वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
१ अध्याय २ आन्हिक १९
१ अध्याय २ आन्हिक १९
तीसरे वस्तु के पास विषमता भी होती है, विषमता और विशेष एक ही बात
है, जो बुद्धिकृत अपेक्षा से है ॥
इस विषय में "समानप्रसवात्मिका जातिः" इस न्याय सूत्रानुसार कदा-
चित् कोई लोग सामान्य का अर्थ सजातीयता समझें, इस कारण हम उद-
यनाचार्य की एक कारिका वैशेषिकदर्शन वैदिक सूत्रवृत्ति से उठा कर रखते
हैं, जिस से कई प्रकार का सामान्य भी जाति होने में बाधक ज्ञात होता है। यथा-
व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथानवस्थितिः ।
रूपहानिरसम्बन्धोजातिबाधकसंग्रहः ॥ १ ॥
इतने कारण जाति के बाधक संगृहीत हैं। १- यह कि व्यक्ति का भेद
( डिफरेंशियर्शी ) न होना । जैसे काल, दिशा, आकाश, तीनों एक दूसरे
से व्यक्ति में भिन्न नहीं, इस लिये काल दिशा आकाश एक जाति नहीं। २-
यह कि सर्वथा तुल्य होना, जैसे घट और कलश एक जाति नहीं, प्रत्युत एक
ही वस्तु हैं, केवल नाममात्र का अन्तर है । ३- यह कि एक धर्म का दूसरे
धर्म में अत्यन्त अभाव हो, परन्तु एक द्रव्य के ही आश्रय दोनों धर्म हों,
इस को संकर कहते हैं । यह भी जातिबाधक है। जैसे भूतपना और मूर्त्त-
पना जाति नहीं । यद्यपि एक ही द्रव्य ( पृथिवी वा जल आदि ) में आश्रय
रखने वाले दोनों धर्म हैं । पृथिवी भूत भी है, मूर्त्त भी है, तथापि भूतत्व
और मूर्त्तत्त्व एक जाति नहीं। क्योंकि भूतत्त्व से रहित मूर्त्तत्त्व 'मन' में है।
मूर्त्तत्त्व से रहित भूतत्त्व आकाश में है और पृथिवी जल अग्नि में भूतत्व
मूर्त्तत्त्व दोनों इकट्ठे हैं। ४- यह कि अनवस्था होना, जैसे सामान्यमें एक दूसरा
सामान्य मानने लगें और फिर उस में एक तीसरा सामान्य मानने लगें तो यह
अनवस्था ( तसलसुल ) होगी, जो जाति नहीं। ५- यह कि रूप की हानि । जैसे
विशेष पदार्थ में विशेषत्व कोई जाति नहीं, क्योंकि वह तो स्वरूप से व्यावर्तक
स्वीकृत है । ६- यह कि संबन्ध न होना । जैसे समवाय होना कोई जाति
नहीं, क्योंकि एक समवाय में कोई दूसरा समवाय माना नहीं गया ॥
जाति आदि कई शब्द जो इस व्याख्यान में आये हैं उन का अर्थ
बताये देते हैं । नित्य होते हुये अनेकों से समवाय होना=सामान्य । अपने
पराये के भेदक स्वभाव वाला होना=विशेष । नित्य सम्बन्ध=समवाय ।
शब्द का समवायी कारण होना=आकाशत्व । व्यतीत आदि व्यवहार का हेतु
२० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
होना=काल । पूर्व पश्चिमादि व्यवहार का हेतु होना दिशापन है ॥
नाम लेकर किसी पदार्थ का कथन करना=उद्देश है । और विभाग भी एक
प्रकार का उद्देश ही है, उस में भी नाम ही गिनाये जाते हैं। उद्दिष्ट पदार्थ
के निजस्वरूप को बताने वाला असाधारण धर्म लक्षण है। लक्षित में लक्षण
घटता है वा नहीं, इस बात को प्रमाणों से परखना=परीक्षा है। पृथिवी, जल,
तेज, वायु, और आकाश, ये ५ भूत हैं। चक्षुरादि बाह्येन्द्रियों से ग्रहण करने
योग्य विषय वाला होना=भूतत्व है। जैसे आंख से ग्राह्य रूप का भूत=तेज ।
नाक से ग्राह्य गन्ध का भूत= पृथिवी । कान से ग्राह्य शब्द का भूत=आकाश ।
त्वचा से ग्राह्य स्पर्श का भूत=वायु और रसना से ग्राह्य रस का भूत जल है॥३॥
३५-भावोऽनुवृत्तेरेव हेतुत्वात्सामान्यमेव ॥ ४ ॥
(भावः) सत्ता (अनुवृत्तेः) अनुवृत्ति के ( एव) ही ( हेतुत्वात् ) हेतु होने से
( सामान्यम् ) सामान्य ( एव ) ही है ॥
सब ही पदार्थ किसी की अपेक्षा से सामान्य हैं, तौ दूसरे की अपेक्षा से विशेष
भी हैं, परन्तु भाव= सत्ता=होना एक ऐसा पदार्थ है जिस को सामान्य ही कह
सक्ते हैं, विशेष नहीं, क्योंकि वह अनुवृत्ति का ही हेतु है, व्यावृत्ति का नहीं। और
विशेष कहते हैं व्यावर्तक हेतु को । सत्ता तौ अनुवृत्ति बुद्धि के अतिरिक्त कभी
व्यावृत्ति की प्रतीति कराती ही नहीं। इसलिये सामान्य ही है, विशेष नहीं ॥४॥
३६-द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्मत्वं च सामान्यानि विशेषाश्च ॥५॥
(द्रव्यत्वं) द्रव्यत्व (गुणत्वं) गुणत्व ( च ) और ( कर्मत्वं.) कर्मत्व ( सामा-
न्यान्यि ) ये सामान्य हैं ( च ) और ( विशेषाः ) विशेष भी ॥
द्रव्यत्व गुणत्व कर्मत्वादि, सत्ता की अपेक्षा विशेष हैं, परन्तु पृथिवी-
त्वादि की अपेक्षा से सामान्य हैं । क्योंकि सत्ता से अधिकदेशवर्त्ती तौ कोई
है ही नहीं, इसलिये भाव वा सत्ता से सब विशेष हैं, परन्तु जो द्रव्यत्व
द्रव्य सामान्य में है, वही द्रव्यत्व अपने एक विभाग पृथिवीत्वादि में भी है,
इसलिये द्रव्यत्व सामान्य भी हुवा । इसी प्रकार गुणत्व और कर्मत्व को
समझिये ॥ ५ ॥
३७-अन्यत्राऽन्त्येभ्योविशेषेभ्यः ॥ ६ ॥
( अन्त्येभ्यः ) अन्त में होने वाले ( विशेषेभ्यः ) विशेषों से ( अन्यत्र )
अन्यत्र [ पूर्वसूत्रोक्त नियम है ] ॥
१ अध्याय २ आन्हिक २१
१ अध्याय २ आन्हिक २१
पूर्व सूत्र में जो द्रव्यत्वादि को सामान्य और विशेष दोनों प्रकार का
होना कहागया वह सार्वत्रिक नियम नहीं, किन्तु अन्त्य विशेष = घटत्व
पटत्वादि से अन्यत्र समझना चाहिये। अर्थात् द्रव्यत्वादि को अपने विभाग
पृथिवीत्वादि से तो सामान्य है, और विशेष भी है, परन्तु पृथिवीत्व के भी
अन्त में जो घटत्व पटत्वादि विशेष हैं, उन में तो द्रव्यत्वादि से सामान्य
नहीं, किन्तु विशेष ही है। जिस प्रकार सत्ता सदा सामान्य ही है, विशेष
