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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

१
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चित्र न० २

बेमेल विवाह, बाल विवाह पृ० ४५३ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३३७


अपने गुप्त रोगों का खुलासा हाल संकोच न करके कह सकें या लिखकर ही अपने रोग का खुलासा हाल समझा सके ।

विदेशी चिकित्सा प्रणाली के अनेक नगरों और कसवो तक में चिकित्सालय हैं परन्तु विदेशी चिकित्सा प्रणाली में स्त्री रोगों का इतना अधिक विस्तार से निदान नहीं है इस कारण हमारे देश की स्त्रियों का इलाज विदेशी चिकित्सा प्रणाली की चिकित्सा करने वाली लेडी डाक्टर स्त्रियां भी ठीक २ नहीं कर सकतीं।

जब से मैंने आयुर्वेद स्त्री औषधालय खोला है तब से कई लाख स्त्रियां मेरे पास इलाज के लिये आईं, इनमें बहुत सी स्त्रियां ऐसी थीं जो लेडी डॉक्टरों तथा अन्य चिकित्सकों से वर्षों इलाज कराकर हजारों रुपया खर्चकर निराश होचुकी थी। उनके गुप्त रोगों की परीक्षा ही ठीक न हो सकी। किसी की समझ में रोग नहीं आये। इसी कारण फायदा नहीं हुआ। जब वे रोगी स्त्रियां मेरे पास आईं तब मैंने उनके रोगों की परीक्षा कर थोड़े ही दिन मे कम खर्च में ही रोग दूर कर दिये।

दूसरा कारण यह है कि हमारे देश की स्त्रियों का शरीर इसी देश की आवोहवा (जल वायु) से वना है इसलिये हमारे ही देश की उत्पन्न हुई जंगली औषधियां हमारे देश की स्त्रियों के रोगों को जड़ से दूर कर सकती हैं।

मेरे पास सैकड़ो स्त्रियां योनि सम्बन्धी ऐसे रोगों वाली भी आईं जो इस प्रकार की शिकायत से परेशान थीं।

२२

३३८ आनन्द मन्दिर
तीन वर्ष के लगभग का समय व्यतीत हुआ एक रानी
साहबा मेरे पास इसी रोग वाली आईं। उन्होंने मुझसे अपनी इस-
शिकायत का हाल बतलाया। उन्होंने कहा—छै महीने से मेरी
यह दशा है कि रात दिन सम्भोग के लिये चित्त चंचल रहता है
मै संकोच और लज्जा के कारण इस बात को किसी से कह नहीं
सकती, न जाने क्या कारण है। छै महीने से बड़ी व्याकुलता
हो रही है। पति से मैने यह बात नहीं कही, कहते लज्जा मालूम
होती है, न जाने वह क्या समझ जावे। किसी डाक्टर वैद्य से
भी कह नही सकती। खुजली होती है और खुजली के साथ ही
सम्भोग की इच्छा होती है। पति जी से योनि की पीड़ा का
बहाना करके आपके पास इलाज कराने आई हू।
मै रानी साहबा से इतना हाल सुनते ही समझ गई और
कमरे के भीतर लेजाकर मैने उनकी जनेन्द्री की परीक्षा की तो
उनके छोटे भगोष्ठों मे छाले पड़े हुये थे और सूजन भी आगई
थी। मैने उसी दिन औषधि का काढ़ा कराकर योनि मार्ग को
धुलवाया और रानी साहबा से पूछा कि आप योनि कभी धोती नहीं
हैं ऐसा मालूम होता है ? उन्होंने कहा मै बाहर से तो प्रतिदिन
धोया करती हूं, भीतर नहीं धोती, क्या भीतर भी धोना चाहिये ?
मैंने उन्हे समझाया और न धोने की हानि बतलाई, मैंने
एक सप्ताह उन्हे अपने यहां रोगी आश्रम मे ठहरा कर इलाज
किया वे बिलकुल ठीक होगईं।
एक और स्त्री ने मुझे लिखा कि मेरे पति घर पर नहीं हैं

