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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

१७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विस्मितोऽभून्महासेनस्ततः प्राह मुनेः सुतः ।
राजन्नेतल्लोकजातं पश्यतः काल अत्यगात् ॥ ९४ ॥
अर्बुदानां द्वादशकमितोऽप्यत्र दिनात्मकः ।
गच्छावो बाह्यलोकं तं यत्रास्ते जनको मम ॥ ९५ ॥
इत्युक्त्वा भूभृता तेन सह भूयः समागतः ।
पूर्ववत्तं गण्डशैलान्निर्गत्याभ्याययौ बहिः ॥ ९६ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गण्डशैललोकावलोकने
द्वादशोऽध्यायः ॥
मुनिकुमारका ऐसा योगसामर्थ्य देखकर महासेनको बड़ा आश्चर्य
हुआ । तब उससे वह मुनिपुत्र बोला ॥ ६३ उ०-६४ पू० ॥
राजन् ! इन लोकोंको देखते हुए हमें बारह अरब वर्ष बीत चुके हैं
और यहाँ अभी एक दिन ही हुआ है । अब हम बाहरके लोकमें चलेंगे,
जहाँ मेरे पिताजी विराजमान हैं ॥ ६४ उ०-६५ ॥
ऐसा कहकर वह राजाके सहित पुनः लौट आया । पहले ही की
भाँति उसने शिलाको पार किया और बाहर आ गया ॥ ६६ ॥
द्वादश अध्याय समाप्त ।

त्रयोदशोऽध्यायः
मुनिपुत्रः पुनः शैलान्महासेने विनिर्गते ।
विधाय मूर्च्छितं लिङ्गदेहं संस्कारमात्रकम् ॥ १ ॥
समादाय विनिर्गत्य प्राक्षिपत्तच्छरीरके ।
उत्थापयामास तु तं जीर्णदेहसुसङ्गतम् ॥ २ ॥
अथोत्थितो महासेनो बाह्यलोकं समीक्ष्य तु ।
भुवं जनांस्तरून् स्रोतोह्रदादींश्चापि नूतनान् ॥ ३ ॥
बभूव विस्मितोऽत्यन्तं पप्रच्छ मुनिनन्दनम् ।
कतमो वै महाभाग लोकोऽयं मे प्रदर्शितः ॥ ४ ॥
पुरादृष्टादपूर्वोऽयं समाचक्ष्वैतदद्भुतम् ।
इत्यापृष्टो मुनिसुतो महासेनमुवाच ह ॥ ५ ॥
शृणु राजन्नयं लोकः पूर्वं योऽस्माभिरास्थितः ।
स एव चिरकालेन परिणामान्तरं गतः ॥ ६ ॥
त्रयोदश अध्याय ॥ १३ ॥
शोकाकुल महासेनको मुनिपुत्रका उपदेश
महासेनके शिलासे बाहर निकलते समय मुनिपुत्रने उसके
लिंग शरीरको पुनः मूर्च्छित कर दिया और उस संस्कारमात्र शरीरको
लेकर बाहर आ उसके स्थूल शरीरमें डाल दिया। इस प्रकार पूर्व
शरीरके साथ संयुक्त होनेपर उसने उसे सचेत कर दिया ॥ १-२ ॥
महासेनने चेत होनेपर बाह्य जगत्को देखा तो पृथ्वी, मनुष्य, वृक्ष,
स्रोत और सरोवर आदि सभीको नये ही रूपमें देखकर उसे बड़ा
आश्चर्य हुआ और उसने मुनिपुत्रसे पूछा, "महाभाग ! आपने मुझे यह
कौनसा लोक दिखा दिया ? ॥ ३-४ ॥
मेरे पहले देखे हुए प्रदेशसे तो यह भिन्न ही है। देखो जी ! यह
तो बड़ी ही विचित्र बात है।" इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने
महासेनसे कहा—॥ ५ ॥
“राजन् ! सुनो, यह वही देश है जिसमें हम पहले रहते थे।
बहुत समय हो जानेके कारण वही अब बदल गया है ॥ ६ ॥

१७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
शैललोकगतानां नो दिनमेकं यदत्यगात् ।
तावतैवाऽत्र कालेन द्वादशार्वुदवत्सराः ॥ ७ ॥
अतिक्रान्ता अतो लोकस्त्वयं रूपान्तरं गतः ।
भिन्नां व्यवहृतिं पश्य भाषां चापि समन्ततः ॥ ८ ॥
एवमेव जनानां तु कालेन भिद्यते स्थितिः ।
एवं मया तु बहुधा दृष्टा भिन्ना जगत्स्थितिः ॥ ९ ॥
पश्यैषमेष भगवान् समाहितमतिः पिता ।
सोऽयं देशो यत्र पूर्वं त्वया मे संस्तुतः पिता ॥ १० ॥
एनं पश्य महाशैलं यत्र मे लोक ईक्षितः ।
त्वद्भ्रातृवंशपुरुषा अतिक्रान्ताः सहस्रशः ॥ ११ ॥
यत्ते परं वङ्गदेशे सुन्दराख्यं स्थितं पुरा ।
तत्राऽभूत् सम्प्रति वनं व्याप्तं श्वापदमण्डलैः ॥ १२ ॥
त्वद्भ्रातुर्वंशजः सद्यो वीरवाहुरिति श्रुतः ।
मालवेशो विशालाख्ये क्षिप्रातीरे पुरेऽस्ति हि ॥ १३ ॥

