वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(द्रव्यत्वनित्यत्वे) [काल के] द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु के
साथ (व्याख्याते) व्याख्यात समझिये ॥ ७ ॥
यदि कहो कि द्रव्यत्व और नित्यत्व भी माना परन्तु एकत्व कैसे ? तौ उत्तर-
८७-तत्त्वं भावेन ॥ ८ ॥
(तत्त्वं) तत्त्व=एकत्व (भावेन) सत्ता से समझिये ॥
जिस प्रकार "होना"=सत्ता में लिङ्ग की अविशेषता और विशेष
लिङ्ग के न होने से सत्ता एक बताई गई, इसी प्रकार वरे परे आदि काल-
लिङ्गों में विशेष चिन्ह न होने, और चिन्हों में विशेष न होने से काल भी
एक ही पदार्थ सिद्ध है । किन्तु वास्तव में काल एक होने पर भी उपाधि से
काल में अनेकता (क्षण, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, रात्रि,
पक्ष, मास, वर्ष, युग, कल्पादि भेद व्यवहृत होते हैं ॥ ८ ॥
८८-नित्येष्वभावादऽनित्येषु भावात्कारणे कालाख्येति ॥ ६ ॥
(नित्येषु) नित्यों में (अभावात्) न होने से और (अनित्येषु) अनित्यों
में (भावात्) होने से (कारणे) कारण में (कालाख्या) काल संज्ञा है
(इति) यह कालपरीक्षा प्रकरण समाप्त हुआ ॥
नित्य पदार्थ आत्मा आकाश आदि में काल (वरछा, परछा, चिर,
शीघ्र आदि प्रत्ययहेतुक) नहीं रहता, और अनित्य मनुष्य पशु पक्षी घट पट
आदि पदार्थों में काल (सायं, प्रातः, दिन, रात्रि, मास, वर्ष आदि) रहता
है, इस हेतु से कारण की काल संज्ञा है अर्थात् काल को कारण और मनुष्य
पशु पक्षी आदि को कार्य कहा जाता है। जैसा कि अथर्व १९ । ५३ में कहा है कि-
कालोऽमूं दिवमऽजनयत् कालइमाः पृथिवीरुत ।
काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वितिष्ठते ॥ ५ ॥
कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम् ॥ १० ॥
कालादापः समभवन् ॥ १६ । ५४ । १ ॥
काल ने इस द्युलोक को उत्पन्न किया और काल ने इन पृथिवियों को
उत्पन्न किया। काल में भूत, भविष्यत् सब ही स्थित है ॥५॥ काल ने आरम्भ
में प्रजापति और प्रजाओं को उत्पन्न किया ॥ १० ॥ काल से अप् उत्पन्न हुवे
१९ । ५४ । १ ॥