सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५३


भी है परन्तु उन मूर्खा खियो को तो उसी मे आनन्द आता है,
मानो उन्ही सब की सोहागरात हो रही है। बड़ी खुशी से गाना
बजाना खाना पीना होता है। उस गाने बजाने मे लड़के की
चिल्लाहट सुन कर भी कोई परवाह नही की जाती।
बहू तो पूरी अवस्था प्राप्त है और पतिजी अनजान है। संभोग
का नाम भी नही जानते पत्नी तो अपनी इच्छा पूरी करना चाहती
है, क्योंकि वह तो अनेक वार मासिकधर्म से होचुकी है; इसलिये
उसे सभोग की प्रबल इच्छा है। गर्भाधान के लिये उसकी
इन्द्रियां ऋतु होने पर सभोग के लिये उत्साहित हो चुकी हैं इस
लिये वह इसी दिन का रास्ता देख रही थी। वह तो अपनी इच्छा
पूरी करना चाहती है। परन्तु जब वह पति को इस काम में अन-
जान पाती है तो उस की सब इच्छाएं हृदय मे भस्म हो जाती है।
उसी दिन के लिये नही सदैव के लिये वह निराश हो जाती है।
वह किसी प्रकार उस छोटे से पति पर भी सन्तोष करके-यदि पति
का प्यार करना चाहती है तो पति उससे डरता है, दूर भागता है।
यदि पति इस छोटी अवस्था में कुसंगति मे पड़कर कुछ इस
विषय मे शिक्षा पा चुके होते हैं और उन्होने प्रसंग किया भी, तो
उससे उस युवती पत्नी की काम वासना की तृप्ति नही होती
वह यदि प्रतिदिन भी इस प्रकार प्रसग करता है तो भी पत्नी की
इच्छा पूत्ति न होकर और भी उत्तेजना बढकर व्याकुलता होती
है और पति जी दिन दिन निर्बल होते जाते हैं यहाँ तक कि
वीर्य-क्षीण होने से कुछ दिन बाद किसी काम के नही रहते।

१५४ आनन्द मन्दिर
ऐसी स्त्रियां अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित होजाती हैं
और चिड़चिड़े स्वभाव की होजाती हैं। हिस्टीरिया का दौरा होने
लगता है। असाध्य प्रदर रोग होजाता है। वे पागल होजाती हैं ।
हर समय क्रोध मे भरी रहती है उनका स्वभाव कलह करने का
होजाता है।
स्त्री हर प्रकार का कष्ट सहलेती है। आपत्ति का पहाड़ सिर
पर आगिरें तो उससे भी नही घवडाती, परन्तु ऋतु स्नाता स्त्री
को गर्भाधान क्रिया के समय यदि योग्य पति न मिले तो वह चित्त
मे वडी दुखी होती है यदि पति रोगी हो, मरगया हो कही विदेश
गया हो तो दुःख नही मानती। परन्तु छोटा हो अथवा वूढा
हो तो वड़ी दुःखी होती हैं। अपना जीवन ही व्यर्थ समझती हैं
अनेक सुशीला स्त्रिया इस दुःख के कारण माता पिता की
मुर्खता पर रो रो कर आत्महत्या कर बैठती हैं। अथवा कुलको
कलंकित कर विधर्मिणी होजाती हैं।
इस विषय मे यदि पता लगाइये तो हजारो उदाहरण ऐसे
मिलेगे कि इस प्रकार के अनमेल विवाहो से दुखी होकर कितनी
ही स्त्रियो ने आत्महत्या किया होगा।
मेरे पास अनेक स्त्रिया ऐसे विवाह वाली आई उन्ही से
ऊपर लिखे विषय का वास्तविक पता लगा है।

