बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( २४१ )
३. यदि जीवन रेखा बाल की तरह पतली तथा अस्पष्ट हो ।
४. यदि जीवन रेखा का रंग पीलापन लिए हुए हो ।
५. यदि जीवन रेखा पर धब्बे का चिन्ह हो ।
६. यदि जीवन रेखा का प्रारम्भ गुच्छे के समान हो ।
७. यदि जीवन रेखा के प्रारम्भ में दो रेखाएं बंटी हुई हों ।
८. यदि जीवन रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो ।
६. यदि जीवन रेखा शुक्र के क्षेत्र में धंसी हुई हो ।
१०. यदि हथेली में जीवन रेखा अत्यन्त गहरी और चौड़ी हो :
११. यदि जीवन रेखा हथेली में बहुत छोटी हो ।
१२. यदि जीवन रेखा अपने उद्गम स्थान से प्रारम्भ होकर मणिबन्ध के दूसरे
पौर तक पहुंच गई हो ।
१३. यदि चन्द्र पर्वत पर त्रिकोण का चिन्ह हो ।
१४. यदि चन्द्र पर्वत पर एक से अधिक धब्बे हों ।
१५. यदि चन्द्र रेखा पर त्रिकोण हो ।
१६. यदि चन्द्र रेखा आगे बढ़कर जीवन रेखा को काटती हुई शुक्र पर्वत तक
पहुंचती हो ।
१७. यदि अनामिका के तीसरे पौर पर तारे का चिह्न हो ।
१८. यदि स्वास्थ्य रेखा कई जगह से कटी हुई हो ।
१६. यदि बुध पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह हो ।
२०. यदि जीवन रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा जंजीरदार हो ।
२१. यदि स्वास्थ्य रेखा पर दो त्रिकोण के चिन्ह हों ।
ऊपर लिखे २१ योग भी अस्वाभाविक मृत्यु योग ही कहलाते हैं । यहां पर
अस्वाभाविक मृत्यु से मेरा तात्पर्य निम्नलिखित प्रकार से है।
१. जंगल में भटक कर भूख प्यास से पीड़ित होकर मृत्यु प्राप्त करना ।
२. पशुओं के पैरों से कुचल जाने के कारण ।
३. पानी में डूबने से ।
४. सूलपात से ।
५. आपसी कलह से युद्ध होने पर ।
६. जेल में रहने से ।
७. किसी छूत की बीमारी से ।
८. मकान के नीचे दब जाने से ।
६. जंगल में रास्ता भटक जाने के कारण ।
१०. वृक्ष से गिर जाने के कारण ।
११. किसी बन्धन या रस्सी से ।
( २४२ )
१२. स्त्री के द्वारा जहर दिये जाने से ।
१३. रोगमय या खराब अन्न खाने से ।
१४. घाव सड़ जाने के कारण ।
१५. लकड़ी से दब जाने के कारण ।
१६. किसी पारिवारिक कुचक्र में उलझ जाने के कारण ।
१७. बन्धन से ।
१८. अन्य किसी भी कारण से जिससे कि स्वाभाविक मृत्यु न हो ।
सर्प-दंश योग :
परिभाषा : यदि शुक्रवलय हो तथा उसमें त्रिकोण का
चिन्ह हो तो यह योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी मृत्यु
सांप डसने से होती है ।
[चित्र: सर्पदंश योग]
दुर्मरण योग :
परिभाषा : यदि राहू क्षेत्र पर त्रिकोण का चिन्ह हो
तथा सूर्य पर्वत अविकसित हो तो दुर्मरण योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति
की मृत्यु स्वाभाविक रूप से नहीं होती । अपितु उसका दुर्मरण
होता है ।
टिप्पणी : विद्वानों ने इस योग के अलावा निम्न योग
भी दुर्मरण योग बताए हैं ।
१. यदि चन्द्र पर्वत पर एक बड़ा त्रिभुज हो और
उसके अन्दर एक छोटा त्रिभुज और हो ।
२. जीवन रेखा पर सफेद चिन्ह हो ।
३. राहू रेखा आगे बढ़कर जीवन रेखा को काटती हो ।
४. केतु पर्वत पर तारे का चिन्ह हो ।
५. आयु रेखा बिल्कुल छोटी हो तथा इसके अन्त में क्रॉस का चिन्ह हो ।
[चित्र: दुर्मरण योग]
( २४६ )
६. पूरे हाथ में बहुत अधिक त्रिभुज बिन्दु और धब्बे हो ।
ऊपर लिखे योग भी दुर्मरण योग कहलाते हैं । इनमें से प्रत्येक की मृत्यु के
निम्नलिखित कारण होते हैं ।
१. शस्त्र से मृत्यु ।
२. फांसी से मृत्यु ।
३. जहर खाने से मृत्यु ।
४. आग में जल जाने से मृत्यु ।
५. पेट में शस्त्र लग जाने के कारण मृत्यु ।
६. नाभी पर भीषण प्रहार से मृत्यु ।
क्षय रोग योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत पर वृत्त बन गया हो और
उस वृत्त को चन्द्र देखा काटती हो तो यह योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी मृत्यु
क्षय रोग की वजह से होती है ।
[चित्र विवरण: क्षय रोग योग]
अंगहीन योग :
परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर तथा शनि रेखा पर
दो या इससे अधिक वृत्त के चिन्ह हों तथा शनि रेखा और
मंगल रेखा का सम्बन्ध बन गया हो तो अंगहीन योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसके जीवन
में उसका कोई एक अंग कटता ही है ।
[चित्र विवरण: अंगहीन योग]
( २४४ )
कूबड़ांग योग :
परिभाषा : यदि शनि रेखा चन्द्र रेखा तथा राहू रेखा
मिलकर त्रिकोण का चिन्ह बनाते हों तो कूबड़ योग होता है ।
फल : कूबड़ योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति की पीठ
बाहर निकल जाती है और उसका सीना अन्दर की ओर धंस
जाता है ।
कूबड़ योग
एकपाद योग :
परिभाषा : एकपाद योग उस व्यक्ति के हाथ में होता
है जिसमें स्वास्थ्य रेखा पर त्रिकोण हो तथा उस त्रिकोण से
कोई रेखा प्रारम्भ होकर चन्द्र पर्वत तक पहुंचती हो ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति एक पैर से
लंगड़ा होता है ।
एकपाद योग
जड़ योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत पर बहुत अधिक धब्बे,
बिन्दु और आड़ी तिरछी रेखाएं हों तो जड़ योग होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति बहरा
होता है ।
जड़ योग
( २४५ )
नेत्रनाश योग :
परिभाषा : यदि राहू रेखा तथा चन्द्र रेखा का सम्बन्ध
हो तो नेत्र नाश योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी आँखें
कमजोर रहती हैं तथा वह नेत्र पीड़ा से पीड़ित रहता है ।
टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्न योगों को भी
नेत्र नाश योग माना है :
१. यदि सूर्य पर्वत पर त्रिकोण का चिन्ह हो ।
२. यदि सूर्य रेखा तथा चन्द्र रेखा आपस में मिलकर
गुच्छा बनाती हों ।
नेत्र नाश योग
३. यदि सूर्य रेखा बिल्कुल कमजोर हो ।
४. यदि हथेली में चन्द्र रेखा का अभाव हो ।
५. यदि सूर्य पर्वत अपने स्थान से खिसककर शनि पर्वत से मिल गया हो ।
६. यदि चन्द्र पर्वत हथेली के बाहर की ओर बढ़ रहा हो ।
७. यदि चन्द्र रेखा पर दो त्रिभुज हों ।
८. यदि सूर्य रेखा अनामिका के दूसरे पौर तक पहुंचती हो ।
६. यदि हथेली के मध्य में लाल धब्बा हो ।
अंध योग :
परिभाषा : यदि हथेली में बुध एवं चन्द्र पर्वत का
अभाव हो तो अंध योग होता है ।
फल : अंध योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अंधा
होता है ।
टिप्पणी : विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी अंध योग
माने हैं :
अंध योग
१. यदि सूर्य रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो ।
२. यदि सूर्य रेखा मंगल पर्वत तक जाती हो और
अन्त में बिन्दु हो ।
३. यदि चन्द्र रेखा मुड़कर मणिबन्ध तक पहुंचती हो ।
४. यदि मंगल रेखा हथेली के दूसरी तरफ जा रही हो ।
५. यदि राहू रेखा का सम्बन्ध मंगल रेखा से हो गया हो ।
६. यदि केतु पर्वत तथा चन्द्र पर्वत में लाल बिन्दु हो ।
( २४६ )
शीतला योग :
परिभाषा : यदि गुरु पर्वत के नीचे सूर्य, शनि तथा
मंगल रेखाओं का सम्बन्ध होता हो तो शीतला योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में शीतला योग होता है उसे अपने
जीवन में चेचक के रोग से ग्रसित होना पड़ता है ।
शीतला योग
सर्पभय योग :
परिभाषा : यदि हाथ में राहू रेखा जंजीरदार हो त
सर्पभय योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जीवन में
सांप काटता है । और यदि रेखा दृढ़ हो तो सर्प के काटने से
व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है ।
टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्न योग भी सर्प
भय योग बताये हैं ।
१. यदि हाथ के सभी मणिबन्ध जंजीरदार हों ।
२. यदि राहू और केतु पर्वत के बीच दो त्रिकोणों के
सर्पभय योग चिन्ह हों ।
३. यदि स्वास्थ्यरेखा कई जगह से कटी हुई हो और अन्त में काला बिन्दु हो ।
ग्रहण योग :
परिभाषा : यदि राहू और चन्द्रमा की रेखाएं परस्पर