शिलाके संसारमें जानेपर हमें जो एक दिन बीता था, उतने
हीमें यहाँ बारह अरब वर्ष बीत गये हैं। इसीसे इस लोकका दूसरा
ही रूप हो गया है। देखो, अब यहाँ सब ओर दूसरी ही आचार-पद्धति है
और दूसरी ही भाषा है ॥ ७-८ ॥
कालक्रमसे इसी प्रकार लोगोंकी स्थितिमें परिवर्तन होता रहता है।
मैंने तो अनेकों बार जगत्की ऐसी विभिन्न स्थितियाँ देखी हैं ॥ ९ ॥
देखो, मेरे सामर्थ्यवान् पिताजी उसी प्रकार समाधिमें स्थित हैं।
यह वही देश है जहाँ पहले तुमने मेरे पिताजीकी स्तुति की थी ॥ १० ॥
इस विशाल शिलाको भी देखो, जिसमें तुमने मेरी सृष्टि देखी है।
तुम्हारे भाईकी वंश-परम्परामें तो अब हजारों पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं ॥११॥
तुम्हारे वङ्गदेशमें जो पहले सुन्दरपुर नामका श्रेष्ठ नगर था वहाँ तो
अब हिंस्र जीवोंसे भरा हुआ विशाल वन हो गया है ॥ १२ ॥
तुम्हारे भाईके वंशमें उत्पन्न हुआ इस समय वीरबाहु नामसे
विख्यात मालव-देशका राजा है, जो क्षिप्रा नदीके तट पर विशाल
नामके नगरमें रहता है ॥ १३ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः। १७७
तद्वंश्योऽपि सुशर्माख्यो द्राविडेष्वभवन्नृपः।
वर्द्धने नाम नगरे ताम्रपर्णीसरित्तटे ॥ १४ ॥
लोकस्थितिरियं चेत्थं सर्वदा परिवर्त्तते।
अल्पकालेनैवमेतद्भवन्नूतनं जगत् ॥ १५ ॥
इतोऽपि चिरकालेन नगा नद्यो ह्रदा भुवः।
अन्यथाभावमायान्ति एवमेव जगद्-गतिः ॥ १६ ॥
गिरयो निम्नतां यान्ति निम्नदेशा महोच्चताम्।
मरुदेशास्त्वनूपाः स्युः पर्वता वालुकामयाः ॥ १७ ॥
कठिना भूः शिलाप्राया भवेदत्यन्तकोमला।
कोमला भूरपि भवेत् पाषाणसदृशी क्वचित् ॥ १८ ॥
ऊपरा भूरुर्वरा स्यादुर्व्वरोषररूपिणी।
रत्नानि शर्कराः स्युर्वै रत्नात्मानस्तु शर्कराः ॥ १९ ॥
क्षारं जलं स्वादुरसं मधुरं क्षारतां गतम्।
कदाचिन्नरबाहुल्यं कदाचित् पशुसञ्चयम् ॥ २० ॥
उसीके वंशमें द्रविड देशमें ताम्रपर्णी नदीके तीरपर वर्द्धन नामकी
नगरीमें सुशर्मा नामका भी एक राजा हुआ है ॥ १४ ॥
यह लोकस्थिति सर्वदा इसी प्रकार बदलती रहती है। इस तरह
थोड़े ही समयमें यह जगत् नया बन जाता है ॥ १५ ॥
आगे भी अधिक समय बीतनेपर ये पर्वत, नदियाँ, सरोवर और भूमियाँ
दूसरे ही प्रकार की हो जायँगी। संसारका स्वरूप ऐसा ही है ॥ १६ ॥
पर्वत गड्ढे हो जाते हैं और निम्न देश बहुत ऊँचे उठ जाते हैं।
मरुस्थल सजल देश हो जाते हैं और पहाड़ियाँ रेगिस्तान बन
जाती हैं ॥ १७ ॥
जिनमें पत्थरोंकी अधिकता होती है वे कठोर भूमियाँ अत्यन्त
कोमल हो जाती हैं और कहीं-कहीं कोमल भूमियाँ भी पत्थरके समान
हो जाती हैं ॥ १८ ॥
ऊसर भूमि उपजाऊ और उपजाऊ भूमि ऊसर बन जाती हैं।
इसी प्रकार रत्न रोड़े बन जाते हैं और रोड़े रत्नरूपमें परिणत हो
जाते हैं ॥ १९ ॥
मीठा जल खारी हो जाता है और खारी जल मीठा। कहीं जहाँ

१७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
कदाचित् कृमिकीटादिप्रचुरं जगदीक्षितम् ।
एवमेतज्जगत् कालभेदात् परिणतं पृथक् ॥ २१ ॥
तस्मादयं पुराऽस्माकं लोक एवेदृशः स्थितः ।
इत्याकर्ण्य मुनिसुत-वाक्यं स च महीपतिः ॥ २२ ॥
महासेनोऽत्यन्तशोकाविष्टो मूर्च्छामुपागतः ।
मुनिपुत्रसमाश्वस्तः प्रज्ञामासाद्य भूपतिः ॥ २३ ॥
अत्यन्तशोकसंविष्टो विललाप सुदीनवत् ।
भ्रातरं भ्रातृपुत्रांश्च दारान् स्वात्मन एव च ॥ २४ ॥
पुत्रादींश्च पृथक् स्मृत्वा विललापाऽतिदुःखितः ।
अथ तं मोहतो भ्रातृमुखान् शोचन्तमञ्जसा ॥ २५ ॥
मुनिपुत्रो वचः प्राह बुवोधयिषया नृपम् ।
राजंस्त्वं बुद्धिमान्नूनं तत्किमर्थं हि शोचसि ॥ २६ ॥
बुद्धिमन्तो हि विफलं जातु कुर्वन्ति कर्म नो ।
अविमृश्य फलं यस्तु कर्म कुर्यात् स बालिशः ॥ २७ ॥
मनुष्योंकी अधिकता होती है वहीं पशुओंके झुण्ड दीख पड़ते हैं ॥ २० ॥
कोई समय ऐसा भी था जब इस जगत्में कृमि-कीटादिकी ही
बहुलता देखी जाती थी। इस प्रकार कालभेदसे यह जगत् अलग-अलग
रूपोंमें बदलता रहता है ॥ २१ ॥
इसलिये हमारा यह पूर्वकालिक प्रदेश ही इस समय ऐसा हो गया
है।" मुनिपुत्रकी यह बात सुनकर राजा महासेन शोकाकुल होकर
मूर्च्छित हो गया ॥ २२-२३ पू० ॥
तब मुनिपुत्रके शान्त करनेपर उसे चेत हुआ और वह शोकातुर हो
अत्यन्त दीनकी तरह विलाप करने लगा ॥ २३ उ०-२४ पू० ॥
वह अपने भाई, भतीजों तथा स्त्री-पुत्र आदिको अलग-अलग याद
करके अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगा ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥
इस प्रकार उसे मोहवश स्वभावसे ही अपने भाई आदिके
लिये शोक करते देख उसे समझानेके लिये मुनिकुमारने ये वचन
कहे—॥ २५ उ०-२६ पू० ॥
"राजन् ! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर शोक क्यों करते हो ?

