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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका ४१७
किसी प्रकार मैंने आपके नामकी शरण ली है ॥४॥ हे रामजी ! आप अपने
नामका प्रताप जानते हैं। विधाताने मेरे लिए (आपके नामके सिवा) दूसरी
गति बनायी ही नहीं। आपके क्रोध करने योग्य मेरे करोड़ों बुरे कर्म हैं; किन्तु
आपके प्रसन्न होने योग्य तुलसीदासकी केवल निर्लज्जता ही है ॥५॥
विशेष
१—'दई'—कुछ टीकाकारोंने इस शब्दका 'दयालु' अर्थ भी लिखा है।
[ २५३ ]
राम ! राखिये सरन, राखि आये सब दिन ।
बिदित त्रैलोक तिहुँ काल न दयालु दूजो,
आरत-प्रनत-पाल को है प्रभु बिन ? ॥१॥
लाले पाले, पोषे तोषे आलसी-अभागी-अघी,
नाथ ! पै अनाथनि सों भये न उरिन ।
स्वामी समरथ ऐसो, हौं तिहारो जैसे-तैसो
काल-चाल हेरि होति हिये घनी घिन ॥२॥
खीझि-रीझि-बिहँसि-अनख, क्यों हूँ एक बार
'तुलसी तू मेरो', बलि कहियत किन ?
जाहि सूल निरमूल, होहिं सुख अनुकूल,
महाराज राम ! रावरी सौं, तेहि छिन ॥३॥
शब्दार्थ—तोषे = सन्तुष्ट कर दिया। अघी = पापी। हेरि = देखकर। अनख = त्यौरी
चढ़ाकर। सौं = शपथ।
भावार्थ—हे रामजी ! मुझे अपनी शरणमें रखिये, क्योंकि आप सदासे
(दीनोंको शरणमें) रखते आये हैं। यह प्रकट है कि तीनों लोक और तीनों काल-
में आपके समान कोई दयालु नहीं है। हे प्रभो ! आपको छोड़कर शरणागत
दीन-दुखियोंका पालन करनेवाला दूसरा कौन है ? ॥१॥ आपने आलसी, अभागे
और पापियोंका लालन-पालन किया, पोषण किया और उन्हें सन्तुष्ट कर दिया।
फिर भी हे नाथ ! (इतना करनेपर भी) आप उनसे उऋण नहीं हुए। स्वामी !
२७

४१८ विनय-पत्रिका
आप ऐसे समर्थ हैं, और मैं जैसा भी हूँ तैसा आपहीका हूँ; कलिकालकी चाल
देखकर मेरे हृदयमें गहरी घृणा पैदा हो रही है ॥२॥ बलिहारी ! एकबार आप
झल्लाकर, प्रसन्न होकर, हँसकर अथवा अनखाकर किसी भी तरह सही, इतना
क्यों नहीं देते कि 'तुलसी, तू मेरा है' । हे महाराज रामचन्द्र ! आपकी सौगन्ध,
(आपके इतना कहते ही) उसी क्षण मेरा सब दुःख जड़से नष्ट हो जायगा और
सब सुख मेरे अनुकूल हो जायँगे ॥३॥
विशेष
—'तोषे'—'पोषे तोषे'का अर्थ कई टीकाकारोंने 'पाला-पोसा' लिखा है।
[ २५४ ]
राम ! रावरो नाम मेरो मातु-पितु है ।
सुजन, सनेही, गुरु-साहिब, सखा-सुह्रद,
राम-नाम प्रेम-पन अविचल बितु है ॥१॥
सतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि,
लियो काढ़ि बामदेव नाम-घृतु है ।
नामको भरोसो-बल चारि हू फल को फल,
सुमिरिये छाँड़ि छल, भलो क्रतु है ॥२॥
स्वारथ-साधक, परमारथ-दायक नाम,
राम-नाम सारिखो न और हितु है ।
तुलसी सुभाव कही साँचिये परैगी सही,
सीतानाथ-नाम नित चित हू को चितु है ॥३॥
शब्दार्थ—अविचल = विचलित न होनेवाला। बितु = धन। बामदेव = महादेवजी।
क्रतु = कर्म, यज्ञ। चितु = चित्त।
भावार्थ—हे रामजी ! आपका नाम ही मेरा माता-पिता, स्वजन, सनेही,
गुरु, स्वामी, मित्र और सुहृद है। आपके नाममें जो प्रेमका मेरा प्रण है, वही मेरा
स्थायी धन है ॥१॥ शिवजीने सैकड़ों करोड़ आपके चरित्ररूपी अगाध दधिसमुद्र-
को मथकर नाम-रूपी घी निकाल लिया है। नामका बल-भरोसा चारों फलोंका
फल यानी अर्थ, धर्म, काम, मोक्षका सार-रूप है। इसलिए छल छोड़कर राम-

नामका स्मरण करना चाहिये। यही उत्तम यज्ञ है ॥२॥ रामका नाम स्वार्थका
साधनेवाला तथा परमार्थ देनेवाला है। रामनामके समान हितू और कोई भी नहीं
है। यदि यह बात तुलसीदासने स्वभावसे कही है, तो सचमुच ही इसपर सही
पड़ेगी। हे सीतानाथ ! आपका नाम नित्य है और चित्तका भी चित्त है ॥३॥
विशेष
१—'सुभाव'—इसका अर्थ 'अच्छा भाव' भी किया जाता है।
२—'नामको भरोसो बल चारि हू फल को फल'—तभी तो श्रीमद्भाग-
बतमें देवी देवहूतिने भगवान् कपिलदेवसे कहा है—
अहो बत् श्वपचोऽतोगरीयान्
यंजिह्वाग्रे वर्तते नामतुभ्यम् ।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥
(३।३३।७)
'अहो, जिसकी जबानपर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ
है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं उन श्रेष्ठ पुरुषोंने तप, यज्ञ,
तीर्थस्नान, वेदाध्ययन सब-कुछ कर लिये।
३—'चित्त'— वेदान्तशास्त्रका कथन है—
“अनुसन्धानात्मिकान्तःकरणवृत्तिः ।”
[ २५५ ]
राम ! रावरो नाम साधु-सुरतरु है।
सुमिरे त्रिबिध घाम हरत, पूरत काम,
सकल सुकृत सरसिजको सरु है ॥१॥
लाभ हू को लाभ, सुख हू को सुख, सरबस,
पतित-पावन, डर हू को डरु है।
नीचे हू को, ऊँचे हू को, रंक हू को राव हू को
सुलभ, सुखद आपनो-सो घरु है ॥२॥

