विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
८६ आनन्द मन्दिर
कामशास्त्र के ही अन्तर्गत विवाह विज्ञान है। हमारे देश में
ऋषियों ने बड़े विचार के साथ विवाह करना वतलाया है क्योंकि
विवाह बन्धन मनुष्य की आयु पर्यन्त ही नहीं कई पीढ़ियों से
सम्बन्ध रखता है इस कारण बहुत विचार करने की आज्ञा है।
विवाह का नियम जो भारतवर्ष मे है वह ससार में कहीं नहीं है।
विवाह बन्धन अन्य देशो मे बन्धन नहीं समझा जाता, न वहा
इतनी देख रेख ओर विचार ही किया जाता है। विवाह हो जाने
पर भी जब स्री चाहे पति को छोड़ सकती है विवाह होने के
पहिले जिन गुणो के कारण पुरुष को पसन्द करके स्री ने उसे
अपना जोड़ा मिलाया था विवाह होने के बाद यदि उसमें कुछ
कमी आगई तो स्री पति को छोड़ देती या छोड़ सकती है। पति
भी इसी प्रकार छोड़ सकता है परन्तु पति के लिये कुछ कठिनाई
होती है।
जिन देशो अथवा जिन जातियो मे विवाह का कोई शास्त्र
सम्मत नियम नहीं है वहां तथा उन जातियो मे पत्नी जब चाहे पति
को छोड़ सकती है परन्तु भारतवर्ष की उच्च जातियो में विवाह का
बड़ा भारी महत्व है इसलिये यहां पति को पत्नी छोड़ नहीं सकती।
जिन जातियो मे छोड़ने का रिवाज है उन मे भी बिरादरी का दंड
आदि बड़ी कठिनाई पड़ती है। भारतवर्ष के प्राचीन पुरुषों ने
विवाह के विषय में पहिले ही इतना विचार रक्खा है कि विवाह
बन्धन टूट न सके। इसीलिये जन्मपत्र के अनुसार अनेक बाते
मिलाई जाती हैं।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८७
वर और कन्या की प्रकृति नाड़ी वर्ग और शुभाशुभ लक्षण
मिलाकर विवाह होता है परन्तु फिर भी कुछ न कुछ मिलान रह
जाता है जिसका परिणाम आगे चलकर बुरा होता है। प्रकृति आदि
न मिलने से स्त्री पुरुष मे कलह रहती है। प्राचीन समय मे जन्म
पत्र का ठीक ठीक मिलान करके विवाह होता था। कुछ समय से
धर्म्म सम्बन्धी सभी बातो मे कमी और असावधानी होने लगी है
इसी प्रकार विवाह आदि मे भी होती है इसलिये ठीक मिलान
न कर पति पत्नी की प्रकृति और स्वभाव आदि न मिलने से नाना
प्रकार के कष्ट होते हैं और दाम्पत्य प्रेम का जैसा चाहिये
आनन्द नहीं मिलता।
आजकल प्रथम तो जन्म पत्र ही ठीक नही वनते। वच्चे
वाले पंडित को बच्चे के पैदा होने का समय अन्दाज से वतलाते
हैं क्योंकि प्रायः घड़ी बहुत कम घरों मे होती है। इसलिये बहुत
कम घर ऐसे होते हैं जिनमे जन्म समय का वक्त बिलकुल ठीक
देखकर जन्म पत्री बनाई जाती होगी। दूसरे जन्म पत्री बनाने
मे जितने पाण्डित्य की आवश्यकता होती है उतनी विद्वत्ता पण्डित
मे होती नहीं। वे अट संट जो समझते हैं, वना देते हैं। इसके
बाद जन्म पत्री के मिलाने वाले भी बहुत कम मिलान करते हैं
वे केवल अपने मतलब साधन की बात सोचते हैं। यही कारण
है कि आजकल जन्म पत्री का मिलान करके भी व्याह होने पर
अधिकतर उसका परिणाम विपरीत होता है। जिस दाम्पत्य प्रेम के