त्रयोदशोऽध्यायः। १७६
तत्त्वं शोचसि कं ब्रूहि किमर्थं वा हि शोचनम् ।
इत्युक्तः प्राह तं भूपो महासेनोऽतिदुःखितः ॥ २८ ॥
किं न पश्यसि शोकस्य स्थानं मम महामुने ! ।
सर्वं यस्य हृतं तस्य कारणं पृच्छसीह किम् ॥ २९ ॥
एकस्मिन्नपि शोकः स्यादृते लोकस्य सर्वथा ।
कुतस्त्वं पृच्छसि पुनः सर्वनाशे ह्युपस्थिते ॥ ३० ॥
इत्युक्तो मुनिपुत्रोऽपि भूयः प्राह हसन्निव ।
राजन् ब्रूहि किमेतत्ते कुलधर्मः सनातनः ॥ ३१ ॥
यच्छोचनमकृत्वा तु प्रत्यवायो महान् भवेत् ।
अथवा शोचिते नष्टं प्राप्यते भूय एव तत् ॥ ३२ ॥
राजन् विमृश धैर्येण शोचिते किं फलं भवेत् ।
नष्टेषु बन्धुषु यदि शोचितव्यं तदा शृणु ॥ ३३ ॥
बुद्धिमान् लोग तो कभी कोई व्यर्थ कर्म नहीं किया करते। जो व्यक्ति
फलका विचार न करके कर्म कर बैठता है वही मूर्ख है ॥२६ उ०-२७॥
अच्छा, तुम यह तो बताओ कि किसके लिये शोक करते हो और
किस निमित्तसे तुम्हें शोक है?” ऐसा पूछे जानेपर महासेनने अत्यन्त
दुःखी होकर उससे कहा-॥ २८ ॥
“मुनिराज ! क्या आपको मेरे शोकका स्थान दिखायी नहीं देता ?
भला, जिसका सभी कुछ चला गया उससे आप शोकका कारण
क्यों पूछते हैं ? ॥ २९ ॥
जिसका एक सम्बन्धी मर जाता है उसे भी सब प्रकार शोक
होता ही है, फिर मेरा सर्वनाश हो जानेपर भी आप यह प्रश्न कैसे
कर रहे हैं ?” ॥ ३० ॥
ऐसा कहे जानेपर मुनिपुत्रने कुछ हँसते हुए-से कहा, “राजन् !
बताओ तो, क्या यह तुम्हारा परम्परागत कुलधर्म है, जिससे कि
शोक न करने पर कोई बड़ा भारी अनर्थ हो जायगा ? अथवा शोक
करनेसे तुम्हें गयी हुई वस्तुएँ पुनः मिल जायेंगी ॥ ३१-३२ ॥
राजन् ! तुम धैर्यधारण करके विचार करो कि शोक करनेसे
क्या फल मिलेगा। यदि नष्ट हुए सम्बन्धियोंके लिये शोक करना

१८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अतीता बन्धवो नष्टाः पितामहमुखाः खलु ।
तत् सर्वदा शोचितव्यं कुतः सर्वं न शोचितम् ॥ ३४ ॥
अथ ते बन्धवः कस्य बन्धुत्वं वा कुतस्तव ।
मातापित्रोः स्वस्य वाऽपि पुरीषक्रमयो हि ये ॥ ३५ ॥
असङ्ख्याताः स्वदेहोत्था देहसम्बन्धिनोऽपि च ।
न ते स्युर्बन्धवः कस्मात् कुतो वा ते न शोचिताः ॥ ३६ ॥
राजन् विमृश कस्त्वं वै कान् विनष्टान् प्रशोचसि ।
देहस्त्वं देहभिन्नो वा देहः सङ्घातरूपकः ॥ ३७ ॥
सङ्घातस्यैकदेशस्य वा नाशानाश उच्यते ।
प्रतिक्षणं त्वेकदेशनाशो देहस्य भावितः ॥ ३८ ॥
मूत्रोच्चारश्लेष्मनखकेशादेः सन्ततं च यः ।
सर्वात्मना तु सङ्घातनाशो न हि विभाव्यते ॥ ३९ ॥
आवश्यक हो, तो सुनो । तुम्हारे दादा आदि और भी अनेकों
भूतकालीन सम्बन्धी मर ही चुके हैं; तब तुम्हें सर्वदा शोक ही
करते रहना चाहिये था । तुमने उन सबके लिये शोक क्यों नहीं
किया ? ॥ ३३-३४ ॥
अच्छा, तुम्हारे वे सम्बन्धी भी वास्तवमें किसके थे और तुम्हारे
साथ भी उनका कैसे सम्बन्ध हुआ ? देखो, माता-पिता अथवा अपने भी
विष्ठामें जो अगणित कीड़े होते हैं वे अपने देहसे ही होते हैं और
देहके सम्बन्धी भी हैं ही, फिर वे तुम्हारे स्वजन क्यों न हुए और
उनके लिये तुम शोक क्यों नहीं करते ? ॥ ३५-३६ ॥
राजन् ! तुम सोचो कि वास्तवमें तुम कौन हो और किन मरे हुओं-
के लिये तुम शोक कर रहे हो ? तुम देह हो या देहसे भिन्न ? देह तो
अनेक तत्त्वोंका संघात ( समूह ) है ॥ ३७ ॥
उस सम्पूर्ण संघातके अथवा उसके एक अंशके नाशको ही नाश
कहते हैं । और देहके एक-एक अंशका नाश तो प्रत्येक क्षणमें माना
जाता है । जैसे मूत्र, मल, कफ, नख और केश आदिका नाश निर-
न्तर होता ही रहता है । तथा इस संघातका पूर्णतया नाश कभी माना
नहीं जाता ॥ ३८-३९ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः। १८१
भ्रात्रादेस्तव देहांशः स्यात् पृथिव्यादिषु स्फुटम् ।
अन्ततो देहगगनमविनाश्यस्ति केवलम् ॥ ४० ॥
न त्वं देहः किं तु देही मदेह इति भाषसे ।
यथा मद्वस्त्रमित्येवं स देहस्त्वं कथं वद ॥ ४१ ॥
यदि त्वं देहभिन्नोऽसि सम्बन्धः कोऽन्यदेहकैः ।
यथा भ्रात्रादिवासोभिर्नास्ति सम्बन्धलेशकः ॥ ४२ ॥
अविशेषात्तच्छरीरैर्विनष्टैस्तैः कथं शुचा ।
मच्छरीरं मदक्षाणि मत्प्राणो मन्मनस्त्विति ॥ ४३ ॥
वदन् भवान् किंस्वरूपो वद मे पृच्छते नृप ! ।
एवमुक्तो महासेनो मुहूर्तं सुविचार्य तु ॥ ४४ ॥
अप्राप्य तं मुनेः प्रश्ने प्राह दीनतरस्ततः ।
न जाने भगवन् कोऽहमिति सर्वात्मनाऽप्यहम् ॥ ४५ ॥
तुम्हारे भ्राता आदिके देहोंका अंश पृथिवी आदि भूतोंमें स्पष्ट
है ही। [ इन पृथिवी आदिका भी नाश माना जाय तो ] अन्ततः विशुद्ध
देहाकाश तो अविनाशी है ही ॥ ४० ॥
वास्तवमें तो तुम देह नहीं देही (देहके स्वामी) हो, क्योंकि
तुम जिस प्रकार 'मेरा वस्त्र' कहते हो वैसे ही 'मेरा देह' भी कहते
हो। फिर बताओ तुम देह कैसे हो सकते हो ? ॥ ४१ ॥
यदि तुम इस देहसे भी भिन्न हो तो अन्य देहोंके साथ तुम्हारा
क्या सम्बन्ध हो सकता है ? जिस प्रकार कि भाई आदिके वस्त्रोंसे
तुम्हारा लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। और [ उनके ममतास्पद
होनेमें ] उनके शरीरोंसे उनके वस्त्रोंका कोई भेद है नहीं। फिर शरीरों-
के मरनेपर ही तुम्हें क्यों शोक होता है ? ॥ ४२-४३ पू० ॥
राजन् ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, बताओ, जब तुम 'मेरा
शरीर' 'मेरी इन्द्रियाँ' 'मेरा प्राण' 'मेरा मन' ऐसा कहते हो तब तुम्हारा
क्या स्वरूप हुआ ?" ॥ ४३ उ०-४४ पू० ॥
ऐसा प्रश्न होनेपर महासेनने एक मुहूर्त्त खूब विचार किया और
जब मुनिके उस प्रश्नका कोई उत्तर न मिला तो अत्यन्त दीन
होकर बोला—"भगवन् ! सब प्रकार विचारनेपर भी मैं यह नहीं जान