सुदृढ़ रूप से मिलती हों तो ग्रहण योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन भर
परेशानियों से ग्रस्त रहता है और उसके जीवन में निरन्तर
बाधाएं आती रहती हैं। एक प्रकार से वह अपने जीवन में हीन
भावना का शिकार हो जाता है ।
ग्रहण योग
( २४७ )
चांडाल योग :
परिभाषा : यदि हथेली में गुरु और राहू की रेखाएं
परस्पर मिलती हों तो चांडाल योग होता है ।
फल : इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भाग्यहीन होता है ।
वह आजीविका के लिये बहुत अधिक संघर्ष करता है । मन्द
बुद्धि का ऐसा बालक निरन्तर कठोर संघर्षों में ही जीवित
रहता है ।
चांडाल योग
व्रण योग :
परिभाषा : यदि मंगल रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो
तथा उसके बीच में सफेद बिन्दु हो तो व्रण योग होता है ।
फल : व्रण योग में उत्पन्न व्यक्ति की मृत्यु घावों के
सड़ने से होती है ।
व्रण योग
गल रोग योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत दबा हुआ हो तथा उस पर
जाली-सी हो, तो गल रोग योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है वह
जीवन भर गले के रोग से पीड़ित रहता है ।
लिंगच्छेदन योग :
गलरोग योग
परिभाषा : यदि बुध रेखा तथा राहू रेखा का सम्बन्ध
हो तथा सम्बन्ध के स्थान पर काला चिह्न हो तो यह योग
होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति
का लिंग या तो किसी वजनी वस्तु से कुचल जाता है या व्यक्ति
स्वयं अपने लिंग को काट देता है ।
लिंगच्छेदन योग
( २४८ )
कलह योग :
परिभाषा : यदि दोनों हाथों में चन्द्र पर्वत जरूरत
से ज्यादा उभरे हुए हों तथा उस पर वृत के चिह्न हों तो कलह
योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसका पूरा
जीवन कलह में ही व्यतीत होता है और कलह से ही दुखी
होकर उसकी मृत्यु होती है ।
उन्माद योग :
कलह योग
परिभाषा : यदि सूर्य पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न हो
तथा सूर्य रेखा उस त्रिकोण को काटती हो तो उन्माद योग
होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
जरूरत से ज्यादा बोलने वाला गप्पें लगाने वाला तथा बकवादी
होता है ।
उन्माद
कुष्ठ रोग योग :
परिभाषा : यदि हथेली में मंगल और बुध रेखाएं मिल
कर मणिबन्ध तक जाती हों तो यह योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह कुष्ट रोग
से पीड़ित रहता है ।
टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्न योगों को
भी कुष्ट रोग योग माना है :
१. यदि चन्द्रमा तथा हर्षल का सम्बन्ध हो ।
२. यदि हथेली के मध्य में दो त्रिकोण हों तथा आपस
में एक दूसरे को काटते हों ।
कुष्ट रोग योग
कुष्ट रोग एक भयानक रोग है इसके होने पर पूरे
शरीर में सफेद-सफेद दाग पड़ जाते हैं । उसका शरीर बदरंग हो जाता है तथा घाव
सड़ने से पीप पड़ जाती है ।
( २४६ )
जलोदर रोग योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत बहुत अधिक विकसित हो
तथा चन्द्र, रेखा सीढ़ीदार होकर प्रथम मणिबन्ध को स्पर्श
करती हो तो जलोदर रोग योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जलोदर
रोग हो जाता है ।
टिप्पणी : जलोदर रोग में पेट में बहुत अधिक पानी
का जमाव हो जाता है और पेट निरन्तर फूलता रहता है ।
अन्त में इस रोग से उसकी मृत्यु हो जाती है ।
मुनि योग
परिभाषा : यदि हथेली में तर्जनी उंगली अनामिका से
लम्बी हो, गुरु पर्वत अपने स्थान पर फूला हुआ हो तथा उस
पर स्वस्तिक का चिह्न हो तो मुनि योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह सांसारिक
छल प्रपंच से दूर हटकर साधुवत् जीवन व्यतीत करता है ।
तथा अधिक समय तक मौन ही रहता है ।
टिप्पणी : यह योग होने पर व्यक्ति पूरी तरह से
सामाजिक नहीं रह पाता । और न उसके जीवन में परिवार का
सुख भी मिलता है । बचपन से ही उसकी प्रवृत्ति साधु की तरह
हो जाती है । वह अधिक से अधिक एकान्त में रहना पसन्द
करता है ।