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३३६


तीन महीने से बाहर गये हुए हैं, मेरे गुप्त स्थान में खुजली होकर
संभोग की अत्यन्त इच्छा होती है, मैने खाना भी छोड़ दिया
है। एक वक्त केवल रूखी रोटी नमक से खाकर रहती हूँ
मुझे कोई ऐसी औषधि भेजिये जिससे मेरी इच्छा न हो। मैं
लगभग छै महीने से ब्रह्मचर्य से हू। मेरे पति प्रायः बाहर रहा
करते हैं, बीच बीच में दस बीस दिन को आते हैं। अभी हाल
में आये थे एक सप्ताह रहकर चले गये।
कृपा करके मुझे ऐसी औषधि भेजिये जिससे यह शिकायत
दूर हो। मैं बडी परेशान हूं आपको भी बड़े संकोच से लिखा है
क्षमा करें।
मैने उस स्त्री को औषधियां भेज दीं, केवल योनि धोने की
औषधियों से ही उसकी शिकायत एक सप्ताह में दूर हो गई।
इस रोग वाली स्त्री के पति को भी अनेक रोग उत्पन्न हो
जाते हैं, उसकी इन्द्री में भी यह रोग हो जाता है। अज्ञानतावश
इस रोग के उत्पन्न होने का कारण न जानने से इस रोग वाली
स्त्रियां अप्राकृतिक रूप से अपनी इच्छा पूरी करती हैं परन्तु
इच्छा पूरी नहीं होती क्योंकि यह रोग के कारण इच्छा उत्पन्न
होती है, जब तक रोग दूर न हो इच्छा बनी ही रहती है।
इस रोग वाली स्त्रियों के चरित्र भ्रष्ट हो जाने की भी शंका
रहती है। मेरे पास इस विषय की भी स्त्रियों की अनेक चिट्ठियां
आया करती हैं वे लिखती हैं कि जल्द इसका उपाय बताइये
हम पति से अपनी इस इच्छा का हाल खुलासा नहीं कह सकतीं।

३४० आनन्द मन्दिर
इस प्रकार इस रोग के कारण स्त्रियां परेशान हो जाती हैं और
पति भी परेशान हो जाता है तथा रोगी होजाता है ।
इस रोग को आज तक किसी ने नहीं समझा है क्योकि
स्त्रियां इस रोग का हाल सकोचवश किसी से नही कहती, पति
से भी छिपाती हैं। इसलिये इस भयंकर रोग से सब स्त्रियो
को सावधान रहना चाहिये प्रतिदिन योनि को पानी से साफ
करते रहना चहिये और आठवे दिन:—
हर्ड एक तोला बहेड़ा दो तोला
आंवला चार तोला
इन सबको कूटकर मोटा मोटा चूरन करले । आध सेर पानी
मे धीमी धीमी आंच से पकावे जब एक पाव पानी रह जावे
तब उतार ले और मोटे कपड़े से छान लेवे और गरम गरम
पानी से ही योनि को भीतर तक धो डाले, छोटे भगोष्ठों को इसी
काढ़े के पानी से खूब धोवे ।
दूसरा उपाय
फिटकरी एक तोला, कपूर देशी आधा तोला
दोनो को एक साथ पीस कर बारीक तजेब के कपड़े मे पोटली
बनाकर योनि मे रक्खे। चौबीस घंटे बराबर रहने दे फिर निकाल
कर फेक दे। इस प्रकार करने से यह रोग तीन दिन मे दूर होजाता
है और हर आठवे दसवे या पन्द्रहवे दिन इस उपाय को करती

