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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १४६

आयुर्वेद और कामशास्त्र
आयुर्वेद मतानुसार स्त्री पुरुष के एकसाथ स्खलित होने से
नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है और कामशास्त्र का मत है जैसा
कि आज कल इस विषय की अनेक प्रकाशित पुस्तको से ज्ञात
होता है सब में प्रायः अनेक उपाय करके स्त्री पुरुष को एक साथ
ही स्खलित होने के साधन बतलाये गये हैं । अनेक ग्रन्थों का
मत है कि:—
स्त्रियों के शरीर मे काम के चढाव उतार का हर महीने एक
चक्कर लगता है । जिस तिथि को जिस स्थान पर कामदेव हो उस
स्थान का आलिंगन चुम्बन करने और नाखूनो के गड़ाने से
स्त्रियां स्खलित हो जाती है । इस प्रकार स्त्री पुरुष के साथ ही
स्खलित होने से विशेष आनन्द प्राप्त होता है इत्यादि ।
पाठको ! विचारिये वैद्यकशास्त्र तो बतलाता है कि स्त्री
पुरुष के साथ ही स्खलित होने से गर्भ रहे तो नपुंसक सन्तान
होती है और इधर विषयी लोग सन्तान की परवाह न करके
विशेष आनन्द की इच्छा से अनेक उपायों से स्त्री पुरुष के
साथ ही स्खलित होने के इच्छुक हो रहे हैं ।
स्त्रीपुंसयोर्विसृष्टिश्चेदेकदैवभवेद्यदा ।
षंडस्तदा प्रजायते इतिमेनिश्चितामतिः ॥
अर्थात्-यदि स्त्री पुरुष दोनो एक ही साथ स्खलित होवे

१५० आनन्द मन्दिर
तो नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है यह मेरी निश्चित मति (राय)
है। ऐसा शास्त्रकारों का कहना है।
स्त्री सम्भोग का अर्थ
स्त्री सम्भोग का अर्थ यही है कि स्त्री पुरुष दोनों का भोग
सम अर्थात् बराबर हो। यही दाम्पत्य प्रेम का आनन्द है, न कि
स्त्री रोगों से ग्रसित, दुःखों से पीडित हो और पति अपनी कामाग्नि
शान्ति के लिये उसपर अत्याचार करता रहे, उसके रोगों की कुछ
भी परवाह न करे। इसका परिणाम यह होता है कि पत्नी
कुछ दिनों में तपेदिक आदि भयकर रोगों में ग्रसित हो काल
का कलेवा बनजाती है अथवा पतिदेव ही ऐसे भयंकर रोगों
का शिकार बनजाते हैं और पत्नी का जीवन नष्ट कर डालते हैं।
ऐसे पुरुषों को सम्भोग का अर्थ समझ कर उसका पालन
करना चाहिये। जो सज्जन पति शब्द का अर्थ समझते हैं वे पत्नी
के साथ कभी इसके विरुद्ध आचरण नही करते । ऐसे ही पति
पत्नी दाम्पत्य प्रेम का आनन्द भोग करते हैं। उन्हीं की सन्तान
आरोग्य और सुन्दर होती है। वे भी पति पत्नी आरोग्यता और
दीर्घजीवन प्राप्त करते हैं परन्तु ऐसे पुरुष इस समय बहुत
कम मिलेगे।
स्त्री संभोग का नियम
प्रायः मेरे पास इस विषय के अनेक पत्र मित्रों के आया
करते हैं कि सम्भोग के नियम क्या हैं ? यदि कोई पुस्तक इस प्रकार के

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १५१


नियमों की हो तो भेज दीजिए अथवा पत्र द्वारा सूचित कीजिए
ताकि हम अपने पति को वे नियम दिखला सकें।
इस प्रकार के पत्रों का यथार्थ उत्तर देने से उनके पतियों के
पत्र आते हैं कि ये तो बड़े कठिन नियम हैं, इतने दिन तक
ब्रह्मचर्य से आज कल के समय में कौन रह सकता है, तब उनके
पत्र का विवशतः उत्तर दिया जाता है कि जब तक रहा जावे रहो
और एक दिन भी न रहा जावे तो अपनी इच्छानुसार करो। ऐसे
अज्ञानी विषयी पुरुषों के लिये कोई नियम नहीं हैं।
यहां यह बात याद रखने की है कि प्रति दिन प्रसंग
करने वाला अथवा सप्ताह में प्रसंग करने वाला कुछ दिन बाद
इस दशा को पहुंच जावेगा कि महीने में भी एक दिन न कर
सकेगा और प्रति दिन करने वाला वर्ष भर मे भी एक दिन न
कर सकेगा क्योंकि अधिक प्रसंग से अन्य अनेक रोग उत्पन्न
होने के अतिरिक्त पुरुष नपुंसक भी हो जाता है तब वह महीने
तथा वर्ष भर में भी एक बार नहीं कर सकता। यही कारण है
कि आजकल तमाम अखबारों में तिला आदि के विज्ञापनों की
भरमार रहती है। मेरे पास भी नपुंसक पुरुषों की स्त्रियों के पत्रों
की संख्या कम नहीं रहती।