नहीं, उसी प्रकार अन्त्य विशेष जो कि घटत्वपटत्त्वादि अनन्त हैं, वे सामान्य
नहीं, विशेष ही विशेष हैं ॥ ६ ॥ अब सत्ता का लक्षण करते हैं :-
३८-सदिति यतोद्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता ॥ ७ ॥
(यतः) जिस पदार्थ से (द्रव्यगुणकर्मसु) द्रव्यों, गुणों और कर्मों में
(सत्) है (इति) ऐसा जाना जाता है (सा) वह (सत्ता) सत्ता वा भाव
कहाता है ॥
द्रव्य है, गुण है, कर्म है, इत्यादि प्रत्ययों में जो "होना" वस्तु है, वह
सत्ता कहाती है ॥ ७ ॥
प्रश्न- क्योंजी ! तो सत्ता कोई पृथक् पदार्थ तौ न हुवा, "द्रव्य है" इस
में द्रव्य ही तो सत्ता हुई, न कि कुछ और ? उत्तर-
३९-द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता ॥ ८ ॥
(द्रव्यगुणकर्मभ्यः) द्रव्य, गुण और कर्म से (सत्ता) भाव (अर्थान्तरम्)
अन्य पदार्थ है ॥ ८ ॥ क्योंकि-
४०-गुणकर्मसु च भावान्न कर्म न गुणः ॥ ९ ॥
(गुणकर्मसु) गुणों और कर्मों में (च) और द्रव्यों में भी (भावात्)
होने से (न) न तौ (कर्म) कर्म है, (न) और न (गुणः) गुण है ॥
यदि सत्ता द्रव्यरूप ही होती तौ गुण वा कर्म में सत्ता न होती, परन्तु
जिस प्रकार द्रव्य में सत्ता है, उसी प्रकार कर्म और गुण में भी है, इस से
पाया जाता है कि सत्ता एक भिन्न पदार्थ है, जो द्रव्य गुण कर्म रूप नहीं है ॥९॥
४१-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १० ॥
(सामा-न) सामान्य और विशेष के न होने से (च) भी ॥
जिस प्रकार द्रव्य गुण और कर्म तीनों में सूत्र (३६) के अनुसार सामान्य
और विशेष दोनों हैं, इसी प्रकार यदि सत्ता इन से भिन्न न होती तो उस
(सत्ता) में भी सामान्य विशेष होते, परन्तु सूत्र (१५) के अनुसार सत्ता
केवल सामान्य ही है, विशेष नहीं, इस हेतु से भी सत्ता को अर्थान्तर ही
मानना चाहिये ॥ १० ॥
४२-अनेकद्रव्यवत्त्वेन द्रव्यत्वमुक्तम् ॥ ११ ॥
(अनेकद्रव्यवत्त्वेन) अनेक द्रव्य वाला होने से (द्रव्यत्वम्) द्रव्यत्व
(उक्तम्) कहा गया ॥
द्रव्य से द्रव्यत्व में क्या भेद है, सो बताते हैं कि जो सत्ताव्याप्य अपरा
सामान्य द्रव्यत्व (द्रव्य पन) है, वह अनेक द्रव्यों वाला है, और द्रव्य (कोई
एक) द्रव्य ही है, इस से द्रव्यत्व कहा गया ॥ ११ ॥ और
४३-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १२ ॥
(सा-वेन) सामान्य विशेष न होने से (च) भी ॥
द्रव्य तो सामान्य और विशेष वाले होते हैं परन्तु द्रव्यत्व एकसा है, उस में
सामान्य और विशेष नहीं, इस कारण भी द्रव्यत्व से द्रव्य भिन्न कहागया ॥१२॥
आगे द्रव्यत्व के समान गुणत्व का भी निरूपण करते हैं किः-
४४-गुणेषु भावाद् गुणत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥
(गुणेषु) गुणों में (भावात्) होने से (गुणत्वम्) गुणत्व (उक्तम्) कहागया॥
जैसे अनेक द्रव्यों में द्रव्यत्व एक है, वैसे अनेक गुणों में गुणत्व एक है,
यह कहा गया ॥ १३ ॥ और-
४५-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १४ ॥
(सा-वेन) सामान्य और विशेष न होने से (च) भी ॥
सूत्र १० और १२ के समान है ॥ १४ ॥
४६-कर्मसु भावात्कर्मत्वमुक्तम् ॥ १५ ॥
(कर्मसु) कर्मों में (भावात्) होने से (कर्मत्वम्) कर्मत्व (उक्तम्)
कहा गया ॥
अनेक कर्मों में एक कर्मत्व होने से कर्म से कर्मत्व भिन्न कहागया है ॥ १५॥
४७-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १६ ॥
१ अध्याय २ आन्हिक २३
१ अध्याय २ आन्हिक २३
सूत्र १० । १२ और ११ के समान व्याख्यान है ॥ १६ ॥
अब सत्ता का एक होना सिद्ध करते हैं :-
४८-सदिति लिङ्गाऽविशेषाद्विशेषलिङ्गाभावाच्चैको भावः॥१७॥
इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
(सत् इति) "है" उस में (लिङ्गाऽविशेषात्) लिङ्ग के सामान्य से (च)
और (विशेषलिङ्गाऽभावात्) विशेष का लिङ्ग न होने से (भावः) सत्ता
(एकः) एक है ॥
जिस प्रकार सामान्यविशेषभावरहित सब द्रव्यों में द्रव्यत्व एक है,
सब अनेक गुणों में गुणत्व एक है, सब कर्मों में कर्मत्व एक है, इसी प्रकार
सब द्रव्यों, गुणों और कर्मों में भाव वा सत्ता एक है, क्योंकि "है" इतने
में कोई विशेष का चिन्ह नहीं, । द्रव्य है, गुण है, कर्म है, इन सब उदाहरणों
में "है=अस्ति" एक सा है, उस में विशेष का लिङ्ग कुछ नहीं ॥ १७ ॥
इस २ आन्हिक के विषय को बताने वाला यह नीचे लिखा श्लोक वैदिक
वृत्ति से उद्धृत किया जाता है जो सब पाठकों को उपयोगी होगा कि-
कार्यकारणयोर्ज्ञानं सामान्यार्थस्य लक्षणम् ।
परीक्षणं च संक्षेपाद्द्वितीयेऽस्मिन्प्रकीर्त्तितम् ॥ १ ॥
कार्य और कारण का ज्ञान, सामान्य अर्थ का लक्षण और संक्षेप से
परीक्षा; इस द्वितीय (आन्हिक) में कही गई ॥ १ ॥
इति प्रथमाऽध्याये द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥
इति श्री तुलसीरामस्वामिकृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
प्रथमोऽध्यायः
॥ १ ॥
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ओ३म्
अथ द्वितीयोऽध्यायः
तत्र
प्रथमाह्निकम्
अब द्रव्यों का लक्षण आरम्भ करते हुये, प्रथम ९ द्रव्यों में से पहिली
पृथिवी का लक्षण करते हैं:—
४६-रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवी ॥ १ ॥
( ऊ-ती ) रूप, रस, गन्ध, और स्पर्शवाली ( पृथिवी ) पृथिवी है ॥