[Heading] विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३४१

रहे तो यह रोग कभी नही होता । योनि को प्रतिदिन अवश्य
धोते रहना चाहिये ।
किसी स्त्री की ऋतुस्नान के १५ पन्द्रह दिन वाद अत्यन्त
प्रवल इच्छा संभोग की हो और योनि मे खुजली भी हो तो
समझ लेना चाहिये कि यही रोग है क्योकि ऋतुस्नान के दिन
से पन्द्रह दिन तक तो हर एक स्त्री की इच्छा गर्भधारण के लिये
सभोग की होती है इसके बाद नही होती । जिनके पतियो ने
अधिक प्रसंग से पत्नी की आदत विगाड़ दी है उनकी वात ही
और है । पतियों की मुर्खता से उस स्त्री की इच्छा विना प्रयो-
जन के भी हुआ ही करती होगी ।
न० ३ भगनाशा का आगे का हिस्सा जिसे योनि लिंग भी
कहते हैं, इसकी बनावट पुरुष की इन्द्री की रीति पर है । यह
स्त्री की जननेन्द्री के ऊपर के हिस्से मे जैसा चित्र मे वतलाया गया
है जिस स्थान पर रोग उत्पन्न होते हैं उसके नीचे और दोनो
बड़े भगोष्ठो के शुरू होने के बीच मे त्रिकोणाकार ऊँचा भाग
नासाकृति से मिलता हुआ होता है ।
इस योनि में लिंग के स्पर्श से ही स्त्री मे उत्तेजना उत्पन्न होती
है इसको भूलकर भी स्पर्श नही करना चाहिये । जिसप्रकार पुरुष
हस्तक्रिया आदि से नपुंसक होजाते हैं इसीप्रकार इसका अधिक
स्पर्श स्त्री को नपुंसक बना देने वाला है । जो स्त्रियां मूर्खतावश
इसका स्पर्श कर उत्तेजना उत्पन्न करती हैं वे उत्तेजना शक्ति से कुछ
दिनों में हीन होजाती हैं और फिर गर्भधारण के योग्य नही रहती ।

३४२ आनन्द मन्दिर
जो मूर्खपति इसका स्पर्शकर पत्नी को उत्तेजित करते है वे
महामूर्ख हैं। कुछ दिनो मे स्त्री नपुसक होजाती है। उसकी उत्तेजना
शक्ति नष्ट होजाती है फिर वह पति उस स्त्री की इच्छा को भी
पूरी नही कर सकता और वह स्त्री गर्भवती भी नहीं हो सकती।
इस विषय मे प्रकृति का नियम यह है कि.—
संभोग के समय पुरुष की इन्द्री का स्पर्श स्त्री के इस योनि
लिग से अकस्मात प्रकृति के नियम के अनुसार आप ही होता
है तब स्त्री को उत्तेजना होती है।
जिनके पति अधिक प्रसग करके पत्नी का स्वभाव बिगाड़
देते हैं और फिर शक्तिहीन होजाने पर स्त्री को इच्छा पूरी नहीं
कर सकते ऐसे दुष्ट पतियो की पलिया स्वय अपने इस अग का
स्पर्शकर उत्तेजना उत्पन्न करती हैं और कुछ दिनो मे शक्तिहीन
होजाती हैं।
ऐसी भी अनेक स्त्रिया मेरे पास आईं कि जिन्होने मुझसे
यह् शिकायत की कि “हमारी कभी इच्छा ही नहीं होती, पति
जी अनेक उपाय करते है घटो उपाय करने पर भी हमारी इच्छा
नहीं होती।” तब मै उनसे पूछती हू कि कभी तुम्हारे पति ने
यह् अज्ञानता तो नही की कि तुम्हारे इस स्थान को स्पर्श किया
हो अथवा तुमने ही इस का स्पर्श कर अपने मे उत्तेजना की हो। तब
मालूम होता है कि यह मूर्खता उनके पति ने वर्षों तक की इसी
प्रकार इस अंग का स्पर्श करके स्त्री को उत्तेजित किया और अब
स्त्री किसी काम की नही रही।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३४३
स्त्री की नपुंसकता
उत्तेजना शक्ति का नष्ट होजाना
इस अंग के स्पर्श से कुछ दिनो मे स्त्री की उत्तेजना शक्ति
नष्ट होजाती है इसलिये गर्भ नही रहता क्योकि यह बात पहिले
ही बतला दी गई हैं कि संभोग के समय पति पत्नी दोनो को
पूर्ण उत्तेजना होनी चाहिये तभी संभोग ठीक और नियमानुसार
होता है यदि दोनो को बराबर उत्तेजना न हुई तो संभोग व्यर्थ
है। जिसके उत्तेजना न होगी वही निराश रह जावेगा और गर्भ-
धारण भी न होगा।
प्रकृति ने जो नियम बना दिये हैं उनके विरुद्ध इन्द्रियो से
काम लेने से अनेक प्रकार की हानि होती है अतएव भूलकर भी
नियम के विरुद्ध काम नही करना चाहिये।
अभी एक मास व्यतीत हुआ एक कालेज के लड़के की
चिट्ठी उसकी स्त्री मेरे पास लेकर आई उसमे लिखा था कि एक
अंग्रेजी पुस्तक कामशास्त्र विषय की थी मैंने उसमे पढ़ा था कि
स्त्री की गुप्त इन्द्री के ऊपर एक स्थान है उसे स्पर्श करने से स्त्री
शीघ्र ही उत्तेजित होजाती है। मैंने परीक्षार्थ ऐसा किया इससे स्त्री
में उत्तेजना हुई और जैसा लिखा था वैसा ही हुआ, इसलिये मैं
बराबर छै सात मास तक ऐसा ही करता रहा।
अब दो महीने से इसमे कुछ खराबी होगई, स्त्री में उत्तेजना
नाम मात्र को भी नहीं होती। मै अनेक उपाय करता हूँ

