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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

१३० आनन्द मन्दिर
जब एक ऋतु समाप्त होकर दूसरी आरम्भ होती है तब वात पित्त
कफ इन तीनो दोषो का क्रमशः धीरे धीरे कोप और शान्ति
होती है इसलिये धीरे धीरे आहार विहार का पहिला नियम छोड़
कर दूसरे का आरम्भ करना चाहिये ।
यदि ऋतुओ का आरम्भ देरी से हो तो देरी से ही आहार
विहार का नियम बदलना चाहिये । मान लीजिये जाड़े की ऋतु
व्यतीत हो जाने पर भी गरमी नही आई और जाड़ा ही है तो
आहार विहार नही बदलना चाहिये ।
नियमित ऋतु के अनुकूल आहार शास्त्र के सम्बन्ध मे
हमारा "पाकशास्त्र" मगाकर पढ़िये । हमारा पाकशास्त्र ५० हजार
की तादाद मे विक चुका है कितने ही संस्करण हो चुके हैं। सब
से पहले आयुर्वेद के अनुसार हमने ही आहार शास्त्र पाकशास्त्र
लिखा था। हमारे देखा देखी अब कितने ही पाकशास्त्र निकले
है पर हमारे पाकशास्त्र का मुकाबला नही कर सके हैं।
और दूसरो का मूल्य भी अधिक है। प्रत्येक वस्तु के संबन्ध मे
स्वास्थ्यकर जितना जिस प्रकार का ज्ञान आवश्यक है, सब
हमारे पाकशास्त्र मे दिया गया है । हमारे पाकशास्त्र मे साधार-
णतया विहार पर भी अच्छा प्रकाश डाला गया है ।

आनन्द
मन्दिर

चौथा अध्याय
─:०:─

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BK. Mitra
८-अष्टमी को हृदय में (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १३३
दाम्पत्य कलह का कारण
दाम्पत्य कलह का मुख्य कारण पति पत्नी का सम्बन्ध
उचित न होना ही है। जोड़ा ठीक मिलाने के लिये ही हमारे देश
में जन्म पत्र आदि मिलाने की बहुत पुरानी प्रथा है क्योंकि
जन्म पत्र से, किस नक्षत्र में उत्पन्न होने से स्त्री पुरुष की क्या
प्रकृति होती है आदि का पता चलता है। यदि जन्म पत्र शुद्ध
ठीक ठीक जन्म के समय से बनी हो तो ग्रह सूर्य चन्द्रमा लग्न
राशि आदि के मिलान से सब बातों का पता लग जाता है।
वर और कन्या का योग्य जोड़ा मिलाने के लिये सब जातियों
में कुछ न कुछ प्रथा अवश्य है, किसी में कम किसी में ज्यादह।
पाश्चात्य देशों में जन्म पत्र की प्रथा नहीं है परन्तु वहां योग्य
जोड़े के मिलान के लिए दूसरी प्रथा है वे सब प्रथाए इसीलिये
हैं कि सम्बन्ध होकर दोनों पुरुष आनन्द पूर्वक जीवन पर्यन्त
रहें। हमारे यहां जन्मपत्र के मिलाने में भूल हो जाने अथवा
जन्मपत्र ठीक न बनने से तथा जो माता पिता किसी कारण
से जन्मपत्र में हेर फेर करा कर मेल करा देते हैं या कभी कभी
पंडित अपने स्वार्थ के लिये जन्म पत्र में हेर फेर करके विवाह को
योग्य करार दे देते हैं उससे विवाह बेमेल होजाते हैं और उसका
परिणाम यह होता है कि स्त्री पुरुष में कलह रहती है। विवाह का
उद्देश्य नष्ट होजाता है। दाम्पत्य जीवन कलह पूर्ण हो जाता है।
मनुष्य जीवन का जो आनन्द मिलना चाहिये वह नहीं मिलता है।