लिये जन्म पत्री मिलाई जाती है वह दाम्पत्य प्रेम नष्ट होजाता है।
८८ आनन्द मन्दिर
स्त्री के भेद
स्त्रियां चार प्रकार की मानी गई हैं ।
१-पद्मिनी २-चित्रणी ३-शंखनी ४-हस्तिनी
पद्मिनी स्त्री के लक्षण
रूपवती, सुन्दर, चन्द्रमुखी और नेत्रो मे मृगी की समान
सुन्दर जिसे मृगनयनी कहते है, पुष्ट स्तन वाली, सुशील, स्वभाव
वाली, कोमलाङ्गी (शरीर के अंग कोमल हो सांवला या गोरा कैसा
ही शरीर हो, ) आहार न बहुत कम न अधिक करने वाली, मीठी
बोली वाली, मधुर चाल वाली, मानवती, विलास दक्षा, लज्जावती,
धर्म कार्यों मे रुचिवाली, कमल के समान शरीर की गन्ध-
वाली, बुद्धिमती, कभी अपमान की बात न सह सकने वाली जो
स्त्री हो ऐसी स्त्री पद्मिनी कही जाती है ।
चित्रणी स्त्री के लक्षण
मृगनयनी अर्थात् जिसके नेत्र मृगी की समान सुन्दर और
बड़े हो, चन्द्रमुखी, सुन्दर मुखाकृति वाली, पतिप्राणा, प्रेम के
महत्व को समझने वाली, प्रसन्न मुख, सगीत प्रेमी, शिल्पकला मे
रुचि रखनेवाली, विद्या प्रेमी, मधुर भाषण करने वाली, सुन्दर,
सुडौल, शरीर वाली और सांवले वर्णवाली, जिसका उदर छोटा, स्तन
ऊंचे और हथिनी के समान मन्द चाल वाली, ऐसी स्त्री को
चित्रणी कहा है ।
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८६
शंखिनी स्त्री के लक्षण
भूरे नेत्रो वाली, दुबलं शरीर वाली, तिरछी चितवन औग
लम्बे केशों वाली, छोटे स्तन, चंचल चालवाली, नशीली वस्तुओ
की रुचि रखने वाली, भांग आदि पीने की इच्छा वाली, कर्कस
बोली वाली. दुष्ट स्वभाव वाली हो क्रोधी हो सांवली या गोरी
वर्ण वाली हो तथा विषय भोग मे अधिक इच्छा रखने वाली हो
तो ऐसी स्त्री शंखिनी कही जाती है ।
हस्तिनी स्त्री के लक्षण
जिसके पसीने मे हाथी कैसी गन्ध आती हो, ठिगने शरीर
वाली, मोटी, दुष्ट स्वभाववाली, हथनी की समान चाल वाली, स्तन-
भार से ऊपर का शरीर झुका हुआ सा कुछ कुछ प्रतीत हो,
घुंघराले बालवाली, लज्जाहीन, लाल बड़े चंडे होठो वाली, खूब
खाने वाली, गोरे शरीर वाली और जिसके मासिकधर्म के रक्त
मे भी हाथी कैसी गन्ध आती हो ऐसी स्त्री को हस्तिनी कहा है।
और भी अनेक प्रकार की स्त्रियां कही हैं परन्तु मुख्य चार ही है।
जिनके आर्त्त
६० आनन्द मन्दिर
स्त्री के शरीर में आर्तव का चढ़ाव उतार
स्त्री के शरीर से आर्तव का चढाव उतार इस प्रकार होता
है जैसे समुद्र मे ज्वार भाटा का नियम है। जिस प्रकार चन्द्रमा
की कला से अर्थात् घटने बढ़ने से समुद्र का जल घटता बढ़ता
है उसी प्रकार का स्त्री के आर्तव का सम्बन्ध चन्द्रमा से है।
चन्द्रमा के ही हिसाब से स्त्रियो का आर्तव समस्त शरीर मे
चक्कर लगाया करता है। मेरे पास अनेक स्त्रियां मासिकधर्म्म
सम्बन्धी ऐसे रोगों वाली भी आई और आया करती हैं जिनका
मासिकधर्म्म ठीक पूर्णिमा तिथि के दिन होता है और बहुत
अधिक गिरता है और पन्द्रह दिन तक जारी रहता है। पन्द्रह दिन
के बाद कम होने लगता है और पूर्णिमा के पहिले ही बिलकुल