३४४ आनन्द मन्दिर
परन्तु सब व्यर्थ होता हैं कृपा करके कोई उपाय बतलाइये। क्या
मेरी मूर्खता से तो कोई खराबी नही आगई है ?
एक और स्त्री मेरे पास अभी थोड़े दिन हुए इलाज के
लिये आई उसे पेशाव बड़े कष्ट के साथ होता था। उसके गुप्त
स्थान की मैने परीक्षा की तो देखा कि वह स्थान बहुत सूज गया
था और उसमे कठोरता आगई थी। अधिक स्पर्श के कारण वहां
का मांस कड़ा होगया था। इस स्थान की यहां तक रक्षा करनी
चाहिये कि भूलकर भी स्पर्श न करे मैं जब स्त्रियो के गुप्त स्थान
की परीक्षा करती हूँ तब इस बात का बड़ा ध्यान रखती हूँ कि
हाथ का अथवा पंजों का स्पर्श इस स्थान से न होने पावे।
जब मैंने उस स्त्री की परीक्षा की और उस स्थान की यह
दशा देखी तो मैने उस स्त्री से कहा कि तुम ठीक ठीक
बतलाओ यह रोग तुम्हे कब से है ? कभी तुमने किसी कारण से
इसे उगली से स्पर्श तो नही किया ? उस स्त्री की अवस्था अट्ठारह
उन्नीस वर्ष की थी, मुझे यह सन्देह हुआ कि इसने अपने हाथो
से अपनी उत्तेजना करके अप्राकृतिक क्रिया की होगी। वह बड़ी
लज्जित हुई और कहा—नही मैंने कभी ऐसा नही किया मेरे पति
एक पुस्तक लाये थे उस पुस्तक में इसके विषय मे लिखा था।
तब से प्रतिदिन इस स्थान का उंगलियों से स्पर्श करने से मुझे
उत्तेजना होने लगी। कई महीने तक ऐसा किया अब कुछ दिनो
से मेरी यह दशा होगई है कि पेशाब मे बड़ा कष्ट होता है और
मेरी कभी इच्छा नही होती, मन और शरीर मुर्दा सा हो गया है।

बेमेल विवाह, चाचा का विवाह । पृ० ४२७ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३४५
मैंने उसका इलाज किया। पन्द्रह दिन में वह अच्छी होकर
घर चली गई परन्तु उसकी चिट्ठी आई इससे मालूम हुआ कि
उसकी इच्छा शक्ति नष्ट होगई है। मैंने उसको समझा दिया था
कि एक वर्ष तक तुम ब्रह्मचर्य में रहो तब आराम होगा यदि
फिर तुम्हारे पति ने ऐसी मूर्खता की तो तुम सदैव के लिये
सम्भोग शक्ति नष्ट होने से वंध्या हो जाओगी, अपने पति को नम-
झती रहो। परन्तु इस मूर्ख पति ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।