१८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
स्वभावतस्तु शोचामि कारणं तत्र नाविदम् ।
प्रपन्नस्त्वामहं दीनः किमिदं भगवन् वद ॥ ४६ ॥
सर्वे शोचन्ति यत् कस्मिन्नपि बन्धौ मृते सति ।
न स्वात्मानं विजानन्ति नाऽन्यं शोचन्ति चैव हि ॥ ४७ ॥
एतन्मे ब्रूहि भगवन् शिष्याय तव वै स्फुटम् ।
इति पृष्टो मुनिसुतो महासेनमथाऽब्रवीत् ॥ ४८ ॥
राजन् शृणु महादेव्या मायया मोहिता जनाः ।
स्वात्मानमविदित्वाैव व्यर्थं शोचन्ति सर्वदा ॥ ४९ ॥
यावन्न विदितं स्वात्मसतत्त्वं तावदेव वै ।
जनाः शोचन्ति विज्ञाय भूयः शोचन्ति न क्वचित् ॥ ५० ॥
यथा निद्रामोहितात्मा स्वमविज्ञाय शोचति ।
ऐन्द्रजालिकमन्त्रोत्थमायया मोहितो नरः ॥ ५१ ॥
तत्प्रकल्पितसर्पादिभीत्या यद्वद्धि शोचति ।
सका कि मैं कौन हूँ। मैं केवल स्वभाववश ही शोक कर रहा हूँ, किन्तु
उसका कारण नहीं जानता। मैं दीन आपकी शरणमें हूँ। भगवन् !
बताइये, यह सब क्या रहस्य है ॥ ४४ उ०-४६ ॥
कोई भी सम्बन्धी मर जाता है तो सभी लोक शोक किया करते
हैं। वे भी न तो अपने स्वरूपको जानते हैं और न दूसरेके ही स्वरूप-
को। तथापि शोक करते ही हैं ॥ ४७ ॥
भगवन् ! मैं आपका शिष्य हूँ। यह बात आप मुझे स्पष्ट समझा
दीजिये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने महासेनसे कहा—॥४८॥
“राजन् ! सुनो, देवी महामायाके कारण मोहमें पड़े हुए लोग
अपने वास्तविक स्वरूपको न जानकर सर्वदा व्यर्थ ही शोक किया
करते हैं ॥ ४९ ॥
जबतक आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता तभीतक लोगोंको शोक
होता है। उसको जान लेनेपर तो फिर कभी शोक नहीं होता ॥ ५० ॥
जिस प्रकार निद्रासे मूर्च्छित हुआ पुरुष [ स्वप्नावस्थामें कल्पित
अनर्थकी आशंकासे ] अपनेको न जाननेके कारण ही शोक करने
लगता है, तथा किसी मायावीकी मन्त्रजनित मायासे मोहित हुआ
पुरुष मायाकल्पित सर्पादिके भयसे शोकाकुल हो उठता है,

त्रयोदशोऽध्यायः। १८३
तथैव मायया मुग्धः स्वमज्ञात्वा प्रशोचति ॥ ५२ ॥
यथा स्वप्नात् प्रबुद्धो वा ज्ञातैन्द्रजालिकागमः ।
न शोचति क्वचिच्चान्याञ्छुचा युक्तान् हसत्यपि ॥ ५३ ॥
एवं स्वात्मविदो मायामुक्ताः शोचन्ति न क्वचित् ।
शोचतस्त्वादृशान् मायामूढान् प्रविहसन्ति च ॥ ५४ ॥
तत्त्वं विज्ञाय्यात्मतत्त्वं मायामुत्तीर्य दुर्गमाम् ।
जहि शोकं महाबाहो ! मोहोत्थं सद्विमर्शनात् ॥ ५५ ॥
इत्युक्तः पुनरप्याह महासेनो मुनीश्वरम् ।
भगवन् यस्त्वया प्रोक्तो दृष्टान्तो विषमः स हि ॥ ५६ ॥
स्वाप्नो वा मायिको वाऽपि शून्यात्मा भासते परम् ।
अयं जाग्रत्प्रपञ्चस्तु सत्यः सर्वार्थसाधकः ॥ ५७ ॥
अबाधितः स्थिरश्चापि कथं स्वाप्नसमो भवेत् ।
उसी प्रकार मायासे मुग्ध हुआ पुरुष अपनेको न जाननेके कारण ही
शोक करता है ॥ ५१-५२ ॥
जैसे स्वप्नसे जगा हुआ तथा इन्द्रजालविद्याको जाननेवाला
पुरुष कभी शोक नहीं करता, प्रत्युत अन्य शोकयुक्त पुरुषोंको देखकर
हँसता भी है, इसी प्रकार आत्मतत्त्वको जाननेवाले मायामुक्त महापुरुष
कभी शोक नहीं करते, प्रत्युत तुम-जैसे शोक करनेवाले मायामुग्ध
पुरुषको देखकर हँसते हैं ॥ ५३-५४ ॥
अतः तुम आत्मतत्त्वको जानकर इस दुर्गम मायाको पार कर
लो और हे महाबाहो ! सत्स्वरूप आत्मतत्त्वका विचार करके इस
मोहजनित शोकको दूर कर दो" ॥ ५५ ॥
इस प्रकार कहे जानेपर महासेनने पुनः उन मुनिराजसे कहा,
“भगवन् ! आपने जो स्वप्न और इन्द्रजालका दृष्टान्त दिया वह तो
यहाँ ठीक नहीं बैठता ॥ ५६ ॥
स्वप्न और मायाका जो प्रपञ्च होता है वह तो पीछे शून्यरूप
ही भासता है। किन्तु यह जाग्रत् प्रपञ्च तो सत्य और सब प्रकारके
प्रयोजनोंकी पूर्ति करनेवाला है। इसका कभी बाध (मिथ्यात्व निश्चय)
नहीं होता और यह स्थिर भी है। फिर यह स्वप्नके समान कैसे