काहल योग :
परिभाषा : यदि मंगल पर्वत विकसित हो तथा उससे
रेखाएं निकलकर शनि, सूर्य तथा बुध पर्वत को स्पर्श करती हों
तो काहल योग होता है ।
फल : इस योग में उत्पन्न व्यक्ति बलवान शरीर तथा
दृढ़ चरित्र का व्यक्ति होता है । साहसिक कार्यों में उसकी बहुत
अधिक रुचि रहती है । ऐसा व्यक्ति पुलिस या सेना में बहुत
अधिक ऊंचे पद पर पहुंचता है । भौतिक दृष्टि से इसके जीवन
मे कोई अभाव नहीं रहता । परन्तु मेरे अनुभव में यह आया है
कि ऐसा व्यक्ति बहुत अधिक बुद्धिमान नहीं होता जिसकी वजह
( २५० )
से एक बार सर्वोच्च पद पर पहुंचकर भी उसका शीघ्र ही पतन हो जाता है। सही
रूप में देखा जाय तो उसे उसके पद के अनुसार लोकप्रियता नहीं मिलती ।
बुध आदित्य योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य और बुध के पर्वत
आपस में मिल गये हों तो यह योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
बुद्धिमान चतुर एवं परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको
ढालने की क्षमता रखने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति अपने
कार्यों से प्रसिद्ध होता है तथा सम्पूर्ण भोग भोगते हुए सुखपूर्ण
जीवन व्यतीत करता है
बुध आदित्य योग
दिवालिया योग :
परिभाषा : यदि भाग्य रेखा छोटी तथा कई स्थानों
पर कटी हुई हो, साथ ही स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिन्ह
हो उसके हाथ में दिवालिया योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह आर्थिक
दृष्टि से हमेशा परेशान रहता है । और अन्त में उसको दिवाला
निकालना पड़ता है ।
दिवालिया योग
जुआ योग :
परिभाषा : यदि मध्यमा और अनामिका बराबर लम्बाई
लिए हुए हो तो यह योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जुए के
माध्यम से धन कमाता है ।
जुआ योग
( २५१ )
लोभ योग :
परिभाषा : यदि हृदय रेखा सीधी चलकर हथेली के
आरपार पहुंचती हो तो लोभ योग होता है ।
फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह जरूरत से
ज्यादा लोभी और कंजूस होता है ।
चोरी योग :
परिभाषा : यदि बुध पर्वत विकसित हो तथा उस पर
जाल का चिह्न हो तो चोरी योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है जीवन में
उसके घर पर कई बार चोरियां होती हैं ।
टिप्पणी : इसके अलावा विद्वानों ने निम्न योग भी
चोर योग बताये हैं ।
१. बुध पर्वत अत्यन्त विकसित हो तथा स्वास्थ्य रेखा
पर द्वीप हो ।
२. यदि कनिष्ठिका के अन्तिम पर्व पर बिन्दु या क्रॉस
का चिन्ह हो ।
३. यदि अनामिका के तीसरे पर्व पर जरूरत से ज्यादा खड़ी रेखाएं हों ।
४. यदि कनिष्ठिका के अन्तिम पर्व पर क्रॉस हो ।
चाप योग :
परिभाषा : यदि सूर्य रेखा अत्यन्त छोटी-छोटी रेखाओं
में जुड़कर बनी हो तो चाप योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसका बचपन
कष्ट में बीतता है परन्तु जीवन में २८वें वर्ष के बाद से आगे
जीवन पर्यन्त वह सभी दृष्टियों से पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत
करता है। ऐसा व्यक्ति यात्रा का शौकीन होता है तथा यात्रा
के माध्यम से ही धन-संग्रह कर पाता है । ऐसे व्यक्ति में घमण्ड
भी जरूरत से ज्यादा होता है ।
( २५२ )
छाप योग :
परिभाषा : यदि गुरु पर्वत विकसित हो तथा उस पर
छोटी-छोटी रेखाओं से क्रॉस का चिह्न बना हो तो वह व्यक्ति
छाप योग से संबंधित होता है ।
फल : जिसके हाथ मे छाप योग होता है वह व्यक्ति
अपने जीवन में अत्यन्त उच्च पद पर पहुंचता है तथा आनन्द
पूर्वक जीवन व्यतीत करता है । आर्थिक दृष्टि से ऐसा व्यक्ति
सौभाग्यशाली कहा जा सकता है ।
भेरी योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध पर्वत विकसित
हो तथा बुध रेखा छोटी-छोटी रेखाओं से मिलकर रज्जूवत बनी
हो पर वह रेखा टूटी हुई न हो तो भेरी योग होता है ।
फल : इस योग में उत्पन्न होने वाला व्यक्ति स्वस्थ,
सबल, दीर्घायु, धनवान, गुणवान, चतुर तथा परिश्रमी होता है ।