पृथिवी में गन्ध गुण अपना और रूपादि तीन गुण अपने से पहिले तेज,
अप्, और वायु के मिलाकर ४ गुण हैं । आकाश का पांचवां गुण शब्द यहां
इस लिये पृथिवी में नहीं गिनाया कि प्रत्येक शास्त्रकार अपने सूत्रों में अपने
अभिमत लाक्षणिक अर्थों के लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग करता है । यद्यपि
न्यायशास्त्रादि में ५ वां महाभूत आकाश गिनाया है, सांख्य में उस को
प्रकृति का कार्य कहा गया है, जिस का गुण शब्द है, परन्तु वैशेषिक दर्शन
में आकाश का गुण शब्द नहीं गिनाया, किन्तु शब्द को एक प्रकार से वायु
गुण मानलिया हो, और उस आकाश को भी जिस को सांख्यादि ने प्रकृति
का कार्य माना है, वैशेषिक ने वायु के अन्तर्गत समझा हो, ऐसा जान
पड़ता है। क्योंकि वैशेषिक के आचार्य कणाद मुनि ने आगे चलकर इसी अध्याय
और आह्निक के सूत्र २० में “निष्क्रमणं प्रवे०” केवल निकलना व प्रवेश करना
मात्र आकाश का चिन्ह कहा है, शब्द नहीं । इस से पाया जाता है कि
वैशेषिक शास्त्र में आकाश कोई प्राकृत पदार्थ नहीं, किन्तु दिशा और काल
के समान एक तीसरा द्रव्य आकाश भी है, जो शून्यार्थक व्यावहारिक है ।
परन्तु न्याय सांख्यादि के अभिमत आकाश (महाभूत) का इस से खण्डन
नहीं समझना चाहिये, किन्तु जैसे सांख्य ने अपने मतानुसार एक प्रकृति
को उपादान कारण माना है, और आकाशादि ५ महाभूतों को तदन्तर्गत
कार्य माना है, और न्याय में प्रकृति का नाम न लेकर केवल आकाशादि
५ महाभूतों से ही सब जगत् की रचना मानते हुये, उन्हीं को उपादान
कारण माना है। इसी प्रकार वैशेषिक ने कुछ कार्य कारणपने की विवक्षा
से नहीं, किन्तु व्यावहारिक संज्ञा रखकर अपना व्यवहार चलाने को पृथिवी
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द्वितीयाऽध्याय १ आन्हिक २५
आदि ९ पदार्थों की द्रव्य संज्ञा करली है, शेष गुणादि समवायान्त ५ पदार्थ
अन्य गिन कर व्यवहार चलाया है। इतने से कोई वैशेषिक का सांख्यादि
के साथ विरोध नहीं हुवा। किन्तु संज्ञा भेदमात्र हुवा ॥ १ ॥
अब दूसरे अप् द्रव्य का लक्षण करते हैं:—
५०–रूपरसस्पर्शवत्य आपोद्रवाः स्निग्धाः ॥ २ ॥
(रू-त्यः) रूप, रस, स्पर्श वाले (द्रवाः) बहने वाले (स्निग्धाः)
और चिकने (आपः) जल हैं ॥
वहां भी शब्द को आकाश का गुण न मानते हुए व्यवहार है। ऐसे
ही आगे भी "परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य" २७ में आकाश की पहचान शब्द
बताया है, न कि गुण ॥ २ ॥
५१–तेजोरूपस्पर्शवत् ॥ ३ ॥
(रूपस्पर्शवत्) रूप और स्पर्श वाला (तेजः) तेज वा अग्नि द्रव्य है ॥३॥
५२–स्पर्शवान्वायुः ॥ ४ ॥
(स्पर्शवान्) स्पर्श वाला (वायुः) वायु है ॥ ४ ॥
५३–त आकाशे न विद्यन्ते ॥ ५ ॥
(ते) वे गन्धादि चारों गुण (आकाशे) आकाश पोल शून्य वा खड़ा
द्रव्य में (न) नहीं (विद्यन्ते) हैं ॥ ५ ॥ और—
५४–सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानामग्निसंयोगाद्
द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ॥ ६ ॥
(सर्पिर्ज-नाम्) घृत, लाख, मधु=शहद=माक्षिकादि का (अग्निसंयो-
गात्) अग्नि के संयोग से (अद्भिः) जलों के साथ (सामान्यम्) सामान्य है ॥
घृत, लाक्षा और शहद को गरमी पहुंचाने से इन में द्रवत्व (बहाव)
उत्पन्न होजाता है, तब ये द्रव होकर जल के समान होजाते हैं ॥ ६ ॥ तथा—
५५–त्रपुसीसलोहरजतसुवर्णानामग्निसंयोगाद्
द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ॥ ७ ॥
(त्रपु-सीस-लोह-रजत-सुवर्णानाम्) रांग, सीसा, लोहा, चान्दी और
सोने का (अग्निसंयोगात्) अग्नि के संयोग से (द्रवत्वम्) पिंघलापन
(अद्भिः) जलों से (सामान्यम्) समानता है ॥
४
२६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जिसप्रकार घृतादि काष्ठ विकारों में अग्नि से द्रवत्व होजाता है, इसी
प्रकार रांगा, सीसा, लोहा, चान्दी, सोना और अन्य धातुओं का भी पिंघल
कर जल के समान द्रवत्व होजाता है ॥ ७ ॥
यदि कहो कि “ स्पर्शवान्वायुः ” यह वायु का लक्षण इस लिये उचित
नहीं कि प्रथम तो वायु का होना ही साध्य है, तब लक्षण से लक्ष्य जाना
जायगा । इस पर अदृष्ट चिन्ह ( लिङ्ग ) से उसको सिद्ध करने के लिये प्रथम
दृष्ट ( चाक्षुषप्रत्यक्ष ) लिङ्ग का उदाहरण देते हैं:—
५६-विषाणी ककुद्वान् प्रान्तेबालधिः सास्नावान्
इति गोत्वे दृष्टं लिङ्गम् ॥ ८ ॥
( विषाणी ) सींग वाला, ( ककुद्वान् ) ऊंची ककूद [ टाट ] वाला,
( प्रान्तेबालधिः ) पुच्छ के अन्तिम भाग में बालों वाला और ( सास्नावान् )
गले में लटक ने वाले मांस [ कमला ] वाला, यह ( गोत्वे ) बैल = गोजाति
होने में ( दृष्टम् ) दृष्ट ( लिङ्गम् ) लिङ्ग = चिन्ह वा लक्षण है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार-
५७-स्पर्शश्च वायोः ॥ ९ ॥
( वायोः ) वायु का ( स्पर्शः ) स्पर्श ( च ) भी [ लिङ्ग ] है, जिस से
लिङ्गी वायु पहचाना जाता और सिद्ध होता है ॥ ९ ॥ तथा च-
५८-न च दृष्टानां स्पर्श इत्यऽदृष्टलिङ्गोवायुः ॥ १० ॥
( च ) और ( दृष्टानां ) दृष्टों = पृथिवी जल अग्नियों का ( स्पर्शः ) स्पर्श
गुण वा लिङ्ग ( न ) नहीं है ( इति ) इस कारण ( वायुः ) वायु ( अदृष्टलिङ्गः )
अदृष्ट लिङ्ग वाला है ॥ १० ॥
यदि कहो कि स्पर्श लिङ्ग से सिद्ध वायु कोई होगा, परन्तु यह कैसे
जानें कि यह वैशेषिकोक्त ९ द्रव्यों में का एक द्रव्य ही है ? उत्तर-
