वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
षष्ठाध्याय २ आह्निक । १९३
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षष्ठाध्याय २ आह्निक । १९३
( शुचि प्रतिषेधः ) जो शुद्ध न हो, उस को ( अशुचि ) अशुद्ध ( इति )
ऐसा कहते हैं ॥ ६ ॥ और—
२४६-अर्थान्तरञ्च ॥ ७ ॥
( अर्थान्तरम् ) विधान किये हुए पदार्थ से भिन्न दूसरा पदार्थ ( च )
भी अशुद्ध है ॥
जैसे जिस वर्ण को जिस सूत का यज्ञोपवीत धारण करना कहा है, उसी
के लिये वह शुद्ध है किन्तु एक के लिये दूसरे का अशुद्ध है ॥ ७ ॥
प्रश्न-तो क्या शुचिभोजन सब किसी से लेकर भोज्य है ?
उत्तर-नहीं, क्योंकि—
२५०-अयतस्य शुचिभोजनादभ्युदयो
न विद्यते नियमाभावात् ॥ ८ ॥
( नियमाभावात् ) नियम के न रखने से ( अयतस्य ) अहिंसादि यमों
के पालन न करने वाले का (शुचिभोजनात्) शुद्ध भोजन करने से (अभ्युदयः)
लोक परलोक का कल्याण ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता ॥
जो पुरुष अहिंसादि व्रतों का पालन नहीं करता उस म्लेच्छादि का दिया
हुवा शुद्ध भोजन भी संसर्गदोष से दूषित है, इस लिये कल्याणकारी नहीं ॥ ८ ॥
२५१—विद्यते वार्थान्तरत्वाद् यमस्य ॥ ९ ॥
( वा ) अथवा ( यमस्य ) अहिंसादि यम का ( अर्थान्तरत्वात् ) अन्य
अर्थ होने से (विद्यते ) शुचिभोजन से लोक परलोक का कल्याण होता भी है ॥
पूर्व सूत्र में अहिंसादि नियमों से रहित म्लेच्छादि के दिये सब प्रकार
के संसर्ग का शुद्धभोजन में भी बचाव कहा था, इस सूत्र में दूसरा पक्ष करते
हैं कि अथवा यदि यह विचार किया जाय कि यम=अहिंसादि का पालन
दूसरी बात है और शुचि भोजन दूसरी बात है, इस लिये जब हिंसकादि
का दिया भी शुचिभोजन हिंसादिदोषदूषित न हो तो लोक परलोक के
अभ्युदय का बाधक नहीं है ॥ ९ ॥ और भी एक कारण है किः—
२५२--असति चाभावात् ॥ १० ॥
(असति) शुद्ध भोजन में हिंसादि दोष के न होने पर (च) और (अभावात्)
हिंसादि दोष न होने से लोक परलोक के कल्याण में बाधा नहीं ॥ १० ॥
कर्म की परीक्षा हो चुकी । अब दोष की परीक्षा का आरम्भ करते हैंः—
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CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
११४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२५३--सुखाद्रागः ॥ ११ ॥
( सुखात् ) सुख से ( रागः ) आसक्ति वा फंसना होता है ॥
इसी से यह भी समझना चाहिये कि दुःख से द्वेष होता है ॥ ११ ॥
२५४--तन्मयत्वाच्च ॥ १२ ॥
( तन्मयत्वात् ) तन्मय हो जाने से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥
निरन्तर सुख ही सुख का ध्यान करते रहने से मन सुखिया होजाता है