उसके जीवन में मित्रों की संख्या बहुत अधिक होती है और
वह शत्रुओं को भी मित्र बनाने की कला जानता है ।
मृदंग योग :
परिभाषा : यदि हथेली में शनि पर्वत पूर्ण विकसित
हो तथा शनि रेखा छोटी-छोटी रेखाओं से बनकर आगे बढ़ी
हो तो मृदंग योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मृदंग योग होता है वह
अपने भाग्य के बल पर जीवन मे उन्नति करता है तथा अपने
प्रयत्नों में सफल होने पर प्रसिद्धि प्राप्त करता है । उसका
काम करने का अपना ही तरीका होता है । और इसी वजह से
उसके कार्य में एक नई दिव्यता आ जाती है । ऐसे व्यक्ति का
प्रभाव अन्य लोगों पर बहुत अधिक होता है ।
( २५३ )
श्रीनाथ योग :
परिभाषा : यदि हथेली में चन्द्र पर्वत विकसित हो तथा
चन्द्र रेखा छोटी-छोटी रेखाओं से मिलकर ऊपर की ओर बढ़ी
हो परन्तु कहीं से भी टूटी न हो तो श्रीनाथ योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में श्रीनाथ योग होता है
वह व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्ण धनवान, सुखी, एवं संपन्न
होता है। उसके पारिवारिक जीवन में किसी प्रकार की कोई
न्यूनता नही होती। उसका भाग्य निरंतर उसका सहायक रहता
है तथा अपने प्रयत्नों से वह उच्चस्तरीय सफलता प्राप्त
करता है।
श्रीनाथ योग
विदेश यात्रा योग :
परिभाषा : यदि हथेली में चन्द्र पर्वत पुष्ट हो तथा
उससे सीधी सरल रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो तो विदेश
योग बनता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह निश्चय
ही किसी समुद्रपारीय देश की यात्रा करता है।
टिप्पणी : यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा
निकलकर सूर्य पर्वत की ओर जाती हो तो वह विशेष क्षेत्र में
प्रसिद्धि प्राप्त करने के कारण विदेश यात्रा करता हैं।
यदि इससे कोई रेखा निकल कर शनि पर्वत की ओर विदेश यात्रा योग
जाती हो तो वह व्यापारिक कार्यों से विदेश यात्रा करता है।
यदि इस रेखा से कोई रेखा निकलकर गुरु पर्वत की ओर जाती हो तो शिक्षा
प्राप्त करने अथवा राजकीय कार्यों से वह विदेश यात्रा करता हैं।
यदि इससे कोई सहायक रेखा निकल कर मंगल पर्वत तक जाती हो तो वह
मिलिट्री के कार्यों से या सेना में उच्च पद पर होने के कारण विदेश यात्रा करता है।
यदि इससे कोई सहायक रेखा निकलकर शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तो
वह व्यक्ति मनोरंजन के लिए विदेश यात्रा करता है।
यदि इससे कोई सहायक रेखा निकल कर प्रजापति पर्वत की ओर जा रही
हो तो वह व्यापार करने के लिए या वहाँ पर स्थायी रूप से रहने के लिए विदेश यात्रा
करता है।
( २५४ )
यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर नीचे की ओर जा रही हो
तो उसकी विदेश यात्रा कम समय की होती है और वहां बदनाम होकर आता है ।
इसके अलावा विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी विदेश यात्रा योग माने हैं :
१. यदि चन्द्र पर्वत से कोई सहायक रेखा शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तथा
शुक्र पर्वत एवं चन्द्र पर्वत पूर्णतः विकसित हों ।
२. यदि चन्द्र पर्वत पर संवर का चिह्न हो ।
३. यदि बुध पर्वत पर बुध मुद्रा हो और उससे कोई रेखा निकल कर चन्द्र
पर्वत की ओर जा रही हो ।
पुष्कल योग :
परिभाषा : यदि शनि पर्वत तथा शुक्र पर्वत बहुत
अधिक पुष्ट तथा लालिमा लिए हुए हों और भाग्य रेखा का
प्रारम्भ शुक्र पर्वत से होता हो जोकि शनि पर्वत के मध्य बिन्दु
तक पहुंचती हो तो उसके हाथ में पुष्कल योग होता है ।
फल : पुष्कल योग से सम्पन्न व्यक्ति अत्यन्त ही सुन्दर
तथा आकर्षक होता है। उसके व्यक्तित्व का प्रभाव दूसरों पर
आसानी से पड़ता है और एक बार जिसके सम्पर्क में
आ जाता उस व्यक्ति के सुख-दुख में वह सहायक रहता है
पुष्कल योग तथा जीवन भर निभाने का प्रयत्न करता है। आर्थिक दृष्टि