५९-अद्रव्यवत्त्वेन द्रव्यम् ॥ ११ ॥
( अद्रव्यवत्त्वेन ) द्रव्य वाला न होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ही है ॥
वायु स्पर्श वाला है और स्पर्श द्रव्य नहीं, बस वायु द्रव्य वाला नहीं,
इस से वह स्वयं द्रव्य है ॥ ११ ॥
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक २७
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक २७
और भी हेतु हैं कि जिन से वायु का द्रव्यत्व पाया जाता है। यथा-
६०-क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्च ॥ १२ ॥
(क्रियावत्त्वात्) क्रियावान् होने (च) और (गुणवत्त्वात्) गुणवान् होने से ॥
सूत्र १५ में द्रव्य का लक्षण करते हुये कह आये हैं कि क्रियावान् और
गुणवान् द्रव्य होता है, तदनुसार वायु भी क्रियावान् और गुणवान् होने से
द्रव्य ही है, कोई अन्य पदार्थ नहीं ॥ १२ ॥
यदि वायु द्रव्य भी है तौ भी इस को नित्यत्व क्यों कहा है, पृथिवी
जलादि के समान अनित्यता क्यों नहीं ? उत्तर-
६१-अद्रव्यत्वेन नित्यत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥
(अद्रव्यत्वेन) द्रव्यवाला न होने से (नित्यत्वम्) नित्यता (उक्तम्) कही गई ॥
लोकव्यवहार में वायु को नित्य इस कारण से कहा गया है कि वायु
का कारण अन्य द्रव्य देखा नहीं जाता । यह नित्यता वास्तविक नित्यता
तौ नहीं है, किन्तु व्यवहार ऐसा है ॥ १३ ॥
वायु एक है वा अनेक ? उत्तर-
६२-वायोर्वायुसंमूर्च्छनं नानात्वे लिङ्गम् ॥ १४ ॥
(वायोः) वायु से (वायुसंमूर्च्छनं) वायु की टक्कर (नानात्वे) अनेक
होने में (लिङ्गम्) पहचान है ॥
यदि वायु एक होता तौ वायु से वायु की टक्कर न होती, वायु के बबूले
न उठते । उठते हैं, इस से जाना जाता है कि वायु अनेक हैं । उन में एक
तौ सूक्ष्म तथा अल्प वायु पृथिवी के चारों ओर लिपटा है, जिस से पृथिवीस्थ
प्राणी श्वास लेकर जीवित रहते हैं, दूसरे जो पूर्व से पश्चिम वा दक्षिण वा
उत्तरादि दिशा विदिशाओं में घूमते फिरते हैं । हम सदा एकसा स्पर्श
(दबाव) अपने ऊपर होने से उस साधारण वायु का अनुभव नहीं कर पाते, जो
हमारा जीवन है, केवल पूर्व पश्चिमादि वायुवों को आपामर सब जानते हैं ॥१४॥
६३-वायुसंनिकर्षे प्रत्यक्षाऽभावाद्
दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ १५ ॥
(वायुसंनिकर्षे) वायु के सामीप्य में (प्रत्यक्षाऽभावात्) प्रत्यक्ष न होने
से (दृष्टं) दृष्ट (लिङ्गम्) चिन्ह (न) नहीं (विद्यते) है ॥
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२८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जिस प्रकार पृथिवी आदि ३ भूत चक्षुर्विषय हैं, इस प्रकार वायु
समीप होने पर भी आंख से नहीं दीखता, इस लिये इस के लिङ्ग (स्पर्श)
को दृष्ट नहीं माना जाता । यहां प्रयोग किया "प्रत्यक्ष" शब्द न्यायदर्शनोक्त
लाक्षणिक नहीं है, किन्तु वह " आंखों देखे " अर्थ में प्रयुक्त है । क्योंकि
त्वचा इन्द्रिय का प्रत्यक्ष तो है ही है ॥ १५ ॥
६४—सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ १६ ॥
(सामान्यतोदृष्टात्) सामान्यतोदृष्ट से (च) भी (अविशेषः) सामान्य
सिद्ध है ॥
जिस प्रकार विषाण पुच्छ सास्नादि को देख कर गौ बैल पहचाने जाते
हैं, इस प्रकार स्पर्श से वायु नहीं पहचाना जाता है। क्योंकि वायु स्पर्श
होने पर भी गौ आदि के समान दीखता नहीं, तथापि जहां २ हम क्रिया
देखते हैं वहां २ किसी करण=साधन को पाते हैं, और जहां कोई गुण देखते
हैं, वहां उस का आश्रयभूत कोई द्रव्य अवश्य पाते हैं, बस स्पर्श गुण को
पाकर उस के आश्रय द्रव्य वायु को भी अनुमान करना चाहिये, परन्तु इस
सामान्यतोदृष्ट अनुमान से इतना सिद्ध होता है कि स्पर्श का भी कोई द्रव्य
है, बस इस सामान्य से अतिरिक्त विशेष वायु आदि संज्ञा नहीं सिद्ध होती,
इस कारण अविशेष रहा ॥
हम देखते हैं कि रूपादि गुण अपने तेज आदि द्रव्यों के आश्रय रहते
हैं, और स्पर्श भी गुण है, वह भी किसी द्रव्य के आश्रय रहना चाहिये
क्योंकि १६ वें सूत्रानुसार गुण का लक्षण "द्रव्याश्रयी" आवश्यक बता चुके
हैं, बस स्पर्श गुण का आश्रय द्रव्य भी कोई होना चाहिये, वही वायु है।
ताशे नंगारे बजते समय हम देखते ही हैं कि द्रव्यों की परस्पर चोट से शब्द
उत्पन्न होता है, तब वृक्षों के पत्तों का हिलना और उस से शब्द होना
देख कर अनुमान करते हैं कि वृक्षों के पत्तों का हिलाने वाला भी कोई
द्रव्य है, जो रूप वाला नहीं, क्योंकि दीखता नहीं, परन्तु स्पर्श वाला और
वेग वाला है जो चलता और पत्तों से रगड़ कर शब्द करता है। जिस २
पदार्थ का धारण हम देखते हैं, वह २ धारण किसी द्रव्य द्वारा हो रहा है,
जैसे पृथिवी पर्वत वृक्षादि को, वृक्षादि फलादि को धारण करते हैं, नौका
को जल धारण करता है, इसी प्रकार आकाश में वृक्षों, तूलों, मेघों, विमानों
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द्वितीयाऽध्याय १ आन्हिक १८
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और उड़ते पक्षियों को धारण करने वाला भी कोई द्रव्य होना चाहिये, पर
आंख से कोई द्रव्य नहीं दीखता, क्योंकि मेघादि का धारक द्रव्य रूपवान्
नहीं, जो दीख सके, परन्तु स्पर्शवान् और वेगवान् है, क्योंकि उस का स्पर्श=
छूना अनुभव होता है, और वेग=टक्कर वा दबाव वा बहाव भी अनुभव
