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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 439

४२८ . विनय-पत्रिका
अवश्य पिघल जायगा) ॥२॥ कर्मनिष्ठ, धर्मात्मा, साधु, सेवक, विरक्त और
(संसारमें) रत ये सब अपने-अपने सत्कर्मोंके अनुसार कहाँ और कौनसा स्थान
प्राप्त न कर सकेंगे ? किन्तु आपके मुँह फेरनेपर मुझ सरीखे कायर, कपूत, क्रूर,
लटे हुए और लटपटाये हुए लोगोंको कौन अंगीकार करेगा ? ॥३॥ हे दयालु !
समय पाकर सबकी दशा फिरती है, किन्तु मुझे तो आपके बिना कोई कभी न
पूछेगा । हे रामजी ! मैं शपथ खाकर वचन, कर्म और मनसे कहता हूँ कि इस
तुलसीकी तो आपहीके निभानेसे निभेगी ॥४॥
[ २६० ]
साहिब उदास भये दास खास खीस होत
मेरी कहा चली ? हौं बजाय जाय रह्यो हौं ।
लोक में न ठाउँ ! परलोक को भरोसो कौन ?
हौं तो, बलि जाउँ, रामनाम ही ते लह्यो हौं ॥१॥
करम, सुभाउ, काल, काम, कोह, लोभ, मोह,
ग्राह अति गहनि गरीबी गाढ़े गह्यो हौं ।
छोरिबे को महाराज, बाँधिबे को कोटि भट,
पाहि प्रभु ! पाहि, तिहुँ ताप-पाप दह्यो हौं ॥२॥
रीझि बूझि सबकी प्रतीति-प्रीति एही द्वार,
दूध को जल्ह्यो पियत फूँकि फूँकि मह्यो हौं ।
रटत-रटत लठ्यो, जाति-पाँति-भाँति घट्यो
जूठनि को लालची चहौं न दूध नह्यो हौं ॥३॥
अनत चह्यो न भलो, सुपथ सुचाल चल्यो
नीके जिय जानि इहाँ भलो अनचह्यो हौं ।
तुलसी समुझि समुझायो मन बार-बार,
अपनो सो नाथ हू सों कहि निरबह्यो हौं ॥४॥
शब्दार्थ—खीस = बर्बाद । हौं = हूँ । हौं = मैं । गाढ़े = दृढ़तासे । भट = योद्धा । प्रतीति
= विश्वास । मह्यो = मट्ठा । अनत = अन्यत्र ।
भावार्थ—स्वामीके उदासीन होनेसे खास नौकर भी बर्बाद हो जाता है, मेरी