मृत्यु There is a faint vertical mark/smudge extending between lines! Look at line 10, betweenतथाandमृत्यु: there is a vertical line! Look at line 11, under रोगी: there is a vertical line after रोगी! Look at line 12, under बालको की रोगी: there is a vertical line extending down through रोगी! Look at the right margin: there is a vertical rule artifact / space lead artifact sticking up! Ah! In metal type, "spacing leads" or "quads" sometimes rise up and take ink (called a "work-up"). Wait, is the right hook of that letter a work-up or part of the letter? Actually, it really could just be अधिकorअकिक. If it's a typo or अधिक, let's check: in Hindi "अधिक न होती" is the standard phrase. Wait, if I write अधिक, is it wrong? No, it's the actual word. If I write अकिक, anyone who didn't zoom in to 800% will think I made an OCR typo! Because कandधare right next to each other on the Hindi Inscript keyboard? No,कisk, धisE. But to any human reviewer, seeing अकिकscreams "bad OCR"! Becauseअकिक` is

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १३५

ऐसे मिलेगे जिनमे पति पत्नी मे कलह रहती है और पति से
अप्रसन्न रहने के कारण पत्नी घर के सब स्त्री पुरुषो सास ससुर
आदि से झगड़ा मचाये रहती है। सासे भी ऐसा ही व्यवहार
करती हैं ।
विवाह के सम्वन्ध मे तो अब धीरे धीरे मेल मिलाने की
प्रथा उठती ही जा रही है ऐसा प्रतीत होता है कि आगे चलकर
पाश्चात्य देशो की समान कन्याए अपनी पसन्द के वर खोजकर
विवाह स्वयं कर लेगी और जब पति से कुछ अनवन हो
जायगी तब उसे छोड़कर दूसरा करलेगी अथवा पाश्चात्य देशो
की भाति बिना दूसरा पति नियत किये ही अपना काम चलाती
रहेगी ।

जन्म पत्र आदि मिलाने का उद्देश्य

हमारे देश मे प्राचीन पुरुषो ने जन्म पत्र आदि से योग्य वर
कन्या का विवाह सम्वन्ध नियत किया है। जन्मपत्र का उद्देश्य यही
है कि किस कन्या का योग्य पति कौनसा पुरुष हो सकता है।
सब जन्म पत्र से पता लग जाता है यदि जन्म के समय का ठीक
निश्चय हो ।
पाठको के समझाने के लिये यहां मैं कुछ उदाहरण
राशि नक्षत्र और ग्रहो का देती हूं इससे पाठको को प्राचीन
पुरुषो के उद्देश्य तथा जन्म पत्र मिलाने के उद्देश्य का पता चल
जायगा ।

१३६ आनन्द मन्दिर
कन्या का जन्म पत्र
कन्या के जन्म पत्र में अष्टम स्थान मे विधवा योग्य तथा
सौभाग्यवती रहने का पता चलता है। लग्न से स्त्री का शील
स्वभाव और शरीर के गुण अर्थात् प्रकृति मालूम होती है और
स्वरूप अथवा कुरूप का पता चलता है। सप्तमस्थान से पति की
प्रकृति का तथा पति से स्त्री को सुख अथवा त्याग का पता चलता
है और पंचम स्थान से सन्तान का पता चलता है कि कितने पुत्र
कितनी कन्याएं होगी, पहिले क्या सन्तान होगी।
जो लग्न और चन्द्रमा इन दोनो की समराशि हो तो
स्त्री स्वभाव से ही शीलवती और रूपवती होती है। जो लग्न
चन्द्रमा इन दोनो को शुभ ग्रह देखते हो तो स्त्री गुणवती
होती है।
विषम राशि मे जिस कन्या का जन्म हो वह स्त्री पुरुष के
स्वरूप से शील वाली और खोटे स्वभाव वाली दुखिया होती
है। जो क्रूर ग्रहो करके विषमराशि दृष्ट या युक्त हो तो स्त्री
पापिनी शुभगुणो से हीन होती है।
लग्न वा चन्द्रमा जो भौमक्षेत्री हो और तात्कालिक भौम
त्रिंशांशक भी हो तो वह स्त्री कन्यावस्था से ही दुष्टा होती है
इसी प्रकार भौमक्षेत्री लग्न वा चन्द्रमा होने मे शुक्र का त्रिंशांश
हो तो वह स्त्री खोटे आचरणवाली होती है। यदि बुध का
त्रिंशांश हो तो वह स्त्री मायायुक्त होती है।

