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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 160 में से

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पृष्ठ 37

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[Header: द्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३३]

में वैधर्म्य है, ठीक नहीं । बस प्रवेश और निष्क्रमण अवश्य आकाश के
ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ २३ ॥
आगे यह बतलाने को कि आकाश का ही गुण शब्द है, भूमिका बांधते हैं कि-
७२-कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणोदृष्टः ॥ २४ ॥
(कार्यगुणः) कार्य का गुण (कारणगुणपूर्वकः) कारण के गुणपूर्वक (दृष्टः)
देखा जाता है ॥
अर्थात् कार्य में वही गुण होते हैं जो उस के कारण में हों ॥ २४ ॥
यदि कहो कि इस से आकाश का गुण शब्द होना तो नहीं सिद्ध हुआ ।
तो उत्तर-
७३-कार्यान्तराऽप्रादुर्भावाच्छब्दः स्पर्शवतामगुणः ॥२५॥
(कार्यान्तराऽप्रादुर्भावात्) किसी अन्य कार्य के प्रकट न होने से (स्पर्श-
वतां) स्पर्श वाले पृथिवी से वायुपर्यन्तों का (शब्दः) शब्द (अगुणः)
गुण नहीं है ॥
स्पर्श वाले पृथिव्यादि ४ द्रव्यों का गुण शब्द नहीं हो सक्ता, क्योंकि
पृथिव्यादि के कार्य घटपटादि से शब्द प्रकट नहीं होता, अतः शब्द को
आकाश का ही गुण मानना होगा ॥ २५ ॥
यदि कहो कि परिशेष से आकाश का ही क्यों समझलें, मन वा आत्मा
का गुण शब्द को क्यों न मानलें ? तो उत्तर-
७४-परत्र समवायात्प्रत्यक्षत्वाच्च नात्मगुणो न मनोगुणः ॥२६॥
(परत्र) अन्य द्रव्यों में (समवायात्) समवेत होने (च) और (प्रत्य-
क्षत्वात्) प्रत्यक्ष होने से (न) न तो (आत्मगुणः) आत्मा का गुण है और
(न) न (मनोगुणः) मन का गुण है ॥
शब्द को अन्य पदार्थों में समवाय सम्बन्धयुक्त पाते हैं और प्रत्यक्ष
(श्रवणेन्द्रियाऽनुभूत) पाते हैं, आत्मा और मन न तो किसी से समवाय
संबन्ध रखते, और न प्रत्यक्ष होते, अतएव शब्द को आत्मा वा मन का गुण
नहीं कहा जासक्ता ॥ २६ ॥ किन्तु-
७५-परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य ॥ २७ ॥
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CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.