजापति की कृपा से हम राष्ट्र को पवित्र करें. ( २६ )
ऊर्ध्वमेनमुच्छ्रयताद्गिरौ भार १भ् हरन्निव.
अथास्य मध्यमेजतु शीते वाते पुनन्निव.. ( २७)
हे प्रजापति! आप इस राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाइए. हे प्रजापति! जैसे भार
को पर्वत पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं (लोग ), उसी प्रकार हम राष्ट्र को ऊंचाई
पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं. जैसे ठंडी हवाओं के बीच से किसान अन्न को साफ
करते हैं, उसी प्रकार प्रजापति की कृपा से हम राष्ट्र को पवित्र करें. ( २७ )
यदस्या ऽ अ १भ् हुमेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत्.
मुष्काविदस्या ऽ एजतो गोशफे शकुलाविव.. ( २८)
यह यज्ञाग्नि पाप भेदक व दुष्ट नाशक है. इस यज्ञाग्नि की स्थूल पृथ्वी पर
स्थापना हो जाती है तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि धर्म रूपी गाय के चरणों में खुरों की
तरह सुशोभित होते हैं. ( २८ )
यद्देवासो ललामगुं प्रविष्टिमिनमाविषुः.
सक्थ्ना देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा.. (२९)
जब ऐसी ही ( यज्ञ जैसी ) परमानंददायी गतिविधि संपन्न होती है तो उन्हें उस
परम सत्य की वैसे ही अनुभूति हो जाती है, जैसे स्त्री के अंगों को देख कर स्त्री की
पहचान हो जाती है. ( २९ )
यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टं पशु मन्यते.
शूद्रा यदर्यजारा न पोषाय धनायति.. (३०)
जब हिरण खेत में घुस कर जौ ( अनाज ) खा जाता है तो किसान हिरण की
पुष्टता से खुश नहीं होते बल्कि अपनी हानि से दुःखी ही होते हैं. वैसे ही कोई शूद्रा
जार से ज्ञानधन पाती है तो उस का पति उस के इस तरह ज्ञान संपन्न होने से प्रसन्न
नहीं होता है. ( ३० )
यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टं बहु मन्यते.
शूद्रो यदर्यायै जारो न पोषमनु मन्यते.. (३१)
जब हिरण खेत में घुस कर जौ ( अनाज ) खा जाता है तो किसान हिरण की
यजुर्वेद - २९७

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
पुष्टता से खुश नहीं होते बल्कि अपनी हानि से दुःखी ही होते हैं. वैसे ही कोई शूद्रा
आर्यजन से ज्ञान पाती है तो उस का पति उस की इस ज्ञान प्राप्ति से ज्ञान पोषण को
नहीं मानता. ( ३१ )
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः.
सुरभि नो मुखा करत्प्र ण ऽ आयूं षि तारिषत्.. (३२)
हम शक्तिशाली यज्ञ की अग्नि को विधिविधानपूर्वक संस्कार युक्त बनाते हैं.
यज्ञ देव की कृपा हमारे मुखों को सुगंधमय व हमें आयुष्मान बनाए. यज्ञ देव की
कृपा हमारा तारण करें. ( ३२ )
गायत्री त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्क्त्या सह.
बृहत्युष्णिहा ककुप्सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३३)
हे यज्ञाग्नि! हम गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती, उष्णिाक्,
ककुप् छंद व सूचियों से आप को शांत करते हैं. आप शांत होने की कृपा
कीजिए. ( ३३ )
द्विपदा याश्चतुष्पदास्त्रिपदा याश्च षट्पदाः.
विच्छन्दा याश्च सच्छन्दाः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३४)
हे यज्ञाग्नि! जो दो, तीन, चार, छह पद वाले, छंद छंदहीन व छंद छंदयुक्त हैं,
वे सूचियों द्वारा आप को शांति प्रदान करें. ( ३४ )
महानाम्न्यो रेवत्यो विश्वा आशाः प्रभूवरीः.
मैध्रीर्विद्युतो वाचः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३५)
हे यज्ञाग्नि! सब प्राणियों को धारण करने वाली ऋचाएं, समस्त दिशाएं,
‘महानाम्नी’ देववाणियां, रेवती नमक ऋचाएं, बादलों की बिजली और श्रेष्ठ
वाणियां सूचियों द्वारा आप को शांति प्रदान करें. ( ३५ )
नार्यस्ते पत्न्यो लोम विचिन्वन्तु मनीषया.
देवानां पत्न्यो दिशः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३६)
हे यज्ञाग्नि! यजमान की पत्नियां नेतृत्व करने में समर्थ हैं. हे यजमान! वे नारियां
आप के लोमों को बुद्धिपूर्वक चुन कर अलग करने की कृपा करें. देवगणों की
पत्नियां व दिशाएं सूची से आप को शांत करने की कृपा करें. ( ३६ )
रजता हरिणीः सीसा युजो युज्यन्ते कर्मभिः.
