यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
गंधर्व सुपर्ण रूप व यज्ञ स्वरूप हैं. भोज्य पदार्थों के दाता हैं. गंधर्व ब्राह्मणों
व क्षत्रियों की रक्षा करने की कृपा करें. स्तुति नामक दक्षिणा यज्ञ की अप्सरा हैं.
उन के लिए यह आहुति समर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ४२ )
प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्य ऋक्सामान्यप्सरस ऽ एष्टयो नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (४३)
गंधर्व प्रजापति, विश्वकर्मा व मन स्वरूप हैं. गंधर्व ब्राह्मणों व क्षत्रियों की रक्षा
करने की कृपा करें. ऋक् और साम की एष्टि नामक अप्सरा है. वे हमारी रक्षा करने
की कृपा करें. उन के लिए यह आहुति अर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ४३ )
स नो भुवनस्य पते प्रजापते यस्य त ऽ उपरि गृहा यस्य वेह.
अस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्राय महि शर्म यच्छ स्वाहा.. (४४)
हे प्रजापति! आप भुवनपति हैं. ऊपर के सारे घर आप की ही कृपा से स्थित
हैं. आप ब्राह्मणों व क्षत्रियों को सुख प्रदान कीजिए. आप के लिए स्वाहा. ( ४४ )
समुद्रोसि नभस्वानार्द्रदानुः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा.
मारुतोसि मरुतां गणः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहावस्यूरसि
दुवस्वाञ्छम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा.. (४५)
आप समुद्र, नभवान, जल दान करने वाले व भूमि को सुख दान करने वाले
हैं. आप के लिए स्वाहा. मरुत् हैं. मरुतों के गण हैं. सुखदायी हैं. सब के आश्रयदाता
हैं. दुःख दूर करने वाले हैं. आप बहुत सुखदायी हैं. आप के लिए यह आहुति अर्पित
है. आप के लिए स्वाहा. ( ४५ )
यास्ते अग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः.
ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि.. (४६)
हे अग्नि! आप से सूर्य स्वर्गलोक को चमकाते हैं. सूर्य की किरणें स्वर्गलोक
को चमकाती हैं. उन देव की किरणें आज सभी को चमकाएं व प्रकाशित करें.
सभी को तेजस्वी बनाने के लिए प्रकाशित हों. ( ४६ )
या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः.
इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचन्नो धत्त बृहस्पते.. (४७)
जो देवगण सूर्य के प्रकाश से ज्योतिमान हैं, जो प्रकाश गायों में विद्यमान है, जो
प्रकाश घोड़ों में विद्यमान है, इंद्र देव उन से हम सभी को चमकाएं. इंद्र देव उसे हम सभी
के लिए धारण करें. अग्नि व बृहस्पति व उसे हम सभी के लिए धारण करें. ( ४७ )
रुचन्नो धेहि ब्राह्मणेषु रुच १७ राजसु नस्कृधि.
रुचं विश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रुचा रुचम्.. (४८)
यजुर्वेद – २३३
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हमारे लिए ज्योति धारिए. ब्राह्मणों व क्षत्रियों में ज्योति स्थापित कीजिए.
वैश्यों, शूद्रों में ज्योति स्थापित कीजिए. मेरे लिए ज्योति धारिए. मुझे ज्योतिष्मान
बनाने की कृपा कीजिए. (४८)
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश १४ स मा न ऽ आयुः प्र मोषीः.. (४९)
हे वरुण देव! ब्राह्मणगण मंत्रों से आप का वंदन करते हैं. यजमान सदैव
हवियों द्वारा आप की अभिशंसा (प्रशंसा और उपासना) करते हैं. हम यहां सुख
चाहते हुए वरुण देव की प्रशंसा और उपासना करते हैं. उन्हें प्रार्थना सुनने के लिए
जाग्रत करते हैं. वे हम पर क्रोध न करें. हमारी आयु को कम न करें. (४९)
स्वर्ण घर्मः स्वाहा स्वर्णार्कः स्वाहा स्वर्ण शुक्रः स्वाहा स्वर्ण ज्योतिः स्वाहा स्वर्ण
सूर्यः स्वाहा.. (५०)
सोने जैसा प्रकाश उकेरने वाले देव के लिए स्वाहा. सोने जैसे सूर्य के लिए
स्वाहा. सोने जैसे चमकने वाले देव के लिए स्वाहा. सोने जैसी ज्योति वाले देव के
लिए स्वाहा. सोने जैसे सूर्य वाले देव के लिए स्वाहा. (५०)
अग्निं युनज्मि शवसा घृतेन दिव्य १४ सुपर्णं वयसा बृहन्तम्.
तेन वयं गमेम ब्रध्नस्य विष्टप १४ स्वो रुहाणा अधि नाकमुत्तमम्.. (५१)
हम अग्नि को घी से युक्त करते हैं. हम घी की आहुतियों से अग्नि की बढ़ोतरी
करते हैं. अग्निदिव्य गुण वाले हैं. अग्निवय वहन करते हैं. उस से हम ऊपर बाधा रहित
स्वर्गलोक जाते हैं. उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं. वहीं अधिष्ठित होते हैं. (५१)
इमौ ते पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्या १४ रक्षा १४ स्यपह १४ स्यग्ने.
ताभ्यां पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः.. (५२)
हे अग्नि! आप के दोनों पंख अजर हैं. सदैव उड़ने के लिए तत्पर हैं. दोनों
पंख से आप राक्षसों का नाश करते हैं. आप उन दोनों पंखों से श्रेष्ठ कर्म करने
वालों के उस लोक में प्रस्थान कीजिए, जहां पहले ही उत्पन्न पुरातन ऋषिगण
जा चुके हैं. (५२)
इन्दुर्दक्षः श्येन ऽ ऋतावा हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः.
महान्तसधस्थे ध्रुव ऽ आ निष्त्तो नमस्ते अस्तु मा मा हि १४ सीः.. (५३)
हे अग्नि! आप चंद्रमा जैसे दक्ष, बाज जैसे वेगशाली हैं. आप सत्यवान, सोने
जैसे पंख वाले, शक्तिमान, भरणपोषण कर्ता हैं व महान् हैं. ध्रुव (स्थिर), यज्ञ में
सध कर रहते हैं. हे अग्नि! आप को नमन! आप हमारे अनुकूल हों. आप हमारे प्रति
हिंसा मत कीजिए. (५३)
२३४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
दिवो मूर्द्धासि पृथिव्या नाभिरूर्गपामोषधीनाम्.
विश्वायुः शर्म सप्रथा नमस्पथे.. (५४)
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक की मूर्धा, पृथ्वीलोक की नाभि, ओषधियों का
सारतत्त्व व विश्व का जीवन (आयु) हैं. आप सुखदाता व समस्त पथ में व्याप्त हैं.
आप पथप्रदर्शक हैं. हे अग्नि! आप को नमन. (५४)
विश्वस्य मूर्धन्नधितिष्ठसि श्रितः समुद्रे ते हृदयमप्स्वायुरपो दतोदधिं भिन्त.
