विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ आनन्द मन्दिर
में प्रथम की चार रात्रि अर्थात् जिस दिन स्त्री रजस्वला हो उस
दिन से चार दिन संभोग के लिए निन्दित हैं। प्रथम द्वितीय
तृतीय और चतुर्थ रात्रि में पुरुष स्त्री का स्पर्श और स्त्री पुरुष
का स्पर्श कभी न करे। रजस्वला के हाथ का छुआ पानी तक न
पीवे वह स्त्री कुछ काम न करे, एकान्त में बैठी रहे, भूमि में शयन
करे। जो पुरुष इन रातों में सभोग करते हैं उन्हें अनेक प्रकार
के रोग घेर लेते हैं। मासिकधर्म के रक्त में स्त्री के शरीर से
एक प्रकार का विकृत उष्ण रक्त जैसा कि फोड़े में से पीव व रक्त
निकलता है वैसा ही निकलता है इस कारण इस समय संभोग
करने से स्त्री पुरुष दोनों रोगी होजाते हैं।
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितैकादशी च या ।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दश रात्रयः ॥
जैसे प्रथम की चार रात्रि रतिक्रिया करने के लिये वर्जित
हैं वैसे ही ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निन्दित है और बाकी
रहीं दश रात्रि सो रतिक्रिया के लिये उत्तम हैं।
युग्मासु पुत्रा जायन्तेस्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदात्तर्वे स्त्रियम् ॥
जिनको पुत्र की इच्छा हो वे छठी, आठवी, दशवीं, बारहवीं,
चौदहवीं, और सोलहवीं रात्रि में सभोग करें। ये छैः रात्रि
गर्भक्रिया अर्थात् रतिक्रिया करने के लिये उत्तम हैं।