होता है, वह कोई द्रव्य है, जो सामान्यतोदृष्ट होने से विशेष ज्ञात नहीं
होता कि वह क्या है । सो-
६५-तस्मादागमिकम् ॥ १७ ॥
( तस्मात् ) इस लिये ( आगमिकम् ) शब्दप्रमाणसिद्ध है ॥
शब्दप्रमाण वेदादि शास्त्र और तदनुसारी लोकव्यवहार में उस को
वायु कहते हैं, इस लिये वह द्रव्य विशेष "वायु" है ॥ १७ ॥
यदि कहो कि वायु संज्ञा मात्र से विशेष क्या सिद्ध हुआ ? तो उत्तर-
६६-संज्ञाकर्म त्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम् ॥ १८ ॥
( संज्ञा ) नाम और ( कर्म ) काम ( तु ) ही तो ( अस्मद्विशिष्टानां )
हमारे विशिष्टों का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥
नाम और काम ही से तो आप और हम विशिष्टों (विशेष वाले पदार्थों)
को पहचानते हैं, तब नाम (वायु) से विशेष क्यों सिद्ध नहीं, अवश्य है॥१८॥
क्योंकि-
६७-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १९ ॥
(संज्ञाकर्मणः) नाम और काम के (प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्) प्रत्यक्षप्रवृत्त होने से ॥
संसार में वस्तुओं के नाम और काम देखकर व जानकर प्रवृत्त हुवे हैं,
वायु संज्ञा भी विशेष कर उस के कामों से रक्खी गई है ॥
सूत्र १८ और १९ पर पं० स्वामी हरिप्रसाद जी ने और तदनुसार पं० आर्य-
मुनि जी ने एक अन्य ध्वनितार्थयुक्त भाष्य किया है, जो पाठकों के सामने रखने
योग्य है । इस भाषानुवाद के पाठक आर्यभाषा में ही देखना चाहेंगे क्योंकि
मनुवाद आर्य भाषा में है। इस लिये हम उक्त दोनों सूत्रों का पं० आर्यमुनि
कृत भाष्य उद्धृत करते हैं जो इस प्रकार है कि:-
"भाष्य - 'स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्' ऋ० ८ । ४ । १७ परमेश्वर पृथिवी
आदि सब लोकों का पालन करता है, इत्यादि मन्त्रों से जो भूमि आदि की
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३२ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद
पृथिवी आदि संज्ञा ‘सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन’ यजु० ३ । २-
प्रज्वलित अग्नि में हवि प्रदान करे, इत्यादि मन्त्रों से अग्निहोत्रादि शुभ
कर्मों का विधान तथा ‘गां मा हि सीः’ यजु० १३ । ४३=गौ आदि पशुओं
की हिंसा न करे, इत्यादि, गौ आदि पशुहिंसारूप अनिष्ट कर्मों का निषेध
वेदों में किया है, वह उन के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥
भाव यह है कि ‘न हीदृशस्यग्वैदादिलक्षणस्यशास्त्रस्य सर्वगुणान्वितस्य
सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति’ शं० भा०=भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान अर्थों के
प्रतिपादक ऋग्वेदादि चारों वेदों की उत्पत्ति किसी सर्वज्ञ के बिना नहीं हो
सकती, इस लिये भूतादि अर्थों के प्रतिपादनपूर्वक संज्ञा कर्मादि का विधान
वेदों के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥
यहां इतना विशेष स्मरण रहे कि सर्वविद्या तथा सर्व अर्थों के प्रति-
पादक होने से वेदों को 'अस्मद्विशिष्ट' कहते हैं और 'जस्मत्' शब्द के प्रयोग
से सूचित किया है कि वेदों के पठन पाठनादि का अधिकार मनुष्यमात्र के
लिये समान है । सं० अब उक्त अर्थ में हेतु कथन करते हैं:-
प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १८ ॥
पद०-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात् । संज्ञाकर्मणः ॥
पदा०-(संज्ञाकर्मणः ) संज्ञा तथा कर्म का प्रवर्त्तक ईश्वर है ( प्रत्यक्ष-
प्रवृत्तत्वात् ) क्योंकि उस को सब पदार्थ प्रत्यक्ष हैं ॥
भाष्य-जिस को जिस विषय का प्रत्यक्ष होता है वह उस विषय में
संज्ञा तथा कर्म का विधान कर सकता है, अन्य नहीं। जैसा कि 'अयं चैत्रः'
इस का नाम चैत्र है, इस प्रकार पिता आदि सम्बन्धी पुत्रादिकों में चैत्रादि
संज्ञा का विधान करते हैं, तथा 'पितरं भजस्व'=पिता की सेवा कर ‘जननीं
मावजानीहि’ माता की अवज्ञा न कर, इस प्रकार शिष्य के प्रति आचार्यादि
इष्ट कर्मों का अनुष्ठान तथा अनिष्ट कर्मों का निषेध कथन करते हैं, क्योंकि
पिता आदि को पुत्रादि का तथा आचार्यादि को उक्त विहित निषिद्ध कर्म
के विषय का प्रत्यक्ष है, वैसे वेदोक्त संज्ञा तथा कर्म के विषय का ईश्वर को
प्रत्यक्ष है, इस लिये वह उन का प्रवर्त्तक है ॥
भाव यह है कि अल्पज्ञ होने के कारण किसी उपदेश के बिना जीवों
को जगदन्तर्वर्त्ती पदार्थों की संज्ञा तथा इष्टानिष्ट कर्मों का ज्ञान नहीं हो
सकता और वह स्वयं उन की संज्ञा बांधने तथा इष्टानिष्ट कर्म के जानने में
असमर्थ हैं, परन्तु वेदों में उन की संज्ञा तथा इष्टानिष्ट कर्मों का उपदेश पाया
जाता है वह उन के ईश्वरोक्त हुए विना नहीं बन सक्ता, इस लिये यह अवश्य
मानना पड़ता है कि वेदद्वारा जिन संज्ञा आदि का उपदेश पाया जाता है
उन का उपदेष्टा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर है और उस के उपदेष्टा होने से
सिद्ध है कि वेद ईश्वरोक्त हैं और ईश्वरोक्त होने से वह स्वतः प्रमाण हैं और
उन के प्रमाण होने से तत्कृत वायु आदि संज्ञा के प्रामाणिक होने में कोई
सन्देह नहीं और सृष्टि के आदि में संज्ञा तथा कर्मों की प्रवृत्ति वेदों द्वारा
होती है, यह सर्वसम्मत है । जैसा कि:-
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ मनु० १।२३