दिवस्पर्जन्यादन्तरिक्षात्पृथिव्यास्ततो नो वृष्ट्याव.. (५५)
हे अग्नि! आप विश्व की मूर्धा पर अधिष्ठित हैं. आप का हृदय समुद्र में आश्रित
है. आप जल में व्याप्त हैं. आप समुद्र का भेदन कर के जल निकालिए. आप
स्वर्गलोक व बादलों से हमारे लिए वर्षा कीजिए. आप अंतरिक्ष व पृथ्वी से हमारे
लिए वर्षा कीजिए. (५५)
इष्टो यज्ञो भृगुभिराशीर्दा वसुभिः. तस्य न ऽ इष्टस्य प्रीतस्य द्रविणेहागमेः.. (५६)
धन इष्ट है. यज्ञ में हम बारबार आप की इच्छा करते हैं. आप हमें भरपूर धनों
से आशीर्वाद दीजिए. हम धन से प्रीति रखते हैं. हम धन के लिए उत्तम रीति से यज्ञ
संपादित करते हैं. (५६)
इष्टो अग्निर्राहुतः पिपर्तु न ऽ इष्ट १४ हविः. स्वगेदं देवेभ्यो नमः.. (५७)
हे अग्नि! आप इष्ट हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. हम हवि से तृप्त करते
हैं. आप स्वयं प्रकाश व गमनशील हैं. आप हमारी हवि देवों तक पहुंचाने की कृपा
करें. (५७)
यदाकूतात्समुसुस्रोद्धृदो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा.
तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः.. (५८)
हे यजमानो! ज्ञान श्रेष्ठ बुद्धि के स्रोत से उत्पन्न होता है. मानस से निकलता है.
चक्षुओं से स्रवित होता है. हम उस का और श्रेष्ठ कर्मों का अनुकरण करें. हम उस
लोक को प्राप्त करें, जहां पूर्व में उत्पन्न पुरातन ऋषि पहुंच चुके हैं. (५८)
एतं १४ सधस्थ परि ते ददामि यमावहाच्छेवधिं जातवेदाः.
अन्वागन्ता यज्ञपतिर्वो अत्र त १४ स्म जानीत परमे व्योमन्.. (५९)
हे परम शक्ति! चारों ओर से यज्ञफल हम आप को भेंट करते हैं. अग्नि यजमान
को जो फल भेंट करते हैं, वह हम आप के लिए अर्पित करते हैं, अंततोगत्वा
यजमान परम व्योम में आता है. उस की गति को आप जानिए. (५९)
एतं जानीथ परमे व्योमन् देवाः सधस्था विद रूपमस्य.
यदागच्छात्पथिभिर्देवयानैरिष्टापूर्ते कृणवाथाविरस्मै.. (६०)
यजुर्वेद - २३५
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हे परम व्योम में स्थित दिव्य शक्तियो! आप यजमान के सधे हुए रूप को जानने
की कृपा कीजिए. जब यजमान देवयान (देवताओं के जाने योग्य) पथ से गमन करें,
उस समय आप इस यजमान की अभीष्टपूर्ति करने की कृपा कीजिए. (६०)
उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स ँ सृजेथामयं च.
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (६१)
हे अग्नि! आप जाग्रत होने व यजमान के अभीष्ट की पूर्ति करने की कृपा
कीजिए. आप यजमान के लिए सब सुख सिरजिए. हे विश्वो! यजमान को आप
चिरकाल तक स्वर्गलोक में अधिष्ठित करने की कृपा कीजिए. (६१)
येन वहसि सहस्रं येनाग्ने सर्ववेदसम्. तेनेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (६२)
हे अग्नि! आप जिस से हजारों को वहन करते हैं, आप जिस से सब को
जानते हैं, आप उसी सामर्थ्य से यज्ञ को ले जाने (पहुंचाने) की कृपा कीजिए.
आप देवताओं के गंतव्य पर यजमानों को ले जाने की कृपा कीजिए. (६२)
प्रस्तरेण परिधिना स्रुचा वेद्या च बर्हिषा. ऋचेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (६३)
हे अग्नि! पत्थर, परिधि, स्रुक (चम्मच), वेदी, कुशा व ऋचा से आप हमारे
इस यज्ञ को देवताओं के गंतव्य की ओर ले जाने की कृपा कीजिए. (६३)
यद्दत्तं यत्परादानं यत्पूर्तं याश्च दक्षिणाः. तदग्निवैश्वकर्मणः स्वर्देवेषु नो दधत्.. (६४)
हम ने जो कुछ दूसरों को दान किया है, हम ने जो कुछ प्रतिपूर्ति की है, हम ने जो
कुछ दक्षिणा दी है, उसे विश्वकर्मा अग्नि देवताओं के लिए धारने की कृपा करें. (६४)
यत्र धारा ऽ अनपेता मधोर्घृतस्य च याः.
तदग्निवैश्वकर्मणः स्वर्देवेषु नो दधत्.. (६५)
जहां मधु व घी की धाराएं लगातार प्रवाहित होती रहती हैं, उन धाराओं को
विश्वकर्मा अग्नि देवताओं के लिए धारने की कृपा करें. (६५)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म ऽ आसन्.
अर्कस्त्रिधातू रजसो विमानोजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम.. (६६)
अग्नि जन्म से ही सर्वज्ञ हैं. घी उन की आंखें हैं. हवि अमृत है. तीनों धातुओं
का सार रज है. वह अजस्र जल का निर्माता है. ग्रीष्म का निर्माता और हवि वही
है. (६६)
ऋचो नामास्मि यजूं षि नामास्मि सामानि नामास्मि.
ये अग्नयः पाञ्चजन्या ऽ अस्यां पृथिव्यामधि.
तेषामसि त्वमुत्तमः प्र नो जीवतवे सुव.. (६७)
२३६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
ऋचा नामक अग्नि है. यजु नामक अग्नि है. साम नामक अग्नि है. इस पृथ्वि
पर जो पंच अग्नियां हैं, उन में आप श्रेष्ठ हैं. आप हम सब को दीर्घ काल तक
जिलाने की कृपा कीजिए. (६७)
वार्त्रहत्याय शवसे पृतनाषाह्वाय च. इन्द्र त्वा वर्तयामसि.. (६८)
हे इंद्र देव! आप शत्रुओं पर आक्रमण कर के उन का नाश कर देते हैं. आप
सामर्थ्यवान हैं. हम बारबार आप का आह्वान करते हैं. (६८)
सहदानुं पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सं पिणक् कुणारुम्.
अभि वृत्रं वर्धमानं पियारूमपादमिन्द्र तवसा जघन्थ.. (६९)
हे इंद्र देव! आप को हजारों यजमान हवि भेंट करते हैं. आप यजमान द्वारा भेंट
की गई हवि को ग्रहण करते हैं. आप हमारे नजदीक के शत्रुओं को कुचल दीजिए.
आप गालीगलौज करने वाले शत्रुओं को साधनहीन कर दीजिए. आप ऐसे शत्रुओं
का नाश कर दीजिए. आप सब ओर आतंक फैला सकते हैं. आप सब ओर से
बढ़ोतरी पाने वाले हैं. आप से अनुरोध है कि आप वृत्रासुर को पैर रहित बना
दीजिए. आप वृत्रासुर का नाश कर दीजिए. (६९)
वि न ऽ इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः.
यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (७०)
हे इंद्र देव! आप से अनुरोध है कि आप युद्धों में हमारे दुश्मनों को नष्ट कर
दीजिए. जो शत्रु हमारे साथ युद्ध करने के लिए तैयार खड़े हों, उन्हें आप पतन के
गर्त में पहुंचा दीजिए. जो शत्रु हमें दास बनाने की इच्छा रखते हैं, आप उन्हें अंधेरे
गर्त में पहुंचा दीजिए. (७०)
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत ऽ आ जगन्था परस्याः.
सृक ण्ष स ण्ष शाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व.. (७१)
हे इंद्र देव! आप हमारे (कुचाल वाले) चालाक, पर्वत व गुफाओं में छिपे,
शेर जैसे खतरनाक व हमारे पास दूर के शत्रुओं को सब ओर से घेर लीजिए. आप
हमारे तीखे हथियारों से शत्रुओं को भेदिए व पीछे खदेड़ दीजिए. (७१)
वैश्वानरो न ऽ ऊतय ऽ आ प्र यातु परावतः. अग्निनः सुष्टुतीरुप.. (७२)
हे अग्नि! आप विश्व का कल्याण करने वाले हैं. आप आइए. आप हमारी रक्षा
कीजिए. आप हमारी स्तुतियां सुनिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. (७२)
पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश.
वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषस्पातु नक्तम्.. (७३)
यजुर्वेद - २३७
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक का आधार हैं. आप से स्वर्गलोक के बारे में पूछा
गया. आप से पृथ्वीलोक के बारे में पूछा गया. आप से विश्व की ओषधियों में
प्रवेश के बारे में पूछा गया. आप सब का कल्याण करने वाले हैं. हम साहस के
साथ आप से पूछते हैं कि आप कौन हैं. आप दिन में व रात्रि में हिंसा से हमारी
रक्षा कीजिए. ( ७३ )
अश्याम तं काममग्ने तवोती अश्याम रयि ᳲष रयिवः सुवीरम्.
अश्याम वाजमभि वाजयन्तोश्याम द्युम्नमजराजरं ते.. (७४)
हे अग्नि! आप हमारी सभी कामनाएं फलीभूत करें. आप हमें धनवान, श्रेष्ठ
वीर पुत्रों वाला, बलवान व धनवान बनाएं. हम आप से सदा अजर व अमर रहने
वाली द्युति ( कांति चमक ) पाएं. ( ७४ )
वयं ते अद्य ररिमा हि काममुत्तानहस्ता नमसोपसद्य.
यजिष्ठेन मनसा यक्षि देवानस्रेधता मन्मना विप्रो अग्ने.. (७५)
हे अग्नि! हम सब नमस्कार कर के आज आप के पास पहुंचते हैं. हम हाथ
ऊंचे कर के आप को नमस्कार करते हैं. हम यज्ञ में दत्तचित्त हैं. हम मन से आप
को हवि भेंट करते हैं. आप इस हवि को ब्राह्मणगणों तक पहुंचाने की कृपा
कीजिए. ( ७५ )
धामच्छदग्निरिन्द्रो ब्रह्मा देवो बृहस्पतिः.
सचेतसो विश्वे देवा यज्ञं प्रावन्तु नः शुभे.. (७६)
हे अग्नि! आप सब के धाम हैं. हे ब्रह्मा! हे बृहस्पति! आप सब के धाम हैं.
सभी देवगणों से अनुरोध है कि वे अच्छे मन से किए जा रहे यजमान के इस यज्ञ
को शुभ परिणति ( परिणाम ) प्रदान करने की कृपा करें. ( ७६ )
त्वं यविष्ठ दाशुषो नूं: पाहि शृणुधी गिरः. रक्षा तोकमुत त्मना.. (७७)
हे अग्नि! आप जौमय व दाता हैं. आप मनुष्यों की रक्षा करें. आप हमारी
वाणियां सुनने, हमारी संतान और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ७७ )
२३८ – यजुर्वेद
उन्नीसवां अध्याय
उन्नीसवां अध्याय
स्वादीं त्वा स्वादुना तीव्रां तीव्रेणामृताममृतेन.
मधुमर्तीं मधुमता सृजामि स १७ सोमेन.
सोमोस्यश्विभ्यां पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्व.. (१)
हे ओषध देव! आप स्वादिष्ट, स्वादु, तीव्र व अमृतमय हैं. आप को मधु मिश्रित
मधुर सोम के साथ मिला कर सृजित करते हैं. आप दोनों अश्विनीकुमारों के लिए
पकने की कृपा करें. आप सरस्वती देवी के लिए पकने की कृपा करें. आप संरक्षक
इंद्र देव के लिए पकने की कृपा करें. ( १ )
परीतो षिञ्चता सुत १७ सोमो य उत्तम १७ हवि:.
दधन्वा यो नर्यो अप्स्वन्तरा सुषाव सोममद्रिभि:.. (२)
हे यजमानो! आप सोम को चारों ओर से उत्तम हवि से सींचिए. आप यजमानों
के लिए नीति धारण कीजिए. सोम जल के बीच में हैं. पत्थरों से उस को कूट कर
सींचा जाता है. ( २ )
वायो: पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्क्सोमो अतिद्रुतः.
इन्द्रस्य युज्यः सखा.
वायो: पूतः पवित्रेण प्राङ्क्सोमो अतिद्रुतः.
इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३)
वायु देव शुद्ध, पवित्र व अति तीव्र गति वाले हैं और इंद्र देव के साथ जुड़ते
हैं. इंद्र देव के सखा हैं. वायु शुद्ध, पवित्र व बहुत द्रुत गति वाले हैं. इंद्र देव के सखा
हैं. ( ३ )
पुनाति ते परिस्रुत १७ सोम १७ सूर्यस्य दुहिता. वारेण शश्वता तना.. (४)
सोम पवित्र हैं. चारों ओर से स्रवित ( झरते ) होते हैं. सोम को पवित्र करते हैं.
सूर्य की दुहिता पवित्र करती हैं. श्रद्धा तुम्हें पवित्र बनाती हैं. ( ४ )
ब्रह्म क्षत्रं पवते तेज ऽ इन्द्रिय—सुरया सोमः सुत ऽ आसुतो मदाय.
शुक्रेण देव देवताः पिपृग्धि रसेनान्नं यजमानाय धेहि.. (५)
यजुर्वेद - २३९
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
हे सोम! आप पवित्र तेज झराइए. आप ब्राह्मणों व क्षत्रियों को पवित्र कीजिए.
सोम इंद्रिय सामर्थ्य को प्रकट करता है. सरस हो कर सोम और अधिक आनंददायी
हो जाता है. यह देवों का देव व चमकीला है. यह यजमानों के लिए रसमय अन्न
धारण करता है. (५)
कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण ऽ एष ते योनिस्तेजसे त्वा
वीर्याय त्वा बलाय त्वा.. (६)
अन्नवान किसान पहले ही अन्न को काट कर रख लेता है, ताकि उस में से
पर्याप्त जौ निकल सके. ये यजमान कुश के आसन पर विराजमान हैं. यजमान
नमस्कारपूर्वक यज्ञ करते हैं. अश्विनी देवों, सरस्वती देवी, संरक्षक इंद्र देव के लिए
आप को उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल निवास है. हम तेज,
वीर्य व बल के लिए आप को यहां स्थापित करते हैं. (६)
नाना हि वां देवहित थ्ं सदस्कृतं मा स थ्ं सृक्षाथां परमे व्योमन्.
