वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
दशमाऽध्याय १ आह्निक. १४३
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दशमाऽध्याय १ आह्निक. १४३
कारण के भेद से कार्य में भेद होता है, और कारण तीन ३ प्रकार के
होते हैं, १- समवायी, २ असमवायी, ३-निमित्त । इन तीनों में से समवायी
कारण ( उपादान ) की परीक्षा करते हुये आचार्य इस सूत्र में बतलाते हैं
कि कार्य पदार्थों का समवाय-द्रव्य में होता है, इस कारण द्रव्य में ही उपा-
दान कारणता का व्यवहार होता है ॥ १ ॥
३६५-संयोगाद्वा ॥ २ ॥
(वा) अथवा (संयोगात्) संयोग से भी [पाया जाता है कि उपा-
दान कारणता द्रव्य में ही है ] ॥ २ ॥
३६६-कारणे समवायात्कर्माणि ॥ ३ ॥
(कारणे) कारण=उपादान में (समवायात्) समवेत होने से (कर्माणि)
कर्म भी [ कारण होजाते हैं ] ॥ ३ ॥
३६७-तथा रूपे कारणैकार्थसमवायाच्च ॥ ४ ॥
( तथा ) इसी प्रकार ( कारणैकार्थसमवायात् ) कारणेकपदार्थ के सम-
वायसम्बन्ध से (रूपे) रूपादि गुणों में (च) भी [कारणता का व्यवहार है] ॥
अर्थात् कार्य पदार्थ की समीपता से कर्म में कारणता का व्यवहार है,
इसी प्रकार कारणैकार्थ की समीपता से रूप और उपलक्षण से अन्य गुणों
में भी कारणता का व्यवहार होता है ॥ ४ ॥ उदाहरण-
३६८-कारणसमवायात्संयोगः पटस्य ॥ ५ ॥
(कारणसमवायात्) उपादान कारण=तन्तुओं के समवाय से (संयोगः)
संयोग ( पटस्य ) वस्त्र का [ कारण ] होता है ॥ ५ ॥
३६९-कारणकारणसमवायाच्च ॥ ६ ॥
(च) और (कारणकारणसमवायात्) कारण का कारण समवेत होने
से [संयोग को कारणता होती है ] ॥
जैसे एक रुई की गांठ दूसरी रुई की गांठ में मिलाई जावे तो महत्त्व
परिमाण कार्य उत्पन्न होगा। अब देखना होगा कि रुई के अवयव=टुकड़ों
से रुई की गांठ बनी, फिर रुई की गांठों के अवयव मिलने (संयोग) से
महत्त्व=बड़ापन बना, तब कारण के कारण का समवाय हुआ अर्थात् रुई के
अवयवों से गांठ, गांठों से महत्त्व कार्य उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
१४४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
समवायी और प्रसङ्गप्राप्त असमवायी कारणों की परीक्षा कह चुके ।
आगे निमित्त कारण की परीक्षा करेंगे, इस लिये उसका आरम्भ करते हैं-
३७०-संयुक्तसमवायादग्नेर्वैशेषिकम् ॥ ७ ॥
(संयुक्तसमवायात्) संयोगसम्बद्ध समवाय से (अग्नेः) अग्नि का (वै-
शेषिकम्) विशेष गुण उष्णता [कारण है] ॥
पाक से उत्पन्न रूपादि रङ्गादि कार्यों में अग्नि निमित्त कारण है, जो
अपने संयुक्तसमवाय से गरमी पहुंचा कर किसी वस्तु पर रङ्ग उत्पन्न कर
देता है। अपना विशेष गुण अग्नि में गरमी का स्पर्श है, उस गुण का आश्रय
द्रव्य अग्नि है, उस अग्नि का संयोग पकने वाले फल पुष्पादि से है, वहां
अग्नि और फलादि के समवाय से पकने से उत्पन्न होने वाले रङ्गों की, जो
पाकज हैं, उत्पत्ति होती है । इस उत्पत्ति में फलादिक उपादान कारण=
समवायी हैं, तेज का संयोग असमवायी कारण है, गरमी का स्पर्श और अन्य
अदृष्ट कारण मिलकर सब निमित्त कारण हैं ॥ ७ ॥
पदार्थों का उद्देश और परीक्षा की जा चुकी, जिन के तत्त्वज्ञान से
मुक्ति होती है। तत्त्वज्ञान धर्म विशेष से उत्पन्न होता है, धर्मविशेष वैदिक
कर्मों के करने से, वैदिककर्मजन्य पुण्य उस के ऊपर अत्यन्त श्रद्धा से बनता
है । तब कहीं वैदिककर्मानुष्ठानियों को दृष्टफल के न पाने से अश्रद्धा न हो
जावे, इस लिये कृपालु कणाद मुनि अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न कराते हुवे, विद्या-
र्थियों को विश्वास दिलाते हैं कि-
३७१-दृष्टानां दृष्टप्रयोजनानां, दृष्टाऽभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय ८
(दृष्टानाम्) [वेद में] देखे हुये (दृष्टप्रयोजनानाम्) जिन का प्रयोजन
इस लोक में ही दीखता है, उन का तथा (दृष्टाभावे) जब दृष्ट ऐहिक फल न
मिले तब भी (प्रयोगः) अनुष्ठान करना (अभ्युदयाय) पारलौकिकफल के
लिये [माननीय है] ॥ ८ ॥
३७२-अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः ॥ ६ ॥
(अस्मद्बुद्धिभ्यः) हम सर्वसाधारणों के ज्ञानों से (ऋषेः) वेद के प्रकाशक
ज्ञानदाता ऋषि परमात्मा की (लिङ्गम्) पहचान होती है ॥
यदि परमात्मा ज्ञान न देता तो मनुष्यों को ज्ञान न होता । मनुष्यों
को ज्ञान है, यह परमात्मा के ज्ञानदान की पहचान है ॥ ९ ॥