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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 446

विनय-पत्रिका ४३५
धर्म) राखमें हवन या ऊसर जमीनपर वर्षा करनेके समान (निष्फल) है ॥३॥
जो (रामजी) आदिमें अन्तमें और मध्यमें अच्छे हैं, जो सभीका भला करते हैं,
और जिनका यश लोक और वेदमें फैल-सा रहा है, उन सीतापति रामचन्द्रके
समान शील-निधान स्वामी दूसरा कोई नहीं है। रे दुष्ट ! (ऐसे स्वामीको) तू
भूला-सा बैठा है; कैसे तुझे चैन पड़ रही है ? ॥४॥ जो (रामजी) जीवोंके जीवन,
प्राणोंके प्राण, परम हितकारी, अत्यन्त प्रिय और नीचोंको पवित्र करनेवाले हैं,
उनका तू निरादर कर रहा है। हे तुलसी ! कोशलपति कृपालु श्रीरामजीने तेरे
लिए चित्र-कूटमें जो लीला रची थी, उसका चित्त देकर स्मरण कर ॥५॥
विशेष
१—'चित्रकूटको चरित्र'—एक बार चित्रकूटमें गुसाईंजीको दो घुड़सवार
राजकुमार एक मृगका पीछा करते हुए दिखाई पड़े। उस समय गुसाईंजी
कुछ ध्यानावस्थित थे। ध्यानमें विघ्न पड़नेकी आशंकासे उन्होंने नेत्र बन्द करके
मस्तक झुका लिया। थोड़ी देरके बाद हनुमान्‌जीने दर्शन देकर उनसे पूछा कि
'राम ओर लक्ष्मणके दर्शन मिले या नहीं ? जो दो राजकुमार घोड़ेपर चढ़कर
गये हैं, वह श्रीरामजी ओर लक्ष्मणजी थे।' गुसाईंजी पछताने लगे। बोले—
'लोचन रहे बैरी होय ।
जानि-बूझि अकाज कीनो गये भू में गोय ॥
अविगत जु तेरी गति न जानी रह्यो जागत सोय ।
सबै छबि की अवधि में हैं निकसि गे ढिग होय ॥
करमहीन मैं पाय हीरा दियो पलमें खोय ।
दास तुलसी राम बिछुरे कहौ कैसी होय ॥'
इस पदमें उक्त प्रत्यक्ष दर्शनकी ओर ही गोसाईंजीका संकेत है।
[ २६५ ]
तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौँ
'जन हौं सिय-पीको'।
केहि अभाग जान्यो नहीं, जो न
होइ नाथ सों नातो-नेहु न नीको ॥१॥