४२० विनय-पत्रिका
बेद हू, पुरान हू, पुरारि हू पुकारि कह्यो,
नाम-प्रेम चारि फल हू को फरु है।
ऐसे राम-नाम सों न प्रीति, न प्रतीति मन,
मेरे जान, जानिबो सोई नर खरु है ॥३॥
नाम-सों न मातु-पितु, मीत-हित, बन्धु-गुरु,
साहिब, सुधी, सुसील, सुधाकरु है।
नाम सों निबाह नेहु, दीन को दयालु ! देहु,
दास तुलसी को, बलि, बड़ो बरु है ॥४॥
शब्दार्थ—सुरतरु = कल्पवृक्ष। घाम = धूप, ताप। सरसिज = कमल। सरु = तालाब।
खरु = गधा। सुधी = सुन्दर बुद्धिवाला, बुद्धिमान्। बरु = वरदान।
भावार्थ—हे राम ! आपका नाम साधुओंके लिए कल्पवृक्ष है, स्मरण करते
ही तीनों तापोंको हर लेता है और सब मनोरथ पूरा कर देता है। वह समस्त
सुकृतरूपी कमलोंका सरोवर है ॥१॥ वह लाभका भी लाभ, सुखका भी सुख,
सर्वस्व, पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा डरका भी डर है अर्थात् कालका भी
काल है। वह नीच, ऊँच, रंक (गरीब), राव (अमीर) सबके लिए सुलभ
है, और अपने घरके समान सुख देनेवाला है ॥२॥ वेदोंने, पुराणोंने तथा
शिवजीने भी पुकारकर कहा है कि राम-रामका प्रेम चारों फलों (अर्थ, धर्म,
काम, मोक्ष) का सारस्वरूप है। ऐसे रामनामपर जिसके मनमें प्रेम और विश्वास
नहीं है, मेरी समझसे उसी आदमीको (असली) गधा समझना चाहिये ॥३॥
नामके समान माता, पिता, मित्र, हितकारी, बन्धु, गुरु और स्वामी कोई नहीं
है। वह (नाम) बुद्धिमान्, सुशील और चन्द्रमाके समान सुन्दर है। हे
दीनोंपर दया करनेवाले रामजी ! मुझे बस यही दीजिये कि आपके नामके साथ
मेरा जो प्रेम है, वह निभ जाय। बलिहारी ! इस सेवक तुलसीके लिए (आपका
इतना देना ही) सबसे बड़ा वरदान है।
विशेष
१—'राम-नाम सों न प्रीति'—किन्तु गोस्वामीजी महाराज ! 'प्रीति' के
सम्बन्धमें सूरदासजीकी उक्ति भी तो देखनी है:—

विनय-पत्रिका ४२१
प्रीति करि काहूने सुख न लह्यो ।
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों सम्पुट माँहिं रह्यो ॥
प्रीति पतंग करीजु दीपक सों आपुन प्रान दह्यो ।
सारँग प्रीति करीजु नाद सों सनमुख बान सह्यो ॥
हम जो प्रीति करी माधव सों चलत कछू ना कह्यो ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु नैनन नीर बह्यो ॥
२—'सोई नर खरु है'—ईश्वर-विमुख प्राणीको गधेकी उपाधि देना
मामूली बात है । श्रीमद्भागवतमें तो यह लिखा है:—
श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः ।
न यत्कर्णपथोपेतो जातुनाम गदाग्रजः ॥
बिले बतोरुक्रमविक्रमान्ये
नशृण्वतः कर्णपुटे नरस्य ।
जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥
(२।३।१९-२०)
अर्थात् 'जिसके कर्णपथमें भगवान्‌के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं किया,
वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और गधेकी अपेक्षा भी
अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी ! जो कान भगवान्‌की लीलाका श्रवण नहीं
करते वे साँपकी बिलके समान हैं और जो दुष्ट जिह्वा भगवान्‌की लीला-कथाका
गान नहीं करती वह मेढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली है ।
इस श्लोकका अनुवाद गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें इस प्रकार
किया है—
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवनरन्ध्र अहि-भवन समाना ॥
जो नहिं करहि राम-गुन-गाना । जीह सो दादुर-जीह समाना ॥
३—'नाम सों निबाह......बरु है'--इसका अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा
है—बलिहारी—तुलसीदासको वही बड़ा बल दीजिये, जिससे आपके नामके

साथ उस दीनका प्रेम निभ जाय (बीचमें कोई बाधक न हो) । 'वरु' का अर्थ
'जल' करनेके कारण ही साधु अर्थ गुम हो गया है।
[२५६]
कहे बिनु रह्यो न परत, कहे राम ! रस न रहत।
तुम से सुसाहिब की ओट जन खोटो-खरो,
काल की, करमकी कुसाँसति सहत ॥१॥
करत बिचार सार पैयत न कहूँ कछु,
सकल बड़ाई सब कहाँ ते लहत ?
नाथ की महिमा सुनि, समुझि अपनी ओर,
हेरि हारि कै हहरि हृदय दहत ॥२॥
सखा न, सुसेवक न, सुतिय न, प्रभु आप,
माय-बाप तुही साँचो तुलसी कहत ।
मेरी तौ थोरी है, सुधरैगी बिगरियौ, बलि,
राम ! रावरी सौं रही रावरी चहत ॥३॥
शब्दार्थ—कुसाँसति = बुरी तरह कष्ट ! हेरि = देखकर । हहरि = हताश होकर ।
बिगरियौ = बिगड़ी हुई भी ।
भावार्थ—हे रामजी ! कहे बिना रहा नहीं जाता और कहनेसे मजा जाता
रहता है। आप-सरीखे सुन्दर स्वामीकी आड़ पाकर भी यह खरा-खोटा सेवक
काल और कर्मकी बुरी तरह तकलीफ सह रहा है ॥१॥ (आपका यह सेवक)
विचार किया करता है, पर कहीं कुछ सार नहीं पाता । सब लोग नाना प्रकार-
की बड़ाई कहाँसे पाते हैं ? हे नाथ ! आपकी महिमा सुन-समझकर तथा अपनी
ओर (अपनी करनीकी ओर) देखकर हार मान लेता और जी छोटा कर लेता
हूँ; इससे मेरा हृदय जलने लगता है ॥२॥ न तो मेरा कोई मित्र है, न अच्छा
सेवक है और न अच्छी स्त्री है । हे प्रभो ! तुलसी तो सच्ची बात कहता है कि
उसके माता-पिता बस आप ही हैं। मेरी तो थोड़ी-सी बात है, बिगड़नेपर भी
सुधर जायगी; किन्तु हे रामजी, बलिहारी ! आपकी कसम, मैं तो केवल आपकी
बात रखना चाहता हूँ ॥३॥

