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सर्वकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 350 में से

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पृष्ठ 255

( २५४ )
यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर नीचे की ओर जा रही हो
तो उसकी विदेश यात्रा कम समय की होती है और वहां बदनाम होकर आता है ।
इसके अलावा विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी विदेश यात्रा योग माने हैं :
१. यदि चन्द्र पर्वत से कोई सहायक रेखा शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तथा
शुक्र पर्वत एवं चन्द्र पर्वत पूर्णतः विकसित हों ।
२. यदि चन्द्र पर्वत पर संवर का चिह्न हो ।
३. यदि बुध पर्वत पर बुध मुद्रा हो और उससे कोई रेखा निकल कर चन्द्र
पर्वत की ओर जा रही हो ।
पुष्कल योग :
परिभाषा : यदि शनि पर्वत तथा शुक्र पर्वत बहुत
अधिक पुष्ट तथा लालिमा लिए हुए हों और भाग्य रेखा का
प्रारम्भ शुक्र पर्वत से होता हो जोकि शनि पर्वत के मध्य बिन्दु
तक पहुंचती हो तो उसके हाथ में पुष्कल योग होता है ।
फल : पुष्कल योग से सम्पन्न व्यक्ति अत्यन्त ही सुन्दर
तथा आकर्षक होता है। उसके व्यक्तित्व का प्रभाव दूसरों पर
आसानी से पड़ता है और एक बार जिसके सम्पर्क में
आ जाता उस व्यक्ति के सुख-दुख में वह सहायक रहता है
पुष्कल योग तथा जीवन भर निभाने का प्रयत्न करता है। आर्थिक दृष्टि
से इसके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । और अत्यन्त ही
आनन्द पूर्ण जीवन व्यतीत करने में विश्वास रखता है। नौकरी में ऐसा व्यक्ति अपने
प्रयत्नों से ऊंचा उठता है तथा सफलता प्राप्त करता है ।
टिप्पणी : विद्वानो ने इसके अलावा निम्नलिखित योग भी पुष्कल योग
माने हैं ।
१. यदि भाग्य रेखा सीधी पतली तथा स्पष्ट होकर चन्द्र पर्वत से सम्बन्धित
हो अर्थात् ऐसी रेखा का उद्गम चन्द्र पर्वत हो ।
२. यदि भाग्य रेखा बुध पर्वत से प्रारम्भ होकर बिना किसी से कटे हुए शनि
पर्वत तक पहुंचती हो ।
३. यदि चन्द्र रेखा तथा भाग्य रेखा मिलकर शनि पर्वत तक जाती हो ।
४. यदि भाग्य रेखा प्रथम मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर ऊपर जाती हो तथा
उसकी एक सहायक रेखा सूर्य पर्वत तक पहुंचती हो ।