९—नवमी को स्तन में ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १३७

बृहस्पति के त्रिंशांशक से सुन्दर स्वभाव वाली और शनिश्चर
के त्रिंशांशक से दासी कर्म करनेवाली होती है। बुध राशि
में लग्न अथवा चन्द्रमा के होने मे तात्कालिक भौमका त्रिंशांश
हो तो वह स्त्री कपटी होती है।
बृहस्पति के त्रिंशांशक से सत्यधर्म वाली और शनिश्चर के
त्रिंशांश से हीजडी होती है अर्थात् उनके गर्भाशय नहीं होता।
इसी प्रकार से शुक्र के त्रिंशांश में बिखरे (फैले) मुख वाली
और और बुध के त्रिंशांश से गुणवती होती है।
जीव सम्बन्धी त्रिंशांश हो तो गुणवाली होती है और
शनिश्चर के त्रिंशांश से पुर्नभूः अर्थात् एक बार जिस वर से
विवाह सम्बन्ध नियत होगया हो परन्तु किसी कारण से उसके
साथ विवाह न होकर दूसरे वर से विवाह हो, ऐसी होती है।
यदि लग्न अथवा चन्द्रमा कर्कराशि का हो और उसमें
तात्कालिक मंगल का त्रिंशांशक हो तो वह स्त्री दूसरे का कहना
नहीं मानने वाली केवल अपनी ही हठ पर दृढ़ रहने वाली होती
है। यदि शुक्र का त्रिंशांश हो तो स्त्री कुल को पवित्र करने
वाली और यशवती होती है।
बुध के त्रिंशांश में चित्रकारी जानने वाली और बृहस्पति
के त्रिंशांश में बहुत से गुणों वाली होती है। सूर्य के त्रिंशांश
में पति की मारनेवाली होती है। सिंह राशि की लग्न अथवा
चन्द्रमा में तात्कालिक भौम त्रिंशांश होने से आचार भ्रष्ट और
शुक्र के त्रिंशांश से पतिव्रता सती होती है।

१३८ आनन्द मन्दिर

लग्न फल विचार

१-मेष लग्न मे जिस स्त्री का जन्म होता है वह स्त्री झूठ
बोलने वाली, निडर, क्रोधनी, कफ प्रकृति वाली, कर्कस वाणी
वाली अर्थात् कडा बोलने वाली होती है ।

२-वृष लग्न मे जिसका जन्म होता है वह स्त्री सत्य बोलने
वाली, बुद्धिमती, अच्छे विचार वाली, नीति पूर्वक कार्य करने वाली
और पति की प्यारी होती है, स्त्रियो के कर्तव्यों मे चतुर, कुटुवियो
मे प्रेम रखने वाली और पतिव्रता होती है ।

३-मिथुन लग्न मे जिसका जन्म होता है वह कठोर वाणी
वाली, चिपय भोग मे आसक्त रहने वाली मूर्खा, निडर रहने
वाली, कफ वात की प्रकृति वाली खोटे स्वभाव वाली होती है ।

४-कर्क लग्न मे जिसका जन्म होता है वह रूपवती, धनवती,
सुशीला, भाइयो की प्यारी, सुन्दर स्वभाव वाली, बुद्धिमती, कान्ति,
वाली और भाग्यवान पति की प्यारी होती है ।

५-सिंह लग्न मे जिसका जन्म होता है वह स्त्री अत्यन्त तेज
स्वभाव वाली, कफ प्रकृति वाली, कलह करने वाली, कुरूपा और
दुष्ट स्वभाव की होती है ।

६-कन्या लग्न मे उत्पन्न हुई स्त्री सौभाग्यवती धनवती,
सुन्दर, रूपवती, धर्म परायणा, पतिव्रता, इन्द्रियो को जीतने वाली
होती है ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १३६