विनय-पत्रिका ४२३
विशेष
१—'नाथकी महिमा'—राम-नामकी महिमा इतनी अधिक है—
नाम्नां सहस्रं दिव्यानां स्मरणे यत् फलं लभेत् ।
तत्फलं लभते नूनं रामोच्चारणमात्रतः ॥
—ब्रह्मवैवर्त ।
[ २५७ ]
दीनबन्धु ! दूरि किये दीन को न दूसरी सरन ।
आपको भले हैं सब, आपने को कोऊ कहूँ,
सब को भलो है राम ! रावरो चरन ॥१॥
पाहन, पसु, पतंग, कोल, भील, निसिचर
काँच ते कृपानिधान किये सुबरन ।
दंडक-पुहुमि पाय परसि पुनीत भई,
उकठे बिटप लागे फूलन-फरन ॥२॥
पतित-पावन नाम बाम हू दाहिनो, देव !
दुनी न दुसह-दुख-दूषन-दरन ।
सीलसिंधु तोसों ऊँची-नीचियौ कहत सोभा,
तो सो तुहीं तुलसी को आरति-हरन ॥३॥
शब्दार्थ—पतंग = पक्षी । पुहुमि = पृथिवी । उकठे = सूखे हुए । बिटप = वृक्ष । आरति =
दुःख । हरन = हरनेवाले ।
भावार्थ—हे दीनबन्धु ! यदि आपने इस दीनको दूर कर दिया तो फिर
इसे दूसरी शरण न मिलेगी । क्योंकि यों तो आप-आपके सभी अच्छे हैं, पर
अपने भक्तोंके लिए विरले ही लोग अच्छे हैं। किन्तु हे रामजी ! आपके चरण
सबके लिए अच्छे हैं, अर्थात् भक्तोंके लिए तो अच्छे हैं ही, अभक्तोंके लिए भी
अच्छे हैं। क्योंकि चरणोंके प्रतापसे ही बालि तर गया था ॥१॥ हे कृपानिधान !
आपने पाषाणी (अहिल्या), पशु (रीछ, बन्दर), पक्षी (जटायु), कोल-भील तथा
राक्षसोंको काँचसे सुवर्ण बना दिया । दंडक वनकी भूमि आपके चरणोंका स्पर्श
होते ही पुनीत हो गयी और वहाँके उकठे हुए पेड़-(हरे-भरे होकर) फूलने-फलने

४२४ विनय-पत्रिका
लगे ॥२॥ हे देव ! पतितोंको पवित्र करनेवाला आपका नाम आपसे विमुख
रहनेवालोंके लिए भी अनुकूल हो जाता है (शत्रु भावसे भी रामका नाम लेने-
वाले लोग तर जाते हैं) । संसारमें दुस्सह दुःखों और दोषोंका नाश करनेवाला
आपके सिवा और कोई नहीं है। आप शीलके समुद्र हैं। आपसे ऊँची-नीची बात
कहनेमें भी शोभा है (अर्थात् आप दुःख और दोष मिटानेवाले हैं, सुशील हैं,
अतः आपसे भला-बुरा कहना शोभा देता है; क्योंकि ऐसोंसे कहना किस कामका
जो दुःख भी दूर न करें और उलटा दिल्लगी भी उड़ावें ? अथवा उन लोगोंसे
कहना भी बेकार है, जो भला-बुरा सुनकर सहन न कर सकें। तुलसीके दुःखको
दूर करनेवाले तो बस आपके समान आप ही हैं (दूसरा कोई नहीं) ॥३॥
विशेष
१—'पाहन'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये ।
२—'पन्नग'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये ।
३—'दंडक-पुहुमि······पुनीत भई'—एक बार दुर्भिक्ष पड़नेपर सब ऋषि
अपने-अपने आश्रमोंको छोड़कर गौतम ऋषिके आश्रममें जाकर रहने लगे ।
दुर्भिक्ष मिट जानेपर सब ऋषियोंने गौतम ऋषिसे विदा माँगी । गौतम ऋषिने
उनको वहीं रहनेके लिए कहा और अन्यत्र जानेके लिए मना किया । इसपर
उन ऋषियोंने मायाकी एक गाय बनाकर गौतम ऋषिके खेतमें खड़ी कर दी ।
ऋषिके हाँकनेके लिए जानेपर वह गाय वहीं गिरकर मर गयी । इससे सब
ऋषियोंने उनपर गो-हत्याका दोष लगाया । इस प्रकार जब वे दोष लगाकर
जाने लगे, तब गौतम ऋषि योगबलसे उनकी माया ताड़ गये और क्रुद्ध होकर
शाप दे दिया कि तुम लोग जहाँ जाना चाहते हो, वह देश अपवित्र और
नष्ट-भ्रष्ट हो जायगा । तभीसे वह दंडक वनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वहाँके हरे-
भरे वृक्ष सूख गये और वह प्रदेश वीरान हो गया । भगवान् रामचन्द्रका पदार्पण
होनेपर वह उजड़ा हुआ प्रदेश फिर पूर्ववत् हरा-भरा होकर पवित्र हुआ ।
२५८ ]
जानि पहिचानि मैं बिसारे हौं कृपानिधान !
एतो मान ढीठ हौं उलटि देत खोरि हौं।