तब उस को सुख में राग होजाता है, इसी प्रकार निरन्तर दुःख ही दुःख का
ध्यान करते रहने से मन दुखिया होजाता है तब उस से द्वेष होता है ॥ १२ ॥
२५५--अदृष्टाच्च ॥ १३ ॥
( अदृष्टात् ) पूर्व जन्म के प्रारब्ध कर्मों से ( च ) भी राग और द्वेष
होते हैं ॥ १३ ॥
२५६-जातिविशेषाच्च ॥ १४ ॥
( जातिविशेषात् ) विशेष जाति से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥
जैसे मनुष्य जाति का दुग्ध, फल, पुष्पादि से राग तथा नकुल का सर्प से
और घोड़े का भैंसे से जातिकृत द्वेष होता है ॥ १४ ॥
२५७-इच्छाद्वेषपूर्विका धर्माधर्मप्रवृत्तिः ॥ १५ ॥
( धर्माधर्मप्रवृत्तिः ) धर्म और अधर्म में प्रवृत्ति ( इच्छाद्वेषपूर्विका ) राग
पूर्वक और द्वेषपूर्वक होती है ॥ १५ ॥
२५८-तत्सयोगो विभागः ॥ १६ ॥
(ततः) उस धर्माधर्म प्रवृत्ति से (संयोगः) जन्म (विभागः) और मृत्यु होते हैं ॥ १६ ॥
२५९-आत्मर्म्मसु मोक्षो व्याख्यातः ॥ १७ ॥
(आत्मकर्मसु) आध्यात्मिककर्मों के करने पर (मोक्षः) मोक्ष ( व्याख्यातः )
वेद में कहा गया है ॥ १७ ॥
इति षष्ठाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥
इति श्री तुलसीरामस्वामीकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे
श्रौतधर्माध्यायः षष्ठः समाप्तः
॥ ६ ॥
ॐ
अथ सप्तमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
द्रव्यों और कर्मों की परीक्षा हो चुकी तथा बीच में श्रौतधर्मों की भी
परीक्षा की गई । अब क्रमानुसार सप्तमाध्याय में गुणों की परीक्षा करेंगे,
इस लिये गुण जो प्रथमाध्याय प्रथम आह्निक के छठे सूत्र में कहे थे, वह
प्रकरण अब बहुत दूर हो गया है, इस लिये आचार्य उस दूरस्थ प्रकरण को
स्मरण कराते हैं कि-
२६०-उक्ता गुणाः ॥ १ ॥
( गुणाः ) गुण ( उक्ताः ) १।६ में कहे गये थे ॥ १ ॥
२६१-पृथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शाः
द्रव्यानित्यत्वादनित्याश्च ॥ २ ॥
( पृथिव्यादि-स्पर्शाः ) पृथिवी आदि द्रव्यों के रूप, रस, गन्ध और
स्पर्श, गुण ( द्रव्यानित्यत्वात् ) द्रव्य की अनित्यता से ( अनित्याः ) अनित्य
( च ) भी हैं ॥
अर्थात् अनित्य पृथिवी का गुण गन्धादिक भी अनित्य है, इसी प्रकार
अनित्य अग्नि का गुण रूप भी अनित्य है । अनित्य जल का गुण रस भी
अनित्य है । अनित्य वायु का गुण स्पर्श भी अनित्य है ॥ २ ॥
पृथिवी आदि द्रव्य कार्य कारण भेद से अनित्य और नित्य भी होते
हैं । उन में से अनित्य द्रव्यों के गुणों को इस सूत्र में अनित्य कहा गया ।
आगे नित्य द्रव्यों के गुणों को नित्य समझना चाहिये सो कहते हैं:-
२६२-एतेन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम् ॥ ३ ॥
( एतेन ) पूर्वोक्त कथन से ही ( नित्येषु ) नित्य द्रव्यों में (नित्यत्वम्)