ऋतु विचार पूर्वक सम्भोग

यदि पुरुष ऋतुधर्म्म होने के बाद अपनी ही स्त्री से सम्भोग
करे तो भी पन्द्रह दिन तक संभोग का समय रहता है। ऋतुस्नान

१५२ आनन्द मन्दिर
के चौथे दिन सभोग करने से यदि उस दिन गर्भ रहने-के लक्षण
न मालूम हो तो फिर पाचवे छठे या सातवे दिन संभोग करने
मे कोई हानि नही, यदि फिर भी गर्भ न रहे तो आठवे नवे या
दसवे दिन संभोग करे, इस प्रकार जब गर्भ रह जाने के लक्षण
मालूम हो तब प्रसंग वन्द कर देवे। इस नियम से चलते रहने से
हर महीने कई बार सभोग का समय है। इसी नियम के अनुसार
ऋषियो ने आज्ञा दी है। ऋतुधर्म्म का समय व्यतीत हो जाने पर
रतिक्रिया करना व्यर्थ है और नियम के विरुद्ध है ।
इस प्रकार रतिक्रिया करने से भी आरोग्यता को हानि न
पहुँचे इसलिये हर ऋतु मे सभोग का नियम बतलाया गया है ।
आयुर्वेद मे सभोग केवल सन्तान उत्पत्ति के ही लिये
बतलाया है परन्तु किसी किसी ऋषि का यह भी मत है कि यदि
पुरुष से इतने समय तक ब्रह्मचर्य से न रहा जाय तो ऋतु के
अनुसार सम्भोग करे परन्तु वह भी सभोग नियमित उचित
रीति से होने से मनुष्य के रोगी होने का भय नही रहता।
आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत बतलाता है:—
त्रिभिस्त्रिभिरहोरात्रैः समयात्प्रमदां नरः ।
सर्वेष्वृतुषु घर्मे तु पक्षात्पक्षाद्व्रजेद्बुधः ॥
यदि पुरुष से अधिक दिन तक ब्रह्मचर्य से न रहा जावे तो
तीन तीन दिन के अन्तर से मैथुन करना और गरमी की ऋतु
मे पन्द्रह पन्द्रह दिन के अन्तर से ही सभोग करना चाहिये ।

१३—नेरम को होंठ में ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १५३
वर्जित समय
नोपेयात्पुरुषो नारीं सन्ध्यायोर्न च पर्वसु ।
गोसर्गेचार्धरात्रे च तथा मध्यं दिनेपि च ॥
दोनो समय की सन्ध्या अर्थात् सायंकाल और प्रात काल
तथा पर्व अमावस, पूर्णमासी, संक्रान्ति, चौदस, एकादशी इत्यादि
इसी प्रकार के जितने पर्व हैं उनमे सम्भोग न करे और जिस
समय गौ चरने को छोड़ी जाती हैं उस गोधूलि के समय, अर्ध-
रात्रि के समय तथा मध्यान्ह के समय पुरुष को स्त्री सम्भोग नही
करना चाहिये ।
दाम्पत्य विहार का योग्य स्थान
विहारं भार्यया कुर्याद्देशेतिशयसावृते ।
रम्ये श्राव्याङ्गनागाने सुगन्धे सुखमारुते ॥
पुरुष को अपनी ही स्त्री के साथ विहार करना चाहिये । जो
स्थान अन्य मनुष्यो के दृष्टिगोचर न हो अर्थात् एकान्त हो तथा
रमणीक स्थान हो । जिस कमरे मे स्त्रीगान कर रही हो और
सुगन्धित तथा सुखदायक पवन आती हो ऐसी जगह अपनी
भार्या के साथ विहार करे । ऐसे