विनय-पत्रिका ४२५
करत जतन जासों जोरिबेको जोगी जन,
तासों क्यों हू जुरी, सो अभागो बैठो तोरि हौं ॥१॥
मोसे दोस-कोसको भुवन-कोस दूसरो न,
अपनी समझि सूझि आयो टकटोरि हौं।
गाड़ी के स्वान की नाईं, माया मोहकी बड़ाई,
छिनहिं तजत, छिन भजत बहोरिहौं ॥२॥
बड़ो साईं-द्रोही न बराबरी मेरी को कोऊ,
नाथ की सपथ किये कहत करोरि हौं।
दूरि कीजै द्वार तें लबार लालची प्रपंची,
सुधा-सो सलिल सूकरी ज्यों गद्होरि हौं ॥३॥
राखिये नीके सुधारि, नीचको डारिये मारि,
दुहूँ ओर की विचारि, अब न निहोरि हौं ॥
तुलसी कही है साँची रेख बार-बार खाँची,
ढील किये नाम-महिमाकी नाव बोरि हौं ॥४॥
शब्दार्थ-कोस = कोष, खजाना । भुवन-कोस = चौदहो भुवन या तीनों लोक ।
टकटोरि = टटोलना, ढूँढ़ना । बहोरि = फिर । लवार = झूठा । गद्होरि हौं = मथकर गँदला
कर डालूँगा ।
भावार्थ-हे कृपानिधान ! मैंने जान-पहचानकर आपको भुला दिया है;
मुझे इतना अभिमान हो गया है और मैं इतना ढीठ हो गया हूँ कि उलटा
आपको दोष देता हूँ (कि आप कृपानिधान होकर भी मुझपर कृपा नहीं कर
रहे हैं) । जिससे नाता जोड़नेके लिए योगी लोग यत्न किया करते हैं, उससे
यदि थोड़ी-सी प्रीति जुड़ी भी थी, तो मैं अभागा उसे तोड़ बैठा ॥१॥ अपनी
सूझ और समझके अनुसार मैं टटोल आया, पर चौदहो भुवन या तीनों लोकमें
मुझसा दोषोंका खजाना दूसरा कोई नहीं है। गाड़ीके (पीछे लगे हुए) कुत्तेकी
नाईं कभी तो मैं माया-मोहके बड़प्पनको क्षणभरमें ही छोड़ देता हूँ, और फिर
क्षणभरमें उसीको भजने लगता हूँ (अर्थात् जैसे गाड़ीके पीछे लगा हुआ कुत्ता
कभी तो गाड़ीको छोड़कर दूर निकल जाता है, और कभी उसके साथ हो लेता

४२६ विनय-पत्रिका
है, वही दशा मेरी है) ॥२॥ हे नाथ ! मैं आपकी (एक नहीं) करोड़ों शपथ
करके कहता हूँ कि मैं बड़ा भारी स्वामि-द्रोही हूँ, मेरी बराबरीका (स्वामि-द्रोही)
कोई नहीं है। इसलिए मुझ झूठे, लालची और प्रपंचीको आप अपने द्वारसे
दूर कर दीजिये, नहीं तो मैं अमृतके समान जलको सूकरीकी तरह मथकर
गँदला कर डालूँगा (आपके पवित्र यशको मलीन बना दूँगा) ॥३॥ दोनों
ओरकी बातोंपर विचार करके या तो मुझे अच्छी तरह सुधारकर (अपनी शरणमें)
रखिये, और या मुझ नीचको मार डालिये। (यदि आप इन दोनों बातोंमेंसे एक
भी न करेंगे, तो) अब मैं आपका निहोरा न करूँगा। तुलसीने बार-बार लकीर
खींचकर सच्ची बात कही है। यदि आप ढिलाई करेंगे तो मैं आपके नामकी
महिमाका जहाज डुबो दूँगा। भाव यह है कि संसार कहने लगेगा कि तुलसी
राम-नाम रटता ही रहा, पर कुछ न हुआ; इसलिए रामनामकी जो बड़ी भारी
महिमा ग्रन्थोंमें लिखी हुई है, वह झूठी है ॥४॥
विशेष
१—'राखिये・・・・・'निहोरिहौं'—इसमें कविकी हार्दिक झुँझलाहट दिखाई
पड़ती है।
२—'ढील किये・・・・・बोरिहौं'—शपथपूर्वक मजेदार धमकी है। ऐसी ही
धमकी भक्तवर सूरदासजीने भी दी है—
आजु हौं एक एक करि टरि हौं।
कै हम ही कै तुम ही माधव, अपुन भरोसे लरिहौं ॥
हौं तो पतित अहौं पीढ़िन को, पतित ह्वै निस्तरिहौं ।
अब हौं उघरि नचन चाहत हौं, तुम्हें बिरद बिनु करिहौं ॥
कत अपनी परतीति नसावत मैं पायो हरि हीरा।
सूर पतित तब ही लै उठिहै जब हँसि दैहौ बीरा ॥
[ २५९ ]
रावरी सुधारी जो बिगारी बिगरेगी मेरी,
कहौं, बलि, बेद की न, लोक कहा कहैगो ?

