यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
करे. सभी गणों के कल्याण के लिए हो. आत्मसुख देने वाली हो. संतान वृद्धिकारी
हो. पशुधन की बढ़ोत्तरी करे. अभयदायी हो. हे अग्नि! आप हमारी प्रजा की बढ़ोत्तरी
करें. आप हमारे लिए दूध व वीर्य धारिए. ( ४८ )
उदीरतामवर ऽ उत्परास ऽ उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः.
असुं य ऽ ईयुरवृका ऽ ऋतज्ञास्ते नोवन्तु पितरो हवेषु.. (४९)
जो ऊंचे पितर, श्रेष्ठ पितर, मध्यम पितर व सौम्य पितर हैं, वे हमें प्रेरित करने
की कृपा करें. शत्रुहीन पितर हमारी रक्षा करने की कृपा करें. सत्य को जानने वाले
पितर व पितृगण हवियों में हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ४९ )
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा ऽ अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः.
तेषां वय ष् सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (५०)
हमारे पितर अंगिरस हैं. नई वाणी के प्रेरक, अथर्वा, भृगु व सौम्य हैं. हम
उन के प्रति सुमति वाले हैं. याजकों का कल्याण करें. उन के लिए समान मन
वाले हों. ( ५० )
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः.
तेभिर्यमः स ष् रराणो हवी ष् ष्युशनुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (५१)
जो हमारे पूर्व पितर हैं, वे सौम्य, सुखी, सोमरस पीने योग्य, वसिष्ठ हैं. उन के
लिए हमारे पितर यम के साथ पधारने की कृपा करें. हवि को ग्रहण करने व शत्रु
का नाश करने की कृपा करें. कामना की पूर्ति करने वाले हों. ( ५१ )
त्व ष् सोम प्रचिकितो मनीषा त्व ष् रनिष्ठमनु नेषि पन्थाम्.
तव प्रणीती पितरो न ऽ इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीराः.. (५२)
हे सोम! आप प्रकृष्ट ( अत्यंत ) प्रकाशमान हैं. आप मनीषा से श्रेष्ठ मार्ग की
ओर ले जाने वाले हैं. आप की प्रीति से धैर्यवान पितरगण ने यज्ञ आदि श्रेष्ठ कार्य
किए तथा देवों में सोमरस के प्रति प्रीति उत्पन्न की. ( ५२ )
त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः.
वन्वन्वातः परिधीँ २ रपोर्णु वीरेभिरश्वैर्मघवा भवा नः.. (५३)
सोम! आप पवित्र हैं. पूर्व में हमारे धीर तथा पवित्र पितरों ने ही यज्ञ कर्म संपादित
किए. आप विघ्नकारियों को दूर भगाएं. इंद्र देव वीर, अश्वारोही व धनवान हैं. वे
हमें ऐश्वर्य प्रदान करने की कृपा करें. ( ५३ )
त्व ष् सोम पितृभिः संविदानोनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ.
तस्मै त ऽ इन्दो हविषा विधेम वय ष् स्याम पतयो रयीणाम्.. (५४)
यजुर्वेद - २४७