में कहा है कि सृष्टि के आदि में प्रजापति परमेश्वर ने वेद शब्दों द्वारा
सब के नाम, कर्म तथा लोकमर्यादा को नियमपूर्वक रचा । इसी अर्थ को
वेदों में भी स्पष्ट किया है कि ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् '
ऋ० ८ । ८ । ४८ । ४८=परमात्मा ने सूर्य आदि लोक तथा उन के नाम, कर्म
पूर्व कल्प के अनुसार निर्माण किये । इस से स्पष्ट है कि वेदों में जो इस
प्रकार का अपूर्व उपदेश पाया जाता है, उस का उपदेष्टा सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-
मान् ईश्वर है और ईश्वरोक्त होने से वेद स्वतः प्रमाण तथा तत्कृत वायु
संज्ञा भी प्रामाणिकी है" ॥
परन्तु हमने उक्त ध्वनियुक्त अनुवाद छोड़कर जो पृथक् अनुवाद किया
है, उस में मूलसूत्रस्थ पदों की घटना से वैसा ही अर्थ निकलता जान कर
किया है । जो जिस को रुचिकर हो, ग्रहण करे ॥ १९ ॥
वायु का वर्णन करके अब आकाश का वर्णन आरम्भ करते हैं कि:-
६८-निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ॥ २० ॥
( निष्क्रमणं ) निकलना और ( प्रवेशनं ) प्रवेश करना ( इति ) यह
( आकाशस्य ) आकाश का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग चिह्न वा पहचान है ॥
जहां से निकलना व जिस में प्रवेश करना बन पड़े जानो कि वहां
आकाश है, आकाश के विना निष्क्रमण और प्रवेश संभव नहीं । क्योंकि
आकाश के सिवाय पृथिव्यादि तौ अपनी जगह में दूसरे को प्रवेश नहीं होने
देते, या तौ स्वयं हटें वा दूसरे को प्रवेश करने से रोकें ॥ २० ॥
अब पूर्व सूत्र पर शङ्का करते हैं किः-
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३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
अब पूर्व सूत्र पर शङ्का करते हैं किः-
६९-तदङ्गलिङ्गमेकद्रव्यत्वात्कर्मणः ॥ २१ ॥
( कर्मणः ) कर्म को ( एकद्रव्यत्वात् ) एक द्रव्य वाला होने से ( तत्
वह=निष्क्रमण और प्रवेश ( अलिङ्गम् ) लिङ्ग नहीं हो सकता ॥
प्रत्येक कर्म, एक द्रव्य में होता है, इसी प्रकार प्रवेश भी प्रविष्ट द्रव्य
वाला है और निष्क्रमण भी निष्क्रान्त द्रव्य वाला है। इस में आकाश का
लिङ्ग मानना किसी को उपपन्न नहीं होता ? ॥ २१ ॥ तथा-
७०-कारणान्तरानुक्लृप्तिवैधर्म्याच्च ॥ २२ ॥
( का-र्म्यात् ) अन्य कारण की कल्पना के वैधर्म्य से ( च ) भी ॥
जिस कारण से जो कार्य होता पाया जावे, उसी को उस का कारण
मानना चाहिये, अन्य कारण की कल्पना में वैधर्म्य है। बस निकलने बड़ने
वाले द्रव्यों को जो निकलने बड़ने का स्वयं कारण हो सकते हैं, छोड़ कर
एक अन्य कारण ( आकाश ) की कल्पना करना ठीक नहीं ? ॥ २२ ॥
आगे समाधान करते हैं किः-
७१-संयोगादभावः कर्मणः ॥ २३ ॥
( संयोगात् ) संयोग से ( कर्मणः ) कर्म का ( अभावः ) अभाव है ॥
आकाश में संयोग से क्रिया नहीं, किन्तु फलसंनिधान है। कर्म क्रिय
को कहते हैं और क्रिया किसी व्यापार और फल को कहते हैं, निष्क्रमर
और प्रवेश दोनों व्यापार हैं, उन व्यापारों से उत्पन्न फल यह है कि निक
लने और प्रवेश करने वाले पदार्थ का संयोग विशेष होना। तब आका
में फल के समवाय से व्यापार का समवाय नहीं, सो तौ ठीक, परन्तु इत
से आकाश को अकारण तौ नहीं कह सकते, हां उपादान कारण न सही
परन्तु निमित्त कारण तौ है ही क्योंकि आकाश के बिना निष्क्रमण औ
प्रवेश हो नहीं सक्ते ॥
यदि कोई कहे कि इस से आकाश का होना मात्र पाया गया, परन्
निकलने बड़ने का कारण होना क्योंकर पाया गया ? उत्तर यह है कि निय
पूर्ववर्त्ती को कारण कहते हैं, सो प्रत्येक प्रवेश और निष्क्रमण से आका
अवश्य पूर्ववर्त्ती है, जो सर्वकालवर्त्ती और ईश्वर के समान निश्चिन किय
जा सकता है । इस लिये सूत्र २२ का यह कहना कि कारणान्तर की कल्पन
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[Header: द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३३]
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में वैधर्म्य है, ठीक नहीं । बस प्रवेश और निष्क्रमण अवश्य आकाश के
ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ २३ ॥
आगे यह बतलाने को कि आकाश का ही गुण शब्द है, भूमिका बांधते हैं कि-
७२-कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणोदृष्टः ॥ २४ ॥
(कार्यगुणः) कार्य का गुण (कारणगुणपूर्वकः) कारण के गुणपूर्वक (दृष्टः)
देखा जाता है ॥
अर्थात् कार्य में वही गुण होते हैं जो उस के कारण में हों ॥ २४ ॥
यदि कहो कि इस से आकाश का गुण शब्द होना तो नहीं सिद्ध हुआ ।
तो उत्तर-
७३-कार्यान्तराऽप्रादुर्भावाच्छब्दः स्पर्शवतामगुणः ॥२५॥
(कार्यान्तराऽप्रादुर्भावात्) किसी अन्य कार्य के प्रकट न होने से (स्पर्श-
वतां) स्पर्श वाले पृथिवी से वायुपर्यन्तों का (शब्दः) शब्द (अगुणः)
गुण नहीं है ॥
स्पर्श वाले पृथिव्यादि ४ द्रव्यों का गुण शब्द नहीं हो सक्ता, क्योंकि
पृथिव्यादि के कार्य घटपटादि से शब्द प्रकट नहीं होता, अतः शब्द को
आकाश का ही गुण मानना होगा ॥ २५ ॥
यदि कहो कि परिशेष से आकाश का ही क्यों समझलें, मन वा आत्मा
का गुण शब्द को क्यों न मानलें ? तो उत्तर-
७४-परत्र समवायात्प्रत्यक्षत्वाच्च नात्मगुणो न मनोगुणः ॥२६॥
(परत्र) अन्य द्रव्यों में (समवायात्) समवेत होने (च) और (प्रत्य-
क्षत्वात्) प्रत्यक्ष होने से (न) न तो (आत्मगुणः) आत्मा का गुण है और
(न) न (मनोगुणः) मन का गुण है ॥