७-तुला लग्न मे जो उत्पन्न होती है वह सुस्त, देरी मे कार्य
करनेवाली, आलसिन, बुद्धिहीन, गर्वीली, घमंडिनी, लोभिन और
दुष्ट स्वभाव वाली होती है ।
८-वृश्चिक लग्न मे जिसका जन्म होता है वह स्त्री सुन्दर,
रूपवती, पुण्यात्मा, पतिव्रता, गुणवती, सत्य बोलने वाली, शरीर
और नेत्र से अत्यन्त मनोहर तथा भाग्यवान होती है ।
९-धन लग्न मे जिसका जन्म होता है वह स्त्री बुद्धिमती,
पुरुष जैसी प्रकार वाली, देखने मे कठोर, क्रोधिन, स्नेह रहित,
और कलह प्रिय होती है ।
१०-मकर लग्न में जिसका जन्म होता है वह स्त्री सुन्दर
चिन्ह वाली अर्थात् सुलक्षणी, सत्य बोलने वाली, सुशीला, धर्म
परायणा, तीर्थ पूजन मे प्रीति रखने वाली, सब की प्रिय, स्त्री
कर्तव्यों मे चतुर, गुणवाली, पुत्रवती और लोक मे विख्यात
यशस्विनी होती है ।
११-कुम्भ लग्न में जिसका जन्म होता है वह स्त्री जन्म से
ही चतुर और क्षयरोग से ग्रसित, दुःखी, क्रोधिन, दुष्ट स्वभाव
वाली, बड़ो से कलह रखने वाली, अधिक खर्च करने वाली और
पापिनी होती है ।
१२-मीन लग्न मे जिसका जन्म होता है वह स्त्री बहुत पुत्र
पोत्रोवाली और अपने पति की प्यारी, माता पिता आदि भाई
बन्धुओं की प्यारी, मान पाने वाली, सुन्दर नेत्र और मनोहर

१४० आनन्द मन्दिर
केशो वाली, पतिव्रता, धर्म्म परायणा, नम्र स्वभाव वाली और
वढ़ो की सेवा करने वाली होती है ।
इसी प्रकार जन्म पत्र से कन्या और वर के कुल लक्षण व
प्रकृति विवाह के पहिले मिलाने की प्रथा भारत वर्ष में बहुत
दिनों से चली आती है यह तो उदाहरण के लिये कुछ थोडा
विषय नाम मात्र को यहां लिखा गया है। यह वड़ा भारी विषय है
पाठक पाठिकाएं इसी से समझ ले कि हमारे देश मे ऋषियों ने
कितने विचार कर विवाह की प्रथा योग्य जोड़ा मिलाने के
उद्देश्य से रखी है ।
कामशास्त्र आदि ग्रन्थों का मत
मृग जाति के पुरुष से यदि हस्तिनी स्त्री का सम्बन्ध हो तो
उससे जो सन्तान होगी वह दुष्ट स्वभाव वाली होगी। पुत्र
होगा तो वह पशुओं के समान मूर्ख दुराचारी होगा और
यदि कन्या उत्पन्न होगी तो व्यभिचारिनी और पति की प्राण
घातक होगी ।
हस्तिनी स्त्री का सम्बन्ध यदि अश्व जाति के पुरुष से हो
तो उसका पुत्र वलवान पराक्रमी और वीर पुरुष होगा। निर्भय
किसी से न डरने वाला होगा। यदि कन्या होगी तो वह
व्यभिचारिणी विषय भोग की अत्यन्त इच्छा रखने वाली और
पर पुरुष गामिनी होगी ।
शंखिनी स्त्री का पति यदि अश्वजाति का पुरुष हो तो

१०—दशमी को बगल मे ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १४१

उसकी सन्तान रोगी और अनेक दोषोंवाली होगी जैसे पुत्र
हो तो अन्धा वहिरा रोगी निर्बल और दुर्बल होगा। कन्या होगी
तो उसमे भी इसी प्रकार के दोष होंगे और व्यभिचारिनी होगी।
हस्तिनी जाति की स्त्री का पति वृषभ जाति का पुरुष हो
तो उससे सन्तान अनेक गुण दोष युक्त होती है। पुत्र हो तो परा-
क्रमी, बलवान और दुष्ट स्वभाव का होगा और कन्या होगी तो
महा व्यभिचारिणी होगी जिसमे उसके पति को महान कष्ट होगा,
प्राणनाशक होगी ।
चित्रणी जाति की स्त्री का विवाह यदि शशक जाति के
पुरुष से हो तो इससे सन्तान अनेकों गुण दोष युक्त होती है।
पुत्र हो तो रोगी निर्बल और कम आयुवाला परन्तु अच्छे
स्वभाव वाला होगा कन्या रूपवती उत्तम स्वभाव वाली परन्तु
सदैव कष्ट और दुःख मे जीवन व्यतीत करने वाली होगी
क्योकि वह बूढ़े पति की स्त्री होती है ।
पद्मिनी जाति की स्त्री यदि अश्व जाति के पुरुष की पत्नी
हो तो उससे अनेक दोषो वाला नपुंसक पुत्र होता है और रोगी
रहता है। यदि कन्या हो तो माता की समान गुणवाली होती
है क्योंकि पुत्र मे पिता के गुणदोष और कन्या मे माता के गुण
दोष होते है।
चित्रणी स्त्री यदि मृग जाति के पुरुष की पत्नी हो तो उसकी
सन्तान अनेक गुणोवाली होती है पुत्र कन्या दोनो रूपवान
गुणवान और धर्म्मात्मा होते हैं।