विनय-पत्रिका ४२७
प्रभुको उदास-भाउ, जनको पाप-प्रभाउ,
दुहूँ भाँति दीनबन्धु ! दीन दुख दहैगो ॥१॥
मैं तो दियो छाती पवि, लयो कलिकाल दबि,
साँसति सहत, परवस को न सहैगो ?
बाँकी विरुदावली बनेगी पाले ही कृपालु !
अन्त मेरो हाल हेरि यों न मन रहैगो ॥२॥
करमी-धरमी साधु-सेवक, बिरत-रत,
आपनी भलाई थल कहाँ कौन लहैगो ?
तेरे मुँह फेरे मोसे कायर-कपूत-कूर,
लटे लटपटनि को कौन परिगहैगो ? ॥३॥
काल पाय फिरत दसा दयालु ! सब ही की,
तोहि बिनु मोहि कबहूँ न कोऊ चहैगो ।
वचन-करम-हिये कहौं राम ! सौंह किये,
तुलसी पै नाथके निबाहेई निबहैगो ॥४॥
शब्दार्थ—पवि = वज्र । लटे = थके हुए, गिरे हुए । लटपटनि = लटपटाये हुए ।
परिगहैगो = ग्रहण करेगा । सौंह = शपथ ।
भावार्थ—यदि आपकी सुधारी हुई या बनायी हुई बात मेरे बिगाड़नेसे
बिगड़ जायगी तो मैं आपकी बलैया लेकर कहता हूँ—वेदोंकी तो नहीं कहता
किन्तु भला संसार क्या कहेगा ? (अर्थात् वेद चाहे जो कहें, पर संसार यही
कहेगा कि तुलसीने रामजीकी बनायी हुई बातको भी बिगाड़ दिया) हे प्रभो !
यदि आपका उदासीन भाव रहा अथवा सेवकके पापने ही अपना प्रभाव दिखाया,
तो हे दीनबन्धो ! दोनों ही प्रकारसे यह गरीब दुःखाग्निसे जलेगा ॥१॥ मैंने तो
वज्रका आघात सहनेके लिए छाती खोल दी है, क्योंकि कलिकालने दबा लिया
है । मैं कष्ट सह रहा हूँ । (यदि आप कहें कि क्यों कष्ट सह रहा है, तो) भला
ऐसा कौन परतन्त्र मनुष्य है जो न सहेगा ? किन्तु हे कृपालु ! आपको अपनी
बाँकी बिरदावलीका पालन करना ही पड़ेगा (अर्थात् मुझे उबारना ही पड़ेगा) ।
क्योंकि अन्तमें मेरा हाल देखकर आपका मन ऐसा न रहेगा (तात्पर्य यह कि

४२८ . विनय-पत्रिका
अवश्य पिघल जायगा) ॥२॥ कर्मनिष्ठ, धर्मात्मा, साधु, सेवक, विरक्त और
(संसारमें) रत ये सब अपने-अपने सत्कर्मोंके अनुसार कहाँ और कौनसा स्थान
प्राप्त न कर सकेंगे ? किन्तु आपके मुँह फेरनेपर मुझ सरीखे कायर, कपूत, क्रूर,
लटे हुए और लटपटाये हुए लोगोंको कौन अंगीकार करेगा ? ॥३॥ हे दयालु !
समय पाकर सबकी दशा फिरती है, किन्तु मुझे तो आपके बिना कोई कभी न
पूछेगा । हे रामजी ! मैं शपथ खाकर वचन, कर्म और मनसे कहता हूँ कि इस
तुलसीकी तो आपहीके निभानेसे निभेगी ॥४॥
[ २६० ]
साहिब उदास भये दास खास खीस होत
मेरी कहा चली ? हौं बजाय जाय रह्यो हौं ।
लोक में न ठाउँ ! परलोक को भरोसो कौन ?
हौं तो, बलि जाउँ, रामनाम ही ते लह्यो हौं ॥१॥
करम, सुभाउ, काल, काम, कोह, लोभ, मोह,
ग्राह अति गहनि गरीबी गाढ़े गह्यो हौं ।
छोरिबे को महाराज, बाँधिबे को कोटि भट,
पाहि प्रभु ! पाहि, तिहुँ ताप-पाप दह्यो हौं ॥२॥
रीझि बूझि सबकी प्रतीति-प्रीति एही द्वार,
दूध को जल्ह्यो पियत फूँकि फूँकि मह्यो हौं ।
रटत-रटत लठ्यो, जाति-पाँति-भाँति घट्यो
जूठनि को लालची चहौं न दूध नह्यो हौं ॥३॥
अनत चह्यो न भलो, सुपथ सुचाल चल्यो
नीके जिय जानि इहाँ भलो अनचह्यो हौं ।
तुलसी समुझि समुझायो मन बार-बार,
अपनो सो नाथ हू सों कहि निरबह्यो हौं ॥४॥
शब्दार्थ—खीस = बर्बाद । हौं = हूँ । हौं = मैं । गाढ़े = दृढ़तासे । भट = योद्धा । प्रतीति
= विश्वास । मह्यो = मट्ठा । अनत = अन्यत्र ।
भावार्थ—स्वामीके उदासीन होनेसे खास नौकर भी बर्बाद हो जाता है, मेरी

विनय-पत्रिका ४२१
तो गिनती ही क्या ! मैं तो बाजा बजाता हुआ (डंकेकी चोट) नष्ट हुआ जा रहा
हूँ। जब इस लोकमें ही (मेरे लिए रहनेकी) जगह नहीं है, तो फिर मैं परलोक-
का क्या भरोसा करूँ ? बलि जाऊँ, मैं तो केवल राम-नामकी ही शरणमें हूँ
॥१॥ कर्म, स्वभाव, काल, काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी बड़े-बड़े ग्राहोंने
और गरीबीने मुझे दृढ़तासे पकड़ लिया है। हे महाराज ! बाँधनेके लिए तो
करोड़ों योद्धा हैं, पर छुड़ानेके लिए केवल आप ही हैं। अतः हे प्रभो ! मेरी
रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! मैं पापके तीनों तापोंसे जल रहा हूँ ॥२॥ लोगोंका
रीझना समझकर मेरी प्रतीति और प्रीति इसी द्वारपर है। मैं तो दूधका जला
हुआ हूँ, इसीसे मट्ठेको भी फूँक-फूँककर पीता हूँ। मैं रटते-रटते थक गया,
जाति-पाँति और चाल-चलन भी नष्ट हो गयी। मैं तो केवल जूठनका लालची
हूँ, दूधसे नहाना नहीं चाहता (अर्थात् मैं आपके चरणोंमें पड़े रहना चाहता
हूँ, मुझे स्वर्गीय भोगोंकी इच्छा नहीं) ॥३॥ मैंने सुमार्गपर अच्छी चाल चलकर
अन्यत्र अपनी भलाई नहीं चाही। यहाँ आपसे तिरस्कृत होनेपर भी मैं अच्छी
तरह अपने दिलमें जानता हूँ कि मेरा भला है। इस बातको तुलसीने खूब
समझकर अपने मनको बार-बार समझाया है, और वह उसे अपने स्वामीसे
(आपसे) भी कहकर पाक हो गया है ॥४॥
[ २६१ ]
मेरी न बनै बनाये मेरे कोटि कलप लौं
राम ! रावरे बनाये बनै पल पाउ मैं ।
निपट सयाने हौ कृपानिधान ! कहा कहौं ?
लिये बेर बदलि अमोल मनि आउ मैं ॥१॥
मानस मलीन, करतब कलिमल पीन
जीह हू न जप्यो नाम, बक्यो राउ-राउ मैं ।
कुपथ कुचाल चल्यो, भयो न भूले हूँ भलो,
बाल-दसा हू न खेल्यो खेलत सुदाउ मैं ॥२॥
देखा-देखी दम्भ तें कि संग तें भई भलाई,
प्रगटि जनाई, कियो दुरित-दुराउ मैं ।