शब्द को अन्य पदार्थों में समवाय सम्बन्धयुक्त पाते हैं और प्रत्यक्ष
(श्रवणेन्द्रियाऽनुभूत) पाते हैं, आत्मा और मन न तो किसी से समवाय
संबन्ध रखते, और न प्रत्यक्ष होते, अतएव शब्द को आत्मा वा मन का गुण
नहीं कहा जासक्ता ॥ २६ ॥ किन्तु-
७५-परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य ॥ २७ ॥
५
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३४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(परिशेषात्) बच रहने से (आकाशस्य) आकाश का (लिङ्गम्)
लिङ्ग वा चिन्ह [शब्द है] ॥
जब शब्द पृथिव्यादि चार भूतों का गुण नहीं, आत्मा और मन का
नहीं, तब बचा केवल आकाश, इस लिये शब्द को आकाश का गुण ही
समझा जाना बनता है ॥ २७ ॥
७६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २८ ॥
आकाश के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु से
(व्याख्याते) व्याख्यात किये गये ॥
२७ वें सूत्र में से इस २८ वें में "आकाशस्य" पद की अनुवृत्ति है। जिस
प्रकार वायु को स्पर्श गुण वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्य का कार्य
न होने से नित्यत्व कहा गया था, इसी प्रकार आकाश को भी शब्द गुण
वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्यकारणकता न होने से नित्यत्व समझ
लेना चाहिये॥ २८ ॥
क्यों जी ! आकाश नित्य और द्रव्य तो सिद्ध हुवा, परन्तु आकाश कोई
तत्त्व है, इस को कैसे मानें ? उत्तर—
७७-तत्त्वं भावेन ॥ २९ ॥
(भावेन) भाव=सत्ता से (तत्त्वम्) तत्त्व व्याख्यात समझना चाहिये ॥
जिस प्रकार भाव एक है, इसी प्रकार आकाश भी एक तत्त्व है ॥२९॥
क्योंकि-
७८-शब्दाल्लिङ्गाऽविशेषाद्विशेषलिङ्गाऽभावाच्च ॥ ३० ॥
(शब्दाल्लिङ्गाऽविशेषात्) शब्द लिङ्ग के सामान्य से (च) और (विशेष
लिङ्गाऽभावात्) विशेष लिङ्ग के न होने से [आकाश एक तत्त्व है] ॥
आकाश का लिङ्ग शब्द है, सो कहीं विशेष नहीं, सर्वत्र समान है, और
विशेष होने का कोई लिङ्ग=पहचान नहीं, इस लिये जिस प्रकार भाव वा
सत्ता लिङ्गाऽविशेष से और विशेषलिङ्गाऽभाव से सूत्र ५८ में एक कही गई
थी, इसीप्रकार आकाश को भी उन्ही कारणों से एक समझना चाहिये॥३०॥
७९-तदनुविधानादेकपृत्वक्त्वं चेति ॥ ३१ ॥
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३५
द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३५
( तदनुविधानात् ) उस [ एकत्व ] के साहचर्य से ( एकपृथक्त्वं ) एक
पृथक् होना ( च ) भी आकाश का सिद्ध है ( इति ) आह्निक समाप्ति के
अर्थ में है ॥
जो पदार्थ एक होता है, वह सब से पृथक् भी होता है, जब आकाश
एक है, तत्त्व है, तब वह पृथक् भी है, एक द्रव्य में रहने वाले पृथक्त्व को
एकपृथक् समझिये ॥ ३१ ॥
इति द्वितीऽध्यायस्य प्रथममाह्निकम्
—*—
अथ द्वितीयाऽध्याये
द्वितीयमाह्निकम्
पूर्वाह्निक में पृथिवी आदि के लक्षण और आकाश तथा शब्द का वर्णन
करके, इस द्वितीयाह्निक में उन की परीक्षा की जायगी । उस में प्रथम
पृथिवी के लक्षण की परीक्षा करने के लिये यह कहते हैं कि पृथिवी से अन्य
किसी द्रव्य का गन्ध गुण नहीं है । यथा-
८०-पुष्पवस्त्रयोः सति संनिकर्षे गुणान्तरा-
ऽप्रादुर्भावोवस्त्रे गन्धाऽभावलिङ्गम् ॥ १ ॥
( पुष्पवस्त्रयोः ) पुष्प और वस्त्र के ( संनिकर्षे ) समीप ( सति ) होने
पर ( गुणान्तराऽप्रादुर्भावः ) अन्य गुण का प्रकट न होना ( वस्त्रे ) वस्त्र में
( गन्धाऽभावलिङ्गम् ) गन्ध न होने की पहचान है ॥
जब कभी गन्ध वाले पुष्प और गन्धरहित वस्त्र को एकत्र समीप रख
देवें, तब भी वस्त्र में पुष्प के गुण ( गन्ध ) को प्रकट होता नहीं देखते, इस
कारण समझना चाहिये कि वस्त्र में गन्ध नहीं । और जो वस्त्र को पुष्पसंसर्ग
से कुछ गन्ध वस्त्र में प्रतीत होने लगता है, वह गन्ध आगन्तुक है, अपना निज
का नहीं। इसी प्रकार पृथिवी के समीप होने से जिन अन्य वायु आदि में
गन्ध प्रतीत होता है वह भी उन वायु आदि का निज गुण नहीं समझना
चाहिये, किन्तु पृथिवी के कण उड़ कर वायु में मिल कर गन्ध की प्रतीति
कराते हैं, केवल वायु में न सुगन्ध है, न दुर्गन्ध है ॥ १ ॥
८१-व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः ॥२॥
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३४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(पृथिव्यां) पृथिवी में (गन्धः) गन्ध गुण (व्यवस्थितः) ठीक सिद्ध है ॥ २ ॥
८२-एतेनोष्णता व्याख्याता ॥ ३ ॥
(एतेन) इस से (उष्णता) गरमी (व्याख्याता) व्याख्यात की गई ॥
पृथिवी का स्वाभाविक गन्ध गुण जिस प्रकार अन्य जलादि में सांसर्गिक
प्रतीत होता है, इतने से जलादि में गन्ध निज का नहीं सिद्ध होता, इसी
बात से उष्णता भी जो अग्नि का स्वाभाविक गुण है, जल वायु में सांसर्गिक
समझनी चाहिये ॥ ३ ॥ आगे इसी को स्पष्ट करके कहते हैं:-
८३-तेजस उष्णता ॥ ४ ॥
(तेजसः) अग्नि तत्त्व की (उष्णता) गरमी है ॥
जैसे पृथिवी में गन्ध स्वाभाविक व्यवस्थित है, इसी प्रकार अग्नि में उष्णता
व्यवस्थित है, अन्य जल वायु आदि भी उष्ण वा गर्म पाये जाते हैं सो वे
अग्नि के संसर्ग से गर्म होते हैं; अपने निजगुण से नहीं ॥ ४ ॥ इसी प्रकार:-
८४-अप्सु शीतता ॥ ५ ॥
(अप्सु) जलों में (शीतता) ठंडा पन है ॥
जल में ठंडापन व्यवस्थित है। वायु भी ठंडा देखा जाता है, परन्तु वह