से इसके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । और अत्यन्त ही
आनन्द पूर्ण जीवन व्यतीत करने में विश्वास रखता है। नौकरी में ऐसा व्यक्ति अपने
प्रयत्नों से ऊंचा उठता है तथा सफलता प्राप्त करता है ।
टिप्पणी : विद्वानो ने इसके अलावा निम्नलिखित योग भी पुष्कल योग
माने हैं ।
१. यदि भाग्य रेखा सीधी पतली तथा स्पष्ट होकर चन्द्र पर्वत से सम्बन्धित
हो अर्थात् ऐसी रेखा का उद्गम चन्द्र पर्वत हो ।
२. यदि भाग्य रेखा बुध पर्वत से प्रारम्भ होकर बिना किसी से कटे हुए शनि
पर्वत तक पहुंचती हो ।
३. यदि चन्द्र रेखा तथा भाग्य रेखा मिलकर शनि पर्वत तक जाती हो ।
४. यदि भाग्य रेखा प्रथम मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर ऊपर जाती हो तथा
उसकी एक सहायक रेखा सूर्य पर्वत तक पहुंचती हो ।
( २५५ )
चामर योग :
परिभाषा : यदि हाथ की उंगलियां लम्बी हों तथा
उस पर नाखून रक्तिम आभा लिए हुए हो साथ ही सूर्य रेखा
लम्बी पुष्ट हो तथा उसका उद्गम मणिबन्ध से हुआ हो । इसके
साथ ही भाग्य रेखा का उद्गम भी मणिबन्ध से हुआ हो और
दोनों रेखाए उद्गम स्थान पर मिली हुई हों तो चामर योग
होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य अत्यन्त
उच्च प्रतिष्ठित एवं विद्वान लोगों के द्वारा पूजा जाता है तथा
वह स्वयं भी अपने आप में विद्वान होता है और विद्वता के [चामर योग]
कारण ही वह देश तथा विदेश में सम्मानित होता है। ऐसा व्यक्ति अपने ही
परिश्रम से सफल होता है और अपनी सफलता के बल पर यश उपार्जित करता है ।
टिप्पणी : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दीर्घायु भी होता है। यहां
दीर्घायु से मेरा तात्पर्य ७० से १०० वर्ष के बीच की आयु का व्यतीत करना है ।
मालिका योग :
परिभाषा : यदि हाथ में राहु केतु को छोड़कर अन्य
सभी ग्रहों से सम्बन्धित पर्वत बलवान और पुष्ट हों तो मालिका
योग होता है ।
फल : यदि हथेली में मालिका योग हो तो ऐसा व्यक्ति
राज्य में उच्चे पद पर स्थापित होता है तथा वह नेतृत्व के
कारण समाज में सम्मानित होता है ।
यहां सात ग्रहों से तात्पर्य सूर्य, चन्द्र, मंगल
बुध, गुरु, शुक्र, तथा शनि है । परन्तु इसमें ध्यान रखने की
[मालिका योग] बात यह है कि प्रत्येक पर्वत का एक मध्य बिन्दु होता है और
यदि उस ग्रह से संबन्धित रेखा उस मध्य बिन्दु को भली प्रकार से स्पष्ट कर रही हो
अर्थात् उस मध्य बिन्दु को स्पर्श कर रही हो तो वह ग्रह सर्वाधिक बलवान माना
जाता है । हाथ में इन सातो ग्रहों में से जो ग्रह सबसे अधिक बलवान हो तो उस ग्रह
से सम्बन्धित मालिका योग समझना चाहिए । उदाहरण के लिए यदि गुरु पर्वत के
मध्य बिन्दु पर गुरु रेखा स्पर्श कर रही हो तो अन्य पर्वतों की अपेक्षा गुरु पर्वत ज्यादा
श्रेष्ठ माना जायेगा और ऐसा होने पर उस हाथ में गुरु मालिका योग कहलाएगा ।
इसी प्रकार सूर्य मालिका योग, चन्द्र मालिका योग आदि हो सकते हैं । इनसे संबंधित
फल इस प्रकार से हैं :
( २१६ )
१. सूर्य मालिका योग : यदि सूर्य से मालिका योग बना हो तो वह व्यक्ति
शासन में महत्वपूर्ण पद को सुशोभित करता है तथा अपने प्रयत्नों से सचिव के पद
तक पहुंच जाता है ।
२. चन्द्र मालिका योग : जिसके हाथ में चन्द्र मालिका योग होता है वह
व्यक्ति नेवी में कमाण्डर बनता है । अथवा जल के समीप नगरों में व्यापार करने से
विशेष लाभ उठाता है । ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में कई बार विदेश यात्राएं करता है ।
३. भौम मालिका योग : यदि मंगल ग्रह से मालिका योग बनता है तो वह
व्यक्ति पुलिस या सेना में उच्च पद सुशोभित करता है तथा उसे जीवन में धन एवं
वाहन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है ।
४. बुध मालिका योग : यदि हाथ में बुध मालिका योग हो तो ऐसा व्यक्ति
दयालु, दानी एवं परोपकारी होता है । विदेश यात्राएं कई बार करता है तथा अपने
प्रयत्नों से सम्मान एवं ख्याति अर्जित करता है ।