४३० विनय-पत्रिका
राग रोष द्वेष पोषे, गोगन समेत मन,
इनकी भगति कीन्ही इन ही को भाउ मैं ॥३॥
आगिली-पाछिली, अब हूँ की अनुमान ही तें,
बूझियत गति, कछु कीन्हों तो न काउ मैं ।
जग कहै रामकी प्रतीति-प्रीति तुलसी हू,
झूठे-साँचे आसरो साहब रघुराउ मैं ॥४॥
शब्दार्थ—आउ = आयु । पीन = पुष्ट । आउ-बाउ = आव-बाव, अनाप-शनाप । दुरित
= पाप । दुराउ = छिपाव । गो-गन = इन्द्रियाँ ।
भावार्थ—हे राम ! मेरे बनानेसे मेरी करोड़ों कल्पतक न बनेगी । किन्तु
आपके बनानेसे मेरी पाव (चौथाई) पलमें ही बन जायगी । आप परम चतुर
हैं । हे कृपानिधान ! मैं क्या कहूँ ! मैंने तो अनमोल मणिरूपी आयुके बदलेमें
(विषयरूप) बेर ले लिये ॥१॥ मेरा मानस मलिन हो गया है और कर्तब
कलियुगी पापोंसे पुष्ट हो गया है; जीभने भी रामनामका जप नहीं किया, वह
आयँ-बायँ बकती रही । कुमार्गपर कुचालें चलता रहा, भूलकर भी अच्छा काम न
बन पड़ा । बचपनमें भी खेलते समय मैंने अच्छा दाव नहीं खेला ॥२॥ किसीकी
देखादेखी, दम्भसे, या सत्संगसे यदि कोई अच्छा काम हो गया, तो उसे प्रत्यक्ष
रूपसे लोगोंको जनाया और पापोंको छिपा लिया । मैंने राग, द्वेष, क्रोध और
इन्द्रियोंके सहित मनका पोषण किया, इन्हींकी भक्ति की और इन्हींका भाव
(आदर) किया ॥३॥ मैंने आगेकी (आनेवालेकी), पीछेकी (बीते हुएकी),
और अबकी गतिका अनुमान करके समझ लिया कि मुझसे कभी कुछ नहीं
बना, (और न बन सकता है) । संसार कहता है 'तुलसी रामका है' और
यह तुलसी भी आपपर ही विश्वास और प्रेम रखता है । सच हो या झूठ, हे
रघुनाथ स्वामी ! मैं तो आपहीके आसरे हूँ ॥४॥
[ २६२ ]
कह्यो न परत, बिनु कहे न रह्यो परत,
बड़ो सुख कहत बड़े सों, वलि, दीनता ।

विनय-पत्रिका ४३१
प्रभु की बड़ाई बड़ी, अपनी छोटाई छोटी,
प्रभुकी पुनीतता, अपनी पाप-पीनता ॥१॥
दुहूँ ओर समुझि सकुचि सहमत मन,
सनमुख होत सुनि स्वामी-समीचीनता ।
नाथ-गुनगाथ गाये, हाथ जोरि माथ नाये,
नीचऊ निवाजे प्रीति-रीति की प्रबीनता ॥२॥
एही दरबार है गरब तें सरब-हानि,
लाभ जोग-छेम को गरीबी-मिसकीनता ।
मोटो दसकन्ध सों न दूबरो बिभीसन सों,
बूझि परी रावरे की प्रेम-पराधीनता ॥३॥
यहाँ को सयानप अयानप सहस सम,
सूधौ सतभाय कहे मिटति मलीनता ।
गीध-सिला-सबरी की सुधि सब दिन किये
होइगी न साईं सों सनेह-हित-हीनता ॥४॥
सकल कामना देत नाम तेरो कामतरु,
सुमिरत होत कलिमल-छल-छीनता ।
करुनानिधान ? बरदान तुलसी चहत,
सीतापत्ति-भक्ति-सुरसरि-नीर-मीनता ॥५॥
शब्दार्थ—समीचीनता = पुराना स्वभाव । प्रबीनता = कुशलता । मिसकीनता
(अरबीका शब्द है) = नम्रता । अयानप = अज्ञानपन, मूर्खता ।
भावार्थ—कहा तो जाता नहीं, और बिना कहे भी रहा नहीं जाता ।
बलिहारी ! किन्तु बड़ेसे अपनी दीनता कहनेमें बड़ा आनन्द आता है । प्रभुकी
बड़ी बड़ाई और अपनी छोटी (हल्की) छोटाई, प्रभुकी पवित्रता और अपने
पापोंकी पुष्टता ॥१॥ दोनों ओरकी इन बातोंको समझकर मेरा मन सकुचकर
सहम जाता है । किन्तु स्वामीका प्राचीन स्वभाव (दीनदयालुता, पतित-पावनता
आदि) सुनकर यह मन सम्मुख होता है । नाथके गुणोंकी गाथा गानेसे, तथा
हाथ जोड़कर मस्तक झुकानेसे आप नीचको भी प्रीतिकी रीति के कौशलसे