१८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
इत्युक्तः पुनराचख्यौ मुनिपुत्रोऽतिबुद्धिमान् ॥ ५८ ॥
शृणु राजन् ! यच्चयोक्तं दृष्टान्तो विषमस्त्विह ।
एष मोहो द्वितीयस्ते स्वप्ने स्वाप्नस्य यादृशः ॥ ५९ ॥
स्वाप्नवृक्षोऽपि तत्काले किं न साधयते हितम् ।
पान्थानां किं न हरति तापं छायाप्रदानतः ॥ ६० ॥
फलाद्यैः स्वाप्नमर्त्यादीन्न तर्पयति किं वद ।
स्वप्ने क बाधितः स्वाप्नः कास्थिरश्चोपलक्षितः ॥ ६१ ॥
अखिलं बाधितं जाग्रद्दशायामिति चेच्छृणु ।
जाग्रत्प्रपञ्चोऽपि सर्वः सुपुप्तौ किं न बाधितः ॥ ६२ ॥
न बाधितः परदिनेऽप्यनुवृत्तेस्तथेति चेत् ।
स्वाप्नस्यापि परदिने नाऽनुवृत्तिः क वा वद ॥ ६३ ॥
हो सकता है ?” उसके ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् मुनिपुत्रने
कहा—॥ ५७-५८ ॥
“राजन् ! सुनो, तुमने जो कहा कि स्वप्न और इन्द्रजालका
दृष्टान्त यहाँ ठीक नहीं बैठता यह तुम्हें दूसरा भ्रम हो गया है, जैसे
स्वप्नमें स्वाप्न पुरुषको [ रज्जु में सर्पादि प्रतीत होने की ] कोई दूसरी
भ्रान्ति उत्पन्न हो जाय ॥ ५६ ॥
स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला वृक्ष भी क्या स्वप्न-कालमें उपयोगी
नहीं होता ? क्या उस समय छाया देकर वह यात्रियोंकी थकावट दूर
नहीं करता ॥ ६० ॥
अथवा फलादि के द्वारा वह स्वप्नके मनुष्योंको तृप्त नहीं करता।
भला, स्वप्नका पदार्थ कभी स्वप्नमें बाधित होता है अथवा कभी
अस्थिर देखा जाता है ? ॥ ६१ ॥
यदि कहो कि [ स्वप्नमें भले ही बाधित न हो ] वह सब जाग्रत्
दशामें तो बाधित हो ही जाता है, तो सुनो, क्या जाग्रत्का सारा प्रपञ्च
सुषुप्तिमे बाधित नहीं हो जाता ॥ ६२ ॥
यदि कहो कि दूसरे दिन भी उसकी अनुवृत्ति होती है इसलिये
उसका बाध नहीं होता, तो बताओ, क्या स्वप्नके पदार्थ दूसरे दिन
अनुभवमें नहीं आते ? ॥ ६३ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः । १८५
नाऽनुवृत्तिर्भाति स्वप्ने इति चेन्नृपते ! शृणु ।
जाग्रत्यपि कानुवृत्तिभासो नव्याऽवभासके ॥ ६४ ॥
नव्येऽनुवृत्त्यभानेऽपि भात्यन्यत्रेति चेच्छृणु ।
तथा स्वप्नेऽपि भान्येवाऽनुवृत्तिः स्थिरभासने ॥ ६५ ॥
मृषानुवृत्तिस्तत्रेति चेज्जाग्रत्यपि सा तथा ।
सूक्ष्मबुद्ध्या विमृश तद्वस्तु जाग्रति संस्थितम् ॥ ६६ ॥
देहवृक्षनदीदीपादिकं क्षणविभेदितम् ।
कथं तदनुवृत्तिर्वै भवेदवितथात्मिका ॥ ६७ ॥
अचलानामपि न हि द्वितीयक्षणसङ्गतम् ।
रूपमस्ति सर्वदैव निर्भरैर्भैदितात्मनाम् ॥ ६८ ॥
मूषकैरुपदीकाभिः शूकरैर्निर्झरादिभिः ।
सर्वतस्तु विभिद्यन्ते पर्वताः सर्वदैव हि ॥ ६९ ॥
यदि कहो कि स्वप्नमें तो पूर्व पदार्थोंकी ही अनुवृत्ति नहीं भासती,
तो राजन् ! सुनो, जाग्रत्में भी अनुवृत्तिका भान कहाँ होता है, उस
अवस्थामें भी तो नये पदार्थ ही भासते हैं ॥ ६४ ॥
यदि तुम कहो कि नये-नये पदार्थोंकी प्रतीति होनेपर भी पृथ्वी
आदि अन्य पदार्थ तो वे ही रहते हैं, तो स्वप्नमें भी [देश-कालादि ]
स्थिर पदार्थोंके भासनेके साथ ही कुछ पदार्थोंकी अनुवृत्ति भासती
है । ६५ ॥
यदि तुम्हारे विचारसे स्वप्नकी अनुवृत्ति मिथ्या है तो जाग्रत्
की भी तो वैसी ही है। तुम जाग्रत्कालकी उन स्थिर वस्तुओंके विषयमें
विचार तो करो ॥ ६६ ॥
शरीर, वृक्ष, नदी और दीपक आदि पदार्थ क्षण-क्षणमें बदलते
रहते हैं। फिर उनकी अनुवृत्ति सत्य कैसे हो सकती है ॥ ६७ ॥
पर्वतादि अचल माने जानेवाले पदार्थोंका भी द्वितीय क्षणमें
रहनेवाला रूप ज्योंका त्यों नहीं होता। वे भी झरने आदिके कारण
बदलते रहते हैं ॥ ६८ ॥
चूहों, दीमकों, सूअरों और झरनों आदिके कारण पर्वतोंमें सर्वदा

