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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 444

विनय-पत्रिका ४३३
मेरे भले को गोसाईं ! पोच को, न सोच-संक,
हौं हूँ किये कहौं सौंह साँची सीय-पीय की ॥२॥
ग्यान हू-गिरा के स्वामी, बाहर-अन्तरजामी,
यहाँ क्यों दुरैगी बात मुख की औ हीय की ?
तुलसी तिहारो, तुम हीं पै तुलसी के हित,
राखि कहौं हौं तो जो पै ह्वै हौं माखी घीय की ॥३॥
शब्दार्थ—जानिबी = जान लेना । कुकृत = बुरी करनी । कीय की = किये हुए की ।
पोच = नीच ।
भावार्थ—हे नाथ ! आप अपने सेवकके हृदयकी ठीक-ठीक बात अच्छी
तरह समझ लीजिये। मेरी बुद्धिने सुन्दर रहन और रुचिवाली (पतिव्रता) स्त्रीकी गति
धारण की है; उसने आपके भरोसे आपके साथ पतिका-सा प्रेम करनेका नेम कर
लिया है ॥१॥ पाप और पुण्यवश सभीका साथ पड़ा है, अतः अपनी और
परायी दोनोंकी गति परख चुका हूँ। हे स्वामिन् ! मुझ नीचको न तो (किसी
बातका) सोच है और न मैंने शंका ही की; क्योंकि मेरी भलाई करनेके लिए
तो आप हैं ही; यह बात मैं जानकी-वल्लभ श्रीरामजीका शपथ खाकर कहता
हूँ ॥२॥ (यह बात मैं बनाकर नहीं कह रहा हूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ कि)
आप ज्ञान और वाणीके स्वामी हैं, तथा बाहर और भीतरकी बात जाननेवाले
हैं; ऐसी दशामें हृदयकी और मुखकी बात आपसे कैसे छिपेगी ? अर्थात् हृदयमें
कुछ और हो किन्तु मुखसे और ही कहा जाय, यह बात आपसे छिपी नहीं
रह सकती । यह तुलसी आपका है और केवल आप ही तुलसीके हितू हैं; यदि मैं
इसमें कुछ बनाकर कहता होऊँगा, तो घीकी मक्खी हो जाऊँगा । अर्थात्
जिस प्रकार मक्खी घीमें पड़कर तुरन्त मर जाती है, उसी प्रकार मेरा सर्वनाश
हो जायगा ॥३॥
[ २६४ ]
मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो ।
चारि हू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ
तेरो तिहुँ काल कहु को है हितू हरि-सो ॥१॥
२८