निहाल कर देते हैं ॥२॥ यही एक दरबार है जहाँ गर्वसे सर्वनाश हो जाता है,
एवं गरीबी और नम्रतासे ही योग-क्षेम-(रक्षा) का लाभ होता है। रावणके
समान मोटा और विभीषणके समान दुबला कोई नहीं था। किन्तु वहाँ मुझे
आपकी प्रेम-पराधीनता समझ पड़ी। (अर्थात् आपने भक्त विभीषणको अपना
लिया और रावणको मार डाला) ॥३॥ यहाँ (इस दरबार) का सयानापन
हजारों मूर्खताके समान है। यहाँ तो सीधे और सत्य भावसे कहनेसे ही मलिनता
दूर होती है। गीध, अहिल्या और शबरीकी सब दिन सुध करते रहनेसे स्वामीके
प्रति स्नेहके सम्बन्धमें कमी न होगी ॥४॥ आपका नाम कल्पवृक्षके समान सारी
कामनाएँ पूर्ण कर देता है। उसका स्मरण करते ही कलिके पाप और छल क्षीण
हो जाते हैं। हे करुणानिधान ! श्री सीतानाथके भक्तिरूपी गंगाजलमें मछली
(की तरह निमग्न) होनेके लिए यह तुलसी वरदान चाहता है ॥५॥

विशेष
१—'अपनी छोटाई छोटी'—इसमें बड़ा ही सुन्दर भाव है। वियोगी
हरिजीने इसका अर्थ किया है, 'अपनी छोटी-सी क्षुद्रता'। किन्तु यहाँ 'तुच्छाति-
तुच्छ छोटापन अथवा 'अत्यन्त ओछी', 'बहुत बड़ी क्षुद्रता' यह आशय प्रकट
करनेके लिए 'छोटी' शब्द प्रयुक्त हुआ है। यहाँ इसका अर्थ 'जरासी' या
'थोड़ी-सी' नहीं है।
२—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये।
३—'सिला'—४३ पदके विशेषमें देखिये।
४—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये।

[ २६३ ]
नाथ नीके कै जानिवी ठीक जन-जीय की।
रावरो भरोसो नाह कै सु-प्रेम-नेम लियो,
रुचिर रहनि रुचि मति गति तीय की ॥१॥
कुकृत-सुकृत बस सब ही सों संग पन्यो,
परखी परायी गति, आपने हूँ कीय की।

विनय-पत्रिका ४३३
मेरे भले को गोसाईं ! पोच को, न सोच-संक,
हौं हूँ किये कहौं सौंह साँची सीय-पीय की ॥२॥
ग्यान हू-गिरा के स्वामी, बाहर-अन्तरजामी,
यहाँ क्यों दुरैगी बात मुख की औ हीय की ?
तुलसी तिहारो, तुम हीं पै तुलसी के हित,
राखि कहौं हौं तो जो पै ह्वै हौं माखी घीय की ॥३॥
शब्दार्थ—जानिबी = जान लेना । कुकृत = बुरी करनी । कीय की = किये हुए की ।
पोच = नीच ।
भावार्थ—हे नाथ ! आप अपने सेवकके हृदयकी ठीक-ठीक बात अच्छी
तरह समझ लीजिये। मेरी बुद्धिने सुन्दर रहन और रुचिवाली (पतिव्रता) स्त्रीकी गति
धारण की है; उसने आपके भरोसे आपके साथ पतिका-सा प्रेम करनेका नेम कर
लिया है ॥१॥ पाप और पुण्यवश सभीका साथ पड़ा है, अतः अपनी और
परायी दोनोंकी गति परख चुका हूँ। हे स्वामिन् ! मुझ नीचको न तो (किसी
बातका) सोच है और न मैंने शंका ही की; क्योंकि मेरी भलाई करनेके लिए
तो आप हैं ही; यह बात मैं जानकी-वल्लभ श्रीरामजीका शपथ खाकर कहता
हूँ ॥२॥ (यह बात मैं बनाकर नहीं कह रहा हूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ कि)
आप ज्ञान और वाणीके स्वामी हैं, तथा बाहर और भीतरकी बात जाननेवाले
हैं; ऐसी दशामें हृदयकी और मुखकी बात आपसे कैसे छिपेगी ? अर्थात् हृदयमें
कुछ और हो किन्तु मुखसे और ही कहा जाय, यह बात आपसे छिपी नहीं
रह सकती । यह तुलसी आपका है और केवल आप ही तुलसीके हितू हैं; यदि मैं
इसमें कुछ बनाकर कहता होऊँगा, तो घीकी मक्खी हो जाऊँगा । अर्थात्
जिस प्रकार मक्खी घीमें पड़कर तुरन्त मर जाती है, उसी प्रकार मेरा सर्वनाश
हो जायगा ॥३॥
[ २६४ ]
मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो ।
चारि हू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ
तेरो तिहुँ काल कहु को है हितू हरि-सो ॥१॥
२८

४३४ विनय-पत्रिका
नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि,
परखे प्रपंची प्रेम, परत उघरि सो।
सुहृद-समाज दगाबाजीही को सौदा-सूत,
जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो ॥२॥
बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके,
देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो।
करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु,
राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो ॥३॥
आदि-अंत-बीच भलो, भलो करै सब ही को,
जाको जस लोक-बेद रह्यो है बगरिसो।
सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान,
कैसे कल परै सठ ! बैठो सो बिसरि-सो ॥४॥
जीवको जीवन, प्रान प्रानको परम हित
प्रीतम, पुनीतकृत नीचन, निदरि सो।
तुलसी ! तो को कृपालु जो कियो कोसलपालु,
चित्रकूट को चरित्र चेतु चित करि सो ॥५॥
शब्दार्थ—अनुभये = अनुभव किया। उघरि = खुल गया। सौदा-सूत = लेन-देनका
व्यवहार। बिबुध = देवता। बगरिसो = फैला-सा, बिखरा हुआ। कल = चैन।
भावार्थ—रे मन ! (पहले) मेरी बात सुन ले, फिर तुझे जो अच्छा लगे,
सो कर। तू अपने चारों नेत्रों (दो बाह्य चक्षु और दो मनश्चक्षु) से तीनों लोकमें
देखकर बतला कि तीनों कालमें भगवान्‌के समान तेरा हितू कौन है ॥१॥ तूने
शरीररूपी घरमें बसकर नये-नये स्नेहका अनुभव किया, कपटभरे प्रेमको परख
लिया, उसका सब भेद खुल गया। मित्रोंकी मण्डलीमें दगाबाजीके ही लेन-देन-
का व्यवहार है; जब जिसका काम होता है, तब वह पैरोंपर गिरकर मिलता
है ॥२॥ देवता भी बड़े चतुर हैं; (कह नहीं सकता कि) तूने उन्हें पहचाना है या
नहीं। वे (पहले) करोड़ गुना भरवा लेते हैं, (तब) एक गुना देते हैं। श्रीरघुनाथ-
जीके बिना कर्म, धर्म करनेका.फल केवल श्रम ही हाथ लगता है। वह (कर्म,