१८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
पर्वताम्बुधिभूमूख्या अप्येवं क्षणभेदिनः ।
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि पश्य सूक्ष्मधिया नृप ! ॥ ७० ॥
परिच्छिन्नाऽनुवृत्तिर्हि समैव स्वाप्नजाग्रतोः ।
अपरिच्छिन्नाऽनुवृत्तिः कार्येष्वत्यन्तदुर्लभा ॥ ७१ ॥
अनुवृत्तिः कारणेन रूपेणास्ति हि सर्वदा ।
इति चेत्कारणं रूपं पृथिव्यादिमयं किल ॥ ७२ ॥
तच्चाऽनुवृत्तंस्वप्नेऽपि पृथिव्यादेर्हि भासनात् ।
अथ स्वाप्नस्य बाधो हि जाग्रति ह्यनुभूयते ॥ ७३ ॥
न जागरस्य बाधस्तु भासते कस्यचित् क्वचित् ।
इति चेच्छृणु वक्ष्यामि बाधो ह्यनवभासनम् ॥ ७४ ॥
सुषुप्तौ सर्वजगतोऽप्यनुभूतं ह्यभासनम् ।
अथ बाधो ह्यप्रमाणदर्शनं चेत्तदा शृणु ॥ ७५ ॥
अप्रमाणदर्शिनास्ति भ्रान्तानां त्वादृशां खलु ।
सर्वत्र परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार पर्वत और समुद्रादि भी
क्षण-क्षण में बदलनेवाले हैं ॥ ६६-७० पू० ॥
अब मैं तुमसे जो कहता हूं उसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार
करो। आंशिक अनुवृत्ति तो स्वप्न और जाग्रत्में समान रूपसे ही
होती है। हाँ, कार्यवर्गमें सर्वांशमें अनुवृत्तिकी प्रतीति होनी तो
अत्यन्त कठिन ही है ॥ ७० उ०-७१ ॥
यदि कहो कि कारणरूपसे तो जाग्रत्कालमें सर्वदा ही पदार्थोंकी
अनुवृत्ति होती है, तो कारणका स्वरूप तो पृथिवी आदि पञ्चभूतमय
ही है, सो वे तो स्वप्नमें भी अनुवृत्त होते ही हैं, क्योंकि वहाँ भी पृथिवी
आदिका भान होता ही है ॥ ७२-७३ पू० ॥
यदि ऐसा कहो कि स्वप्नके पदार्थोंका तो जाग्रत्कालमें अभाव
जान पड़ता है, किन्तु जाग्रत्कालका बाध कभी किसीको नहीं
भासता—तो सुनो, इसका उत्तर देता हूं। 'बाध' का अर्थ है 'न
भासना', सो सुषुप्तिमें तो सम्पूर्ण जगत्का 'न भासना' अनुभवमें
आता है ॥ ७३ उ०-७४ पू० ॥
और यदि तुम 'बाध' का अर्थ 'अप्रमाण दर्शन'¹ करो तो सुनो,
१. प्रमाणसे सिद्ध न देखना अर्थात् 'असत्य देखना' ।

त्रयोदशोऽध्यायः। १८७
ज्ञातविज्ञेयतत्त्वाना मप्रामाण्यदृशिः स्फुटा ॥ ७६ ॥
तस्मादिदं दृश्यजालं स्वाप्नदृश्यसमस्थिति ।
दीर्घकालोऽपि च स्वप्ने भासते निर्विशेषतः ॥ ७७ ॥
तस्मादबाधितो ह्यर्थक्रियाकारी स्थिरोऽपि च ।
स्वाप्नभावस्तेन तुल्यो जाग्रद्भावोऽपि सर्वशः ॥ ७८ ॥
यथा जाग्रति जाग्रत्त्वं गृहीतं जागरे स्फुटम् ।
स्वप्नेऽपि जागरत्वं तु गृहीतं तद्वदेव हि ॥ ७९ ॥
एवं स्थिते कुतो राजन् विशेषः स्वप्नजाग्रतोः ।
तत्स्वाप्नान्निजबन्धूंस्त्वं न हि शोचसि वै कुतः ॥ ८० ॥
केवलं भावनामात्रात् सत्यता जगति स्थिता ।
शून्यताभावनेनाऽपि शून्यं निष्प्रतिघं भवेत् ॥ ८१ ॥
तुम-जैसे भ्रान्त पुरुषोंको वह अप्रमाणदर्शन करनेकी दृष्टि प्राप्त नहीं
है। जो महापुरुष ज्ञेयतत्त्वको पहचानते हैं उन्हें स्पष्ट ही यह अप्रमा-
णदर्शनकी दृष्टि प्राप्त है ॥ ७५ उ०-७६ ॥
इसलिये यह दृश्यप्रपञ्च स्वप्नकालके दृश्यके समान ही है।
स्वप्नमें भी समान रूपसे दीर्घकालकी प्रतीति होती ही है ॥ ७७ ॥
अतः स्वप्नकालमें स्वप्नसृष्टि भी बाधित न होनेवाली, प्रयोजन-
की पूर्ति करनेवाली और स्थिर ही है। जाग्रत्सृष्टि भी सर्वथा उसके
समान ही है ॥ ७८ ॥
जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें ‘यह जाग्रत् है’ ऐसा भान स्पष्ट होता
है उसी प्रकार स्वप्नावस्थामें भी जागृतिका ग्रहण होता ही है।
[ अर्थात् उस समय भी यही जान पड़ता है कि यह जाग्रत् है ] ॥ ७९ ॥
राजन् ! ऐसी स्थितिमें भला, जाग्रत् और स्वप्नका अन्तर कहाँ
है ? फिर तुम अपने स्वप्नावस्थाके सम्बन्धियोंके लिये शोक क्यों
नहीं करते हो ? ॥ ८० ॥
केवल भावनासे ही संसारमें सत्यता बनी हुई है। यदि इसमें
शून्यताकी भावना की जाय तो यह शून्य और निष्प्रतिघ ( सब प्रकार
की रुकावटसे रहित ) जान पड़ेगा ॥ ८१ ॥

१८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भावना ह्यप्रमाणत्ववैधुर्येण स्थिरीकृता ।
भवेत्तदात्मभावेन सत्यमेतन्महीपते ! ॥ ८२ ॥
निदर्शनं त्वत्र चेदं यज्जगद् दृष्टमेव ते ।
इमं शैलं परिक्रम्य यौ हि पश्याव सम्प्रति ॥ ८३ ॥
इत्युक्त्वा नृपतिं हस्ते गृहीत्वा परिचक्रमे ।
परिक्रम्य गण्डशैलं राज्ञा सह समेत्य तु ॥ ८४ ॥
पुनः प्राह महासेनं मेधावी मुनिनन्दनः ।
राजन् ! दृष्ट एष शैलः पादगव्यूतिमात्रकः ॥ ८५ ॥
दृष्ट श्वास्य गर्भे ते लोकः सुविततः स्फुटः ।
एष जाग्रदुत स्वप्नः सत्यो मिथ्यात्मकोऽपि वा ॥ ८६ ॥
शैललोके यदिनेकं तदत्र द्वादशाऽर्बुदाः !
वत्सरास्त्वनुभूतास्ते सत्यासत्ये विवेचय ॥ ८७ ॥
विवेचनं नास्य भवेत् स्वप्नयोर्भिन्नयोरिव ।
वह भावना इसमें अप्रमाणत्व (असत्यत्व) बुद्धि न होनेके कारण
पुष्ट हो गयी है। राजन् ! आत्मभाव होनेपर तो यह सचमुच भावना ही
जान पड़ेगी ॥ ८२ ॥
इस समय तुमने जो संसार देखा है वह इसमें दृष्टान्त है। [यदि
इच्छा हो तो] इस पर्वतकी परिक्रमा करके अब पुनः देख लें” ॥ ८३ ॥
ऐसा कहकर मुनिपुत्रने राजाका हाथ पकड़कर परिक्रमा की और
राजाके साथ शिलाकी परिक्रमा कर उस महाबुद्धि मुनिपुत्रने महा-
सेनसे पुनः कहा—॥ ८४-८५ पू० ॥
“राजन् ! देखा, यह पहाड़ी केवल चौथाई गव्यूतिमात्र है, किन्तु
इसके भीतर स्पष्ट ही तुमने विस्तृत संसार देखा था। यह जाग्रत् था या
स्वप्न, सत्य था या मिथ्या ?” ॥ ८५ उ०-८६ ॥
पहाड़ीके संसारमें जो एक दिन था वही यहाँ तुम्हारे अनुभवमें
बारह अरब वर्ष हुए। इन दोनों अनुभवोंमें तुम सत्य और असत्यका
निर्णय करो ॥ ८७ ॥
भिन्न-भिन्न दो स्वप्नोंके समान इनका विवेचन नहीं हो सकता।
१. गव्यूति दो कोशको कहते हैं। अतः चौथाई गव्यूति ‘आधा कोश’ हुई।

