वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयाऽध्याय १ आन्हिक २५
आदि ९ पदार्थों की द्रव्य संज्ञा करली है, शेष गुणादि समवायान्त ५ पदार्थ
अन्य गिन कर व्यवहार चलाया है। इतने से कोई वैशेषिक का सांख्यादि
के साथ विरोध नहीं हुवा। किन्तु संज्ञा भेदमात्र हुवा ॥ १ ॥
अब दूसरे अप् द्रव्य का लक्षण करते हैं:—
५०–रूपरसस्पर्शवत्य आपोद्रवाः स्निग्धाः ॥ २ ॥
(रू-त्यः) रूप, रस, स्पर्श वाले (द्रवाः) बहने वाले (स्निग्धाः)
और चिकने (आपः) जल हैं ॥
वहां भी शब्द को आकाश का गुण न मानते हुए व्यवहार है। ऐसे
ही आगे भी "परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य" २७ में आकाश की पहचान शब्द
बताया है, न कि गुण ॥ २ ॥
५१–तेजोरूपस्पर्शवत् ॥ ३ ॥
(रूपस्पर्शवत्) रूप और स्पर्श वाला (तेजः) तेज वा अग्नि द्रव्य है ॥३॥
५२–स्पर्शवान्वायुः ॥ ४ ॥
(स्पर्शवान्) स्पर्श वाला (वायुः) वायु है ॥ ४ ॥
५३–त आकाशे न विद्यन्ते ॥ ५ ॥
(ते) वे गन्धादि चारों गुण (आकाशे) आकाश पोल शून्य वा खड़ा
द्रव्य में (न) नहीं (विद्यन्ते) हैं ॥ ५ ॥ और—
५४–सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानामग्निसंयोगाद्
द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ॥ ६ ॥
(सर्पिर्ज-नाम्) घृत, लाख, मधु=शहद=माक्षिकादि का (अग्निसंयो-
गात्) अग्नि के संयोग से (अद्भिः) जलों के साथ (सामान्यम्) सामान्य है ॥
घृत, लाक्षा और शहद को गरमी पहुंचाने से इन में द्रवत्व (बहाव)
उत्पन्न होजाता है, तब ये द्रव होकर जल के समान होजाते हैं ॥ ६ ॥ तथा—
५५–त्रपुसीसलोहरजतसुवर्णानामग्निसंयोगाद्
द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ॥ ७ ॥
(त्रपु-सीस-लोह-रजत-सुवर्णानाम्) रांग, सीसा, लोहा, चान्दी और
सोने का (अग्निसंयोगात्) अग्नि के संयोग से (द्रवत्वम्) पिंघलापन
(अद्भिः) जलों से (सामान्यम्) समानता है ॥
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