एक और स्त्री इसी प्रकार की मेरे पास बहुत दुःखी होकर
आई। उसकी अवस्था लगभग ३५ पैंतीस वर्ष की थी उसके
कोई सन्तान नहीं थी, कभी गर्भ नहीं रहा। वह मेरे पास सन्तान
का इलाज कराने के लिये आई थी, उसे कोई रोग प्रत्यक्ष में नहीं
था। मैंने उसके गर्भाशय आदि की परीक्षा की, गर्भाशय में किसी
प्रकार का रोग नहीं पाया। तब मैंने उसे अपने रोगी आश्रम में
मासिक धर्म की परीक्षा करने के लिये ठहराया। वही समय उसका
मासिक धर्म होने का निकट था वह तीन चार दिन बाद मासि-
कधर्म से हुई। मैंने तीन दिन तक

३४६ आनन्द मन्दिर
इसके सब प्रश्नो का उत्तर लिख भेजे तब मैं तुम्हारे पति का
हाल मालूम करके बतलाऊगी कि किस के दोष से सन्तान
नही होती ।
इसके तीन चार दिन बाद एक दिन वह मेरे पास मुझसे
केवल मिलने के लिये आई, उस दिन उसने मुझसे कहा "देवी
जी ! न मालूम क्या बात है मेरी इच्छा कभी सम्भोग की नही
होती, अपने आप तो कभी इच्छा होती ही नही। जब मेरा विवाह
हुआ था तब इच्छा होती थी उसके बाद कभी भी स्वप्न मे भी
इच्छा नही होती । पति जी जब मेरे पास आते हैं तब घंटों वे
अनेक उपाय करते हैं तब इच्छा होती है, सो भी भलीभांति
नही होती । प्रसंग मे कुछ प्रसन्नता नही होती ।
उस स्त्री के कहने से मैं समझ गई । इसके पहिले मुझे उससे
यह बात पूछने का संकोच वश कुछ ध्यान ही नहीं रहा था
क्योंकि ऐसी बाते स्त्रियो से बिना जरूरत के पूछने में मुझे भी
कभी कभी संकोच मालूम होता है । मै जिस रोग की परीक्षा
करती हू उसके विषय मे भली भाति देखकर ही मालूम करलेती
हूँ और स्त्रियो के इस श्रग की खास कर बिना कारण के परीक्षा
नही करती, क्योकि इस

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३४७
मैंने उस स्त्री के उस स्थान को देखा तो मालूम हुआ वह
स्थान स्पर्श करते करते इतना कठोर होगया था कि उस स्त्री को
इसके स्पर्श से कुछ मालूम ही नही होता था, उतनी जगह शून्य हो
गई थी ।
यह देखकर मैंने उससे पूछा—कभी तुम्हारे पति ने तुम्हारे
इस स्थान को हाथ से तो नहीं रगड़ा ? उसने कहा कि कभी की
क्या बात पूछती हो लगभग बीस वर्ष होगये जब से मेरा विवाह
हुआ तभी से मेरे पति जी इसी प्रकार मेरी इच्छा करके तब
सम्भोग करते हैं । जब तक वे हाथ से मेरी इच्छा न करे तब तक
मेरी इच्छा स्वप्न मे भी नहीं होती और मुझे कई वर्ष होगईं जो
प्रसन्नता पहिले विवाह के बाद कुछ दिन आरम्भ में होती थी वह
अब नहीं होती ।
मैंने उसका यह हाल सुनकर जवाब दे दिया कि तुम नपुंसक
होगईं । तुम्हारे अब सन्तान नहीं हो सकती । वह स्त्री रोने लगी
और पैरों पड़गई । मैने कहा इसका कोई इलाज नहीं हो सकता
तब वह रोकर अपने घर को चली गई । गर्भाशय की परीक्षा
करने से मालूम हुआ कि उस स्त्री का गर्भाशय भी सूखगया था वह
शक्तिहीन होगया था इसी कारण जवाब देदिया । गर्भाशय के
सूखजाने और इच्छा शक्ति नष्ट होजाने से स्त्री बन्ध्या होजाती है।
जो पुरुष अथवा स्त्रियां स्वयं इस अंग का हाथो से स्पर्शकर
अर्थात् घर्षण क्रिया करके स्त्री को उत्तेजित करके उसकी इच्छा
पूरी करते हैं अथवा स्त्रियां अपने हाथ से ऐसा करती हैं वे नपु-
सक होजाती हैं । उनकी उत्तेजना शक्ति नष्ट होजाती है इसलिये