विनय-पत्रिका ४३५
धर्म) राखमें हवन या ऊसर जमीनपर वर्षा करनेके समान (निष्फल) है ॥३॥
जो (रामजी) आदिमें अन्तमें और मध्यमें अच्छे हैं, जो सभीका भला करते हैं,
और जिनका यश लोक और वेदमें फैल-सा रहा है, उन सीतापति रामचन्द्रके
समान शील-निधान स्वामी दूसरा कोई नहीं है। रे दुष्ट ! (ऐसे स्वामीको) तू
भूला-सा बैठा है; कैसे तुझे चैन पड़ रही है ? ॥४॥ जो (रामजी) जीवोंके जीवन,
प्राणोंके प्राण, परम हितकारी, अत्यन्त प्रिय और नीचोंको पवित्र करनेवाले हैं,
उनका तू निरादर कर रहा है। हे तुलसी ! कोशलपति कृपालु श्रीरामजीने तेरे
लिए चित्र-कूटमें जो लीला रची थी, उसका चित्त देकर स्मरण कर ॥५॥
विशेष
१—'चित्रकूटको चरित्र'—एक बार चित्रकूटमें गुसाईंजीको दो घुड़सवार
राजकुमार एक मृगका पीछा करते हुए दिखाई पड़े। उस समय गुसाईंजी
कुछ ध्यानावस्थित थे। ध्यानमें विघ्न पड़नेकी आशंकासे उन्होंने नेत्र बन्द करके
मस्तक झुका लिया। थोड़ी देरके बाद हनुमान्‌जीने दर्शन देकर उनसे पूछा कि
'राम ओर लक्ष्मणके दर्शन मिले या नहीं ? जो दो राजकुमार घोड़ेपर चढ़कर
गये हैं, वह श्रीरामजी ओर लक्ष्मणजी थे।' गुसाईंजी पछताने लगे। बोले—
'लोचन रहे बैरी होय ।
जानि-बूझि अकाज कीनो गये भू में गोय ॥
अविगत जु तेरी गति न जानी रह्यो जागत सोय ।
सबै छबि की अवधि में हैं निकसि गे ढिग होय ॥
करमहीन मैं पाय हीरा दियो पलमें खोय ।
दास तुलसी राम बिछुरे कहौ कैसी होय ॥'
इस पदमें उक्त प्रत्यक्ष दर्शनकी ओर ही गोसाईंजीका संकेत है।
[ २६५ ]
तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौँ
'जन हौं सिय-पीको'।
केहि अभाग जान्यो नहीं, जो न
होइ नाथ सों नातो-नेहु न नीको ॥१॥

४३६ विनय-पत्रिका
जल चाहत पावक लहौं,
विष होत अमी को ।
कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही,
मोहि कछु फहम न तरनि तमी को ॥२॥
जानि अंध अंजन कहै
बन-बाघिनी-घी को ।
सुनि उपचार बिकार को सुविचार करौं
जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥३॥
प्रभु सों कहत सकुचात हौं,
परौं जनि फिरि फीको ।
निकट बोलि, बलि, बरजिये,
परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥४॥
शब्दार्थ—फहम = ज्ञान । तरनि = सूर्य, प्रकाश । तमी = रात्रि, अन्धकार । बरजिये
= मना कर दीजिए । जीको = जीव का ।
भावार्थ—हे प्रभो ! मैं शरीरको पवित्र और मनमें रुचि रखता हूँ; मुखसे
भी कहता हूँ कि 'मैं जानकी-वल्लभ श्रीरघुनाथजीका सेवक हूँ'; फिर भी जानता
नहीं कि किस दुर्भाग्यसे नाथके साथ मेरा भली-भाँति स्नेह-सम्बन्ध नहीं हो
रहा है ॥१॥ चाहता हूँ जल, पाता हूँ आग ! (शान्तिकी जगह त्रिताप मिलता
है) । इसी प्रकार मेरे लिए अमृतका भी विष हो जाता है (अर्थात् अमृतरूपी
सत्कर्म अभिमानरूपी विष पैदा करता है) । सन्तोंने जो कलिकालकी कुचालें
कही हैं, वे सही हैं । मुझे प्रकाश और अन्धकारका कुछ भी ज्ञान नहीं है
(अर्थात् मैं ज्ञान और अज्ञानको यथार्थ रूपसे नहीं पहचान सकता) ॥२॥ मुझे
अन्धा जानकर (कलि) वनकी सिंहिनीके घीका अंजन लगानेको कहता है । जब
मैं यह विकारयुक्त उपचार सुनकर उसपर सुन्दर विचार करता हूँ, तब वह मेरे
हृदयके बुद्धिवलको हर लेता है (अज्ञान-वनमें वासनारूपी सिंहिनी रहती है ।
विषय ही उसका घी है । वह तो पासमें जाते ही खा जायगी, विषयोंमें फँसे हुए
जीवको ज्ञानरूपी नेत्र कैसे मिल सकते हैं ?) ॥३॥ हे प्रभो ! मैं आपसे कहनेमें
सकुचाता हूँ कि कहीं मैं फिर फीका न पड़ जाऊँ । इसीसे मैं बलैया लेता हूँ,