बन्द होकर पूर्णिमा को फिर जारी हो जाता है। इसी प्रकार के
अनेक दोष मासिकधर्म्म मे पाये गये। कुछ स्त्रियां ऐसी भी देखने
मे आई जिनको हर महीने कृष्ण पत्त की प्रतिपदा को ऋतुधर्म
के रक्त का कुछ अंश दिखलाई देकर वन्द हो गया और उसी दिन
से गर्भाशय मे पीडा होनी आरम्भ
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६१
अंगुष्ठे पद गुल्फजानु जघने नाभौ च सङ्गः स्तने ।
कक्षा कण्ठ कपोल दन्त वसने नेत्रालिके पद्धति ॥
इसका अर्थ यह है कि स्त्री के आर्तव का चढ़ाव उतार
कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होता है।
१—प्रतिपदा को पैर के अंगूठे मे
२—द्वितीया को पैर के तलवे में
३—तृतीया को पैर के घुटने मे
४—चौथ को जांघ में
५—पंचमी को गुप्त स्थान मे
६—छठ को कमर मे
७—सप्तमी को नाभि मे
८—अष्टमी को हृदय मे
९—नवमी को स्तन में
१०—दशमी को बगल में
११—एकादशी को कपोल मे
१२—द्वादशी को गले मे
१३—तेरस को गाल में
१४—चौदश को आंख में
१५—अमावस को शिर मे
इस प्रकार हर महीने की प्रतिपदा से १५ दिन में पैर के
६२ आनन्द मन्दिर
अंगूठे से शिर तक चढ़ता है और फिर दूसरे पक्ष मे शिर से
उतर कर उसी क्रम से दूसरी ओर से पैर के अंगूठे पर आता है।
इस प्रकार आर्तव का हर महीने एक चक्कर पूरे शरीर में
होकर योनि मार्ग से निकलता है। जितने आर्तव की गर्भ धारण
के लिये शरीर को आवश्यकता है उतना शरीर मे प्रकृति रहने
देती है। इसी प्रकार आहार विहार के अनुसार फिर आर्तव
बनना आरम्भ होता है और महीने भर तक बनता तथा शरीर
मे चक्कर लगाता है वही समय पर फिर निकलता है।
इसके विषय मे अनेक ग्रन्थो मे यह पाया जाता है कि स्त्रियो
को स्खलित करने के लिये जिस स्थान मे जिस तिथि को कामदेव
हो उस तिथि को उस स्थान मे नख गडावे और आलिगन चुम्बन
आदि करे इससे स्त्री शीघ्र ही स्खलित होजाती है। किन्तु यह
बात बिलकुल मनगढंत है। इसका तात्पर्य कुछ और है।
कामशास्त्र सम्बन्धी जितनी पुस्तके प्रकाशित हुई है प्राय'
सब मे यह बतलाया गया है कि जिस तिथि को कामदेव जिस
स्थान पर हो उस स्थान को नखो से दातो से खीचे ताने, नाखून
गडावे इस विधि से स्त्री शीघ्र ही द्रवित होजाती है।
एक पुस्तक मे लिखा है स्त्री के अगो मे जिस समय काम
की स्थिति हो उस समय वहा पर चुम्बन करे नाखून गड़ावे, दांत
गडावे या ताड़न करे इन उपायो से स्त्री के कामदेव को जाग्रत करना
चाहिये। शिर के बालो को अपने हाथ की अंगुलियो मे लपेट
कर खींचना चाहिये।
चित्रांगी स्त्री ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६३
इसी प्रकार के अनेक घृणित उपाय बतलाये गये हैं जिनको
मैं यहां लिखना उचित नहीं समझती ।
स्त्री का कामदेव क्या मानो कुम्भकरण की नींद होगई,
जिसे जगाने मे पुरुष को इतने कठिन उपाय करने की जरूरत है।
पाठको ! विचार कीजिये विषयी लोगो ने स्त्रियो को क्या समझ
रक्खा है ऐसी पुस्तको के प्रचारको को भी इस बात का कुछ
