विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४३१
प्रभु की बड़ाई बड़ी, अपनी छोटाई छोटी,
प्रभुकी पुनीतता, अपनी पाप-पीनता ॥१॥
दुहूँ ओर समुझि सकुचि सहमत मन,
सनमुख होत सुनि स्वामी-समीचीनता ।
नाथ-गुनगाथ गाये, हाथ जोरि माथ नाये,
नीचऊ निवाजे प्रीति-रीति की प्रबीनता ॥२॥
एही दरबार है गरब तें सरब-हानि,
लाभ जोग-छेम को गरीबी-मिसकीनता ।
मोटो दसकन्ध सों न दूबरो बिभीसन सों,
बूझि परी रावरे की प्रेम-पराधीनता ॥३॥
यहाँ को सयानप अयानप सहस सम,
सूधौ सतभाय कहे मिटति मलीनता ।
गीध-सिला-सबरी की सुधि सब दिन किये
होइगी न साईं सों सनेह-हित-हीनता ॥४॥
सकल कामना देत नाम तेरो कामतरु,
सुमिरत होत कलिमल-छल-छीनता ।
करुनानिधान ? बरदान तुलसी चहत,
सीतापत्ति-भक्ति-सुरसरि-नीर-मीनता ॥५॥
शब्दार्थ—समीचीनता = पुराना स्वभाव । प्रबीनता = कुशलता । मिसकीनता
(अरबीका शब्द है) = नम्रता । अयानप = अज्ञानपन, मूर्खता ।
भावार्थ—कहा तो जाता नहीं, और बिना कहे भी रहा नहीं जाता ।
बलिहारी ! किन्तु बड़ेसे अपनी दीनता कहनेमें बड़ा आनन्द आता है । प्रभुकी
बड़ी बड़ाई और अपनी छोटी (हल्की) छोटाई, प्रभुकी पवित्रता और अपने
पापोंकी पुष्टता ॥१॥ दोनों ओरकी इन बातोंको समझकर मेरा मन सकुचकर
सहम जाता है । किन्तु स्वामीका प्राचीन स्वभाव (दीनदयालुता, पतित-पावनता
आदि) सुनकर यह मन सम्मुख होता है । नाथके गुणोंकी गाथा गानेसे, तथा
हाथ जोड़कर मस्तक झुकानेसे आप नीचको भी प्रीतिकी रीति के कौशलसे