अश्वस्य वाजिनस्त्वचि सिमाः शम्यन्तु शम्यन्तीः.. (३७)
चांदी, सीसा और सोना विधिविधानपूर्वक यज्ञ में जोड़ा जाता है. वे इस यज्ञ
२९८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
की सम्यक् रूप से रक्षा करें. वे इस यज्ञ की अग्नि को सम्यक् रूप से शांत करने
की कृपा करें. ( ३७ )
कुविदङ्ग्यवमन्तो यवञ्चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.. ( ३८ )
हे सोम! यवमान यानी जौ से पूरी तरह भरी हुई फसल को हम सब बहुत
सोचविचार कर सावधानीपूर्वक काटते हैं. हम दया से परिपूर्ण आप को कुश का
आसन भेंट करते हैं. आप यहां आने व भोजन करने की कृपा कीजिए. ये यजमान
कुश के आसन पर बैठ कर नमस्कारपूर्वक आप के लिए यज्ञ कर रहे हैं. ( ३८ )
कस्त्वा च्छ्यति कस्त्वा विशास्ति कस्ते गात्राणि शम्यति.
क ऽ उ ते शमिता कवि:.. ( ३९)
कौन आप को आजाद करता है ? कौन आप को आदेश ( उपदेश ) देता है ?
कौन आप को शांत करता है ? कौन आप को सुख देता है ? विद्वान् ( कवि )
परमात्मा ही यह सब करते हैं. ( ३९ )
ऋतवस्त ऽ ऋतुथा पर्व शमितारो वि शासतु.
संवत्सरस्य तेजसा शमीभिः शम्यन्तु त्वा.. ( ४० )
ऋतुएं ऋतु के अनुसार सुखदायी हों. पर्व सुखद व अनुशासन में रहें. संवत्सर
के तेज से सुख मिले. शांतिदायी कर्म आप के लिए सुखद हों. ( ४० )
अर्धमासाः परूंषि ते मासा ऽ आ च्छ्यन्तु शम्यन्तः.
अहोरात्राणि मरुतो विलिष्टं सूदयन्तु ते.. ( ४१ )
हे परम पुरुष! आधे माह पक्ष और मास से आयु क्षीण होती है. मरुद्गण
दिनरात आप के दुःख दूर करने की कृपा करें. ( ४१ )
दैव्या अध्वर्यवस्त्वा च्छ्यततु वि च शासतु.
गात्राणि पर्वशस्ते सिमाः कृण्वन्तु शम्यन्तीः.. ( ४२ )
इस यज्ञ के अध्वर्यु ( पुरोहित ) आप के दोषों का क्षय करें व आप के
अनुशासन हेतु मार्गदर्शन करें. इस यज्ञ के अध्वर्यु आप के शरीर उस के जोड़ों को
शक्तिमान बनाने की कृपा करें. ( ४२ )
द्यौस्ते पृथिव्यन्तरिक्षं वायुश्छिद्रं पृणातु ते.
सूर्यस्ते नक्षत्रैः सह लोकं कृणोतु साधुया.. ( ४३ )
हे परमात्मा! आप पृथ्वीलोक ( यजमान ) को परिपूर्ण बनाने की कृपा करें.
आप अंतरिक्षलोक के दोष दूर करें. आप अंतरिक्षलोक को परिपूर्ण बनाने की कृपा
यजुर्वेद - २९१

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
करें. आप वायुलोक के दोष दूर करने की कृपा करें. हे परमात्मा! आप वायुलोक
को परिपूर्ण बनाने की कृपा करें. सूर्य नक्षत्रों के साथ इस लोक को सज्जनता से
पूरित करने की कृपा करें. ( ४३ )
शं ते परेभ्यो गात्रेभ्यः शमस्त्ववरेभ्यः.
शमस्थिभ्यो मज्जभ्यः शम्वस्तु तन्वौ तव.. (४४)
हे परमात्मा! आप की कृपा से हमारे शरीर के अंग विकारहीन हो जाएं. आप
की कृपा से हमारे शरीर की हड्डियां व मज्जा विकारहीन हो जाएं. आप की कृपा
से हमारे सुखों का विस्तार हो जाए. ( ४४ )
कः स्विदेकाकी चरति क ऽ उ स्विज्जायते पुनः.
कि १४ स्विद्धिमस्य भेषजं किम्वावपनं महत्.. (४५)
कौन अकेला विचरता है ? कौन बारबार उत्पन्न होता हैं? हिम की ओषधि
कौन सी है ? अच्छी तरह बीज बोने का विशाल स्थान कौन सा है ? ( ४५ )
सूर्य ऽ एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः.
