विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ आनन्द मन्दिर
के चौथे दिन सभोग करने से यदि उस दिन गर्भ रहने-के लक्षण
न मालूम हो तो फिर पाचवे छठे या सातवे दिन संभोग करने
मे कोई हानि नही, यदि फिर भी गर्भ न रहे तो आठवे नवे या
दसवे दिन संभोग करे, इस प्रकार जब गर्भ रह जाने के लक्षण
मालूम हो तब प्रसंग वन्द कर देवे। इस नियम से चलते रहने से
हर महीने कई बार सभोग का समय है। इसी नियम के अनुसार
ऋषियो ने आज्ञा दी है। ऋतुधर्म्म का समय व्यतीत हो जाने पर
रतिक्रिया करना व्यर्थ है और नियम के विरुद्ध है ।
इस प्रकार रतिक्रिया करने से भी आरोग्यता को हानि न
पहुँचे इसलिये हर ऋतु मे सभोग का नियम बतलाया गया है ।
आयुर्वेद मे सभोग केवल सन्तान उत्पत्ति के ही लिये
बतलाया है परन्तु किसी किसी ऋषि का यह भी मत है कि यदि
पुरुष से इतने समय तक ब्रह्मचर्य से न रहा जाय तो ऋतु के
अनुसार सम्भोग करे परन्तु वह भी सभोग नियमित उचित
रीति से होने से मनुष्य के रोगी होने का भय नही रहता।
आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत बतलाता है:—
त्रिभिस्त्रिभिरहोरात्रैः समयात्प्रमदां नरः ।
सर्वेष्वृतुषु घर्मे तु पक्षात्पक्षाद्व्रजेद्बुधः ॥
यदि पुरुष से अधिक दिन तक ब्रह्मचर्य से न रहा जावे तो
तीन तीन दिन के अन्तर से मैथुन करना और गरमी की ऋतु
मे पन्द्रह पन्द्रह दिन के अन्तर से ही सभोग करना चाहिये ।