यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 297, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
ऊर्ध्वामेनामुच्छ्रापय गिरौ भार १भ् हरन्निव.
अथास्यै मध्यमेधता १भ् शीते वाते पुनन्निव.. ( २६ )
हे प्रजापति! आप इस राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाइए. हे प्रजापति! जैसे किसी
भार को पर्वत पर पहुंचा कर ( लोग ) प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार हम राष्ट्र को ऊंचाई
पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं. जैसे ठंडी हवाओं के बीच से किसान अन्न को साफ
करते हैं, उसी प्रकार प्रजापति की कृपा से हम राष्ट्र को पवित्र करें. ( २६ )
ऊर्ध्वमेनमुच्छ्रयताद्गिरौ भार १भ् हरन्निव.
अथास्य मध्यमेजतु शीते वाते पुनन्निव.. ( २७)
हे प्रजापति! आप इस राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाइए. हे प्रजापति! जैसे भार
को पर्वत पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं (लोग ), उसी प्रकार हम राष्ट्र को ऊंचाई
पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं. जैसे ठंडी हवाओं के बीच से किसान अन्न को साफ
करते हैं, उसी प्रकार प्रजापति की कृपा से हम राष्ट्र को पवित्र करें. ( २७ )
यदस्या ऽ अ १भ् हुमेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत्.
मुष्काविदस्या ऽ एजतो गोशफे शकुलाविव.. ( २८)
यह यज्ञाग्नि पाप भेदक व दुष्ट नाशक है. इस यज्ञाग्नि की स्थूल पृथ्वी पर
स्थापना हो जाती है तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि धर्म रूपी गाय के चरणों में खुरों की
तरह सुशोभित होते हैं. ( २८ )
यद्देवासो ललामगुं प्रविष्टिमिनमाविषुः.
सक्थ्ना देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा.. (२९)
जब ऐसी ही ( यज्ञ जैसी ) परमानंददायी गतिविधि संपन्न होती है तो उन्हें उस
परम सत्य की वैसे ही अनुभूति हो जाती है, जैसे स्त्री के अंगों को देख कर स्त्री की
पहचान हो जाती है. ( २९ )
यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टं पशु मन्यते.
शूद्रा यदर्यजारा न पोषाय धनायति.. (३०)
जब हिरण खेत में घुस कर जौ ( अनाज ) खा जाता है तो किसान हिरण की
पुष्टता से खुश नहीं होते बल्कि अपनी हानि से दुःखी ही होते हैं. वैसे ही कोई शूद्रा
जार से ज्ञानधन पाती है तो उस का पति उस के इस तरह ज्ञान संपन्न होने से प्रसन्न
नहीं होता है. ( ३० )
यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टं बहु मन्यते.
शूद्रो यदर्यायै जारो न पोषमनु मन्यते.. (३१)
जब हिरण खेत में घुस कर जौ ( अनाज ) खा जाता है तो किसान हिरण की
यजुर्वेद - २९७