५. गुरु मालिका योग : यदि हाथ में गुरु मालिका योग हो तो वह व्यक्ति
वेद धर्म शास्त्र आदि में पूर्ण रुचि लेने वाला तथा दानी एवं परोपकारी होता है ।
ऐसा व्यक्ति सामाजिक कार्यों में अग्रणी रहता है तथा समाज में पूर्ण सम्मान प्राप्त
करता है ।
६. शुक्र मालिका योग : जिसके हाथ में शुक्र मालिका योग होता है वह सच्चा
पितृ-भक्त होता है साथ ही उसे धन की कोई चिन्ता नहीं रहती । ऐसे व्यक्ति का
शरीर सुन्दर एवं आकर्षक होता है तथा अपने कार्यों से वह प्रसिद्धि एवं यश, सम्मान
प्राप्त करता है ।
७. शनि मालिका योग : शनि मालिका योग रखने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता
है परन्तु ऐसे व्यक्ति के जीवन में संघर्ष जरूरत से ज्यादा होता है । जीवन में ३६वें
वर्ष के बाद से वह पूर्ण यश तथा सम्मान प्राप्त करता है ।
शंख योग :
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत का क्षेत्र विस्तृत हो तथा
उससे एक रेखा शनि पर्वत पर और दूसरी रेखा सूर्य पर्वत
पर जाती हो तो शंख योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में शंख योग होता है वह व्यक्ति
पूरा जीवन आनन्द से व्यतीत करता है । दूसरों के प्रति उसका
व्यवहार अत्यन्त मधुर एवं सरल होता है तथा उसकी पत्नी
सुन्दर, सुशील एवं शिक्षित होती है । ऐसा व्यक्ति धर्म
विज्ञान आदि में भी पूर्ण रुचि रखता है । एक प्रकार से देखा
जाय तो उसके जीवन में भौतिकता और आध्यात्मिकता का
अपूर्व समन्वय है ।
( २५७ )
वीर योग :
परिभाषा : यदि मंगल पर्वत पुष्ट एवं दृढ़ हो तथा
उस पर वृत्त का चिह्न हो तो वीर योग होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति मिलिट्री
अथवा देश रक्षा से संबंधित कार्यों में अग्रणी होता है तथा
अत्यन्त उच्च पद पर पहुंचता है ।
वीर योग
प्रेष्य योग :
परिभाषा : यदि हाथ में भाग्य रेखा का अभाव हो तो
प्रेष्य योग होता है ।
फल : प्रेष्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति गरीब,
दुखी, दूसरों के कटु वचन सुनने वाला, विद्या से हीन, तथा
उम्र भर गुलामी करने वाला होता है ।
टिप्पणी : विद्वानों ने निम्न योग भी प्रेष्य योग
बताये हैं ।
१. यदि हाथ में सूर्य रेखा कई जगह टूटी हुई हो ।
२. यदि सूर्य रेखा का उद्गम राहु पर्वत से अथवा केतु पर्वत से है ।
प्रेष्य योग
३. यदि भाग्य रेखा जीवन रेखा के पास हथेली के बाहर जा रही हो ।
भिक्षुक योग :
परिभाषा : यदि भाग्य रेखा पर क्रॉस का चिह्न है
तो भिक्षुक योग होता है ।
फल : भिक्षुक योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति भाग्यहीन,
स्त्री पुत्र तथा परिवार के सुख से वंचित, विपरीत स्थितियों में
रहने वाला, अपनी आजीविका के लिए हर समय चिन्तित रहने
वाला गरीब व्यक्ति होता है ।
टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने इसके अलावा
निम्न योग भी भिक्षुक योग बताये हैं ।
१. यदि हाथ में शुक्र पर्वत दो भागों में विभाजित हो ।
२. यदि केवल मात्र एक ही मणिबन्ध हो ।
भिक्षुक योग
( २५८ )
३. यदि बुध पर्वत हथेली के बाहर निकला हुआ हो तथा उस पर सफेद
धब्बे हों।
४. यदि सूर्य रेखा अनामिका के दूसरे पर्वत तक पहुंची हुई हो।
५. यदि टूटी हुई स्वास्थ्य रेखा से कोई रेखा निकल कर नीचे मणिबन्ध
तक जाती हो ।
दरिद्र योग :
परिभाषा : यदि सूर्य रेखा अत्यन्त कमजोर और टूटी
हुई हो तो दरिद्र योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में दरिद्र योग होता है वह व्यक्ति
आजीविका से वंचित, निर्धन, चिन्तातुर और निरन्तर कष्ट
में रहने वाला होता है ।
टिप्पणी : इसके अलावा निम्नलिखित योग भी दरिद्र
योग कहलाते हैं ।
१. यदि शुक्र पर्वत पर शंख का या भंवर का चिह्न हो ।
२. यदि मध्यमा के उपरी सिरे पर क्रॉस का चिह्न हों ।
३. यदि हाथ में बहुत अधिक आडी-तिरछी रेखाएं तथा जाल हो ।
रेका योग :
यदि हथेली उथली हो तथा हथेली के बीच