गुणों की भी नित्यता ( उक्तम् ) कही गई ॥ ३ ॥
२६३-अप्सु तेजसि वायौ च नित्या द्रव्यनित्यत्वात् ॥ ४ ॥
११६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(द्रव्यनित्यत्वात्) द्रव्य के नित्य होने से (अप्सु) जल के परमाणुओं
में (तेजसि) अग्नि के परमाणुओं में (च) और (वायौ) वायु के परमाणुओं
में (नित्याः) गुण भी नित्य हैं ॥
जल के परमाणुओं में रस, रूप और स्पर्श; अग्नि के परमाणुओं में
रूप और स्पर्श, वायु के परमाणुओं में स्पर्श गुण नित्य हैं, ऐसा शङ्कर
मिश्रादि व्याख्यान करते हैं परन्तु परमाणु रूप नित्यद्रव्यों में अनित्यद्रव्यों
के गुण संभव नहीं, इस लिये हमारे मत में सूत्र का यही अभिप्राय है कि
जलपरमाणुओं में रस, अग्निपरमाणुओं में रूप और वायुपरमाणुओं में
स्पर्श; केवल यही नित्य गुण हैं ॥
इस सूत्र में पृथिवी के परमाणुओं का गन्ध गुण नित्य कहने से न
जाने क्यों छोड़ दिया गया, इस विषय पर प्रायः सभी टीकाकार बिना
किसी तर्क के चुपचाप इस शङ्का की ओर ध्यान नहीं लाये ॥ ४ ॥
२६४-अनित्येष्वनित्या द्रव्याऽनित्यत्वात् ॥ ५ ॥
(द्रव्यानित्यत्वात्) द्रव्यों के अनित्य होने से (अनित्येषु) अनित्य
कार्य द्रव्यों में (अनित्याः) गुण भी अनित्य हैं ॥ ५ ॥
२६५-कारणगुणपूर्वकाः पृथिव्यां पाकजाः ॥ ६ ॥
(पृथिव्यां) कार्य रूप पृथिवी में (पाकजाः) अन्य द्रव्यों के साथ
पकने से उत्पन्न हुए रस रूप और स्पर्श गुण (कारणगुणपूर्वकाः) अपने २
कारणों के गुणों से आये हुए होते हैं ॥
पृथिवी में केवल गन्ध गुण तो अपना है और रूपादि गुण अग्नि आदि
अन्य द्रव्यों के साथ पकने से उत्पन्न होजाते हैं ॥ ६ ॥ क्योंकि-
२६६-एकद्रव्यत्वात् ॥ ७ ॥
प्रत्येक गुण का केवल एक ही द्रव्य होने से ॥ ७ ॥
२६७-अणोर्महतश्चोपलब्ध्यनुप-
लब्धी नित्ये व्याख्याते ॥ ८ ॥
(अणोः) अणु की (च) और (महतः) महत् की (उपलब्ध्यनुपलब्धी)
अनुपलब्धि और उपलब्धि (नित्ये) नित्य (व्याख्याते) कहीं समझनी चाहिये॥
प्रत्येक अणु अर्थात सूक्ष्मपदार्थ की उपलब्धि नहीं होती और महत्
पदार्थ की उपलब्धि होती है, यह उपलब्ध और अनुपलब्ध होना सार्व-
कालिक नित्य है ॥ ८ ॥
२६८—कारणबहुत्वाच्च ॥ ६ ॥
(कारणबहुत्वात्) बहुत कारणों के होने से (च) भी महत् पदार्थ
में महत्त्व=बड़ापन होजाता है ॥ ९ ॥
२६९—अतोविपरीतमणु ॥ १० ॥
(अतः) इस से (विपरीतम्) विरुद्ध (अणु) परमाणु रूप लघुपदार्थ
में महत्त्व=बड़ा पन नहीं होता ॥ १० ॥
२७०—अणु महदिति तस्मिन् विशेष-
भावाद्विशेषाऽभावाच्च ॥ ११ ॥
(अणु) छोटा (महत्) बड़ा (इति) यह व्यवहार (तस्मिन्) उस
पदार्थ में (विशेषभावात्) विशेष होने से (च) और (विशेषाऽभावात्)
