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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १५६
जिनको कन्या की इच्छा हो वे पाँचवीं, सातवीं, नवीं, और
पन्द्रहवीं ये चार रात्रि उत्तम समझें।
पुमान् पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियः ।
समे पुमान् पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥
पुरुष के अधिक वीर्य होने से पुत्र और स्त्री के आर्तव अधिक
होने से कन्या और वरावर होने से नपुंसक सन्तान होती है।
पुरुष व वन्ध्या स्त्री के क्षीण और अल्प वीर्य से गर्भ का न
रहना व रहकर गिरजाना आदि होता है।
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् ।
ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥
जो पहिले वर्जित आठ रात्रि ऋषियों ने बताई हैं उनमें
जो स्त्री प्रसंग नही करता वह गृहस्थाश्रम में रहता हुआ भी ब्रह्म-
चारी ही कहलाता है।
वह पुरुष कभी शक्तिहीन नही होता और आरोग्य तथा
दीर्घजीवी होता है। पति पत्नी दोनों एक सौ वर्ष की आयु पाते
हैं और उनकी सन्तान भी एक सौ वर्ष तक जीवित रहकर
जीवन का आनन्द और सुख भोग करती है। अपनी आरोग्यता
दीर्घजीवन और सन्तान की आरोग्यता तथा दीर्घजीवन माता
पिता के ही हाथ मे है। इसलिये माता पिता को विचार कर
उचित संभोग करना चाहिये।