३४८ आनन्द मन्दिर
गर्भ नहीं रहता और उनको प्रसन्नता भी संभोग मे कभी नहीं
होती। इसका कोई इलाज नही हो सकता क्योकि प्राकृतिक
प्रसन्नता भी नष्ट हो जाती है और बिना स्पर्श के स्त्री की इच्छा
होती नही, सो भी जब बहुत देरी तक पुरुष हाथ से स्पर्श करता
रहे तब स्त्री की कुछ इच्छा होगी। तब तक पुरुष की इच्छा जाती
रहेगी क्योंकि जिन मूर्ख पतियो ने हाथ से इस स्थान का स्पर्श
करके स्त्री को उत्तेजित करके संभोग करने की आदत डाली है
उनने ऐसा इसी कारण किया है कि उनसे संभोग करके स्त्री को
उत्तेजित करने की सामर्थ नही होती।
जो मूर्ख पति ऐसा करते हैं उनकी स्त्रियो का जीवन तो
नष्ट होता ही है किन्तु पुरुष भी कुछ दिनो मे रोया करते हैं और
पछताते हैं। सम्भव है यह बात अभी तक किसी को कदाचित
मालूम न हो क्योकि जिन्हो ने अपनी पुस्तको मे इस अंग के
विषय मे लिखा है उन्होने केवल इतना ही लिखा है कि इस स्थान
के स्पर्श से स्त्री को बड़ा आनन्द आता है। यह बात उन्हे भी
नही मालूम है कि इस स्थान को स्पर्श करने से कितनी बड़ी
खराबिया उत्पन्न हो जाती है। उन्हे याद रखना चाहिये कि यह
स्थान हाथ से स्पर्श करने योग्य नही है।
इस दुष्ट स्वभाव से पुरुषो को बचते रहना चाहिये और
स्त्रियो को भी सावधान रहना चाहिये। जो इस पर ध्यान नही देगे
उन्हे जीवन भर रोना और पछताना पड़ेगा। उनका जीवन नीरस
हो जायगा जैसे कि ऊपर के उदाहरणों मे बतलाया गया है।

आनन्द
मन्दिर
चौदहवां अध्याय
—:०:—

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र - ३५१
रतिक्रिया का प्राकृतिक नियम और
उत्तम सन्तान
इच्छेतां यादृशं पुत्रं तद्रूपचरितांश्च तौ ।
चिंतयेतां जनपदांस्तदा चार परिच्छदौ ॥
इसका अर्थ यह है कि स्त्री पुरुष को जैसे पुत्र की इच्छा हो
वैसे ही रूप ( वर्ण संस्थान प्रमाण आकृति ) और चरित्र (श्रद्धा
श्रुत, ऋजुता, आनृशंस्य, दान, दया, दाक्षिण्यादि स्वभाव वाले )
तथा आचार ( कुल और देश के अनुरूप कर्त्तव्य कर्म ) और
परिच्छद् ( मनुष्य गौ, घोड़ा, धन, धान्य, वस्त्र, अलंकार, रत्न,
रथ, वाले ) मनुष्यो का ध्यान करे ।
कर्मांते च पुमान्सर्पिः क्षीरशाल्योदनाशितः ।
प्राग्दक्षिणेन पादेन शय्यां मौहूर्तिकाज्ञया ॥
आरोहेत् स्त्री तु वामेन तस्य दक्षिण पार्श्वतः ।
तैल माषोत्तराहारा तत्रमंत्रं प्रयोजयेत् ॥
अर्थात् पुरुष घी और दूध मिलाकर शाली चावलो ( भात )
का भोजन करके शुभ मुहुर्त का विचार कर उत्तम सन्तान की
हृदय मे इच्छा करके सभोग के लिये स्त्री के पास जावे ।
पीछे लिखा जा चुका है कि शास्त्रकारो का मत है, पति