सुरा त्वमसि शुष्मिणी सोम ऽ एष मा मा हि थ्ं सी: स्वां योनिमाविशन्ती.. (७)
आप नाना प्रकार से देवताओं का हित व श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं. आप परम
व्योम में स्थित रहते हैं. सुरा तुम बलवती हो. यह सोम अलग स्वभाव का है. आप
उस के मूल स्थान में प्रवेश करते हुए उस के प्रति हिंसा मत कीजिए. (७)
उपयामगृहीतोस्याश्विनं तेजः सारस्वतं वीर्यमैन्द्रं बलम्.
एष ते योनिर्मोदाय त्वा नन्दाय त्वा महसे त्वा.. (८)
सोम देव! आप उपयाम में ग्रहण किए गए हैं. अश्विनीकुमार के तेज के लिए
व सरस्वती देवी के पराक्रम के लिए आप को स्थापित करते हैं. हमारे लिए वीर्य
धारिए. (८)
तेजोसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोस्योजो
मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोसि सहो मयि धेहि.. (९)
आप बलवान हैं. हमारे लिए बल धारिए. आप ओजवान हैं. हमारे लिए ओज
धारिए. आप मन्यु (उत्साह) हैं. हमारे लिए उत्साह धारिए. आप सहनशील हैं.
आप हमारे लिए सहनशीलता धारिए. आप संघर्षशील हैं. आप हमारे लिए
संघर्षशीलता धारिए. (९)
या व्याघ्रं विषूचिकोभौ वृकं च रक्षति.
श्येनं पतत्रिण थ्ं सि थ्ं ह थ्ं सेमं पात्व थ्ं हसः.. (१०)
२४० - यजुर्वेद 632/15
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो व्याघ्र और विषूचिका दोनों की रक्षा करती है, जो भेड़िए की भी रक्षा
करती है, जो पतनशील बाज की रक्षा करती है, जो सिंह की रक्षा करती है, वही
( शक्ति ) यजमानों की भी रक्षा करने की कृपा करे. ( १० )
यदापिपेष मातरं पुत्रः प्रमुदितो धयन्.
एतत्तदग्ने अनृणो भवाम्यहन्तौ पितरौ मया.
सम्पृच स्थ सं मा भद्रेण पृङ्क्त विपृच स्थ वि मा पाप्मना पृङ्क्त.. (११)
दूध पीता हुआ बालक प्रमुदित होता हुआ मां को प्रताड़ित करता है, उसी
प्रकार हम मातापिता के ऋण से उऋण होना चाहते हैं. मातापिता कल्याणकारी हैं.
आप हमें पापों से दूर या अलग करने की कृपा कीजिए. ( ११ )
देवा यज्ञमतन्वत भेषजं भिषजाश्विना.
वाचा सरस्वती भिषगिन्द्रायेन्द्रियाणि दधतः.. (१२)
देवताओं व वैद्य अश्विनीकुमार ने यज्ञ का विस्तार किया. सरस्वती ने वाणी
से इंद्र देव के लिए इंद्रियों में क्षमता धारते हुए यज्ञ का विस्तार किया. ( १२ )
दीक्षायै रूप १४ शष्पाणि प्रायणीयस्य तोक्मानि.
क्रयस्य रूप १४ सोमस्य लाजाः सोमा १४ शवो मधु.. (१३)
दीक्षा के लिए प्रायणीय ( आरंभिक ) जौ यज्ञ रूप हैं. खरीदे गए लाजा सोम
के लिए कल्याणकारी व मधुमय हैं. ( १३ )
आतिथ्यरूपं मासरं महावीरस्य नग्नहुः. रूपमुपसदामेतत्तिस्रो रात्रीः सुरासुता.. (१४)
धन और ओषधियों का चूर्ण आतिथ्य रूप है. महान् वीरों के लिए उपयोगी है.
तीन रातों तक उपसद ( निकट जाने वाले ) के रूप में टपकता और सुरा बन जाता
है. ( १४ )
सोमस्य रूपं क्रीतस्य परिस्रुत्परिशिच्यते.
अश्विभ्यां दुग्धं भेषजमिन्द्रायेन्द्र १४ सरस्वत्या.. (१५)
खरीदे गए सोम का रूप चारों ओर से टपकता है. वैद्य अश्विनी व सरस्वती
देवी इंद्र देव के लिए दूध दुहती हैं. ( १५ )
आसन्दी रूप १४ राजासन्द्वै वेद्यै कुम्भी सुराधानी.
अन्तर ऽ उत्तरवेद्या रूपं कारोतरो भिषक्.. (१६)
सोम राजा स्वरूप हैं और राजा के आसन पर विराजमान हैं. वेदी पर सुरा का
कुंभ स्थापित किया गया है. दोनों के बीच उत्तरवेदी हैं. भिषक् के रूप में छलने
( छानने का यंत्र ) को स्थापित किया गया है. ( १६ )
यजुर्वेद - २४१
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हिरिन्द्रियम्.
यूपेन यूप ऽ आप्यते प्रणीतो अग्निरग्निना.. (१७)
इस यज्ञ में वेदी से वेदी को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में कुशा से कुशा
को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में इंद्रियों से इंद्रिय ज्ञान प्राप्त किया जाता है. इस
यज्ञ में स्तंभ से स्तंभ को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में अग्नि से अग्नि को प्राप्त
किया जाता है. ( १७ )
हविर्धानं यदश्विनाग्नीध्रं यत्सरस्वती.
इन्द्रायेन्द्र ९४ सदस्कृतं पत्नीशालं गार्हपत्यः.. (१८)
अश्विनीकुमार से हवि का धान प्राप्त होता है. सरस्वती देवी से आग्नीध्र प्राप्त
होता है. यज्ञ सदन में, पत्नीशाला में तथा गार्हपत्य अग्नि में इंद्र देव के ऐश्वर्य के
अनुकूल हवि देवगणों द्वारा प्रस्तुत की जाती है. ( १८ )
प्रैषैभिः प्रैषानाप्नोत्याप्रीभिराप्रीर्यज्ञस्य.
प्रयाजैर्भिरनुयाजान् वषट्कारेभिराहुतीः.. (१९)
प्रैष ( कष्ट या प्रेरणा ) आदि से प्रैष प्राप्त होता है. प्रिय से प्रियदायी की प्राप्ति
होती है. यज्ञ से यज्ञ की प्राप्ति होती है. यजन से यज्ञ का अनुकरण करने वाले की
प्राप्ति होती है. वषट्कारों से आहुतियों की प्राप्ति होती है. ( १९ )
पशुभिः पशूनाप्नोति पुरोडाशैर्हवी ९४ ष्या.
छन्दोभिः सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारान्.. (२०)
पशुओं से पशु प्राप्त होते हैं. पुरोडाश से हवि प्राप्त होती है. छंदों से सामधेनी
( विशेष प्रकार के मंत्र ) की प्राप्ति होती है. यज्ञ से संबंधित क्रियाओं से वषट्कारों
को प्राप्त किया जाता है. ( २० )
धानाः करम्भः सक्तवः परीवापः पयो दधि.