आनन्द
मन्दिर

सत्रहवां अध्याय
—:•:—

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५७
बाबा का विवाह
बूढ़ों का विवाह भी बड़ा भयंकर है। इसका बहुत
बुरा परिणाम होता है। बूढ़े विवाह वाली स्त्रियां भी मेरे पास
अब तक हजारो ही आईं वृद्ध विवाह से स्त्री को जो कष्ट
और दुःख होता है उस दुःख और कष्ट की कहानी मैने अनेक
स्त्रियो की जबानी सुनी है, जो इलाज के लिये मेरे पास आया
करती हैं।
जो माता पिता अज्ञानतावश अथवा लालचवश या किसी
दबाव अथवा धनवान पुरुष को देखकर अपनी प्यारी कन्या
का विवाह बुड्ढों के साथ कर देते हैं, वे बड़ा भारी अधर्म्म,
अन्याय और अत्याचार करते हैं। शास्त्रकारो ने बतलाया है
कि कन्या को चाहे मरण पर्यन्त क्वारी रहने दे परन्तु बूढ़े
वर के साथ कभी विवाह न करे इसी प्रकार छोटे वर के
साथ न करे। बेचारी कन्या तो अबोध होती है प्रायः देखा
गया है कि बूढ़े बाबा धन का लालच दिखला कर दस ग्यारह वर्ष
की ही कन्या ढूंढ़ते है। कन्या तो दस ग्यारह अथवा बारह वर्ष
की होती है और पति जी उसके बाबा के समान पूरे खुरांट।
किसी २ के तो मुंह मे दांत तक नही होते। नकली दाँत और
बालो मे खिजाब लगाये, आखो मे नजर की कमजोरी से चश्मा
लगाये जब कि सभी इन्द्रियां कमजोर होजाती हैं ऐसी अवस्था
मे भी वे विवाह करने के लिये जवान बनने की कोशिश करते है।

४५८ आनन्द मन्दिर


ऐसे मूर्ख और अत्याचारी पुरुषो को आगे चलकर बड़ा कष्ट
भोगना पड़ता है और उनकी अन्तिम अवस्था बड़ी ही दुःखमय
कटती है। वे दुनियां मे मुह दिखलाने लायक नही रहते।
यदि स्त्री, दुष्ट पुरुषो अथवा दुष्ट स्त्रियो की संगति मे पडगई तो
स्त्री भी अनेक कष्टो से जीवन व्यतीत करती है और दोनो कुलो
को कलंकित करती है। जो अपने धर्म पर दृढ़ रहती हैं वे कितने
ही कष्ट मिले दुख को ही सुख समझकर जीवन व्यतीत करती
है। इस प्रकार माता पिता की अज्ञानता से बाल पति अथवा
वृद्ध पति जिन स्त्रियों को मिलता है उनका जीवन दुःखमय व्यतीत
होता है।

इस विषय मे भी मेरे पास सैकड़ो उदाहरण सच्चे मौजूद हैं।
मेरे पास बूढे पतियों की सैकड़ो ही स्त्रियां अनेक रोगों मे ग्रसित
इलाज के लिये आई। स्त्रियो और उनके पतियो को इस बात का
पता ही नही है कि स्त्री को रोग किस कारण से उत्पन्न हुए है।
जहां इलाज के लिये पतिजी स्त्री को लेजाते हैं उन चिकित्सको
को भी इस बात का अनुभव नहीं है कि बूढ़े पतिदेव ही इन
रोगो का कारण हैं। इलाज मे हजारो रुपया बरबाद करते है कुछ
लाभ नही होता।

चिकित्सको और लेडी डाक्टरो (स्त्री-चिकित्सक) को भी
इस बात का अनुभव नही है जो ठीक ठीक रोगों का कारण
समझ सके। इस विषय मे मै अपने अनुभव की कुछ रोगी
स्त्रियो का हाल लिखती हूँ, आशा है बूढे पति इन सच्चे उदाहरणो

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४५६


को पढ़ कर इसे भलीभांति समझेंगे और उस पर विचार करेंगे
तथा दूसरों को भी उपदेश करेंगे जिससे अन्य मूर्ख कामान्ध बूढ़े
यदि आगे को अपना जीवन सुखमय बनाना चाहें तो बुढ़ापे में
कदापि विवाह न करें ।
कई वर्ष व्यतीत हुए एक सेठ जी ने अपनी स्त्री को मेरे
पास इलाज के लिये भेजा। उस स्त्री की अवस्था अठारह वर्ष की
थी, उसे हिस्टीरिया, पागलपन हृदय की धड़कन और सिरकी
पीड़ा आदि रोग थे । जब वह मेरे पास आई उसकी माता साथ
में थी । मैंने उसे देखा, वह बडी हृष्ट पुष्ट स्त्री थी । उसे कोई
बीमारी की शिकायत देखने मे नही थी मैं उसे रोगी स्त्रियो के
देखने वाले कमरे में उसकी माता से अलग लेगई। मैंने उसकी सब
प्रकार से परीक्षा की । किसी प्रकार का गुप्त रोग भी नही था ।
तब मैंने उससे उसके पति की अवस्था पूछी पति की अवस्था
पूँछते ही उदास हो, नीचे को सिर करके बोली पचपन 'इतना
कहते ही उसे हिस्टीरिया का दौरा हुआ। मैने उसकी हालत देखी
वास्तव मे उसे इस समय बडा ही कष्ट था मैं उस स्त्री को उठवा
कर दूसरे कमरे मे लेगई और पलंग पर लिटाकर हिस्टीरिया शांत
करने के उपाय करके ठीक किया । मैंने उसकी माता को अलग
करके एकान्त मे उससे पूछा कि पति की अवस्था पूछने ही तुम
उदास क्यो हो गई, सच्चा हाल बतलाओ ।
उसने कहा—देवी जी ! क्या कहूँ, बडी लज्जा और दुःखकी बात
है । मेरे मूर्ख माता पिता ने कुछ देखा नही केवल धन देखकर