अग्निर्गृहमस्य भेषजं भूमिरावपनं महत्.. (४६)
सूर्य अकेले विचरते हैं. चंद्र देव बारबार उत्पन्न होते हैं. हिम की ओषधि अग्नि
है. पृथ्वी बीज बोने का विशाल स्थान है. ( ४६ )
कि १४ स्वित्सूर्यसमं ज्योतिः कि १४ समुद्रसम १४ सरः.
कि १४ स्वित्पृथिव्यै वर्षीयः कस्य मात्रा न विद्यते.. (४७)
सूर्य के समान ज्योति कौन सी है ? समुद्र के समान तालाब कौन सा है ? पृथ्वी
देवी से भी अधिक वर्षों वाला ( पुराना ) कौन है ? किस की कोई मात्रा ( परिमाण )
नहीं है ? ( ४७ )
ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिर्द्यौः समुद्रसम १४ सरः.
इन्द्रः पृथिव्यै वर्षीयान् गोस्तु मात्रा न विद्यते.. (४८)
ब्रह्म देव की ज्योति सूर्य की ज्योति के समान है. स्वर्गलोक समुद्र के समान
तालाब है. इंद्र देव पृथ्वी देवी से भी पुराने हैं. गौ माता का कोई परिमाण नहीं
है. ( ४८ )
पृच्छामि त्वा चितये देवसख यदि त्वमत्र मनसा जगन्थ.
येषु विष्णुस्त्रिषु पदेष्वेष्टस्तेषु विश्वं भुवनमा विवेशाँ ३.. (४९)
हे देवसखाओ! हम जिज्ञासु हैं. हम मन से आप से पूछते हैं कि क्या विष्णु ने
अपने तीन पैरों में विश्व के सभी भुवनों को समा लिया ? क्या तीनों लोक विष्णु
३०० – यजुर्वेद

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
के पैरों में (की परिधि में ) समा गए. यदि आप इस बात को जानते हैं तो हमें बताने
की कृपा कीजिए. (४९)
अपि तेषु त्रिषु पदेष्वस्मि येषु विश्वं भुवनमा विवेश.
सद्यः पर्येमि पृथिवीमुत द्यामेकेनाङ्गेन दिवो अस्य पृष्ठम्.. (५०)
जिन में सारे विश्व के भुवन समा गए, उन तीनों पैरों में भी मैं ही हूं.
पृथ्वीलोक के ऊपर जो लोक है, उसे मैं इस एक मन रूपी अंग से जान जाता हूं.
स्वर्गलोक के आधार पर लोक है. उसे मैं इस एक मन रूपी अंग से जान जाता
हूं. (५०)
केष्वन्तः पुरुष ऽ आ विवेश कान्यन्तः पुरुषे अर्पितानि.
एतद्ब्रह्मन्नुप वल्हामसि त्वा किं स्विन्नः प्रति वोचास्यत्र.. (५१)
किस के अंतस्तल में परम पुरुष आ कर रमण करता है? परम पुरुष के
अंतस्तल में किन वस्तुओं को अर्पित किया जाता है? हे ब्राह्मण! हम यजमान यह
जानने के इच्छुक हैं. आप कृपया हमारी इन जिज्ञासाओं को वाणी प्रदान करने की
कृपा कीजिए. (५१)
पञ्चस्वन्तः पुरुष ऽ आ विवेश तान्यन्तः पुरुषे अर्पितानि.
एतत्त्वात्र प्रतिमन्वानो अस्मि न मायया भवस्युत्तरो मत्.. (५२)
आप यह मानते हैं कि आप यह नहीं जानते. अतः मैं माया से अर्थात् आप को
मायापूर्वक प्रत्युत्तर देता हूं कि परम पुरुष पांच महाभूतों व पांच तन्मात्राओं में रमण
करता है. परम पुरुष को पांच महाभूत व तन्मात्राएं अर्पित हैं. (५२)
का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः किं स्विदासीद् बृहद्वयः.
का स्विदासीत्पिलिप्पिला का स्विदासीत्पिशङ्गिला.. (५३)
हे अध्वर्युगण! सब से पहले क्या जानना चाहिए? सब से बड़ा पक्षी कौन सा
है? सब से अद्भुत रूप वाला कौन है? वह कौन है, जो सब रूपों को निगल जाता
है. (५३)
द्यौरासीत्पूर्वचित्तिरश्व ऽ आसीद् बृहद्वयः.
अविरासीत्पिलिप्पिला रात्रिरासीत्पिशङ्गिला.. (५४)
सब से पहले स्वर्गलोक को जानना चाहिए. सब से बड़ा पक्षी अग्नि रूपी
अश्व है. पृथ्वी सब से अधिक रूपों को निगलने वाली है. रात्रि सभी रूपों को
निगल जाने वाली होती है. (५४)
का ईमरे पिशङ्गिला का ईं कुरुपिशङ्गिला.
क ऽ ईमास्कन्दमर्षति क ऽ ईं पन्थां वि सर्पति.. (५५)
यजुर्वेद - ३०१