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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 160 में से

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पृष्ठ 25

१ अध्याय २ आन्हिक २१
पूर्व सूत्र में जो द्रव्यत्वादि को सामान्य और विशेष दोनों प्रकार का
होना कहागया वह सार्वत्रिक नियम नहीं, किन्तु अन्त्य विशेष = घटत्व
पटत्वादि से अन्यत्र समझना चाहिये। अर्थात् द्रव्यत्वादि को अपने विभाग
पृथिवीत्वादि से तो सामान्य है, और विशेष भी है, परन्तु पृथिवीत्व के भी
अन्त में जो घटत्व पटत्वादि विशेष हैं, उन में तो द्रव्यत्वादि से सामान्य
नहीं, किन्तु विशेष ही है। जिस प्रकार सत्ता सदा सामान्य ही है, विशेष
नहीं, उसी प्रकार अन्त्य विशेष जो कि घटत्वपटत्त्वादि अनन्त हैं, वे सामान्य
नहीं, विशेष ही विशेष हैं ॥ ६ ॥ अब सत्ता का लक्षण करते हैं :-
३८-सदिति यतोद्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता ॥ ७ ॥
(यतः) जिस पदार्थ से (द्रव्यगुणकर्मसु) द्रव्यों, गुणों और कर्मों में
(सत्) है (इति) ऐसा जाना जाता है (सा) वह (सत्ता) सत्ता वा भाव
कहाता है ॥
द्रव्य है, गुण है, कर्म है, इत्यादि प्रत्ययों में जो "होना" वस्तु है, वह
सत्ता कहाती है ॥ ७ ॥
प्रश्न- क्योंजी ! तो सत्ता कोई पृथक् पदार्थ तौ न हुवा, "द्रव्य है" इस
में द्रव्य ही तो सत्ता हुई, न कि कुछ और ? उत्तर-
३९-द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता ॥ ८ ॥
(द्रव्यगुणकर्मभ्यः) द्रव्य, गुण और कर्म से (सत्ता) भाव (अर्थान्तरम्)
अन्य पदार्थ है ॥ ८ ॥ क्योंकि-
४०-गुणकर्मसु च भावान्न कर्म न गुणः ॥ ९ ॥
(गुणकर्मसु) गुणों और कर्मों में (च) और द्रव्यों में भी (भावात्)
होने से (न) न तौ (कर्म) कर्म है, (न) और न (गुणः) गुण है ॥
यदि सत्ता द्रव्यरूप ही होती तौ गुण वा कर्म में सत्ता न होती, परन्तु
जिस प्रकार द्रव्य में सत्ता है, उसी प्रकार कर्म और गुण में भी है, इस से
पाया जाता है कि सत्ता एक भिन्न पदार्थ है, जो द्रव्य गुण कर्म रूप नहीं है ॥९॥
४१-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १० ॥
(सामा-न) सामान्य और विशेष के न होने से (च) भी ॥
जिस प्रकार द्रव्य गुण और कर्म तीनों में सूत्र (३६) के अनुसार सामान्य