त्रयोदशोऽध्यायः । १८६
तस्मादेतद्विद्धि जगद्भावनामात्रसारकम् ॥ ८८ ॥
अभाव्यमानं चैतत्तु लीयेत क्षणमात्रतः ।
तस्माच्छोकं जहि नृपावेक्ष्य स्वाप्नसमं जगत् ॥ ८९ ॥
स्वाप्नचित्रभित्तिभूतं स्वात्मानं संविदात्मकम् ।
दर्पणप्रतिमं मत्वा संस्थितोऽसि यथा तथा ॥ ९० ॥
जाग्रच्चित्रदर्पणं चावेह्यात्मानं चिदात्मकम् ।
परमानन्दितस्वान्तो भव शीघ्रं महीपते ! ॥ ९१ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकदर्शनं नाम
त्रयोदशोऽध्यायः ॥
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[ अर्थात् इनमेंसे एकको सत्य तथा दूसरेको असत्य नहीं कह सकते ] ।
अतः सार यह है कि यह जगत् भावनामात्र है ॥ ८८ ॥
यदि भावना न हो तो यह एक क्षणमें ही लीन हो जाय । इसलिये
राजन् ! शोक त्याग दो, इस जगत्‌को स्वप्नका संसार ही समझो ॥८९॥
इस स्वप्नसंसाररूप चित्रकी भित्ति है अपना ही चित्स्वरूप आत्मा ।
उसे दर्पणकी तरह इसका आश्रय समझकर तुम चाहे जैसे रहो ॥६०॥
पृथिवीपते ! अपने चेतन आत्माको जाग्रत् अवस्थारूप चित्र ( प्रति-
बिम्ब ) का दर्पण जानकर तुम अपने अन्तःकरणमें परमानन्दका
अनुभव करो' ॥ ६१ ॥
त्रयोदश अध्याय समाप्त ।
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चतुर्दशोऽध्यायः
इत्याकर्ण्य मुनिवचो विचार्य शुभया धिया ।
जगत्स्थितिं स्वाप्नसमां ज्ञात्वा शोकं जहौ द्रुतम् ॥ १ ॥
धैर्यमालम्ब्य निःशोको भूयोऽपृच्छन्मुनेः सुतम् ।
मुनिपुत्र ! महाबुद्धे ! त्वं पराऽवरदर्शनः ॥ २ ॥
ततोऽप्यविदितं किञ्चिन्मन्ये स्यादिति लेशतः ।
पृच्छामि यदहं तन्मे कृपया वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
भावनाप्रभवं ह्येतत् सर्वं वदसि तत् कथम् ।
मया भूयो भाविते च न वहिः सर्वथा भवेत् ॥ ४ ॥
त्वया तु भावनासिद्ध्या शैललोकः प्रकल्पितः ।
अथाऽपि देशः कालश्च युगपद् द्विविधः कथम् ॥ ५ ॥
चतुर्दश अध्याय ॥ १४ ॥
सङ्कल्पसिद्धि और उसका साधन
मुनिपुत्रके ये वचन सुनकर महासेनने शुद्ध बुद्धिसे विचार किया
और इस जगत्की स्थितिको स्वप्नके समान समझकर तत्काल शोक
त्याग दिया ॥ १ ॥
फिर धैर्य धारण कर शोकहीन हो मुनिपुत्रसे पूछा, "परमबुद्धिमान्
मुनिपुत्र ! आप परावरदर्शी हैं। [ आपको इन्द्रियातीत और इन्द्रिय-
गोचर दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंका ज्ञान है ] ॥ २ ॥
तथापि मुझे अभी जो थोड़ी-सी बात अविदित-सी जान पड़ती है
उसके विषयमें कुछ प्रश्न करता हूँ, आप उसे कृपापूर्वक बताइये ॥ ३ ॥
आप कहते हैं कि यह सब भावनासे ही हुआ है, सो कैसे ?
क्योंकि मैं जिसकी भावना करता हूँ वह वस्तु तो बाहर बिलकुल
दिखायी नहीं देती ॥ ४ ॥
भावनाकी सिद्धि होनेके कारण आपने अवश्य पहाड़ीके भीतर स्थित
लोककी कल्पना कर ली है। तथापि यह लोक और शिलालोक साथ
होनेपर भी इनमें दो प्रकारके देश और काल क्यों हैं ? ॥ ५ ॥

चतुर्दशोऽध्यायः। ' १६१
तत्राऽसत्यमन्यतरत् कतमं तन्ममेरय ।
इति पृष्टो मुनिसुतः प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ६ ॥
सङ्कल्पो भावना प्रोक्ता सिद्धाऽसिद्धेति सा द्विधा ।
सिद्धिर्विकल्पासम्भेदो(ऽ)विकल्पस्त्वेकनिष्ठितेः ॥ ७ ॥
ब्रह्मभावनया पश्य जातं जगदिदं ननु ।
एतत् सर्वैः सत्यरूपं भावितं सुदृढत्वतः। ८ ॥
तथा स्वसङ्कल्पभवे नास्ति कस्याऽपि भावना ।
विकल्पसम्भेद एषोऽसिद्धा तस्माद्विभावना ॥ ९ ॥
भावनायाः सिद्धिरत्र बहुधा संस्थिता भवेत् ।
जन्मना मणिना तद्वदौषधेन च योगतः ॥ १० ॥
तपसा मन्त्रसिद्ध्या च वरेण च भवेन्नृपः ।
जन्मना ब्रह्मणः सा वै मणिना यक्षरक्षसाम् ॥ ११ ॥
औषधेन तु देवानां योगिनां योगतो भवेत् ।
तपसा तापसानां सा मान्त्रिकाणां तु मन्त्रतः ॥ १२ ॥
इनमें एक तो असत्य होगा ही, सो कौन-सा है—यह मुझे बतला-
इये।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥
“भावना संकल्पको ही कहते हैं और वह सिद्ध एवं असिद्ध दो
प्रकारकी होती है। जिस भावनामें विकल्प (संशय) का संश्लेष नहीं
होता वह सिद्ध होती है, विकल्प न होनेका अर्थ है किसी एकमें लग
जाना ॥ ७ ॥
इस संसारको तुम निश्चय ही ब्रह्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ
समझो। अत्यन्त दृढ़ताके कारण सबने इसे सत्य मान रखा है ॥ ८ ॥
तथा तुम्हारे अपने संकल्पसे उत्पन्न हुए संसारमें किसी दूसरेकी
सत्यत्व भावना नहीं होती ! अतः इसमें [यह सत्य नहीं है] ऐसे तुम्हारे
ही विकल्पका मेल रहनेके कारण यह भावना सिद्ध नहीं होती ॥ ९ ॥
यहाँ भावनाकी सिद्धि अनेक प्रकारसे होती है। राजन् ! यह
भावनासिद्धि जन्मसे, मणिसे, ओषधिसे, योगसे, तपसे, मन्त्रसिद्धिसे तथा
वरके द्वारा भी हो सकती है ॥ १०-११ पू० ॥
यह जन्मके द्वारा ब्रह्माको, मणिसे यक्ष और राक्षसोंको, ओषधिसे