[Page Header]
४६० आनन्द मन्दिर

विवाह कर दिया इसी से मेरी यह दशा है । जब उनकी सूरत
देखती हूँ, तभी मुझे इतना दुःख होता है जो कह नही सकती ।
जब वे मेरे पास आते हैं। तब मेरे दिमाग मे पागलपन सा हो
जाता है और कई दिन तक शिर घूमता है । शरीर व्याकुल
रहता है। लगभग पांच वर्ष विवाह को हुए। आज तक मैंने विवाह
का सुख नही जाना। जब बहुत व्याकुल होजाती हूँ तब बीमारी
का बहाना करके पिता के यहा चली जाती हूँ । ससुराल मे मुझे
किसी प्रकार का कष्ट नही है धन की कमी नही है सभी सुख
हैं परन्तु विवाह का कोई सुख नही है मैंने आपका नाम बहुत
दिनो से सुन रक्खा था इसलिये आपसे अपने दुःख की कहानी
सुनाने के लिये इलाज के बहाने से माता को लेकर आई हू ।
अगर कोई उपाय मेरे उद्धार का हो सके तो कीजिये नही तो मेरा
जीवन रो रो कर ही व्यतीत होगा इस दशा में मैं जीवित नहीं
रहना चाहती ।
मैंने उस स्त्री की यह कष्ट कहानी सुनकर उसकी माता को
पास बुलाकर कहा—तुम लोग कैसे अन्धे हो जो बूढ़े से विवाह
कर दिया कैसी सुन्दर लड़की है तुम्हे इसके ऊपर दया नहीं
आयी ? तब उसने कहा कि लड़की को कमी किस बात की है,
धनवान् देखकर हम लोगो ने शादी की थी ।
मैंने उसकी माता से साफ २ कह दिया कि इसका पति बूढ़ा
है, इसी कारण यह सब बीमारियां हुई हैं। तुम लोग इस बात
को नहीं समझ सकते। तुम्हीं क्या बहुत से मूर्ख माता पिता इस

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६१
बात का ख्याल नहीं करते। धन के लालच मे विवाह कर देते हैं।
वर की अवस्था का ख्याल नहीं करते, फिर पीछे पछताते हैं ।
मैंने उस स्त्री के कहने के अनुसार जैसा कि उसने अपने
पति की शिकायते बतलाई थीं निश्चय करने के लिये उसके पति
के पास अपने औषधालय का रोगी फार्म भेजा वह रोगी
स्त्री और उसकी माता मेरे औषधालय के रोगी आश्रम मे ठहरी
रहीं । एक सप्ताह में जब उसके पति का रोगी फार्म भरकर आया
उसे देखने से पता लगा कि उसके पति को विवाह होने के दो
तीन वर्ष पहिले ही से अनेक रोग थे। शीघ्रपात और स्वप्रदोष तथा
शिथिलता आदि ने अपना पूरा प्रभाव जमा लिया था । उस
बूढे की बड़ी भारी मूर्खता थी जो उसने फिर से विवाह किया ।
वह स्त्री के बिलकुल काम का नहीं था क्योकि उसने अपना भी
इलाज कराने की इच्छा से अपना पूरा हाल लिख दिया था ।
इन्हीं कारणों से उसकी पहिली स्त्री के भी कभी गर्भ नहीं रहा था।
वृद्ध विवाह के भेद
वृद्ध विवाह कई प्रकार के होते हैं:—
१—वृद्ध पुरुष वास्तव मे सन्तान की इच्छा से विवाह
करते हैं । धनवान होने के कारण लोग उन्हे समझाते हैं कि यह
धन क्या होगा इसे कौन लेगा इसलिये विवाह अवश्य करो।
वे इन चापलूसों के समझाने पर इच्छा न होते हुए भी विवाह
कर लेते हैं, परन्तु शक्ति न होने से फिर भी सन्तान नहीं

? Yes, sometimes 'ज्यादा' is colloquially written or printed as 'ज्याद' or 'ज्याद्'. Here it looks like "ज्याद्".