सोमस्य रूप ९४ हविष ऽ आमिक्षा वाजिनं मधु.. (२१)
धान, धान की लपसी, सत्तू आदि, जलमय दूध व दही आदि सोम का रूप है.
हवि, ईक्षु ( गन्ना ) आदि, अन्न हवि व शहद आदि सोम का रूप हैं. ( २१ )
धानाना ९४ रूपं कुवलं परीवापस्य गोधूमाः.
सक्तूना ९४ रूपं बदरमुपवाकाः करम्भस्य.. (२२)
धान का रूप ही यज्ञ में अन्न के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. चारों ओर उस
से ही गोधूम फैलता है. बेर सत्तू के रूप में तैयार किया जाता है. जौ को लपसी के
रूप में तैयार किया जाता है. इन्हें हवि के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. ( २२ )
२४२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पयसो रूपं यद्गवा दध्नो रूपं कर्कन्धूनि.
सोमस्य रूपं वाजिन १७ सौम्यस्य रूपमामिक्षा.. (२३)
जौ दूध और दही दही रूप में है. अन्न सोम से संबंधित इन रूपों को हम पूरी
तरह देखना चाहते व चढ़ाना चाहते हैं. (२३)
आश्रावयेति स्तोत्रियाः प्रत्याश्रावो अनुरूपः.
यजेति धाय्यारूपं प्रगाथा ये यजामहाः.. (२४)
स्तोत्र से संबंधित ऋचाएं आश्रावय व प्रत्याश्राव के अनुरूप हैं. यज से
संबंधित ऋचाएं धाय्या रूप हैं. ‘यजामहे' पद से आरंभ होने वाली ऋचाएं प्रगाथा
रूप हैं. (२४)
अर्धऋचैरुक्थाना १७ रूपं पदैराप्नोति निविदः.
प्रणवैः शस्त्राणा १७ रूपं पयसा सोम ऽ आप्यते.. (२५)
आधी ऋचाओं से उक्थों का बोध होता है. पदों से निविद का बोध होता है.
प्रणवों से शस्त्रों के रूप का बोध होता है. दूध से सोम का रूप प्राप्त किया जाता
है. (२५)
अश्विभ्यां प्रातःसवनमिन्द्रेणैन्द्रं माध्यन्दिनम्.
वैश्वदेव १७ सरस्वत्या तृतीयमाप्त १७ सवनम्.. (२६)
अश्विनीकुमारों से प्रातः सवन की प्राप्ति होती है. इंद्र देव और उन से संबंधित
मंत्रों से माध्यंदिन सवन की प्राप्ति होती है. सरस्वती देवी विश्वों से संबंधित हैं. उन
के माध्यम से तृतीय सवन की प्राप्ति होती है. (२६)
वायव्यैर्वायव्यान्याप्नोति सतेन द्रोणकलशम्.
कुम्भीभ्यामम्भृणौ सुते स्थालीभिः स्थालीराप्नोति.. (२७)
वायव्यों से वायव्य की प्राप्ति होती है. सत् से द्रोणकलश की प्राप्ति होती है.
कुंभियों से अंभृण की प्राप्ति होती है. स्थालियों से स्थाली की प्राप्ति होती है. (२७)
यजुर्भिराप्यन्ते ग्रहा ग्रहैः स्तोमाश्च विष्टुतीः.
छन्दोभिरुक्थाशस्त्राणि साम्नावभृथ ऽ आप्यते.. (२८)
यजुमंत्रों से यजु और ग्रहों से ग्रह की प्राप्ति होती है. स्तोत्रों से इष्ट स्तुतियों,
छंदों से उक्थ व शस्त्र की प्राप्ति होती है. साम मंत्रों से शस्त्र साम व अवभृथ की
प्राप्ति होती है. (२८)
इडाभिर्भक्षानाप्नोति सूक्तवाकेनाशिषः.
शंयुना पत्नीसंयाजान्त्समिष्टयजुषा स १७ स्थाम्.. (२९)
यजुर्वेद - २४३
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले अन्न के भक्षण से वर्षा होती है. वाग्सूक्त से आशीष
प्राप्त होता है. संयम से पतिपत्नी संबंध में प्रेम प्राप्त होता है. इष्ट यज्ञ से संस्थिति
( उत्तम स्थिति ) प्राप्त होती है. ( २९ )
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्.
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते.. (३०)
व्रत से दीक्षा प्राप्त होती है. दीक्षा से दक्षिणा प्राप्त होती है. दक्षिणा से श्रद्धा
प्राप्त होती है. श्रद्धा से सत्य प्राप्त किया जाता है. ( ३० )
एतावद्रूपं यज्ञस्य यद्देवैर्ब्राह्मणा कृतम्.
तदेतत्सर्वमाप्नोति यज्ञे सौत्रामणी सुते.. (३१)
ब्राह्मणों ने यज्ञ के इतने ही रूप का वर्णन किया है. यज्ञ में वह सब प्राप्त
किया जाता है. सौत्रामणि यज्ञ में सोम की आहुति से यह सब प्राप्त किया जाता
है. ( ३१ )
सुरावन्तं बर्हिषद १४ सुवीरं यज्ञ १४ हिन्वन्ति महिषा नमोभिः.
दधानाः सोमं दिवि देवतासु मदेमेन्द्रं यजमानाः स्वर्काः.. (३२)
हम सुरावान, कुश के आसन पर स्थित व श्रेष्ठवीर को नमस्कारों से मनाते
हैं. हम महिमाशाली यज्ञ को नमस्कारों से विस्तृत करते हैं. स्वर्गलोक में
विद्यमान देवताओं के लिए सोम धारण करते हुए यजमान इंद्र देव को आनंदित
करते और अत्यंत प्रसन्न होते हैं. ( ३२ )
यस्ते रसः सम्भृत ऽ ओषधीषु सोमस्य शुष्मः सुरया सुतस्य.
तेन जिन्व यजमानं मदेन सरस्वटीमश्विनाविन्द्रमग्निम्.. (३३)
ओषधियों में जो इकट्ठा किया गया सोम का रस है, वह तीक्ष्ण और सारवान
है. उस सोम रस से यजमान को सरस्वती देवी, अश्विनीकुमारों व अग्नि को
आनंदित करना चाहिए. ( ३३ )
यमश्विना नमुचेरासुरादधि सरस्वत्यसुनोदिन्द्रियाय.
इमं त १४ शुक्रं मधुमन्तमिन्दु १४ सोम १४ राजानमिह भक्षयामि.. (३४)
अश्विनीकुमारों ने असुर नमुचि से सोम को पाया. सरस्वती देवी ने इंद्र देव के
लिए सोम को निचोड़ा. सोम राजा, चमकीला व मधुर है. हम उस का पान करते
हैं. ( ३४ )
यदत्र रिप्त १४ रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः.
अहं तदस्य मनसा शिवेन सोम १४ राजानमिह भक्षयामि.. (३५)
२४४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो रसीला सोम यहां मौजूद है, जिस सोम को इंद्र देव ने पीया, हम उस
कल्याणकारी सोम का मन से भक्षण करते हैं. सोम राजा हैं. ( ३५ )
पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः
प्रपितामहेभ्यः स्वाधायिभ्यः स्वधा नमः.