१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विश्वकर्ममुखानां च वरप्राप्त्या हि साऽऽभवत् ।
सङ्कल्पिते तथा भाव्यं पूर्वविस्मरणे सति ॥ १३ ॥
स्थिरं तावद्भवत्येव यावत् पूर्वं न हि स्मरेत् ।
एवमेव निर्विकल्पभावना यदि सुस्थिरा ॥ १४ ॥
अनिच्छया विकल्पस्य यावत् सम्भेदनं न हि ।
तावत् सा भावना सिद्धा साधयेद्वै महाफलम् ॥ १५ ॥
सम्भेदात्तु विकल्पेन न सिद्धा तव भावना ।
भावनां साधय क्षिप्रं यदि स्रष्टुं समीहसि ॥ १६ ॥
शृणु राजन् ! देशकालद्वैविध्यं वदतो मम ।
अव्युत्पन्नोऽसि लोकस्य व्यवहारे ह्यतस्तव ॥ १७ ॥
एतच्चित्रं भासते वै शृणु सम्यग् ब्रवीमि ते ।
जगद्भावस्वभावोऽयं विविधत्वेन भासनम् ॥ १८ ॥
देवताओंको, योगसे योगियोंको, तपसे तपस्वियोंको मन्त्रसे मान्त्रिकोंको
और वरसे विश्वकर्मा आदिको प्राप्त हुई थी ॥ ११ उ०-१३ पू० ॥
संकल्प ऐसा होना चाहिये कि मैं संकल्प कर रहा हूँ—इस पूर्व-
संकल्पकी भी स्मृति न रहे। ऐसा संकल्प तबतक स्थिर रहता है
जबतक कि पूर्वसंकल्प न फुरे ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥
इस प्रकार ही जब निर्विकल्प भावना अच्छी तरहसे स्थिर हो
जाती है और इच्छा न होनेके कारण ही जबतक उससे विकल्पका
संसर्ग नहीं होता, तबतक वह सिद्ध भावना बड़ा भारी फल प्रदान
करती रहती है ॥ १४ उ०-१५ ॥
विकल्पका सम्पर्क रहनेके कारण ही तुम्हारी भावना सिद्ध नहीं हुई
है। अतः यदि तुम सृष्टिरचना करना चाहते हो तो तुरन्त ही अपनी
भावनाको सिद्ध करो ॥ १६ ॥
राजन् ! सुनो, अब मैं इस लोक और शैललोकके देश-कालोंकी
द्विविधताका रहस्य बतलाता हूँ। क्योंकि तुम लोकव्यवहारको ठीक-ठीक
नहीं समझते हो इसीसे तुम्हें यह बात विचित्र जान पड़ती है। मैं तुम्हें
यह स्पष्ट करके समझाता हूँ, सुनो। इस तरह अनेक रूपसे भासना
तो जगत्का स्वभाव ही है ॥ १७-१८ ॥

चतुर्दशोऽध्यायः। १६३
एक एव हि सर्वस्य प्रकाशो द्विविधः स्थितः ।
दिवान्धानामान्धकार इतरेषां तु भासकः ॥ १९ ॥
जलं मनुष्यपश्वादेः श्वासस्य प्रतिरोधकम् ।
मत्स्यादीनां बहिः श्वासप्रतिरोधो जले न हि ॥ २० ॥
अग्निर्दहति मर्त्यादींस्तं भक्षयति तित्तिरिः ।
वह्निर्नश्यति तोयेन स जले ज्वलति क्वचित् ॥ २१ ॥
एवं सर्वे जागतास्तु भावा द्वैरूप्यतः स्थिताः ।
एवं सेन्द्रियधृत्तान्तास्त्वन्ये कैऽपि निरिन्द्रियाः ॥ २२ ॥
स्वभावतो विरुद्धा वै शतशोऽथ सहस्रशः ।
अत्रोपपत्तिं वक्ष्यामि समाहितमनाः शृणु ॥ २३ ॥
एते हि चाक्षुषा भावाश्चक्षुर्विंकृतिमात्रकाः ।
न चाक्षुपादंशतोऽन्यद् दृश्यमस्ति क्वचिद्बहिः ॥ २४ ॥
प्रकाश सबके लिये एक ही होता है, किन्तु वह दो रूपमें ज्ञान
पड़ता है। उल्लू आदि दिनमें अन्धे रहनेवाले जीवोंको वह अन्धकाररूप
है तथा दूसरोंको ज्योतिस्वरूप ॥ १९ ॥
जल मनुष्य और पशु आदिके लिये तो साँस लेनेमें बाधा डालने-
वाला है, किन्तु मत्स्यादिका श्वास बाहर निकलनेपर तो घुटता है पर
जलमें नहीं ॥ २० ॥
अग्नि मनुष्यादिकों तो जला देती है, पर तीतर उसे खा जाता
है। तथा आग बाहर होनेपर तो जलसे बुझ जाती है, किन्तु कहीं
बड़वानल कुण्डादिमें वह जलमें रहती भी है ॥ २१ ॥
इस प्रकार जगत्के सभी पदार्थ दो रूपोंमें स्थित हैं। इसी प्रकार
कुछ पदार्थ तो ऐसे हैं जो इन्द्रियोंसे जाने जा सकते हैं और कुछ
ऐसे भी हैं जो इन्द्रियोंके विषय नहीं होते ॥ २२ ॥
इस तरह सैकड़ों-हजारों पदार्थ परस्पर स्वभावसे विरुद्ध हैं। मैं
इसकी उपपत्ति बतलाता हूँ, सावधान चित्तसे सुनो ॥ २३ ॥
ये नेत्रोंसे प्रतीत होनेवाले पदार्थ केवल नेत्रके विकार ही हैं। नेत्रों-
का दृश्य नेत्रोंके अंशसे भिन्न बाहर और कहीं कुछ भी नहीं होता ॥२४॥