१५४ आनन्द मन्दिर
दिस्तीर्णे सजले सुधाधवलिते चित्रादिनालङ्कृते।
रम्यप्रोन्नतचत्वरेऽगुरुमहाधूपादि पुष्पान्विते ॥
अर्थात्—लम्बा चौड़ा स्थान (मकान) हो तात्पर्य यह है कि
जहा वायु भलीभांति आता जाता रहे। जहां जल भी हो और
वह स्थान सफेदी से पुताया गया हो तथा भांतिभांति के चित्रों
से सजाया गया हो, चित्त को प्रसन्न करने वाले शोभायमान
पदार्थों से सुशोभित हो रहा हो, ऊंची छत और ऊंचा आंगन
हो, अगर आदि धुनी से धूपित किया गया हो, जिसमें चित्त को
प्रसन्न करने वाली मन्द मन्द सुगन्धि आ रही हो और भांति
भांति के सुगन्धित फूलों की मालाएं रक्खी हों।
सङ्गीताङ्गविराजते स्वभवनेदीपप्रभाभासुरे ।
निशङ्कं सुरतं यथाभिलाषितं कुर्यात्समंकान्तया ॥
संगीत के अनेक वाजे रक्खे हों और दीपक से प्रकाशमान
हो, ऐसे सुरमणीक स्थान में निःशंक होकर अपने घर मे अपनी
प्यारी भार्या से नियम पूर्वक दाम्पत्य प्रेम का आनन्द भोग करे।
तात्पर्य
इस प्रकार से संयोग करना इस कारण बतलाया है कि जो
अधिक दिनों तक ब्रह्मचर्य से न रहसके वे इस नियम के अनुसार
संभोग करें तो एकदम निर्बलता न होगी और कुछ हानि न
होगी। इस कारण बतलाया है—

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १५५
निदाघशरदोर्बालाहिता विषयिणो मता ।
तरुणी शीत समये प्रौढा वर्षा वसन्तयोः ॥
इसका अर्थ यह है कि जो पुरुप ब्रह्मचर्य से अधिक दिन तक
नहीं रह सकते वे या जिनकी स्त्री की अवस्था थोडी है अर्थात्
१६ वर्ष की है, वे गरमी की ऋतु मे तीन तीन दिन पर संभोग
करे और जिनकी स्त्री तरुणी है अर्थात् ३२ बत्तीस वर्ष के भीतर
जिसकी अवस्था है वे. जाडे की ऋतु मे समोग करे और
जिनकी स्त्री की प्रौढ़ा अवस्था है वे वर्षा और वसन्त ऋतु में
संभोग करें। गरमी की ऋतु और शरद् ऋतु में बाला स्त्री
हितकारी है । तरुणी स्त्री शीतकाल मे हितकारी है और
प्रौढ़ा वर्षा तथा वसंत ऋतु मे हितकारी है ऐसा किसी किसी
ऋषि का मत है ।
बाला स्त्री से संभोग करने से बलकी हानि नहीं होती। तरुणी
स्त्री से नित्य संभोग करने से शरीर की शक्ति शीण होती है और
प्रौढ़ा स्त्री से सभोग करने से वृद्धावस्था आती है और वृद्धा स्त्री
से संभोग करने से मृत्यु आती है। इसलिये वृद्धा स्त्री से जो
अपने प्राणों की रक्षा चाहे वे सभोग न करे तथा नियम के विरुद्ध
न करे। नियम के विरुद्ध सभोग करने अथवा प्रौढ़ा वृद्धा स्त्री से
संभोग करने तथा तरुणी स्त्री से नित्य करने से शरीर की इन्द्रियां
शिथिल हो जाती हैं इस लिये वृद्धावस्था शरीर पर अपना
प्रभाव बहुत शीघ्र जमालेती है ।

१५६ आनन्द मन्दिर
आरोग्यता और संभोग
।हमारे यहां आयुर्वेद और धर्म्मशास्त्रो मे आरोग्यता तथा
दीर्घजीवन का विचार करते हुए सम्भोग का आनन्द और उत्तम
सन्तान उत्पन्न करने का विधान है उसे हम यहां सचित्र लिखती हैं।
शास्त्र बतलाते हैं :—
वाजी करणमन्विच्छेत्ससततं विषयी पुमान् ।
तुष्टिःपुष्टिरपत्यं च गुणवत्तत्र संश्रितम् ॥
अपत्य संतानकरं यत्सद्यः संप्रहर्षणम् ।
अर्थात्—पुरुषो को उचित है कि वाजीकरण औषधियो का
निरन्तर सेवन करता रहे क्योकि वाजीकरण मे तुष्टि पुष्टि तथा
गुणवान सन्तान होती है। वाजीकरण मे ओषधियाँ आरोग्य
दाता उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाली और आनन्द देने वाली
होती हैं ।
वाजीकरण क्या है
वाजीवाऽतिबलो येन यात्यप्रतिहतोँगनाः ।
भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनोपचीयते ॥
तद्वाजिकरणं तद्धिदेहस्योर्जस्करं परम् ।
इसका अर्थ यह है कि जिसके द्वारा अर्थात् जिसकी सहा-
यता से पुरुष बलवान और अत्यन्त सामर्थ्यवाला घोड़े की समान