विचार नही होता । वे अपने स्वार्थ साधन के लालच से विषयी
लोगो के चित्त प्रसन्नार्थ कुछ का कुछ मनगढत लिख देते है ।
मैंने २५ वर्ष तक लाखो स्त्रियो की चिकित्सा करके इस
बात का अनुभव किया कि स्त्रियों के आर्तव का चढ़ाव उतार
चन्द्रमा के हिसाब से है क्योकि मेरे यहां जो स्त्रियां आर्तव दोष
वाली इलाज के लिये आया करती हैं उनमे यदि साधारण
खराबी हुई तो रोग की परीक्षा करके औषधि देदी, वे दो चार
दिन ठहर कर अपने घर चली गई । और जिनमे अधिक खराबी
हुई वे ठहर कर इलाज कराती है और आराम होकर जाती हैं ।
ऋतुदोष वाली स्त्रियो के विषय मे मैं लिख चुकी हूं ।
आर्तव का चढ़ाव उतार चन्द्रमा के हिसाब से होता है । अभी
हाल में एक स्त्री मेरे पास आर्तव दोष की आई थी और उसने
मेरे यहां ठहर कर इलाज कराया उसका ऋतुधर्म्म प्रतिपदा से
आरम्भ हुआ । कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को उसके पीड़ा आरम्भ
हुई और वह पीड़ा दिन दिन क्रमश. बढ़ती गई और अठाइसवे
दिन खूब पीड़ा होकर मासिकधर्म्म अधिक तादाद मे हुआ ।
६४ आनन्द मन्दिर
उस स्त्री की जबानी मालूम हुआ कि वह ठीक २८-या २९
वें दिन इसी कष्ट से ऋतुधर्म्म मे होती है और कई वर्ष से उसके
मासिकधर्म्म का यही हाल है। प्रतिपदा से पीडा आरम्भ होती थी
और चौदह पन्द्रह दिन में खूब बढ़ती थी। मासिकधर्म्म के एक
दिन पहले पीड़ा इतनी अधिक बढ़ती थी कि उसे नशीली औष-
धियों के इञ्जेक्शन लगवाने पड़ते थे जिससे पीड़ा मालूम न हो।
मेरे यहां वह दो तीन महीने रही। हर महीने उसे इसी प्रकार का
कष्ट होता था।
मैंने उससे पूछा तो मालूम हुआ उसे जब से मासिकधर्म्म
आरम्भ हुआ तब से ही वह ठीक २८ वें दिन मासिकधर्म्म से
होती रही है। विवाह के बाद अधिक प्रसग के कारण उसके
मासिकधर्म्म मे यह खराबी उत्पन्न होगई कि कष्ट से होने लगा और
बहुत अधिक होने लगा। मेरे यहां तीन महीने रहकर उसने इलाज
कराया। तब सब शिकायते दूर हुईं और वह अपने घर को गई।
इस प्रकार अनेक ऐसी स्त्रियों के रोगो से निश्चय होता है
कि स्त्रियो का आर्तव वास तिथि के हिसाब से होता है।
स्त्रियों के ये भेद और लक्षण कामशास्त्रो में ही बतलाये
गये हैं। अन्य धर्म ग्रन्थो तथा आयुर्वेद शास्त्रो में यह तो बतलाया
गया है कि किन चिन्हों वाली लड़की की कैसा स्वभाव होता है
और कैसी लड़की से विवाह करना चाहिये तथा विवाह के समय
किन बातो का ध्यान रखना चाहिये। सम्भव है उन्ही ग्रन्थो के
आधार पर कामशास्त्र में ये भेद किये गये हों।
विवाह-विज्ञान-कामशास्त्र ६५
अमृत और विष
वैद्यकशास्त्र मे अमृत और विष दोनों प्रकार की औषधियो
की विधि और सेवन बतलाया गया है। विष से जो औषधियां
विधि पूर्वक तैयार कर पथ्य से सेवन की जाती हैं वे विषों द्वारा
तैयार हुई औषधियां अमृत का काम कर दिखलाती हैं।
जो मूर्ख उन्हें बिना समझे ही तैयार कर अथवा अज्ञानी