अक्षन् पितरोमीमदन्त पितरोतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम्.. ( ३६)
पितरों के लिए स्वधा, स्वधा के लिए नमन. पितामहों के लिए स्वधा, स्वधा
के लिए नमन. पितामहों के लिए स्वधा, स्वधा के लिए नमन. पितरों ने हवि के
रूप में समर्पित आहार को ग्रहण किया. उस आहार को ग्रहण कर के तृप्ति पाई.
पितृगण हमें भी तृप्त करते हैं. पितृगण हमारे जीवन को शुद्ध करने की कृपा
करें. ( ३६ )
पुनन्तु मा पितरः सोम्यासः पुनन्तु मा पितामहाः पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा.
पुनन्तु मा पितामहाः पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा विश्वमायुर्व्यश्नवै.. ( ३७)
पितृगण हमें पवित्र करने की कृपा करें. पितृगण सौम्य हैं. पितामह हमें पवित्र
करने की कृपा करें. प्रपितामह हमें पवित्र करने की कृपा करें. हम पवित्रतापूर्वक
सौ वर्ष तक जीएं. अश्विनी देवों की कृपा से हम पूर्णायु पाएं. ( ३७ )
अग्न ऽ आयु १७ षि पवस ऽ आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. ( ३८)
हे अग्नि! आप आयुदायक व पवित्रताकारी हैं. आप हमें अच्छा अन्न प्रदान
करने की कृपा करें. आप हमारी बाधाओं को दूर करने की कृपा करें. आप दुष्टों
को दूर करने की कृपा करें. ( ३८ )
पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः.
पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा.. ( ३९)
देवजन हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. वे मन से हमारी बुद्धि को पवित्र बनाने
की कृपा करें. अग्नि सभी प्राणियों को पवित्र बनाने की कृपा करें. सर्वज्ञ देव हमें
पवित्र बनाने की कृपा करें. ( ३९ )
पवित्रेण पुनीहि मा शुक्रेण देव दीद्यत्. अग्ने क्रत्वा क्रतूँ १ २ नु.. (४०)
हे अग्नि! आप अपनी पवित्रता से हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. आप अपनी
तेजस्विता से हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. आप स्वर्गलोक तक दीप्तिमान हैं.
आप अपने पवित्र कर्मों से यज्ञ को पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. ( ४० )
यत्ते पवित्रमर्चिष्यग्ने विततमन्तरा. ब्रह्म तेन पुनातु मा.. (४१)
हे अग्नि! जो आप का पवित्र स्वरूप है, आप बीच में अपने जिस स्वरूप का
यजुर्वेद - २४५
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
विस्तार करते हैं, आप उस ब्रह्म स्वरूप से हमें पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. ( ४१ )
पवमानः सो अद्य नः पवित्रेण विचर्षणिः. यः पोता स पुनातु मा.. (४२)
आप पवित्र बनाने वाले हैं. आप आज अपनी पवित्रता से हमें सर्वज्ञ बनाने की
कृपा कीजिए. स्वयं पवित्र हैं. हमें पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. ( ४२ )
उभाभ्यां देव सवितः पवित्रेण सवेन च. मां पुनीहि विश्वतः.. (४३)
सविता देव आप दोनों व दोनों सवनों से हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. आप
सब ओर से हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. ( ४३ )
वैश्वदेवी पुनती देव्यागाद्यस्यामिमा बह्व्यस्तन्वो वीतपृष्ठाः.
तया मदन्तः सधमादेषु वय ँ श्याम पतयो रयीणाम्.. (४४)
यह विश्वे देवी हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. यह विश्वे देवी हमें दिव्यता
प्रदान करने की कृपा करें. ( ४४ )
ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये.
तेषाँल्लोकः स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पताम्.. (४५)
यम के राज्य में जो हमारे समान मान वाले और समान मन वाले पितर हैं, उन
के लोक में हमारी स्वधा व नमस्कार पहुंचें. हमारा यज्ञ सभी देवताओं के लिए
फलीभूत हो. ( ४५ )
ये समानाः समनसो जीवा जीवेषु मामकाः.
तेषा ँ श्रीर्मयि कल्पतामस्मिँल्लोके शत ँ समाः.. (४६)
जीवों में जो समान मान वाले और समान मन वाले जीव हैं, उन की शोभा मुझे
फलीभूत करे. हम इस लोक में सौ वर्षों तक जीएं. हमारे साथ ये जुड़ कर रहें. ( ४६ )
द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम्.
ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च.. (४७)
हम ने मनुष्यों के जाने योग्य दो मार्ग सुने हैं. पहला पितृ मार्ग और दूसरा देव
मार्ग. इन दोनों मार्गों से ही विश्व का सृजन हुआ है. मातापिता के संयोग से जीवों
का निर्माण हुआ है. ( ४७ )
इद ँ हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीर ँ सर्वगण ँ स्वस्तये.
आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि.
अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त.. (४८)
यह हवि हमारी संतान की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करे. दसों अंगों की बढ़ोत्तरी
२४६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
करे. सभी गणों के कल्याण के लिए हो. आत्मसुख देने वाली हो. संतान वृद्धिकारी
हो. पशुधन की बढ़ोत्तरी करे. अभयदायी हो. हे अग्नि! आप हमारी प्रजा की बढ़ोत्तरी
करें. आप हमारे लिए दूध व वीर्य धारिए. ( ४८ )
उदीरतामवर ऽ उत्परास ऽ उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः.
असुं य ऽ ईयुरवृका ऽ ऋतज्ञास्ते नोवन्तु पितरो हवेषु.. (४९)
जो ऊंचे पितर, श्रेष्ठ पितर, मध्यम पितर व सौम्य पितर हैं, वे हमें प्रेरित करने
की कृपा करें. शत्रुहीन पितर हमारी रक्षा करने की कृपा करें. सत्य को जानने वाले
पितर व पितृगण हवियों में हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ४९ )
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा ऽ अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः.
तेषां वय ष् सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (५०)
हमारे पितर अंगिरस हैं. नई वाणी के प्रेरक, अथर्वा, भृगु व सौम्य हैं. हम
उन के प्रति सुमति वाले हैं. याजकों का कल्याण करें. उन के लिए समान मन
वाले हों. ( ५० )
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः.
तेभिर्यमः स ष् रराणो हवी ष् ष्युशनुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (५१)
जो हमारे पूर्व पितर हैं, वे सौम्य, सुखी, सोमरस पीने योग्य, वसिष्ठ हैं. उन के
लिए हमारे पितर यम के साथ पधारने की कृपा करें. हवि को ग्रहण करने व शत्रु
का नाश करने की कृपा करें. कामना की पूर्ति करने वाले हों. ( ५१ )
त्व ष् सोम प्रचिकितो मनीषा त्व ष् रनिष्ठमनु नेषि पन्थाम्.
तव प्रणीती पितरो न ऽ इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीराः.. (५२)
हे सोम! आप प्रकृष्ट ( अत्यंत ) प्रकाशमान हैं. आप मनीषा से श्रेष्ठ मार्ग की
ओर ले जाने वाले हैं. आप की प्रीति से धैर्यवान पितरगण ने यज्ञ आदि श्रेष्ठ कार्य
किए तथा देवों में सोमरस के प्रति प्रीति उत्पन्न की. ( ५२ )
त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः.
