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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 434

विनय-पत्रिका ४२३
विशेष
१—'नाथकी महिमा'—राम-नामकी महिमा इतनी अधिक है—
नाम्नां सहस्रं दिव्यानां स्मरणे यत् फलं लभेत् ।
तत्फलं लभते नूनं रामोच्चारणमात्रतः ॥
—ब्रह्मवैवर्त ।
[ २५७ ]
दीनबन्धु ! दूरि किये दीन को न दूसरी सरन ।
आपको भले हैं सब, आपने को कोऊ कहूँ,
सब को भलो है राम ! रावरो चरन ॥१॥
पाहन, पसु, पतंग, कोल, भील, निसिचर
काँच ते कृपानिधान किये सुबरन ।
दंडक-पुहुमि पाय परसि पुनीत भई,
उकठे बिटप लागे फूलन-फरन ॥२॥
पतित-पावन नाम बाम हू दाहिनो, देव !
दुनी न दुसह-दुख-दूषन-दरन ।
सीलसिंधु तोसों ऊँची-नीचियौ कहत सोभा,
तो सो तुहीं तुलसी को आरति-हरन ॥३॥
शब्दार्थ—पतंग = पक्षी । पुहुमि = पृथिवी । उकठे = सूखे हुए । बिटप = वृक्ष । आरति =
दुःख । हरन = हरनेवाले ।
भावार्थ—हे दीनबन्धु ! यदि आपने इस दीनको दूर कर दिया तो फिर
इसे दूसरी शरण न मिलेगी । क्योंकि यों तो आप-आपके सभी अच्छे हैं, पर
अपने भक्तोंके लिए विरले ही लोग अच्छे हैं। किन्तु हे रामजी ! आपके चरण
सबके लिए अच्छे हैं, अर्थात् भक्तोंके लिए तो अच्छे हैं ही, अभक्तोंके लिए भी
अच्छे हैं। क्योंकि चरणोंके प्रतापसे ही बालि तर गया था ॥१॥ हे कृपानिधान !
आपने पाषाणी (अहिल्या), पशु (रीछ, बन्दर), पक्षी (जटायु), कोल-भील तथा
राक्षसोंको काँचसे सुवर्ण बना दिया । दंडक वनकी भूमि आपके चरणोंका स्पर्श
होते ही पुनीत हो गयी और वहाँके उकठे हुए पेड़-(हरे-भरे होकर) फूलने-फलने