चिकित्सकों की तैयार की हुई औषधियां सेवन करते हैं वे
अमृत की समान गुणकारी होने पर भी विष की समान प्राण
नाशक हैं।
इसी प्रकार अमृत की समान औषधियां बिना जरूरत के
सेवन की जावे तो वे भी विष की समान हानि कारक होती हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि:—
सन्तान की इच्छा से संभोग के समय स्त्री को प्यार और
प्रेम से आलिंगन चुम्बनादि से प्रसन्न करके सीधे आसन से संभोग
करे, नोच खसोट आदि से नही। जब स्त्री पति के प्यार से प्रसन्न
होगी तब संभोग मे भी उसकी इच्छा पूरी होगी और वह
स्खलित होकर गर्भधारण करेगी।
इसका मूर्ख लोग यह आशय समझते हैं कि स्त्री को आलि-
गन चुम्बन आदि उपायो से पुरुष के साथ ही स्खलित होना
चाहिये उन मूर्खों को यह नही मालूम है कि स्त्री पुरुष एक साथ
स्खलित होने से यदि गर्भ रह गया तो नपुंसक सन्तान उत्पन्न होगी।
६६ आनन्द मन्दिर
चारों प्रकार के पुरुषों के लिक्षण
स्त्रियो की तरह पुरुषो के चार भेद है—
१—मृग २—वृषभ ३—शशक ४—अश्व ।
मृग पुरुष के लक्षण
हृष्ट पुष्ट, सुन्दर बलवान सुन्दर नेत्रो वाला हो और कमल जैसी
सुगन्धि शरीर मे आती हो, शरीर सुकोमल चिकना कान्ति वाला
हो और डील डौल मे न बहुत लम्बा बेडौल न ठिगना हो, प्रसन्न
चित्त रहने वाला पर उपकार करने मे उत्साही धैर्यवान् अतिथि
सेवक, धर्मकार्यों तथा ईश्वर मे भक्ति रखने वाला, सदैव सन्तोष
रखने वाला हो ऐसे पुरुष को मृग कहा है ।
जिस प्रकार मृग के नेत्र बड़े बड़े और सुन्दर होते हैं नेत्रो मे
चचलता और साथ ही सुन्दरता भी होती है उसी प्रकार ऐसे
ऐसे नेत्र वाले पुरुष को मृग कहा है ।
वृषभ पुरुष के लक्षण
अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाला, मधुर भाषी, साहसी,
धैर्यवान्, कफ प्रकृति वाला, परिश्रमी, उद्योगी, चौड़ी छाती वाला,
और अधिक सोने वाला हो, सुन्दर स्त्रियो को प्यारा पाचन
शक्ति तीव्र हो, कुछ भारी शरीर वाला हो, शरीर के बाल कुछ
घने और कड़े हो, नाक के नथुने कुछ चौडे हो, सदा प्रसन्न,मुख
- B K Mitra
शङ्खिनी स्त्री ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६७
रहने वाला और सन्तोषी हो ऐसे लक्षणो वाला पुरुष वृषभ कहा
गया है ।
शशक नामक पुरुष के लक्षण
शशक पुरुष का शरीर सुडौल सुन्दर हृदय कोमल,
धर्मात्मा, सत्य बोलने वाला, स्त्री भोग मे कम इच्छा रखने वाला,
अपनी ही स्त्री से प्रेम करने वाला, बुद्धिमान, विद्वान्, और भाग्य-
वान होता है । परोपकार मे उत्साही, मधुरभाषी, सुशील और
गम्भीर विचार वाला होता है ।
अश्व नामक पुरुष के लक्षण
अश्व नाम घोडे का है । अश्व पुरुष घोडे के समान चचल,
पुष्ट शरीर वाला, कुमार्गी, शरीर का रग सांवला, रतिक्रिया मे
अत्यन्त लिप्त रहने वाला, अधिक आहार करने वाला, लज्जाहीन,
कुल कलंकी, विषयी, व्यभिचारी, क्रोधी स्वभाववाला और घमंडी
होता है । वड़ों का अपमान करने वाला और पर सतापी होता है।
इसी प्रकार से स्त्री पुरुष अनेक लक्षणो वाले होते हैं यह