वन्वन्वातः परिधीँ २ रपोर्णु वीरेभिरश्वैर्मघवा भवा नः.. (५३)
सोम! आप पवित्र हैं. पूर्व में हमारे धीर तथा पवित्र पितरों ने ही यज्ञ कर्म संपादित
किए. आप विघ्नकारियों को दूर भगाएं. इंद्र देव वीर, अश्वारोही व धनवान हैं. वे
हमें ऐश्वर्य प्रदान करने की कृपा करें. ( ५३ )
त्व ष् सोम पितृभिः संविदानोनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ.
तस्मै त ऽ इन्दो हविषा विधेम वय ष् स्याम पतयो रयीणाम्.. (५४)
यजुर्वेद - २४७
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
हे सोम! आप पूर्वजों के साथ हो कर स्वर्गलोक के सुख विस्तृत कीजिए. आप
पूर्वजों के साथ हो कर पृथ्वीलोक के सुख विस्तृत कीजिए. हम आप के लिए हवि
का विधान करते हैं. आप और हम भी धनपति हों. ( ५४ )
बर्हिषदः पितर ऽ ऊर्त्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्.
त ऽ आ गतावसा शन्तमेनाथा नः शं योररपो दधात.. (५५)
हे पितरगण! आप कुश के आसन पर विराजते हैं. हम आप के लिए ऊंचेऊंचे
स्वर में स्तुति गाते हैं. हम आप के लिए हवि समर्पित करते हैं. आप प्रसन्नता से इस
हवि को ग्रहण करने व रक्षा साधनों से इस यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप
हमारे लिए सुख धारिए. ( ५५ )
आहं पितॄन्सुविदत्राँ २ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः.
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त ऽ इहागमिष्ठाः.. (५६)
आप श्रेष्ठ ज्ञाता हैं. आप पितरों को अच्छी तरह जानिए. आप संसार के
गतिमान चक्र को समझें. जो पितर कुश के आसन पर विराजित हैं, जो पितर
स्वधामय सोमरस पीते हैं, वे पितरगण यहां आने की कृपा करें. ( ५६ )
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु.
त ऽ आ गमन्तु त ऽ इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान्.. (५७)
हम पितरों व सोमरस के इच्छुक पितरों का आह्वान करते हैं. हम कुश के
आसन पर विराजित पितरों का आह्वान करते हैं. पितरगण हमारे प्रिय वचनों व
हमारी बोली हुई स्तुतियों को सुनने और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ५७ )
आ यन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः.
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोधि ब्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान्.. (५८)
हमारे पितर सोम के समान सौम्य हैं. अग्नि जैसे तेजस्वी हैं. पितरगण देवों के लिए
उपयुक्त मार्गों से इस यज्ञ में पधारने की कृपा करें. इस यज्ञ में स्वधा से आनंदित हों.
हमारे प्रति उपदेश देने व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ५८ )
अग्निष्वात्ताः पितर ऽ एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः.
अत्ता हवी ᳪ षि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयि ᳪ सर्ववीरं दधातन.. (५९)
पितरगण अग्नि के समान तेजस्वी हैं. वे यहां पधारें. यज्ञ सदन में विराजने की
कृपा करें. कुश के आसन पर विराजिए. पितर हम यजमान के लिए धन व श्रेष्ठ
वीर धारने की कृपा करें. ( ५९ )
ये ऽ अग्निष्वात्ता ये ऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते.
तेभ्यः स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयाति.. (६०)
२४८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो पितर अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो पितर स्वर्गलोक के बीच में हैं, वे
पितर स्वधा से आनंदित होते हैं. उन को स्वयं प्रकाशित परमात्मा अच्छी नीयत प्रदान
करें. उन के शरीर को आवश्यकता के अनुसार कर्म का फल प्रदान करने की कृपा
करें. (६०)
अग्निष्वात्तान्ऋतुमतो हवामहे नाराश १७ से सोमपीथं य ऽ आशुः.
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वय १७ स्याम पतयो रयीणाम्.. (६१)
जो पितर अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो नीतिवान हैं, हम उन का आह्वान
करते हैं. हम प्रशंसित व सोमपान में तीव्र गतिशील पितर का आह्वान करते
हैं. वे हमारे ब्राह्मण पितर अच्छी तरह आह्वान योग्य हैं. हम धनों के स्वामी हो
जाएं. (६१)
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे.
मा हि १७ सिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व ऽ आगः पुरुषता कराम.. (६२)
हे पितरगणो! हम दाहिने घुटने पर टिक कर आप को आमंत्रित करते हैं.
आप इस पूरे यज्ञ में अपना अभिमत प्रकट करने की कृपा करें. आप हम को
हिंसित न करें. पितरगण यहां आने और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. (६२)
आसीनासो ऽ अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय.
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त ऽ इहोजं दधात.. (६३)
पितरगण लाल सूर्यलोक में विराजे हुए हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. मनुष्यों
के लिए ऐश्वर्य दीजिए. पितर पुत्रों के लिए वैभव दें. ऊर्जा धारण करें. (६३)
यमग्ने कव्यवाहन त्वं चिन्मन्यसे रयिम्.
तन्नो गीर्भिः श्रवाय्यं देवत्रा पनया युजम्.. (६४)
हे अग्नि! कविगण आप की स्तुति करते हैं. आप चिन्मय हैं. आप धन धारिए.
आप हमारी उन वाणियों को सुनिए. देवताओं के लिए इस हवि की रक्षा कीजिए.
हवि को उन तक पहुंचाइए. (६४)
यो अग्निः कव्यवाहनः पितॄन् यक्षदृतावृधः.
प्रेदु हव्यानि वोचति देवेभ्यश्च पितृभ्य ऽ आ.. (६५)
हे अग्नि! आप हवि वाहक हैं. आप सत्यमय यज्ञ की बढ़ोतरी करने वाले हैं.
आप देवताओं व पितरों तक हवि प्रेषित करने की कृपा करें. (६५)
त्वमग्न ऽ ईडितः कव्यवाहनावाढव्यानि सुरभीणि कृत्त्वी.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवी १७ षि.. (६६)
यजुर्वेद - २४९
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
हे अग्नि! आप आकांक्षित, कविगणों से स्तुत व हवि वाहक हैं. आप सुगंधित
हवि को वहन करने की कृपा करें. देवगण प्रीतिपूर्वक इस हवि को ग्रहण करने की
कृपा करें. पितरगण को स्वधामय हवि प्रदान करते हैं. ( ६६ )
ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ २ उ च न प्रविद्म.
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञ १४ सुकृतं जुषस्व.. (६७)
जो हमारे पितर यहां विराजमान हैं और जो यहां नहीं हैं, जिन पितरों को
हम जानते हैं और जिन को नहीं जानते हैं, हे सर्वज्ञ अग्नि! आप उन्हें जानिए.
आप स्वधापूर्वक इस यज्ञ को अच्छी तरह संपादित कीजिए. ( ६७ )
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य ऽ उपरास ऽ ईयुः.