विशेष न होने से भी होता है ॥
एक ही पदार्थ को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा से छोटा कहसकते हैं और
उसी को तीसरे पदार्थ की अपेक्षा से बड़ा भी कह सकते हैं। जैसे—एक ही
आंवला (आमलकीफल) बिल्व से छोटा और गेहूँ से बड़ा कहाता है ॥११॥
२७१—एककालत्वात् ॥ १२ ॥
(एककालत्वात्) एक काल में होने से ॥
जिस काल में हम आंवले को बिल्व से छोटा कहते हैं,उसी एक काल
में उसी आंवले को गेहूँ से बड़ा भी कहते हैं ॥ १२ ॥
२७२—दृष्टान्ताच्च ॥ १३ ॥
(च) और (दृष्टान्तात्) दृष्टान्त से भी सिद्ध है ॥
जैसा एक दृष्टान्त आंवले का पूर्व सूत्रों में दिया गया, ऐसे ही अन्य
अनेक दृष्टान्त सर्वत्र देखे जाते हैं। जैसे गौ हाथी से छोटी और बकरी से
बड़ी होती है, इत्यादि ॥ १३ ॥
प्रश्न—तो क्या छोटेपन का छोटापन और बड़ेपन का बड़ापन भी होता
है ? उत्तर—नहीं, क्योंकि—
११८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२७३—अणुत्वमहत्त्वयोरणुत्वमहत्त्वा-
ऽभावः कर्मगुणैर्व्याख्यातः ॥ १४ ॥
(अणुत्वमहत्त्वयोः) छोटेपन और बड़ेपन का (अणुत्वमहत्त्वाभावः)
अन्य छोटापन और बड़ापन नहीं होता, यह बात (कर्मगुणैः) कर्म और
गुणों के व्याख्यान से (व्याख्यातः) कही गई ॥
कर्मों और गुणों के व्याख्यान में कह चुके हैं (देखो सूत्र १६ और १७
अध्याय १ आह्निक १) कि कर्म का कर्म और गुण का गुण नहीं होता,
इसी प्रकार समझना चाहिये कि छोटेपन का छोटापन और बड़ेपन का
बड़ापन भी अन्य नहीं होता ॥ १४ ॥
इसी बात को अगले सूत्र में भिन्न-२ करके समझाते हैं कि:-
२७४-कर्मभिः कर्माणि गुणैश्च गुणा व्याख्याताः ॥ १५ ॥
(कर्मभिः) उत्क्षेपणादि विशिष्ट कर्मों से (कर्माणि) कर्म (च) और
(गुणैः) रूपादि विशिष्ट गुणों से (गुणाः) गुण (व्याख्याताः) व्याख्यात
हो चुके ॥ १५ ॥ तथा:-
२७५-अणुत्वमहत्त्वाभ्यां कर्मगुणाश्च ॥ १६ ॥
(अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व के व्याख्यान से (कर्मगुणाः)
कर्म और गुण (च) भी व्याख्यात समझो ॥
जिस प्रकार अणुत्व का अणुत्व नहीं होता और जैसे महत्त्व का महत्त्व
नहीं होता, इसी प्रकार कर्मों का अणुत्व और महत्त्व तथा गुणों का अणुत्व
और महत्त्व भी नहीं बनता ॥ १६ ॥ और-
२७६-एतेन दीर्घत्वह्रस्वत्वे व्याख्याते ॥ १७ ॥
(एतेन) इस से (दीर्घत्वह्रस्वत्वे) दीर्घता और ह्रस्वता (व्याख्याते)
व्याख्यात समझो ॥
जिस प्रकार अणुत्व का अणुत्व और महत्त्व का महत्त्व नहीं बनता,
इसी प्रकार दीर्घत्व का दीर्घत्व और ह्रस्वत्व का ह्रस्वत्व भी नहीं बनता ॥ १७ ॥
प्रश्न-१-अणुत्व, २-महत्त्व, ३-दीर्घत्व, ४-ह्रस्वत्व, ये चारों परिमाण
नित्य हैं वा अनित्य ? उत्तर-.