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १५७
संभोग शक्ति प्राप्त कर उत्तम आरोग्य सन्तान उत्पन्न करने वाला
होकर स्त्रियो का प्रिय होजावे। उसी को वाजीकरण कहते हैं।
वाजीकरण प्रयोगो की सहायता से पुरुष की संभोग शक्ति कम
नहीं होती और पुरुष सुन्दर दीर्घजीवी सन्तान उत्पन्न करने की
शक्ति प्राप्त करता है। ऐसा आयुर्वेद का मत है।
धर्मशास्त्र और
आयुर्वेद से ऋतुदान का समय
ऋतुकालाभिगामीस्यात्स्वदारनिरतस्सदा ।
पर्व वर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया ॥
महर्षियो ने ऋतुदान के समय का निश्चय इस प्रकार से
किया है कि सदा पुरुष ऋतुकाल मे ही स्त्री के साथ मे समागम
करे। वह पुरुष जब ऋतुदान देना हो तो पर्व अर्थात् जो उस
ऋतुदान के १६ दिनों मे पूर्णमासी अमावस्या चतुर्थी अष्टमी एका-
दशी आवे उसको छोड़ देवे इन तिथियों मे स्त्री पुरुष रतिक्रिया कभी
न करें।
ऋतु स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः पोडश स्मृताः ।
चतुर्भिरितरैः सार्द्धमहोभिः सहिगर्हितैः ॥
स्त्रियो का स्वाभाविक ऋतुकाल १६ रात्रि का है अर्थात्
रजोदर्शन के दिन से १६ सोलहवे दिन तक ऋतु समय है। इन

१५८ आनन्द मन्दिर
में प्रथम की चार रात्रि अर्थात् जिस दिन स्त्री रजस्वला हो उस
दिन से चार दिन संभोग के लिए निन्दित हैं। प्रथम द्वितीय
तृतीय और चतुर्थ रात्रि में पुरुष स्त्री का स्पर्श और स्त्री पुरुष
का स्पर्श कभी न करे। रजस्वला के हाथ का छुआ पानी तक न
पीवे वह स्त्री कुछ काम न करे, एकान्त में बैठी रहे, भूमि में शयन
करे। जो पुरुष इन रातों में सभोग करते हैं उन्हें अनेक प्रकार
के रोग घेर लेते हैं। मासिकधर्म के रक्त में स्त्री के शरीर से
एक प्रकार का विकृत उष्ण रक्त जैसा कि फोड़े में से पीव व रक्त
निकलता है वैसा ही निकलता है इस कारण इस समय संभोग
करने से स्त्री पुरुष दोनों रोगी होजाते हैं।
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितैकादशी च या ।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दश रात्रयः ॥
जैसे प्रथम की चार रात्रि रतिक्रिया करने के लिये वर्जित
हैं वैसे ही ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निन्दित है और बाकी
रहीं दश रात्रि सो रतिक्रिया के लिये उत्तम हैं।
युग्मासु पुत्रा जायन्तेस्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदात्तर्वे स्त्रियम् ॥
जिनको पुत्र की इच्छा हो वे छठी, आठवी, दशवीं, बारहवीं,
चौदहवीं, और सोलहवीं रात्रि में सभोग करें। ये छैः रात्रि
गर्भक्रिया अर्थात् रतिक्रिया करने के लिये उत्तम हैं।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १५६
जिनको कन्या की इच्छा हो वे पाँचवीं, सातवीं, नवीं, और
पन्द्रहवीं ये चार रात्रि उत्तम समझें।
पुमान् पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियः ।
समे पुमान् पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥
पुरुष के अधिक वीर्य होने से पुत्र और स्त्री के आर्तव अधिक
होने से कन्या और वरावर होने से नपुंसक सन्तान होती है।
पुरुष व वन्ध्या स्त्री के क्षीण और अल्प वीर्य से गर्भ का न
रहना व रहकर गिरजाना आदि होता है।
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् ।
ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥
जो पहिले वर्जित आठ रात्रि ऋषियों ने बताई हैं उनमें
जो स्त्री प्रसंग नही करता वह गृहस्थाश्रम में रहता हुआ भी ब्रह्म-
चारी ही कहलाता है।
वह पुरुष कभी शक्तिहीन नही होता और आरोग्य तथा
दीर्घजीवी होता है। पति पत्नी दोनों एक सौ वर्ष की आयु पाते
हैं और उनकी सन्तान भी एक सौ वर्ष तक जीवित रहकर
जीवन का आनन्द और सुख भोग करती है। अपनी आरोग्यता
दीर्घजीवन और सन्तान की आरोग्यता तथा दीर्घजीवन माता
पिता के ही हाथ मे है। इसलिये माता पिता को विचार कर
उचित संभोग करना चाहिये।