ठंड उस में जलसंसर्ग की होती है। निज की स्वाभाविक नहीं ॥ ५ ॥
पृथिवी जल तेज वायु के लक्षणों की परीक्षा कह चुके, आगे आकाश
के लक्षण शब्द की परीक्षा फिर की जायगी। अभी काल की परीक्षा इस
लिये पहले करते हैं कि उस से आकाश की वा शब्द की परीक्षा सुगम हो
जायगी। प्रथम तौ काल पदार्थ के होने में उस के चिह्न वा लिङ्ग वा पहचान
बताते हैं:-
८५-अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं
क्षिप्रमिति काललिङ्गानि ॥ ६ ॥
(अपरस्मिन्) परले=अल्पवयस्कादि में (अपरम्) अल्पायुष्क हो
का ज्ञान, (युगपत्) एक साथ (चिरम्) देरी से (क्षिप्रम्) शीघ्र (इति)
ये (काललिङ्गानि) काल के चिह्न हैं ॥
इधर के में इधर का ज्ञान, उधर के में उधर का ज्ञान, एक साथ में ए
साथ का ज्ञान, देरी में देर का ज्ञान, जल्दी में जल्दी का ज्ञान, इस प्रकार
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व्यावहारिक ज्ञान, काल के लिङ्ग हैं, अर्थात् इन से काल पहचाना जाता है ॥
जिस की अपेक्षा से एक पुरुष को बालक, दूसरे को युवा, तीसरे को
वृद्ध कहते हैं, सूर्य के उदय अस्त जिस के जन्म से लेकर न्यून बीते हैं, वह
बालक, उस से अधिक बार जिस के सामने सूर्योदय और सूर्यास्त हो चुके,
वह युवा, उस से भी अधिक बार उदयाऽस्त वाला वृद्ध कहाता है, बस जिस
को लक्ष्य करके यह न्यूनाधिक व्यवस्था होती है, वह काल पदार्थ है । यदि
कालकृत अन्तर वा फ़रक न हो तो युवा को वृद्ध वा वृद्ध को बालक क्यों नहीं
समझ लिया जाता, काल ही है जो इन में अपने सम्बन्ध से अन्तर कराता है ॥
पृथिवी आदि ५ महाभूतों से पृथक् ही काल पदार्थ हुवा । क्योंकि
पहिले, पीछे, एक साथ, शीघ्र, देर से, यह व्यवहार पृथिवी में नहीं होता,
न जल में, न तेज में, न अन्य किसी द्रव्य में, इस लिये इन से पृथक् काल एक
द्रव्यान्तर है, जो पदार्थ पृथिवी आदि से भिन्न है, अचेतन होने से आत्मा
से भी भिन्न है, जो बूढ़े वा जवानों के देहों और सूर्य से संसर्ग करके अपनी
साथी संयुक्त और संयोग स्वरूप समीपता से वा अपने से संयुक्त समवाय
स्वरूप समीपता से सूर्योदयाऽस्तादि को बूढ़े वा जवानों के देहों से संबद्ध
करता है, वही द्रव्य " काल " कहाता है । इसी से वरे परे देर से वा शीघ्र,
इत्यादि प्रतीतियों को काल का लिङ्ग कहा गया है ॥
देशकृत वरे, परे होना, इस कालकृत वरे परे इत्यादि प्रत्यय से
विलक्षण है । देशकृत अधिक परत्व को " दूर " कहते हैं । कालकृत अधिक
परत्व को " चिर वा देर " कहते हैं । दूर और चिर के अर्थ में जो अन्तर
है, वही देश और काल के लिङ्गों की विलक्षणता है । ॥
लोग देखते हैं कि कोई क्रिया मेरठ में हो रही है, और उसी समय
वही क्रिया कलकत्ते में हो रही है, तब कालकृत संबन्ध तो दोनों स्थानों में
युगपत ( एक साथ ) है, परन्तु देशकृत संबन्ध एक नहीं । मेरठ से कलकत्ता
दूर समझा ही जाता है, परन्तु मेरठ में होने वाली क्रिया और कलकत्ते
में होने वाली क्रिया जिस एक द्रव्य से संबद्ध हुई वह काल है ॥ ६ ॥
यदि कहो कि ऊपर के सूत्रव्याख्यान से काल कोई पदार्थ होना तो पाया
गया, परन्तु उस का नित्य होना और द्रव्य होना कैसे समझा जावे ? तो उत्तर-
८६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ७ ॥
३८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(द्रव्यत्वनित्यत्वे) [काल के] द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु के
साथ (व्याख्याते) व्याख्यात समझिये ॥ ७ ॥
यदि कहो कि द्रव्यत्व और नित्यत्व भी माना परन्तु एकत्व कैसे ? तौ उत्तर-
८७-तत्त्वं भावेन ॥ ८ ॥
(तत्त्वं) तत्त्व=एकत्व (भावेन) सत्ता से समझिये ॥
जिस प्रकार "होना"=सत्ता में लिङ्ग की अविशेषता और विशेष
लिङ्ग के न होने से सत्ता एक बताई गई, इसी प्रकार वरे परे आदि काल-
लिङ्गों में विशेष चिन्ह न होने, और चिन्हों में विशेष न होने से काल भी
एक ही पदार्थ सिद्ध है । किन्तु वास्तव में काल एक होने पर भी उपाधि से
काल में अनेकता (क्षण, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, रात्रि,
पक्ष, मास, वर्ष, युग, कल्पादि भेद व्यवहृत होते हैं ॥ ८ ॥
८८-नित्येष्वभावादऽनित्येषु भावात्कारणे कालाख्येति ॥ ६ ॥
(नित्येषु) नित्यों में (अभावात्) न होने से और (अनित्येषु) अनित्यों
में (भावात्) होने से (कारणे) कारण में (कालाख्या) काल संज्ञा है
(इति) यह कालपरीक्षा प्रकरण समाप्त हुआ ॥
नित्य पदार्थ आत्मा आकाश आदि में काल (वरछा, परछा, चिर,
शीघ्र आदि प्रत्ययहेतुक) नहीं रहता, और अनित्य मनुष्य पशु पक्षी घट पट
आदि पदार्थों में काल (सायं, प्रातः, दिन, रात्रि, मास, वर्ष आदि) रहता
है, इस हेतु से कारण की काल संज्ञा है अर्थात् काल को कारण और मनुष्य
पशु पक्षी आदि को कार्य कहा जाता है। जैसा कि अथर्व १९ । ५३ में कहा है कि-
कालोऽमूं दिवमऽजनयत् कालइमाः पृथिवीरुत ।
काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वितिष्ठते ॥ ५ ॥
कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम् ॥ १० ॥
कालादापः समभवन् ॥ १६ । ५४ । १ ॥
काल ने इस द्युलोक को उत्पन्न किया और काल ने इन पृथिवियों को
उत्पन्न किया। काल में भूत, भविष्यत् सब ही स्थित है ॥५॥ काल ने आरम्भ
में प्रजापति और प्रजाओं को उत्पन्न किया ॥ १० ॥ काल से अप् उत्पन्न हुवे
१९ । ५४ । १ ॥