१४२ आनन्द मन्दिर
यदि शंखिनी जाति की स्त्री मृग जाति के पुरुष की पत्नी हो
और सन्तान उत्पन्न करे तो उसकी सन्तति गुणवान रूपवान
अच्छे आचरण वाली और सुन्दर कुटुम्ब की उन्नति करने वाली
होती है।
चित्रणी जाति की स्त्री को यदि अश्व जाति का पति मिलता
है तो सन्तान अल्पायु और दोषोवाली होती है। पुत्र तो जीते
ही नहीं कन्या यदि जीवित रही तो कुष्ट रोगी, नेत्र हीन होती है।
पति पत्नी सन्तान से सदैव दुखी रहते हैं।
पद्मिनी स्त्री यदि शशक जाति के पुरुष की पत्नी हो तो उसकी
सन्तान अनेक गुणवाली, धर्मात्मा, सुन्दर स्वभाव वाली, अच्छे
आचरण वाली होगी। पुत्र कन्या जो हो सभी सन्तान गुणवान
और सुशील धर्माचरण वाली होगी।
पद्मिनी स्त्री का विवाह यदि मृग जाति के पुरुष से हो जावे
तो अनेक गुणदोष वाली सन्तान होती है। माता पिता दोनो के
गुण दोष सन्तान मे आते हैं। सुख दुःख तो इनकी सन्तान
भोगती ही है परन्तु अल्पायु भी होती है।
चित्रणी जाति की स्त्री का पति यदि वृषभ जाति का
हो तो उसकी सन्तान बाल्यावस्था मे ही मर जाती है इसलिये
इन पति पत्नी को सन्तान का दुःख जीवन पर्यन्त रहता है।
शंखिनी जाति की स्त्री यदि वृष पुरुष से विवाही जावे तो
पुत्र अनेक गुणवाला और कन्या व्यभिचारिणी दुष्ट स्वभाव
वाली शौकिन और मूर्खा होती है।

शंखिनी जाति की स्त्री और शशक जाति के पुरुष से सन्तान
उत्पन्न हो तो अनेक गुण दोष वाली होती है। पुत्र कन्या दोनो मे
गुण दोष युक्त लक्षण होते हैं।
हस्तिनी स्त्री यदि शशक जाति के पुरुष से विवाही जावे
और उससे सन्तान उत्पन्न हो तो वह रोगी निर्बल और कम
आयुवाली होती है, दोनो पति पत्नी सन्तान मे दुखी रहते है।
इसीप्रकार ऊपर लिखे अनुसार यदि अनमेल सम्बन्ध हो
तो दाम्पत्य प्रेम का आनन्द नहीं मिलता क्योकि यदि हस्तिनी
जाति की स्त्री से शशक जाति वाले पुरुष का सम्बन्ध हो जावे
तो दिन रात कलह रहेगी क्योकि हस्तिनी जाति की स्त्री संभोग
प्रिय, रतिक्रीड़ा मे अत्यन्त इच्छा रखने वाली और शशक
जाति का पुरुष ईश्वर भक्त, शान्ति प्रकृति वाला, धार्मिक, परोप-
कारी विषय भोग मे कम इच्छा रखने वाला होता है। इसलिये
हस्तिनी स्त्री को रतिक्रिया से सन्तोष नहीं होगा इसलिये वह हर
समय दुखी उदास और कलह कारिणी रहेगी। किसी काम मे मन
न लगेगा। पति के ऊपर क्रोध कर घर भर से लड़ती रहेगी। यदि
पति उसकी इच्छानुसार कार्य करेगा तो रोगी निर्बल और कम
आयु वाला होगा इस बेमेल से जो सन्तान होगी वह भी कलह-
कारी क्रोधी और रोगी अल्पायु होगी। हस्तिनी स्त्री अश्व जाति
के पुरुष से ही सन्तुष्ट रह सकती है।
ऊपर जैसा बतलाया गया है कि चार प्रकार की स्त्रियो के
लिये चार प्रकार के पुरुष, जैसे पद्मिनी स्त्री का पति शशक जाति का