कोई कोई बूढे केवल ऊपरी सेवा के लिये विवाह करते हैं ।
"बूढे": बूढे (or बूढ़े? It looks like बूढे without nukta, or with nukta? It's 'बूढे').

उन्हे बहकाने वाले कहते हैं कि बुढ़ापे मे अपनी ही स्त्री
"उन्हे": no bindi.
"मे": no bindi.

सेवा कर सकती है दूसरा नही कर सकता । इसलिये वे केवल
"नही": no bindi.

सेवा के ही लिये विवाह करते हैं । परन्तु उस सेवा का फल
"परन्तु": परन्तु.

बहुत बुरा होता है । उनसे केवल स्त्री से सेवा लेने का ही काम

हो सकता है विवाह का कुछ भी सुख नही मिलता । बुढ़े पति
"बुढ़े": with nukta or without? Looks like बुढ़े.

की स्त्रिया दुष्टो की संगति मे पड़कर दुष्ट स्वभाव की हो जाती है
"स्त्रिया": no bindi.
"दुष्टो": no bindi.
"मे": no bindi.
"जाती है": no bindi on है.

क्योकि पति शक्ति-हीन होते हैं ।
"क्योकि": no bindi.
"शक्ति-हीन

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६३
गर्भपात और मूढ़ गर्भोँ की उत्पत्ति
इस पुस्तक के दूसरे भाग मे रतिक्रिया रहस्य के गूढ़ से
गूढ़ और अत्यन्त गुप्त विषय रक्खे गये हैं। रतिक्रिया अर्थात्
गर्भाधान रहस्य की गूढ़ से गूढ़ और दाम्पत्य जीवन को सुख-
मय बनाने वाले अनेक विषय प्रकाशित होंगे। उन गूढ़ तथा गुप्त
विषयों के अभी चित्र भी तय्यार न होसके इसलिये दूसरा भाग
प्रकाशित नहीं होसका यह प्रथम भाग भी अन्दाज से अधिक बड़ा
होगया है। विचार यह था कि दोनो भाग एक साथ ही तय्यार
हों परन्तु प्रथम भाग अधिक बड़ा होजाने के कारण दूसरा भाग
तय्यार न होसका। दोनो भागो का मूल्य १५) पन्द्रह रुपया होगा।
पुस्तक का यह प्रथम भाग कुछ विशेष उपयोगी और
आवश्यक विषयों का वर्णन करके समाप्त होगा। यहां पाठक
पाठिकाओं के हितार्थ अनियम रतिक्रिया से गर्भ और गर्भवती
दोनो को हानि पहुंचती है इसका वर्णन करना अत्यन्त आवश्यक
है। क्योकि पुस्तक के इस प्रथम भाग में केवल दाम्पत्य प्रेम
और उससे दाम्पत्य जीवन का सच्चा सुख और आनन्द प्राप्त होने
के उपाय ही बतलाये गये हैं और अनियम रतिक्रिया से जो
हानि पति-पत्नी और सन्तान को होती है उसका वर्णन किया गया
है; इसलिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि अनियम रतिक्रिया
से जो हानि गर्भ और गर्भवती को पहुंचती है और मूढ़ गर्भोँ
की उत्पत्ति होती है। उससे पति पत्नी को सावधान किया जावे।
1

