विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४१७
किसी प्रकार मैंने आपके नामकी शरण ली है ॥४॥ हे रामजी ! आप अपने
नामका प्रताप जानते हैं। विधाताने मेरे लिए (आपके नामके सिवा) दूसरी
गति बनायी ही नहीं। आपके क्रोध करने योग्य मेरे करोड़ों बुरे कर्म हैं; किन्तु
आपके प्रसन्न होने योग्य तुलसीदासकी केवल निर्लज्जता ही है ॥५॥
विशेष
१—'दई'—कुछ टीकाकारोंने इस शब्दका 'दयालु' अर्थ भी लिखा है।
[ २५३ ]
राम ! राखिये सरन, राखि आये सब दिन ।
बिदित त्रैलोक तिहुँ काल न दयालु दूजो,
आरत-प्रनत-पाल को है प्रभु बिन ? ॥१॥
लाले पाले, पोषे तोषे आलसी-अभागी-अघी,
नाथ ! पै अनाथनि सों भये न उरिन ।
स्वामी समरथ ऐसो, हौं तिहारो जैसे-तैसो
काल-चाल हेरि होति हिये घनी घिन ॥२॥
खीझि-रीझि-बिहँसि-अनख, क्यों हूँ एक बार
'तुलसी तू मेरो', बलि कहियत किन ?
जाहि सूल निरमूल, होहिं सुख अनुकूल,
महाराज राम ! रावरी सौं, तेहि छिन ॥३॥
शब्दार्थ—तोषे = सन्तुष्ट कर दिया। अघी = पापी। हेरि = देखकर। अनख = त्यौरी
चढ़ाकर। सौं = शपथ।
भावार्थ—हे रामजी ! मुझे अपनी शरणमें रखिये, क्योंकि आप सदासे
(दीनोंको शरणमें) रखते आये हैं। यह प्रकट है कि तीनों लोक और तीनों काल-
में आपके समान कोई दयालु नहीं है। हे प्रभो ! आपको छोड़कर शरणागत
दीन-दुखियोंका पालन करनेवाला दूसरा कौन है ? ॥१॥ आपने आलसी, अभागे
और पापियोंका लालन-पालन किया, पोषण किया और उन्हें सन्तुष्ट कर दिया।
फिर भी हे नाथ ! (इतना करनेपर भी) आप उनसे उऋण नहीं हुए। स्वामी !
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