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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 429

४१८ विनय-पत्रिका
आप ऐसे समर्थ हैं, और मैं जैसा भी हूँ तैसा आपहीका हूँ; कलिकालकी चाल
देखकर मेरे हृदयमें गहरी घृणा पैदा हो रही है ॥२॥ बलिहारी ! एकबार आप
झल्लाकर, प्रसन्न होकर, हँसकर अथवा अनखाकर किसी भी तरह सही, इतना
क्यों नहीं देते कि 'तुलसी, तू मेरा है' । हे महाराज रामचन्द्र ! आपकी सौगन्ध,
(आपके इतना कहते ही) उसी क्षण मेरा सब दुःख जड़से नष्ट हो जायगा और
सब सुख मेरे अनुकूल हो जायँगे ॥३॥
विशेष
—'तोषे'—'पोषे तोषे'का अर्थ कई टीकाकारोंने 'पाला-पोसा' लिखा है।
[ २५४ ]
राम ! रावरो नाम मेरो मातु-पितु है ।
सुजन, सनेही, गुरु-साहिब, सखा-सुह्रद,
राम-नाम प्रेम-पन अविचल बितु है ॥१॥
सतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि,
लियो काढ़ि बामदेव नाम-घृतु है ।
नामको भरोसो-बल चारि हू फल को फल,
सुमिरिये छाँड़ि छल, भलो क्रतु है ॥२॥
स्वारथ-साधक, परमारथ-दायक नाम,
राम-नाम सारिखो न और हितु है ।
तुलसी सुभाव कही साँचिये परैगी सही,
सीतानाथ-नाम नित चित हू को चितु है ॥३॥
शब्दार्थ—अविचल = विचलित न होनेवाला। बितु = धन। बामदेव = महादेवजी।
क्रतु = कर्म, यज्ञ। चितु = चित्त।
भावार्थ—हे रामजी ! आपका नाम ही मेरा माता-पिता, स्वजन, सनेही,
गुरु, स्वामी, मित्र और सुहृद है। आपके नाममें जो प्रेमका मेरा प्रण है, वही मेरा
स्थायी धन है ॥१॥ शिवजीने सैकड़ों करोड़ आपके चरित्ररूपी अगाध दधिसमुद्र-
को मथकर नाम-रूपी घी निकाल लिया है। नामका बल-भरोसा चारों फलोंका
फल यानी अर्थ, धर्म, काम, मोक्षका सार-रूप है। इसलिए छल छोड़कर राम-