१४४ \quad\quad\quad आनन्द मन्दिर

इस विषय के न जानने से सैकड़ा पीछे ७५ पचहत्तर स्त्रियां
अनियम गर्भाधान क्रिया से गर्भवती होकर गर्भस्त्राव व गर्भपात
के दुःख से तथा प्रसव समय के कष्ट और मूढ गर्भों के कारण
रोगी और दुर्बल हो तथा प्रसूत तपेदिक आदि अनेक भयंकर
रोगों से ग्रसित हो दुःखमय जीवन व्यतीत करती हैं बहुतेरी तो
प्रसव समय मे काल का कलेवा बन जाती हैं।
इसका कारण अभी तक किसी की समझ में नही आया
है, क्योकि अभी तक इस विषय की कोई पुस्तक नही बनी। इस
विषय मे०स्त्रियो को जितनी हानि, नकली मनगढंत कामशास्त्र व
कोकशास्त्र सम्बन्धी पुस्तको से पहुंची है, वह लिखकर नहीं बत-
लाई जा सकती।
जितनी इस विषय की पुस्तके बनी हैं, वे सब आरोग्यता
के नियम के विरुद्ध हैं। लोग बिना सोचे समझे अपनी कामाग्नि
की शान्ति के लिये उन पुस्तकों मे लिखे प्रयोग तथा आसन
काम में लाते हैं, जिससे स्त्रियों को अनेक प्रकार की हानि पहुंच
रही है और यदि उस मूर्खता पूर्ण विपरीत रति से गर्भ रह जाता
है तो मूढ गर्भों की उत्पत्ति होती है। जिसके कारण जच्चा और
बच्चा दोनो जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं।
आशा है सब इस विषय को भलीभांति समझ कर पुरुषमात्र
अनियम रति से बचेगे और अपनी प्यारी पत्नी को भी बचवेंगे
तथा उत्तम हृष्ट-पुष्ट सन्तान उत्पन्न कर दाम्पत्य-जीवन को
सुखमय बनावेगे।

आनन्द-
मन्दिर

अठारहवां अध्याय
—:•:—

३०

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६७
स्त्री का रति सुख
जो पुरुष वाल्यावस्था में हस्तक्रिया करते हैं अथवा जो
मूर्ख लड़को के साथ दुष्ट कर्म करते हैं उनकी इन्द्री टेढ़ी और
निर्वल, नीचे का हिस्सा पतला और आगे का भारी होजाता है।
नीचे की नसें कमजोर होकर सिकुड़ जाती हैं जिसके कारण इन्द्री
छोटी पड़जाती है इसलिये वह स्त्री के गर्भाशय के पास तक नही
पहुँचती। ऐसे पतियो की स्त्रियां पति से रति का कुछ सुख प्राप्त
नहीं करती और पति पत्नी दोनो आयु पर्यन्त पछताते हैं।
मेरे पास ऐसे पुरुषो की स्त्रियाँ और लाखो चिट्ठियां अबतक
आचुकी हैं। ऐसे पुरुषो की स्त्रियो द्वारा उनका इलाज करके
उनकी शिकायतें दूर कर दी गई हैं और उन्हें दाम्पत्य जीवन का
सच्चा फल स्वरूप सन्तान उत्पन्न हुई और हो रही है।
यदि पुरुष के हस्तक्रिया आदि दुष्ट कर्म से कुछ भी खराबी
उत्पन्न न हुई तो अधिक विषय और विपरीत आसन से रतिक्रिया
करने से भी पुरुष की इन्द्री मे सुस्ती और कमजोरी आजाने से
गर्भ नही रहता।
यदि पुरुष की इन्द्री मे किसी प्रकार की भी खराबी न हो
केवल वीर्य मे खराबी हो तो भी गर्भ नहीं रहता। यदि पुरुष को
वीर्य की खराबी से शीघ्रपात की शिकायत है तो भी उसकी स्त्री
को रतिसुख प्राप्त नही होता और गर्भ नही रहता।
यदि पुरुष की उत्तेजना शक्ति ठीक है परन्तु स्त्री के पास

४६८ आनन्द मन्दिर
जाते ही वीर्य बहने लगता है तो इससे भी उस पुरुष की स्त्री
रति सुख से वंचित रहती है और उसके गर्भ नहीं रहता ।
यदि संभोग आरम्भ करते ही पुरुष मे सिथिलता आजाती, है
तो भी उसकी स्त्री को रतिसुख नही मिलता और गर्भ नहीं रहता ।
रति सुख का आनन्द
रति सुख का आनन्द उन्ही पति पत्नियों को ठीक मिलता
है जो आरोग्य हैं जो विपरीत रतिक्रिया आसन आदि और
अधिक आनन्द की इच्छा नही रखते। जो पुरुष जीवन रखने के
लिये आहार करते हैं वे ही आरोग्य रहते हैं और जो आहार के
लिये अर्थात् अच्छे अच्छे पदार्थ अधिक स्वादिष्ट पदार्थ खाने के
लिये ही अपना जीवन समझते हैं वे सदैव रोगी रहते हैं जिनकी
जिह्वा अपने काबू मे नही है वे रोगो का घर बने रहते हैं ।
इसी प्रकार जो रति सुख को ही जीवन का आनन्द माने
हुए हैं और अधिक आनन्द के लिये अनियम रति करते हैं। वे भी
रोगो का घर बने हुए है और जो प्राकृतिक नियम के अनुसार
सन्तान के लिये रति सुख के इच्छुक हैं वे दाम्पत्य सुख का
आनन्द प्राप्त करते हैं और उत्तम सन्तान प्राप्त करते हैं।
गर्भवती से रति करने का गर्भ पर
बुरा प्रभाव
जो मूर्ख पति गर्भ रह जाने पर भी गर्भवती से रतिक्रिया
करते हैं उनकी सन्तान दुष्ट स्वभाव रोगी और निर्बल होती है।

