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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 432

विनय-पत्रिका ४२१
प्रीति करि काहूने सुख न लह्यो ।
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों सम्पुट माँहिं रह्यो ॥
प्रीति पतंग करीजु दीपक सों आपुन प्रान दह्यो ।
सारँग प्रीति करीजु नाद सों सनमुख बान सह्यो ॥
हम जो प्रीति करी माधव सों चलत कछू ना कह्यो ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु नैनन नीर बह्यो ॥
२—'सोई नर खरु है'—ईश्वर-विमुख प्राणीको गधेकी उपाधि देना
मामूली बात है । श्रीमद्भागवतमें तो यह लिखा है:—
श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः ।
न यत्कर्णपथोपेतो जातुनाम गदाग्रजः ॥
बिले बतोरुक्रमविक्रमान्ये
नशृण्वतः कर्णपुटे नरस्य ।
जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥
(२।३।१९-२०)
अर्थात् 'जिसके कर्णपथमें भगवान्‌के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं किया,
वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और गधेकी अपेक्षा भी
अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी ! जो कान भगवान्‌की लीलाका श्रवण नहीं
करते वे साँपकी बिलके समान हैं और जो दुष्ट जिह्वा भगवान्‌की लीला-कथाका
गान नहीं करती वह मेढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली है ।
इस श्लोकका अनुवाद गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें इस प्रकार
किया है—
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवनरन्ध्र अहि-भवन समाना ॥
जो नहिं करहि राम-गुन-गाना । जीह सो दादुर-जीह समाना ॥
३—'नाम सों निबाह......बरु है'--इसका अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा
है—बलिहारी—तुलसीदासको वही बड़ा बल दीजिये, जिससे आपके नामके