वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऔर विशेष दोनों हैं, इसी प्रकार यदि सत्ता इन से भिन्न न होती तो उस
(सत्ता) में भी सामान्य विशेष होते, परन्तु सूत्र (१५) के अनुसार सत्ता
केवल सामान्य ही है, विशेष नहीं, इस हेतु से भी सत्ता को अर्थान्तर ही
मानना चाहिये ॥ १० ॥
४२-अनेकद्रव्यवत्त्वेन द्रव्यत्वमुक्तम् ॥ ११ ॥
(अनेकद्रव्यवत्त्वेन) अनेक द्रव्य वाला होने से (द्रव्यत्वम्) द्रव्यत्व
(उक्तम्) कहा गया ॥
द्रव्य से द्रव्यत्व में क्या भेद है, सो बताते हैं कि जो सत्ताव्याप्य अपरा
सामान्य द्रव्यत्व (द्रव्य पन) है, वह अनेक द्रव्यों वाला है, और द्रव्य (कोई
एक) द्रव्य ही है, इस से द्रव्यत्व कहा गया ॥ ११ ॥ और
४३-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १२ ॥
(सा-वेन) सामान्य विशेष न होने से (च) भी ॥
द्रव्य तो सामान्य और विशेष वाले होते हैं परन्तु द्रव्यत्व एकसा है, उस में
सामान्य और विशेष नहीं, इस कारण भी द्रव्यत्व से द्रव्य भिन्न कहागया ॥१२॥
आगे द्रव्यत्व के समान गुणत्व का भी निरूपण करते हैं किः-
४४-गुणेषु भावाद् गुणत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥
(गुणेषु) गुणों में (भावात्) होने से (गुणत्वम्) गुणत्व (उक्तम्) कहागया॥
जैसे अनेक द्रव्यों में द्रव्यत्व एक है, वैसे अनेक गुणों में गुणत्व एक है,
यह कहा गया ॥ १३ ॥ और-
४५-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १४ ॥
(सा-वेन) सामान्य और विशेष न होने से (च) भी ॥
सूत्र १० और १२ के समान है ॥ १४ ॥
४६-कर्मसु भावात्कर्मत्वमुक्तम् ॥ १५ ॥
(कर्मसु) कर्मों में (भावात्) होने से (कर्मत्वम्) कर्मत्व (उक्तम्)
कहा गया ॥
अनेक कर्मों में एक कर्मत्व होने से कर्म से कर्मत्व भिन्न कहागया है ॥ १५॥
४७-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १६ ॥