१
११
२
१०
७
८
६
९
५
३
४

१४७ आनन्द मन्दिर
बहुतों के गर्भस्राव व गर्भपात होते हैं और बहुतों के मूढ़ गर्भ की
उत्पति होती है ।
चित्र मे नम्बर १ के पास जिस स्थान से लकीर गई है वह
सब चित्र के इस छोर मे उस छोर तक गर्भाशय की दीवार
( हह ) है ।
न० २ के पास जिस स्थान मे लकीर गई है वह गर्भाशय
का एक वह हिस्सा है जो कि गर्भ के साथ ही साथ बढ़ता जाता
है वह बालक की सब से बाहरी भित्ती है। यह गर्भाशय और
बालक के बीच में रहती है इसका काम हैं बालक को गर्भाशय
से मिलाकर माता के हृदय के रक्त को ले जाने और लाने वाली
नलियो को मिलाना ।
न० ३ के पास जिस स्थान से एक लकीर गई है वह गर्भा-
शय मे गर्भवती के शरीर से गर्भ को पोषण करने के लिये शुद्ध
रक्त लाने वाली नली है ।
न० ४ गर्भाशय से बचे को पोषण करके अशुद्ध रक्त माता
के शरीर मे लौटा देने वाली नली जिसके द्वारा बालक से अशुद्ध
रक्त माता से आकर शुद्ध हो फिर दूसरी शुद्ध रक्त लाने वाली नली
द्वारा गर्भ को पोषण करने के लिये लौट जाता है । इस प्रकार
शुद्ध और अशुद्ध रक्त वाली दो नलियां मिलकर नाड़ कहलाता है।
न० ५-७-११ के पास जिन स्थानों से लकीर चली है
यह एक प्रकार की छोटी छोटी नलिया के छत्ते हैं जो रक्त में
तैरते रहते हैं। जो काला स्थान है जिसमे नं० ५-७-११

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४७१
तीन छत्ते दिखला रहे हैं ये सब रक्त से भरे हुए हैं जिसे
न० १० के पास वाली लकीर बतलाती है। ये छत्ते रक्त मे तैरते
रहते हैं और गर्भवती के शुद्ध रक्त को खींचकर उस नली मे
लेजाते हैं जिस के द्वारा गर्भ का पालन होता है और बालक
से अशुद्ध रक्त लाकर अशुद्ध रक्त वाली नली को देते हैं।
गर्भ और गर्भाशय के चित्र मे नं० ६—७ ये दो नलियां
हैं जिनके मिलने से नाड़ बना है इन दोनो नलियो द्वारा माता
से शुद्ध रक्त बालक मे और बालक से अशुद्ध रक्त माता मे ले
जाने और लाने का काम होता है।
न० ८ यह वह सबसे भीतरी झिल्ली है जो कि नाड की
दोनो नलियो को लपेटी हुई वच्चे के चारों ओर थैली रूप मे
रहती है अर्थात् इसी थैली मे वच्चा रहता है।
वच्चे की रक्षा और गर्भाशय को हर वक्त कोमल व तर
बनाये रखने के लिये इस थैली मे पानी भरा रहता है। सन्तान
उत्पन्न होने के समय यह थैली फट जाती है तब सब पानी निकल
जाता है।
वह नाल जो वच्चे की नाभि मे लगा रहता है जिसके द्वारा
वच्चे का पोषण होता है इस बालक और खेड़ी वाले दो रंगे
चित्र से भली भांति समझ मे आजावेगा।
इसी प्राकृतिक नियम से माता जो कुछ आहार करती है
उसका परिपाक होकर रस बनता है और रस से रक्त वनकर

४७२ आनन्द मन्दिर
गर्भ का पोषण करता है इस प्रकार माता के आहार का प्रभाव
बच्चे पर पड़ता है और गर्भवती के आचार विचार का भी
बहुत कुछ प्रभाव बालक की आत्मा पर पड़ता है ।