१६० आनन्द मन्दिर
ऋतु धर्म्म का समय
मासेनोपचितंकाले धमनी धमनीभ्यांतदार्त्तवम् ।
ईषद्रक्तं विवर्णञ्च वायुर्योनि मुखं नयेत् ॥
अर्थात्—आर्त्तव काल यानी मासिक धर्म्म का समय बारह
वर्ष से लेकर साठ वर्ष पर्य्यन्त रहता है, वह महीने के महीने इकट्ठा
होकर वायु के योग से नाड़ियो द्वारा कुछ लाल और विकृत वर्ण
अथवा बिना गन्ध का योनि के मुख से बाहर निकलता है। गर्भ
रूप फल उत्पन्न करने से इस ऋतु को पुष्प कहते हैं इसी कारण
ऋतुमती स्त्री को पुष्पवती कहा है।
ऋतु धर्म्म का बन्द होना
तद्वर्षाद्द्वादशात्काले वर्त्तमानमसृक्पुनः ।
जरापक्के शरीराणां याति पंचाशतः क्षयम् ॥
अर्थात्—ऋतु धर्म्म का रक्त बारह वर्ष से प्रकट होकर
तदनन्तर जैसे जैसे शरीर मे सप्तधातु बढ़कर शरीर बढ़ता है उसी
प्रकार ऋतु का रक्त बढ़कर महीने के महीने निकलता है और
पचास वर्ष की अवस्था होने के बाद बुढ़ापे से शरीर तथा धातु
थकित होकर जिस भांति क्रमश. धीरे धीरे बढ़ा था उसी प्रकार
क्रम से क्षीण होकर साठ वर्ष की अवस्था होने तक बन्द होजाता है।
यह नियम आरोग्य स्त्री के ऋतु धर्म का है। जो अधिक प्रसग

अमावस या पूर्णिमा को शिर मे ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६१
के कारण रोगी होजाती हैं उन स्त्रियों का मासिक धर्म समय के
पहिले ही बन्द होजाता है और रोग के कारण अधिक तथा कम
भी होजाता है और अधिक दिनों तक जारी रहता है तथा जवानी
में ही बिलकुल बन्द होजाता है। इसी प्रकार जो लड़कियां कुसङ्गति
में पड़ जाती हैं ओर कामोद्दीपन करने वाले गन्दे किस्सा कहानी
उपन्यास पढ़ा तथा सुना करती हैं वे बारह वर्ष की अवस्था के
पहिले ही ऋतुमती होने लगती हैं और उनकी इच्छा रतिक्रिया
की ओर दौड़ती है। उनको कामोत्तेजन होने का कोई नियम
नहीं है जो स्त्रियां इस प्रकार कुसङ्गति में पड़ जाती हैं वे
अनियम ऋतुधर्म से होने लगती हैं और उनके ऋतुधर्म बन्द
होने का भी कोई नियम नहीं है। यदि विवाह होने पर उन्हें
योग्य पति मिल जाये और वे उन्हें योग्य बना कर अच्छे अच्छे
धार्मिक ग्रन्थों की शिक्षा देकर नियम पूर्वक रतिक्रिया करे तो वे
सुधर सकती हैं और सन्तान भी अच्छी हो सकती है। क्योंकि
कामोद्दीपन में मानसिक वृत्तियों का जबर्दस्त असर पड़ता है।
स्त्रियों को योग्य अथवा अयोग्य बनाने वाले पुरुष ही हैं,
बाल्यावस्था में माता पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिये
कि लड़कियां गन्दी पुस्तकें न पढ़ने पावे। तथा दुष्ट लड़कों
लड़कियों के साथ न रहने पावे। आज कल तो लड़कियां
लड़कों के साथ ही पढ़ा करती हैं और स्वतन्त्र होती जाती हैं इन्ही
कारणों से ऋतुधर्म्म का भी कुछ नियम नहीं रहा। जल्दी आरम्भ
होता है ओर जल्दी बन्द होता है तथा ऋतुधर्म्म में अनेक प्रकार
११