विषय यदि विस्तार से लिखा जावे तो एक बड़ा भारी ग्रन्थ बन
जावेगा इस लिये अधिक लिखना व्यर्थ है क्योकि जिस पुरुष
का जिस स्त्री के साथ विवाह हो चुका है वह तो जैसा है ठीक
ही है, जिनका विवाह नही हुआ है उनके विषय मे एक अलग
पुस्तक लिखी जारही है, इसलिये यहां इस विषय मे अधिक
लिखना अनावश्यक है।
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६८ आनन्द मन्दिर
स्त्री पुरुष सम्बन्ध
पद्मिनी स्त्री और शशक पुरुष
पद्मिनी स्त्री का और शशक नामक पुरुष का सम्बन्ध उचित
सम्बन्ध है क्योंकि शशक नाम खरगोश का है। खरगोश कोमल
शरीर, सुन्दर, विषय भोग में कम इच्छा रखने वाला होता है।
पद्मिनी स्त्री भी भोग की कम इच्छुक होती है इस कारण
दोनो का स्वभाव एकसा होता है। इसलिये पद्मिनी स्त्री शशक
नामक पुरुष से सव प्रकार सन्तुष्ट रहती है।
पद्मिनी स्त्री और शशक पुरुष का सम्बन्ध सन्तान के लिये
भी अति उत्तम है। सन्तान भी योग्य बुद्धिमान धर्म्मात्मा सुशील
आज्ञाकारी होती है अर्थात् माता पिता के स्वभाव की समान
होती है।
पद्मिनी स्त्री की प्राचीन ग्रन्थो मे वड़ी प्रशंसा की है। इसी
प्रकार शशक पुरुष को भी माना है, इस कारण जिस घर मे
पद्मिनी पत्नी और शशक पुरुष पति है उस घर मे ही दाम्पत्य सुख
का सच्चा आनन्द मिल सकता है ऐसा ग्रन्थकारो का मत है।
चित्रणी स्त्री और मृग पुरुष
चित्रणी और मृग नामक स्त्री पुरुष का सम्बन्ध होने से
दाम्पत्य प्रेम का आनन्द और योग्य सन्तान का सुख मिलता है
क्योकि चित्रणी स्त्री और मृग पुरुष का जोड़ा ठीक है। चित्रणी
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६६
स्त्री का स्वभाव और मृग पुरुष का स्वभाव एकसा होता है।
उनकी सन्तान भी योग्य होती है।
प्राचीन ग्रन्थों में चित्रणी स्त्री के लिये मृग पुरुष ही योग्य
बतलाया है जिस गृह में ये दोनों दम्पति हैं वह घर उन्नति
शील होता है।
शंखिनी स्त्री और वृषभ पुरुष
वृषभ पुरुष के लिये शंखिनी स्त्री का सम्बन्ध योग्य
बतलाया है क्योंकि इन दोनों का स्वभाव एक सा होता है।
शंखिनी स्त्री भोग विलास में अधिक इच्छा रखने वाली होती
है और पुरुष भी ऐसे ही स्वभाव वाला होता है इसलिये शंखिनी
स्त्री वृषभ नामक पुरुष को ही पाकर सन्तुष्ट रहती है।
हस्तिनी स्त्री और अश्व पुरुष
हस्तिनी स्त्री का सम्बन्ध अश्व जाति के पुरुष से उचित
सम्बन्ध है क्योंकि हस्तिनी स्त्री अश्व जाति के पुरुष से सन्तुष्ट
रहती है।
हस्तिनी जाति की स्त्री और अश्व जाति के पुरुष का स्वभाव
एकसा होता है। दोनों विषय वासना की बराबर ही इच्छा रखते हैं
इसलिये हस्तिनी का जोड़ा अश्व पुरुष ही उत्तम माना गया है।
इस प्रकार के सम्बन्धों के साथ साथ ऋतु, आहार तथा परिस्थिति
आदि का भी दाम्पत्य प्रेम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आगे
ऋतुचर्या नामक प्रकरण मे इसविषय पर लिखा गया है।