में वर्ग का चिन्ह हो तो रेका योग होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति कमजोर
स्मरण शक्ति रखने वाला, मलीन बुद्धि एवं लगभग मूर्ख होता
है । धन के लिए यह हमेशा परेशान रहता है तथा इसका स्वभाव
चिडचिड़ा हो जाता है जिसकी वजह से यह हमेशा परेशान रहता
है । एक प्रकार से देखा जाय तो यह व्यक्ति चतुर, विवादी
चुगलखोर तथा आलस्य के कारण लापरवाही बरतने वाला तथा
सौभाग्यहीन होता है ।
टिप्पणी : पंडितो ने इसके अलावा निम्नलिखित योग
भी रेका योग माने हैं ।
१. यदि हाथ में शुक्र तथा गुरु पर्वत अत्यन्त कमजोर हों तथा उस पर
सफेद बिन्दु हो ।
( २५६ )
२. यदि हाथ में दो से अधिक त्रिभुज चिह्न हों ।
३. बुध पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह हो और उसके नीचे बिन्दु हो ।
४. हाथ की उंगलियां तथा अंगूठा छोटा हो और उसके नाखून पीले छोटे
तथा लगभग गोल हों ।
राजभंग योग :
परिभाषा : हस्त रेखा शास्त्र के अनुसार निम्नलिखित
योग राजभंग योग कहलाते हैं ।
१. यदि उंगलियों की गांठें फूली हुई हों तथा लगभग
बाहर बढ़ी हुई हों ।
२. यदि सभी उंगलियां चपटी हों तथा तर्जनी पर
सफेद बिन्दु हो ।
३. यदि नाखूनों के अग्र भाग चपटे तथा अन्दर की
ओर धंसे हुए हों ।
४. यदि अंगूठे के पहले पर्व पर ३-४ लम्बी रेखाएं
हों । राजभंग योग
५. यदि उंगलियों के अग्रभाग आगे की ओर झुके हुए हो ।
६. यदि हथेली बहुत मोटी और सख्त हो तथा उंगलिया छोटी-छोटी हों ।
७. यदि सभी उंगलियां कठोर लम्बी तथा दबी हुई हों और उनके जोड़
भद्दे हों ।
८. यदि चन्द्र पर्वत पर दो त्रिकोण हों तथा उन दोनों के बीच में बिन्दु का
चिन्ह हो ।
६. यदि शुक्र पर्वत हथेली के बाहर की ओर निकला हुआ हो ।
१०. यदि स्वास्थ्य रेखा मे कई पतली-पतली रेखाएं निकल कर नीचे की
ओर जा रही हों ।
११. यदि मस्तिष्क रेखा कमजोर हो तथा उस पर काले बिन्दु हों ।
१२. यदि गुरु तथा सूर्य की रेखाएं लहरदार हों ।
१३. यदि हाथ के मध्य में जाली हो तथा इसी प्रकार की जाली सूर्य पर्वत पर
भी हो ।
१४. यदि सभी उंगलियों के प्रथम पर्व पर नक्षत्र के चिन्ह हों ।
१५. यदि गुरु रेखा सीढ़ीदार हो ।
१६. यदि सूर्य रेखा के नीचे द्वीप का चिन्ह हो ।
१७. यदि शुक्र रेखा तथा चन्द्र रेखा धब्बेदार हो ।
१८. यदि सूर्य रेखा का प्रारंभ फुन्दनेदार हो ।
४. चतुर्थ खण्ड: विशेष चिह्न, आयु-गणना, लक्षण-फल एवं उपसंहार
( २६० )
१९. यदि हाथ में बुध पर्वत पर जाली का चिन्ह हो तथा उसके प्रथम पर्व
पर बिन्दु हो।
२० यदि शनि पर्वत पर एक दूसरे को काटती हुई अस्त-व्यस्त रेखाएं हों।
२१. यदि चन्द्र पर्वत पर शनि का चिन्ह हो ।
२२. यदि सूर्य पर्वत तथा बुध पर्वत का हाथ में अभाव हो ।
२३. यदि बुध पर्वत पर वृत्त का चिन्ह हो ।
२४. यदि ऊर्ध्व मंगल पर क्रॉस धब्बा या जाली हो ।
२५. यदि जीवन रेखा बीच में कटी हुई हो तथा उसके साथ ही साथ वह
मोटी और लाल रंग की हो।
२६. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरदार हो ।
२७. यदि जीवन रेखा के प्रारंभ में कई शाखाएं निकलती हों ।
२८. जीवन रेखा से एक रेखा फुन्दनेदार होकर चन्द्र पर्वत को जा रही हो ।
२९. यदि हृदय रेखा दो तीन जगहों से टूटी हुई हो ।
३०. यदि वृहस्पति और शनि के बीच में चक्र का चिह्न हो ।
३१. यदि मस्तिष्क रेखा पीली तथा कमजोर हो ।
३२. यदि हृदय रेखा तथा जीवन रेखा के बीच क्रॉस का चिह्न हों ।
३३. यदि मस्तिष्क रेखा कमजोर तंग-सी होकर हथेली के पार जा रही हो ।
३४. यदि जीवन रेखा चन्द्र पर्वत की ओर झुक रही हो तथा तर्जनी पर
तारे का चिह्न हो ।
३५. यदि दोनों हाथों में मस्तिष्क रेखा जरूरत से ज्यादा कमजोर तथा टूटी
हुई हो ।
३६. यदि मस्तिष्क रेखा पर सफेद धब्बे हों ।
फल : हाथ मे चाहे कितने ही अच्छे योग हों परन्तु यदि उसके हाथ मे राज-
भंग योग भी हो तो वह जातक दुखी, परेशान, चिन्तित, तथा दरिद्र जीवन व्यतीत
करने वाला होता है ।