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नून १४ सुवृजनासु विक्षु.. (६८)
पितरों को नमन. जो पितर पूर्व में हुए, जो पितर बाद में हुए, जो पार्थिव हैं,
जो धर्म पालक हैं, उन सभी पितरों को सादर यह हवि प्राप्त हो. ( ६८ )
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऽ ऋतमाशुषाणाः.
शुचीदयन् दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरपव्रन्.. (६९)
हे अग्नि! जैसे हमारे पितरों ने देह से मुक्त हो कर ऋतलोक को पाया, पवित्र
किया, ज्ञान का विस्तार किया, अज्ञान का भेदन किया, हम भी उन की ही तरह
दिव्यलोक को पाएं. ( ६९ )
उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि.
उशन्नुशत ऽ आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (७०)
हे अग्नि! आप यहां विराजिए. हम यज्ञ और अर्थ की कामना से समिधा से आप
को प्रज्वलित करते हैं. आप अग्रगामी हैं. आप पितरों को हविग्रहण करने के लिए
बुलाने की कृपा करें. ( ७० )
अपां फेनेन नमुचेः शिर ऽ इन्द्रोदवर्तयः. विश्वा यदजयः स्पृधः.. (७१)
हे इंद्र देव! आप ने जलों के फेन से ही नमुचि के सिर को काट दिया. आप
सभी अजेय शत्रुओं से स्पर्द्धा करने वाले हैं. ( ७१ )
सोमो राजामृत १४ सुत ऽ ऋजीषेणाजहान्मृत्युम्.
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान १४ शुक्रमन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतं मधु.. (७२)
सोम राजा व अमृत हैं. वे हमें मृत्यु से दूर करते हैं. वे यज्ञ से सत्य, बल व
इंद्रियों में इंद्र का सामर्थ्य उपलब्ध कराते हैं. वे यज्ञ से दूध, अमृत व मधु उपलब्ध
कराते हैं. ( ७२ )
२५० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
अ॒द्भ्यः क्षीरं॒ व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिर॒सो धि॒या.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७३)
प्राण रूपी हंस बुद्धि से जल मिश्रित दूध में से दूध पीता है. ऋत से सत्य की
प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध व मधुर पदार्थ
की प्राप्ति कराता है. (७३)
सोम॑म॒द्भ्यो व्यपिबच्छन्द॑सा ह॒ ᳵ सः शु॒चिषत्.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७४)
आदित्य देव सोम को जलों से पृथक् कर के पीते हैं. ऋत से सत्य की प्राप्ति
कराते हैं. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराते हैं. यह हमें दूध व मधुर पदार्थ की
प्राप्ति कराते हैं. (७४)
अन्ना॒त्परिस्रुतो॒ रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्रजाप॑तिः.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७५)
ब्राह्मणों के साथ प्रजापति निस्सृत अन्न के रस से सोम रूपी दूध को अलग
कर के पीते हैं. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराते हैं. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराते
हैं. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराते हैं. (७५)
रेतो॒ मूत्रं॑ वि॒जहा॑ति॒ योनिं॑ प्रवि॒शदि॑न्द्रि॒यम्.
गर्भो॒ जरायु॒णावृ॑त॒ ऽ उल्बं॑ जहाति॒ जन्म॑ना.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७६)
एक ही मार्ग मूत्र छोड़ता है और वही योनि इंद्रिय में प्रवेश कर के वीर्य छोड़ता
है. गर्भ जरायु से आवृत हो कर जन्म के साथ ही उस को भेद कर छोड़ देता है. ऋत
से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध,
अमृत की प्राप्ति कराता है. यह हमें मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७६)
दृष्ट्वा रू॒पे व्याक॑रोत्स॒त्यानृ॒ते प्र॒जाप॑तिः. अश्र॑द्धामनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धा ᳵ स॒त्ये प्र॒जाप॑तिः.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७७)
प्रजापति ने सत्य और असत्य दोनों को अलगअलग रूपों में स्थापित किया
प्रजापति ने असत्य को अश्रद्धा व सत्य को श्रद्धा के रूप में स्थापित किया. ऋत
से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध,
अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७७)
वे॒देन॑ रू॒पे व्यपिबत् सु॒तासु॒तौ प्र॒जाप॑तिः.
ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७८)
प्रजापति ने वेदों से ग्राह्य और अग्राह्य रूप को पीया. ऋत सत्य की प्राप्ति
यजुर्वेद - २५१
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ
की प्राप्ति कराता है. (७८)
दृष्ट्वा परिस्रुतो रस ᳵ शुक्रेण शुक्लं व्यपिबत् पयः सोमं प्रजापतिः.
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान ᳵ शुक्रमन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतं मधु.. (७९)
प्रजापति ने निस्सृत सोम रस को दूध के साथ पीया. प्रजापति ने चमकीला
सोम रस को दूध के साथ पीया. यह ऋत से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों
में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता
है. (७९)
सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽ ऊर्णासूत्रेण कवयो वयन्ति.
अश्विना यज्ञ ᳵ सविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपं वरुणो भिषज्यन्.. (८०)
जैसे सीसे के यंत्र से तांत और ऊन आदि को बुना जाता है, वैसे ही मन से
मनीषी और कवि इस यज्ञ की वय की बढ़ोत्तरी करते हैं. अश्विनी देव यज्ञ को संपन्न
करते हैं. सविता देव, सरस्वती देवी, वरुण, इंद्र देव के रूप को ओषधियों से पुष्ट
करते हैं. (८०)
तदस्य रूपममृत ᳵ शचीभिस्तिस्रो दधुर्देवताः स ᳵ रणाः.
लोमानि शष्पैर्बहुधा न तोक्मभिस्त्वगस्य मा ᳵ सम्भवन्न लाजाः.. (८१)
इस यज्ञ के अमृतमय रूप को शची आदि तीनों देवताओं ने धारा. उन्होंने ही
इस की खोज की. बहुत प्रकार की घास के लोम उन के शरीर के रोम हुए. यज्ञ में
त्वक् को प्रकट किया. लाजा उन का मांस हुआ. (८१)
तदश्विना भिषजा रुद्रवर्तनी सरस्वती वयति पेशो अन्तरम्.
अस्थि मज्जानं मास्रैः कारोतरेण दधतो गवां त्वचि.. (८२)
वैद्य अश्विनीकुमार रुद्र जैसे स्वभाव के हैं. उन्होंने और देवी सरस्वती ने इंद्र
देव के शरीर को पूरा बनाया. अस्थि, मज्जा, मांस आदि और गायों की त्वचा
को धारा. (८२)
सरस्वती मनसा पेशलं वसु नासत्याभ्यां वयति दर्शतं वपुः.
रसं परिस्रुता न रोहितं नग्नहुर्धीरस्तसरं न वेम.. (८३)
सरस्वती देवी ने दोनों अश्विनीकुमारों के साथ मिल कर मन से विशेष सुंदर
तथा दर्शनीय शरीर की रचना की, रस ( लहू ) चुआया, धैर्य से विकार नाशक इस
को शरीर में उपजाया. (८३)
पयसा शुक्रममृतं जनित्र ᳵ सुरया मूत्राज्जनयन्त रेतः.
अपामतिं दुर्मतिं बाधमाना ऽ ऊवध्यं वात ᳵ सव्वं तदारात्.. (८४)
२५२ - यजुर्वेद