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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 431

४२० विनय-पत्रिका
बेद हू, पुरान हू, पुरारि हू पुकारि कह्यो,
नाम-प्रेम चारि फल हू को फरु है।
ऐसे राम-नाम सों न प्रीति, न प्रतीति मन,
मेरे जान, जानिबो सोई नर खरु है ॥३॥
नाम-सों न मातु-पितु, मीत-हित, बन्धु-गुरु,
साहिब, सुधी, सुसील, सुधाकरु है।
नाम सों निबाह नेहु, दीन को दयालु ! देहु,
दास तुलसी को, बलि, बड़ो बरु है ॥४॥
शब्दार्थ—सुरतरु = कल्पवृक्ष। घाम = धूप, ताप। सरसिज = कमल। सरु = तालाब।
खरु = गधा। सुधी = सुन्दर बुद्धिवाला, बुद्धिमान्। बरु = वरदान।
भावार्थ—हे राम ! आपका नाम साधुओंके लिए कल्पवृक्ष है, स्मरण करते
ही तीनों तापोंको हर लेता है और सब मनोरथ पूरा कर देता है। वह समस्त
सुकृतरूपी कमलोंका सरोवर है ॥१॥ वह लाभका भी लाभ, सुखका भी सुख,
सर्वस्व, पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा डरका भी डर है अर्थात् कालका भी
काल है। वह नीच, ऊँच, रंक (गरीब), राव (अमीर) सबके लिए सुलभ
है, और अपने घरके समान सुख देनेवाला है ॥२॥ वेदोंने, पुराणोंने तथा
शिवजीने भी पुकारकर कहा है कि राम-रामका प्रेम चारों फलों (अर्थ, धर्म,
काम, मोक्ष) का सारस्वरूप है। ऐसे रामनामपर जिसके मनमें प्रेम और विश्वास
नहीं है, मेरी समझसे उसी आदमीको (असली) गधा समझना चाहिये ॥३॥
नामके समान माता, पिता, मित्र, हितकारी, बन्धु, गुरु और स्वामी कोई नहीं
है। वह (नाम) बुद्धिमान्, सुशील और चन्द्रमाके समान सुन्दर है। हे
दीनोंपर दया करनेवाले रामजी ! मुझे बस यही दीजिये कि आपके नामके साथ
मेरा जो प्रेम है, वह निभ जाय। बलिहारी ! इस सेवक तुलसीके लिए (आपका
इतना देना ही) सबसे बड़ा वरदान है।
विशेष
१—'राम-नाम सों न प्रीति'—किन्तु गोस्वामीजी महाराज ! 'प्रीति' के
सम्बन्धमें सूरदासजीकी उक्ति भी तो देखनी है:—