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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 433, कुल 475 में से

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पृष्ठ 433

साथ उस दीनका प्रेम निभ जाय (बीचमें कोई बाधक न हो) । 'वरु' का अर्थ
'जल' करनेके कारण ही साधु अर्थ गुम हो गया है।
[२५६]
कहे बिनु रह्यो न परत, कहे राम ! रस न रहत।
तुम से सुसाहिब की ओट जन खोटो-खरो,
काल की, करमकी कुसाँसति सहत ॥१॥
करत बिचार सार पैयत न कहूँ कछु,
सकल बड़ाई सब कहाँ ते लहत ?
नाथ की महिमा सुनि, समुझि अपनी ओर,
हेरि हारि कै हहरि हृदय दहत ॥२॥
सखा न, सुसेवक न, सुतिय न, प्रभु आप,
माय-बाप तुही साँचो तुलसी कहत ।
मेरी तौ थोरी है, सुधरैगी बिगरियौ, बलि,
राम ! रावरी सौं रही रावरी चहत ॥३॥
शब्दार्थ—कुसाँसति = बुरी तरह कष्ट ! हेरि = देखकर । हहरि = हताश होकर ।
बिगरियौ = बिगड़ी हुई भी ।
भावार्थ—हे रामजी ! कहे बिना रहा नहीं जाता और कहनेसे मजा जाता
रहता है। आप-सरीखे सुन्दर स्वामीकी आड़ पाकर भी यह खरा-खोटा सेवक
काल और कर्मकी बुरी तरह तकलीफ सह रहा है ॥१॥ (आपका यह सेवक)
विचार किया करता है, पर कहीं कुछ सार नहीं पाता । सब लोग नाना प्रकार-
की बड़ाई कहाँसे पाते हैं ? हे नाथ ! आपकी महिमा सुन-समझकर तथा अपनी
ओर (अपनी करनीकी ओर) देखकर हार मान लेता और जी छोटा कर लेता
हूँ; इससे मेरा हृदय जलने लगता है ॥२॥ न तो मेरा कोई मित्र है, न अच्छा
सेवक है और न अच्छी स्त्री है । हे प्रभो ! तुलसी तो सच्ची बात कहता है कि
उसके माता-पिता बस आप ही हैं। मेरी तो थोड़ी-सी बात है, बिगड़नेपर भी
सुधर जायगी; किन्तु हे रामजी, बलिहारी ! आपकी कसम, मैं तो केवल आपकी
बात रखना चाहता हूँ ॥३॥